किसी डिस्को में जाएं…

बहुत कम ब्लाग्स ऐसे लिखे जाते हैं जिनकी प्रतिक्रिया में बहुत कुछ कहने का मन हो. आज शुएब का ब्लाग “डिस्को में पहली बार” पढ कर लिखने का मन हुआ. शुएब के ब्लाग्स से अधिक परिचित नहीं हैं उनको ये बता दूं की इनके संस्कारों और समझ के बीच का अंतर्द्वद्व इनके लेखों में दिखता है.

शुएब भाई पहली बार किसी नाच-घर में गए. वो भी दुबई के किसी “डिस्को” में. वे जिस अनुभव से गुज़रे उन्होंनें बडी ईमानदारी से बढिया लेख में लिखा है. अगर अभी तक आपने शोएब का लेख नही पढा है तो आगे पढने से पहले उसे बांच लें.

एक पाठक के रूप में मैं उनकी लेखनी, उनकी प्रतिक्रिया और उनके अंदाज़ से उनके स्वाभाव के बारे में काफ़ी कुछ जान सका. अपने आप के बारे और अपनी सोच को इतनी सरलता से लिखने वाला एक भलामानुस ही हो सकता है. शुएब खुद के बारे में ही नही लिख रहे ऐसा लगता है की वो उन तमाम लडकों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मध्यमवर्गीय भारतीय संस्कारों में पले बढे और एक दिन किसी विदेशी भूमी पर पहूंच गए.

सबसे पहले टेक्निकल मुद्दे से निपट लें. डिस्कोथेक – यह शब्द अब पश्चिम में नाचघर के लिए कम प्रयोग में आता है “क्लब” या “नाईट क्लब” अधिक. डिस्कोथेक या नाचघरों मे बजाए जाने वाले संगीत का अपने आप में एक विधा बन जाना और फ़िर धीरे धीरे मुख्यधारा से हल्का पड जाना इसका कारण है. आज “डिस्को” नाचगाने की एक विधा के रूप मे अधिक जाना जाता है. तो शुएब तथाकथित डिस्कोथेम में गए वहां जा के डिस्को नाचे या हिंदी रीमिक्स पे भांगडा किया शोध का विषय हो सकता है. मुद्दा ये की वे नाचघर में गए.

उनके ब्लाग पर मेरे विचार एक टिप्पणी से अधिक लंबे हैं सो लेख ही बन गए हैं आशा है वे हमेशा की तरह खुले दिल से पढेंगे!

डिस्को मे घुसने का पास खरीदने गए तो अजब ही आफर है लडकी साथ हो तो ज़बरदस्त डिसकॉऊंट भी है – कितनी बेशर्मी की बात है हम पूरे आठ मित्र मगर एक भी लडकी साथ नही लानत है हमारी ज़िन्दगी पर।

वैसे ये सचमुच गहरे चिंतन का विषय है की आठ लडकों में से एक की भी कोई महिला मित्र नहीं – समस्या की जड ये ही है!

लाईफ मे पहली बार अपना पाक कदम डिस्को मे रखा – ऐ खुदा मुझे माफ कर – मगर ये क्या? खुदा खुद डिस्को मे नाच रहा है।

भई ना वो नापाक हैं ना आप पाक हैं. सभी आदमी हैं – जो धरती पर पाए जाने वाले जानवर की एक किस्म है – होमोसेपियन्स. लेबल चाहे कोई लगा हो दाढी बढी हो या कटी हुई हो. प्रकृति प्रदत्त यौन आकांक्षाएं कम हो या ज्यादा हों पर सारे एक सरीखे. और ये किसने कह दिया की शरीफ़ आदमी नाच गा नही सकता? खुदा को नाच पसंद है – कभी किसी गुलाब की डाली को हवा में झूमते देखो – उसका पूरा वजूद इबादत कर रहा होता है!

बाकी मित्रों को डिस्को का ऐसा तजुर्बा है कि जैसे ये उनका दूसरा घर हो, मगर मैं अनाडी अंदर घुस्ते ही अंधेरे मे लोगों को धक्का मारते ठोकरें खाते जैसे भूकंप आगया हो, चारों तरफ बडे बडे सपीकरों पर ज़ोरदार म्युज़िक – समझ मे नही आ रहा कि कहां जाकर क्या करना है।

नाईट क्लबों और कसीनों में घडियां और खिडकियां नहीं होतीं क्योंकी वे चाहते हैं आप अधिक से अधिक समय वहां रहें और पैसे खर्च करते रहें – रात का माहौल बना रहे.

जवान तो जवान बुज़र्ग लोग भी तशरीफ फर्मा थे और उनके साथ कम उम्र की लडकीयां बिलकुल बीटी या पोती जैसी मगर उनकी हरकतें ऐसी कि इन पाक रिश्तों का नाम नही दे सकते। ऐसे भी लोग आए थे जिन्हें लोग सलाम करते हैं इज़्ज़त देते हैं शरीफ आदमी समझते हैं मगर किसी को ये नही मालूम कि वो इस वक्त डिस्को मे हैं।

इज्जतदार आदमी नाच नही सकता क्या? लेकिन नाचघर के नाम पर कोई वेश्यालय चल रहा हो और आप वहां जा कर परेशान हो रहे हों तो सही जगह चुनें जाने ले लिए! वैसे भी देसी लोग किसी भी अच्छे कंसेप्ट की वाट लगाने मे आगे होते हैं डिस्को के नाम पर कोई गलीज़ अड्डे बना दिये हों तो क्या अचंभा!

शुएब भाई, बात है डिमान्ड सप्लाई की. जब आप जैसे यूवा इस्लामिक देश में पैसा कमाने जाएंगे और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए कोई गर्ल-फ़्रैंड भी नही होगी तो उनकी यौन कुंठाओं के चलते वे क्या क्या नहीं कर बैठेंगे! “पडोसी के चूल्हे से आग लईले” वाली हरकत की तो सरकार पता नहीं कौन से अंग काट डालेगी. अब ऐसे में इतने सारे सेक्स के मारे फ़्रस्टेटेड भूखे लोगों को निकास चाहिए! नाईट क्लब का तो नाम है वे दोहरी सेवाएं दे रहे हैं. सरकारों और धरम के ठेकेदारों नें मूह दूसरी तरफ़ किया हुआ है. करना ही पडेगा – शांती भी बनाए रखनी है और आप जैसे जवान लोगों की सारी उर्जा जो चूसनी है उन्हें चन्द दिनारों/फ़िनारों के लिए.

उनके चेहरों से लग रहा है कि वो सब यहां खूशी मनाने और मौज करने आए हैं बस और कुछ नही। हर टाईप के लोग हिन्दू मुस्लमान सिख ईसाई और हर तरह के लोग शरीफ कमीने मासूम दिखने वाले लम्बी दाढी वाले, अमीर और गरीब मतलब एक हमाम मे दुनिया की हर कौम के लोग नाच रहे थे।

एक शरीफ़ मुस्लिम जिसके लिए रक्स हराम हो और शराब बुरी शै अगर किसी नाईट क्लब में पहुंच जाएगा तो उसका क्या हाल होगा समझा जा सकता है. फ़िर दुबई जैसी जगह पर जहां पर रोजमर्रा के जीवन पर इस्लाम हावी हो. फ़िर वो ये देखे की लोग ये तथाकथित हराम काम लोग बहुत सुगमता से कर रहे हैं. मजे ले कर कर रहे हैं. हां भई कर रहे हैं. लेकिन उनमें से कई कुरूप भी दिख रहे हैं पता है क्यों?

जिस भी काम से ग्लानी जुडेगी वो कुरूप हो जाएगा. चाहे गाना हो नाच हो या सेक्स अगर उसको करते समय गिल्ट होगा तो उसका आनंद खो जाएगा. आप कभी किसी सूफ़ी को मस्ती में झूमता हुआ देखें, बीहू नृत्य करती बालाओं को या गिद्दा डालती लडकियों को देखें, किसी बच्चे के मनपसंद खिलौना पा जाने पर उछल कूद मचाना देखें, मोर का बारिश में झूमना देखें – ये नाच सुंदर है आलौकिक है और जो हरकतें आप “डिस्को” में देख कर आए हैं उससे अलग है. भाव की अभिव्यक्ति पर रोक ही मानवता विरोधी है और ऐसी किसी भी कंडिशनिंग को उतार कर फ़ेंक दो – फ़िर देखो नाच का मजा. लोग नाचते तो हैं नाच में उतर नही पाते – क्योंकी गिल्ट नही जाता. चिपका रहता है – जैसे बिना नहाए इत्र लगाने पर इत्र और पसीना मिल जाए और अजीब सी गंध आए – वैसा ही कुछ मिश्रित भाव आ जाता है चेहरे पर! हैना? (फ़ंडा मेरा नही है ओशो से मारा हुआ है लेकिन बात सही है)

पहली बार डिस्को आकर मुझे जो शर्म और डर मेहसूस हआ मगर अब सोच रहा हूं कि यहां हर टाईप के लोग आए हैं जो अपने धर्म ज़ात और ईमान को साईड मे रख कर थोडी देर के लिए सब एक साथ खुशी मे नाच रहे हैं मगर यही लोग डिस्को से बाहर निकलने के बाद शरीफ इनसान होने का नटक क्यों करते हैं।

शर्म आपको इसलिए आई की संस्कारजनित ग्लानी आप पर हावी हुई. डर आपको इसलिए लगा की कहीं आपको ये सब अच्छा ना लगने लगे. आपने हकीकत देखी है – नाच, संगीत, मुस्कुराहट और खुशी हम सब में है. दुनिया के तमाम कवि कह गए की मन्दिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला.

एक लडकी से बहुत देर तक मीठी मीठी प्यार भरी बातें हुईं जब वो काम की बात पर आई तो मेरे पैर कांप उठे (नही चाहिए ये बीमारी)

अब मुद्दे की बात ये है की अच्छे और बुरे नाचघरों में फ़र्क करना सीखें. अच्छे नाचघर पता नहीं आपको दुबई में मिलें या नही – लेकिन अच्छे नाचघरों की परिभाषा ये है की ऐसे नाचघर जहां देहव्यवसाय ना होता हो. मादक द्रव्यों से दूर हो और आप अपने किसी पारिवारिक सदस्य को वहां लेजाने में लज्जित महसूस ना करें. कई बार अच्छे बार या रेस्त्रां में डांस नाईट्स होती हैं – वे एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं. कामन सेंस का प्रयोग करें जैसे किसी अजनबी को आपके साथ वाली महिला को कोई पेय ना पिलानें दें. आप हर धुन या किसी और की तय की गई धुन पर ना नाचें – अपने मनपसंद धुनों पर ही नाचें – फ़ोकट झटके मारना हो तो अलग बात है, अगर मदिरा पान करें तो एक डेजिग्नेटेड ड्राईवर को साथ रखें जो उस दिन ना पिए और मित्र बारी बारे से ये जिम्मेदारी लें. अपने साथियों का ध्यान रखें और किसी को भी सीमा से अधिक ना पीनें दें ऐसे छोटे मोटे नियम बना कर चलें – आदी!

दूसरी बात – परिवार वालों को आपकी हदें पता होनी चाहिए और आप पर पूरा भरोसा भी. अगर कोई हद बढानी है तो परिवार वालों को पहले बताएं फ़िर मस्ती करें और सुरक्षित घर आएं. मसलन अगर शराब पीने जा रहे हों तो मां को बता कर जाएं – “मैं ठीक डेढ पटियाला पेग [फ़लानी शराब] के मारने जा रिया हूं तीन घंटे बाद नाच के आ कू फ़ोन करूंगा. साथ में भरोसे वाले चार यार हैं और डेजिग्नेटेड ड्राईवर है.” घर आ कर मां को फ़ोन करें थेंक्यू! घर वालों को अगर ये पता हो की आप जो भी करते हैं खुल्लेआम बता कर भरोसे में ले कर करते हैं तो आपका मजा दुगुना हो जाता है – ये अपना फ़ंडा है. शराब को आदत कतई ना बनाएं. और अगर घर के संस्कारों में कोई काम बिल्कुल वर्जित है तो ना ही करें!

10 responses to “किसी डिस्को में जाएं…”

  1. Pratik Pandey

    इति ओशोरूपेण ई-स्वामीस्य प्रवचनम् समाप्त: :)

  2. श्रीश । ई-पंडित

    अच्छे सुझाव हैं, मैं आप से सहमत हूँ डिस्को जाना कोई बुरी बात तो नहीं बशर्ते वह देह-व्यापार, मादक-पदार्थों आदि का अड्डा न हो।

  3. समीर लाल

    जैसा नाम वैसा काम—वाह वाह, ई स्वामी जी का ई प्रवचन सुन कर मजा आ गया…बधाई!!

  4. डा प्रभत टन्डन

    क्या बच्चे(शुएब) की जान ले लोगे स्वामी महाराज!:lol:

  5. संजय बेंगाणी

    ई-प्रवचम के बाद ई-दक्षिणा समर्पियामी. जय हो.
    शुएबभाई ये सब बातें गांठ बाँधलें.
    जहाँ हिन्दू-मुस्लिम, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरूष बीना भेदभाव ना-गा सके वो ही खुदा का सच्चा घर है.

  6. SHUAIB

    बहतरीन और अच्छे अंदाज़ मे सुझाव के लिए बहुत बहुत धन्यवाद स्वामी जी

  7. सागर चन्द नाहर

    पठनीय लेख,
    अन्तिम पैरा में एक संशय है कि क्या कोई यह अपनी माँ को बता सकेगा ( खासकर भारतीय माँ को) कि माँ में शराब पीने जा रहा हूँ और रात को डेढ़ बजे तक वापस आऊंगा?
    यह मेरे विचार या संस्कार नहीं है और ना ही मैं शराब पीता हूँ, पर मन में एक संशय है, समाधान करें।

  8. अनुराग मिश्र

    इस्वामी जी, इतना बेहतरीन चिट्ठा लिखा है आपने की, दिल ले लिया कसम से। कुछ बातें मानना मुश्किल है लेकिन है एकदम सही।

  9. विनीता

    ई स्वामी जी बड़े ही खूबसूरत ढ़ग से सुझाव दिए है। शुएेब जी को धन्यवाद आपको ये लेख लिखने को उकसाने के लिए ओर आपको धन्यवाद आज ८ या ९ साल बाद मुझे हिन्दी मे कुछ लिखने को उकसाने के लिए इतना अच्छा लेख लिख के।

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