मैं अपनी संस्कृति से गहरी जुडी हुई विशेषताओं को पुरुस्कृत करने का पक्षधर हूं. एक गहरे अलसाए अंतर्द्वंद्व से गुजरने के बाद जिस नैसनल केरेक्टरिस्टिक या राष्ट्रीय गुण को पुरुस्कृत करने का ठेका मन मार कर उठाया है, वो है “उदासीनता”.
सबसे पहले तो ये मानता हूं की मैं इस विषय में कमजोर निकला, क्या करूं मैं उदासीनों के प्रति उदासीन नही रह पाया हूं और अपनी उदासीनता को ताक पर रख दिया और पुरुस्कार की घोषणा कर दी! खैर प्रस्तुत है – अगर अंग्रेजी में बोलूं तो “ई-स्वामी इन्डिफ़रंस अवार्ड २००६”!
वैसे तो पुरुस्कार बंटते रहे हैं. लोग पुरुस्कृत हो रहे हैं उन चीज़ों के लिए जिन्हें पुरुस्कृत करना आधारभूत रूप से गलत है!
मसलन अच्छे अभिनय के लिए हॉलीवुड में ऑस्कर अवार्ड दिये जाते हैं. किसी और का चरित्र कितनी सफ़लता से निभाया इसलिये पुरुस्कार. जो आप नहीं हो वह बनने का स्वांग आपने सफ़लता से किया है – ये लो जी पुरुस्कार! देखिये, अपने लाजिक के हिसाब से तो एक बढिया झूठे आदमी को पुरुस्कृत कर दिया गया. भला ये भी कोई बात हुई? लेकिन ये दुनिया है यार, ऐसे ही चलती है. हमारी संस्कृति में ‘झूठ बोलना पाप है नदी किनारे सांप है’ बचपन में ही सिखा दिया जाता है. तो अभिनय के लिए पुरुस्कार देना हमारी संस्कृति के खिलाफ़ हुआ ना!
दूसरी ओर, उदासीनता, जिसके लिये अब तक कोई पुरुस्कार नहीं था, हमारी संस्कृति का निचोड है -
“अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काज
कह गए दास मलूकजी सबके दाता राम”
“ज्यूं की त्यूं धर दीन्हिं चदरिया”
चदरिया झीनी रे झीनी.. झीनी झीनी”
“ना उधौ का लेना ना माधौ का देना”
अगर शुद्ध हिंदी में बोलूं तो (मतलब धीरे धीरे दो बार पढना पडेगा) – अपने परिवेश से भावहीन निर्लिप्तता एक महान साधना है. ये विरक्ति का व्यव्हारिक रूप है. जो हर एक के बस की बात नहीं है! (हां, फ़िर पढ लो एक बार)
आगे जोडना चाहूंगा की उदासीनता के साधक की खाल इतनी मोटी होती है, की वो अपने परिवेश से अनभिज्ञ ना हो कर भी उस के प्रति अप्रतिक्रियात्मक होता है. वो परिवेश में रह कर भी उस से परे होता है. उसके मरने के बाद और जीने के पहले वाली दुनिया में साधक का अस्तित्व पाखाना भरने के अतिरिक्त कोई जोड-घटा नही करता.
“लाई हयात आए कज़ा ले चली चले
अपनी खुशी से आए ना अपनी खुशी चले” का अति-परिष्कृत रूप!
जैसा की हमेशा से होता आया है – पश्विमीकरण के चलते इस परंपरागत भारतीय विरासत पर, हमारी उदासीनता पर, आक्रमण होते रहे हैं.
उदासीनता पर नाक भौं सिकोडने वाले पश्चिम-वालों की सोच है की बुराई की सफ़लता के लिए भले आदमी की उदासीनता के अलावा और क्या चाहिए? जैसा की जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का एक प्रसिद्ध कथन है – “उदासीनता अमानवीयता का अत्तर[निचोड/सत्व] है!” या खलील जिब्रान नें कहा है की “लालसा आधा जीवन है निर्लिप्तता आधी मृत्यु” इस तरह के कथन हमारी संस्कृति पर परोक्ष प्रहार करते हैं – चूंकी हमारी संस्कृति में निर्लिप्तता ही आकांक्षा का एंटी-डाट है!
आपने भी नोट किय होगा की ये मूरख लोग तकनीकी तौर पे भले ही आगे हों दर्शन में हमसे कितने पीछे हैं! भक्तिधारा के उदासीनों से हम मालवावासी कितना सीखे हैं. हमारे मालवा में एक से एक कैच-फ़्रेज़ बोले तो पापुलर तकियाकलाम हैं – “आपणें कईं करणों?”, “अब क्याआ करो सा’ब” से लेकर “सब चल्ताए बाबा” तक में निर्लिप्तता की महिमा फैली है!
खैर उदासीनता की महिमा का बखान कर चुकने के बाद औपचारिक रूप से निर्विवाद विजेता की घोषणा भी कर दी जाए -
२००६ के उदासीन पुरुस्कार के विजेता हैं – “भारत का पुलिस बल” – हर क्षेत्र के हर राज्य की पुलिस!
साल के शुरु से रह कर आखीर तक भारतीय पुलिस नें उदासीनता के क्ष्रेत्र में नए मानदंड स्थापित किए हैं. यह कहना अतिशयोक्ति ना होगी की उन्हें पुरुस्कृत करके इस पुरुस्कार का ही सम्मान बढा है!
वैसे तो भारतीय पुलिस की उदासीनता की प्रेरक कथाएं आपने सालभर अखबारों और पत्रिकाओं में पढी ही होंगी लेकिन पुरुस्कार देते समय तीन का संक्षिप्त उल्लेख करना जरूरी है -
१) दिल्ली पुलिस अपने ही कमिश्नर के कारनामों के प्रति निर्लिप्त है. दिल्ली पुलिस कमिश्नर के.के. पॉल हर बडे कांड
में – जेसिका लाल हत्याकांड, और दविंदर मनचंदा के मानसिक प्रतारण में लिप्त जरूर रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं होती. उनका अपना [अपवाद स्वरूप इमानदार और कर्मठ] सहकर्मी(दविंदर मनचंदा – चित्र) उसके भ्रष्ट अधिकारियों के द्वारा किए गए षडयंत्र के चलते झूठे आरोपों की वजह से दो साल से अधिक सस्पेंड रहा, अवसाद ग्रस्त हुआ और आत्महत्या को प्रेरित भी लेकिन दिल्ली पुलिस नें मरने के बाद परिवार वालों की प्राथमिकी तक दर्ज करने से मना कर दिया! जो विभाग अपने ही कर्मियों के जीवन और उनके लिए अपने उत्तरदायित्व के प्रति उदासीन हो चुका हो वह निश्चित ही इस पुरुस्कार का सम्मान बढाएगा.
२) लंबे समय से नोयडा क्षेत्र में नागरिकों के बच्चे अपहृत होते रहे और पुलिस नें प्रथमिकियां भी दर्ज नहीं कीं! जिनमें से अभी तक सत्रह कंकाल हत्यारे के निवास से बरामद हो चुके हैं. देखिए नागरिकों की सुरक्षा के पद पर रहते हुए भी इस प्रकार की निर्लिप्तता का अभ्यास एक महान साधना है! ऐसे साधकों का विरोध करने वाले मृत बच्चों के अभिभावकों को राज्य सरकार नें २-२ लाख का “मुआवजा” दिया. अभिभावकों की भावनाओं के प्रति ये उदासीनता और पुलिस बल की निर्लिप्तता अन्य राज्यों की पुलिस के लिए अनुकरणीय उदाहरण बनी हैं! उल्लेखनीय है की नोयडा पुलिस की अधिकारिक वेबसाईट पर रॉबरी(robbery) को रबरी(rubbery) लिखा जाता है.
३) मुंबई में नव वर्ष की संध्या को गेटवे पर मिड-डे के एक पत्रकार नें पुरुषों की भीड द्वारा एक महिला से अभद्र व्यव्हार किए जाने के चित्र खींचे. चिखती चिल्लाती महिला की आवाज़ नव वर्ष के स्वागत वाले शोर में दब गई. दस मिनट तक जूझने के बाद बडी मुश्किल से महिला अपने मित्र के साथ बच कर वहां से निकली – महिला के वस्त्र फ़ाड दिए गए थे. महिला और उसके मित्र नें कोई पुलिस शिकायद दर्ज नहीं की. वे जानते ही थे की “कुछ होना जाना नहीं है”. उस रात इस प्रकार की अन्य घटनाओं की रिपोर्टें भी आईं लेकिन कोई शिकायत किसी थानें में दर्ज नहीं की गई और की भी किस उम्मीद में जाती – उदासीनता के साधकों की समाधी गहन है! भारत भाग्य विधाता मुंबई पुलिस के राज में भेड की खाल में भेडिये स्वछंदता से विचरण कर रहे हैं. आपको भी ये जान कर प्रसन्नता हुई होगी की मुंबई पुलिस भी पीछे नहीं है. जय हो!
सिद्ध है की भारतीय पुलिस स्त्रियों, पुरुषों बच्चों बडों – अपने विभाग वालों और नागरिकों सब से ही निर्लिप्त है और इस पुरुस्कार के सच्चे हकदार भी! भारतीय पुलिस को बधाई और नमन – साधू! साधू!!





बहुत ही धासूं लेख. गजब का व्यंग्य. मजा आ गया स्वामी जी. बधाई.
धन्य है भारतीय पुलिस और धन्य है उसकी उदासीनता। वह इस पुरुस्कार की सच्ची हकदार है।
ई-स्वामीजी,
बहुत ही बढिया व्यंग्य है, बधाई!
स्वामी जी छा गये धांसू लेख लिख कर, पुलिस की उदासीनता आम जनता के लिये। पैसे, नेता और अभिनेता के आगे पीछे रहने में इनका कोई सानी नही….
स्वामीजी काफी दिनो बाद अपने पुराने रंग मे दिखाई दिये
आप कम लिखते है पर जो लिखते है, जम कर लिखते है. पुलिसवालो ने खतरनाक उदासिनता दिखई है, लगता है दिखाते भी रहेंगे. इससे कम से कम रेकोर्ड में तो अपराध कम होते ही है.
अच्छा व्यंग्य. साधूवाद.
वाह वाह स्वामीजी, छा गए!
पुलिस वालों के बारे में तो लगभग सभी जानते हैं कि वे लोग सिर्फ़ पैसे(घूस वाले) और कुर्सी के यार हैं और फ़ोकट की तन्खव्वाह बटोरते हैं। किसी ने सही कहा था कि पुलिस से बड़ी गुण्डा कंपनी भारत में और कोई नहीं।
बीच में बहुत दिनों तक हिंदी चिट्ठों को देखने पढ़ने का मौका नहीं मिला था, फ़िर श्रीश का ई पँडित नाम से चिट्ठा देख कर धोखा खा गया, उत्साहित टिप्पणी भेजी कि “पर्दे से बाहर आने के लिए बधाई, आप का श्री नाम और श्रीरुप देख कर बहुत खुशी हुई”. उन्होंने उत्तर दिया कि हम तो हमेशा पर्दे से बाहर थे, तो कुछ समझ नहीं आया. आज अचानक तुम्हारा चिट्ठा देखा तो समझ में आया कि उन्हें ई स्वीमी सोच कर लिखा था और तुम्हारा पर्दा तो वैसे का वैसा ही है!
क्या इस्वामी जी। उदासीनता का पुरस्कार तो हम हिन्दुस्तानियों को मिल बाँट कर मिलना चाहिए, फिर भी हमें आपके चुनाव पर गर्व है।
बहुत सही लिखा है।
शायद हमारा सबसे बड़ा दुर्गुण हमारी उदासीनता ही है। आपके लेख ने इस पर अचूक प्रहार किया है।