एक प्रोजेक्ट मैक्सिको में लगाना है उसके स्पैनी भाषा में स्थानीयकरण या लोकलाईज़ेशन का काम चल रहा है. प्रबंधन का काम पकडाया गया है (हमीं मिले थे!). वैसे टीम में काफ़ी लोग हैं लेकिन अनुवादक के बतौर एक मैक्सिकन आया, एक कंपनी में पहले से था. कंपनी वाले बंदे को जैसे ही इस प्रोजेक्ट के बारे में पता चला वो प्रयोगकर्ताओं के प्रशिक्षण के बहाने मैक्सिको घूमने फ़िरने जाने की आस में इधर कूद पडा. हमें भी जरूरत थी – साथ ले लिया गया.
आज अमरीका को अपने साफ़्टवेयर अगर मेक्सिको में भी प्रयोग करने हों तो उन्हें स्पैनिश में अनूदित करना पडता है - मैक्सिकन्स अपने देश में अंग्रेजी बोलने से साफ़ इनकार कर देते हैं वो सीमा पार कर कर के यहां गैर कानूनी रूप से भरे पडे हैं.
जब मेक्सिकन टीम को वैबएक्स डैमों या वेब पर साफ़्टवेयर प्रदर्शन करने का समय आया तो तय हुआ की ये सब स्पैनिश में करना होगा. रात साढे आठ बजे तक काम करते रहे. मुझे अगले दिन के कार्यक्रम की रूप-रेखा दिखायी गयी जो अंग्रेजी में थी. मैंने उसे स्वीकृत कर दिया और कहा इसे भेजा जाए!
अगली सुबह प्रदर्शन की तैयारी में लगा रहा, प्रदर्शन शुरु हुआ अजेंडा देखने के लिए अचानक ई-मेल खोलने पर पाता हूं की रूपरेखा दफ़्तर के लोगों समेत सभी को स्पैनी भाषा में भेज दी गई है – ये क्या चक्कर है? मुझे स्पैनी भाषा पल्ले ना पडे! चलते हुए प्रदर्शन के दौरान मैंने पूछा “अंग्रेजी का अजेंडा कहां है?”
“वहीं है पढिए” जवाब मिला!
देखता हूं की स्पैनी भाषा में सारे शीर्षक हैं और अंग्रेजी को दरकिनार कर दिया गया है – अजेंडा में अंग्रेजी ढूंढनी पड रही है, जैसे किसी गूगल एड से लदे ब्लाग पर लेख खोजना पडता है.
उधर स्पैनिश भाषा के अनुवादकों को मेरे इस प्रश्न किये जाने पर इतनी मिर्ची लगी की उन्होंने प्रदर्शन पूरा होने के बाद मेरी शिकायत मेरे अधिकारी से कर दी - की इसनें हमें प्रदर्शन के दौरान टोका, हमारा मौसम तोडा!
मैनें उनसे पूछा मीटिंग में मात्र ४० प्रतिशत लोग वो हैं जो स्पैनिश जानने वाले हैं बाकी सब अमरीकी हैं और वे सभी महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं प्रोजेक्ट में फ़िर अजेण्डा मात्र स्पैनिश को मुख्य भाषा बना कर क्यों भेजा? अजेंडा भी हमारे प्रोजेक्ट के दस्तावेजों का हिस्सा है उसे पुरालेखों में रखा जाना होता है. कम से कम एक अंग्रेजी की कापी तो बनाई होती! जो लोग प्रदर्शन देखने वाले थे उन्हें भी अंग्रेजी आती है वे मीटिंग्स में बोलते हैं अंग्रेजी अमरीका आने पर ऐसा तो नहीं की अंग्रेजी वाले में कोई नुकसान था! फ़िर मेरी अंग्रेजी अजेंडे को दी गई स्वीकृति और भेजने की बात बोलने के बाद पूछे बिना ये परिवर्तन कैसे कर दिया गया? अंग्रेजी वाला अजेंडा गया कहां? अब आगे से दोनो भाषाओं मे पूरा अजेंडा भेजो – बात खत्म!
वैसे प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही पूरी प्रक्रिया में मैनें इन कर्मचारियों को इस बात से फ़ूले ना समाते देखा था की आज अमरीकी कंपनियों को उनके भाषाई चयन के आगे झुकना होता है – अगर उनके बाज़ारों की हिस्सेदारी चाहिए तो स्पैनिश को अपनाना होता है. मेरे अपने हिंदी प्रेम के चलते मुझे उनके इस भाषा प्रेम पर क्या आपत्ती हो सकती है?
यूं देखा स्पैनिश मूल मैक्सिकन लोगों की भाषा नहीं थी. वो अब स्पैन से आए लोगों, मिश्रित रक्तपंक्तियों और मूलनिवासियों की विभिन्न किस्मों से भरी जगह है. लेकिन सदियों से भाषा स्पैनिश ही है.
लेकिन उनकी अपनी हदें बढाने का आलम ये की स्वामी की नाक के नीचे अजेंडे भी स्पैनिश में भेजने की हरकत हो गई! जीयो बेटा शाबाश, की क्लास लेने की नौबत आ गई!
मेरे अधिकारी नें एकान्त में मुझ से कहा “ये अपनी भाषा से बहुत प्रेम करते हैं!”
मैंने हंसते हुए जवाब दिया – आपकी बोली सीख चुका हूं, अब इनकी भी सीखूं? अगर मेरा प्रतिक्रियात्मक भाषा प्रेम जाग गया तो मुझे वापस अपने देश जाना पडेगा हिंदी में अजेंडा भेजने के जुर्म में! मेरा अधिकारी बोला – वहां पे भी अंग्रेजी ही बोलोगे बबुआ, मुझे पता है तुम नार्थ वाले साऊथ वालों से अंग्रेजी में ही बात करते हो! चाहे मेरा अधिकारी समझे मेरा दर्द, लेकिन हम दोनो इस परिस्थिती पर हंस ही दिए! वो मेरी पीठ थपथपा कर आगे बढ गया.
अब दोनो अनुवादक उस के बाद मुझ से सीधे मूंह बात नहीं कर रहे! लेकिन मैं मन ही मन सोचता हूं की यार काश भाषा-प्रेम का ऐसा जज़्बा हमारे देसियों मे होता तो मेरे ब्लाग पर कितनी अधिक हिट्स पडतीं!
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थोडे दिन पहले की बात है, ऐश्वर्या राय ओपरा विनफ़्री के कार्यक्रम में आ कर कहती हैं – “अमरीका में हम भारतीयों के बारे में अनेकों गलत धारणाएं हैं!”
ओपरा पूछी: “मसलन?”
ऐश बोली: “मसलन ये माना जाता है की हमें अंग्रेजी नहीं आती! हम तो बचपन से ही अंग्रेजी सीखते हैं!”
दर्द भी है तो किस बात का. देखिए आप ये तो ना समझिये की हमें आपकी भाषा नहीं आती – हम २०० साल गुलाम रहे हैं अंग्रेजों के, कुछ तो सीखा ही है हमने संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फ़ारसी आदी बैकवर्ड भाषाएं भूल के! आप लोग जब हमारी वैसी इमेज बनाते हैं हमें बहुत माईंड होता है जी हां.
गोरियां देख रही हैं – आश्चर्य बैकवर्ड इंडिया की ये ऐश्वर्या कितनी पश्चिमीकृत है. ये बात एक भारतीय औरत के लिए गर्व करने की चीज़ है. ऐश्वर्या जी ज़रा उधर से स्पेनिश, फ़्रांसिसी और अन्य भाषाओं के बोलने वालों को देखिये और आत्मावलोकन कीजिए!
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सद्दाम समेत अनेकों तानाशाह अमरीका के चहेते हुआ करते, अफ़गानी उन्हें प्यारे थे. उस तरफ़ वैसे आजकल फ़ार-ए-चेंज बम बरस रहे हैं मगर अपना इंडिया अमरीका का पट्ठा हुआ पडा है! २६ जनवरी को नैसडेक वालों ने थोडी देर ई-तिरंगा फ़हरा दिया, देसी खुश हो गए. अंग्रेजी बोलने वाले पिछलग्गूओं क इतना बडा बना बनाया बाज़ार तैयार मिले तो कौन सा बाजारवादी इस प्रेम का दिखावा नहीं करेगा?
“ये ई-स्वामी जैसों की प्राब्लम ही यही है यार अच्छी चीजों में भी बुरी चीज़ ढूंढ लेते हैं.”
“देखो हमारी सफ़लता को इन्टरनेशनल रिकगनीशन मिल रही है! अच्छा भला उदित-उदित फ़ील होने लगा था की ये फ़िर शुरु.”
मुझे क्यों लगता है की ये भारत की सफ़लता नहीं है, ये अमरीका की सफ़लता है. भारत का कोई भय नहीं है, उस से कोई स्पर्धा नहीं है वो पालतू हो गया है – जैसे कोई निरीह नवयौवना किसी ड्रैकुला से खून चूसवाने को अपनी गर्दन आगे बढा दे! और निश्चिंत ड्रैकुला दांत गडाते हुए कहे “आज तुम्हारी ड्रेस खूबसूरत लग रही है”! नवयौवना बोले “थेंक्यू” … बिल्कुल वैसा मामला है – अपने बाज़ारों पर जैसे पकड हो रही है उप्पर वाला ही मालिक है,बीच में तो बॉम्बे स्टाक एक्सचेंज में नेस्डेक और एनवाईएसई द्वारा निवेश करने की खबरें उड रहीं थी! इनकी असली स्पर्धा तो है संयुक्त यूरोप से, चीन से. उधर किसानों की आत्महत्याएं और त्सुनामी प्रभावित नाविकों के किडनी बेचने की खबरें कहां और कहां न्यूयार्क के चौराहे पर तिरंगा! इस से बडी विसंगती नहीं हो सकती!
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गणतंत्र दिवस की बधाई!






इतने गण फिर भी बिखरा तंत्र – गणतंत्र, पहले तो आप दीवस को दिवस करिये, हमें पता है आप अभी भी मैक्सिको से आये है। रहा सवाल भाषा प्रेम का तो वो तो हमें है ही आपको किसने कहा भारत की भाषा हिन्दी है वो तो बालीवुड की फिल्मों की ये सास बहु के सीरियल की भाषा है। बाकी अपन लोगों की तो मतलबी भाषा है जिस भाषा में काम चल जाये वो अपनी भाषा। आज अंग्रेजी में बात कर रहे हैं कुछ दिनों बाद हो सकता है चीनी (शायद मंडेरियन) में बात करें।
सही लिखे हो स्वामीजी,
हजारों वर्षों की गुलामी ने हमारे जीन खराब कर दिए हैं। हम अभी भी गुलाम है, भीरू हैं।
क्या टिप्पणी करें. जो आपका दर्द है वही हमारा भी दर्द है.
आप वहाँ से हिन्दी में लिख रहें है, हम यहाँ से. बस यही मरहम है.
जय भारत. तस्वीर अच्छी लगी.
स्वामी जी, आपने दिल को छूलेने वाला लेख पोस्ट किया है – आपके दिल का दर्द समझ सकता हूं।
कहीं पढ़ा था,
कनक कणी सी लग रही अंग्रेज़ी की लीद,
हिंदी तेरे देश में मिट्टी तेरी पलीद।
आपका लेख पढ़ कर ऐसा लगा मानो हमारे ही मनोभावों को कोई शब्द प्रदान कर रहा हो।
शुभकामनाएँ स्वीकारें।
स्वामी जी, यह दर्द जो आपके दिल में है, भारत के लाखों-करोड़ों लोगों में है लेकिन उसकी दवा यही है कि हम अपने जीवन और कैरियर में हिन्द, हिन्दी और हिन्दुस्तानी के लिए अधिकाधिक काम करने की जिद बनाए रखें। भारत के सरकारी तंत्र में, जहाँ चारों तरफ अंग्रेजी का बोलबाला है, मेरे जैसे लोग कुछ लोग इस जिद के साथ जीते हैं और अपना निन्यानवे फीसदी काम हिन्दी में करते हैं और अपने कार्यक्षेत्र के दायरे में अन्य लोगों को भी हिन्दी में कार्य करने के लिए प्रेरित ही नहीं, बाध्य भी करते हैं। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि भाषा के लिए हम अपने कैरियर के साथ समझौता नहीं कर पाते और जमाने के दस्तूर और फैशन की हवा के साथ बहते चले जाते हैं।
भारत जब तक आर्थिक रूप से विकसित देशों की अग्रिम कतार में शामिल नहीं हो जाता तब तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठा मिल पाना मुश्किल है। लेकिन वह समय आएगा जरूर। हो सकता है कि इसके लिए हमें कम से कम दो दशक तक इंतजार करना पड़े।
वो सुना है न कि अंग्रेजों का प्रयास था भारत में एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो नस्ल से भारतीय हो पर सोंच से अंग्रेज…बस इसी का फल है ये सब…हम अंग्रेजी बोलने को अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं…लेकिन मैं इसे बुरा भी पूर्णत: नहीं मानता क्योंकि यही एक भाषा है जो लगभग हर देश का नागरिक समझता है…इसके कारण ही हम लोग दुनियाँ के हर कोने में अपनी उपस्थिती दर्शा रहे हैं…भाई हमें अभी इसकी जरुरत है…अभी-भी NRI’s द्वारा सबसे अधिक पैसा भारत में ही आता है…पिछले साल ही हमनें चीन को पछाड़ा है…
मेरी टिप्पणी भी वही है जो ऊपर वाले सभी भाईयों की है। लिखूँगा तो स्वामी जी बोलेंगे कॉपी-पेस्ट तो नहीं कर दिया। इस विषय पर एकदिन जमकर भड़ास निकालने का इरादा है और उस दिन फुरसतिया जी से बड़ा (साइज में) लेख लिख कर निकालूँगा।
हस्बे-मामूल, एक सोचने को मजबूर करता लेख ईस्वामी की कलम से। धन्यवाद। और जितना सोचते हैं उतना कन्फ्यूजियाते हैं। अपना इंडिया अमरीका का पट्ठा हुआ पड़ा है, तभी तो आप-हम जैसे देश-द्रोही यहाँ पड़े हैं, और इन की अंग्रेज़ी सुन रहे हैं। आप के अधिकारी ने भी सही कहा कि हम भारत में ही कहाँ सभी हिन्दी बोलते हैं — और जो लोग बोलते भी हैं, वह ढ़ंग से नहीं बोलते – लिखना तो दूर की बात है। यदि मैक्सिकन लोग स्पैनिश पर ज़ोर दे रहे हैं, तो कोई तीर नहीं मार रहे – अमरीका में या दुनिया में मैक्सिकोवासी भारतीयों से बहुत बढ़ कर नहीं माने जाते। अमरीका में सब से बड़ा अश्वेत समूह होते हुए भी प्रगति में ये लोग पीछे हैं – भारतीयों से काफी पीछे। जैसा आप ने बताया, स्पैनिश भी उन की पुश्तैनी भाषा नहीं है। भारत के आत्मसम्मान को बढ़ाने का मूलमन्त्र केवल हिन्दी नहीं है, बल्कि कतई हिन्दी नहीं है। मैं एक अहिन्दी भाषी प्रदेश से हूँ, मेरा आत्मसम्मान हिन्दी बोलने में है या कश्मीरी बोलने में? वैसे दुनिया में जितने लोग विश्व के साथ धन्धा करना चाहते हैं, उन के लिए अंग्रेज़ी ज़रूरी हो गई है। यदि आप यह पूछना चाहते हैं कि मेरा मुद्दा क्या है, तो मैं यही कहूँगा कि इस मामले में मैं खुद उलझा हुआ हूँ, बस अपने कन्फ्यूजन को व्यक्त कर रहा हूँ।
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एक अलग मुद्दे पर, आप का नुक़्ता-ए-नज़र जो भी हो, आप के लेख में नुक़्तों की भरमार है। अच्छे खासे संस्कृत शब्दों में भी नुक़्ते हैं – जैसे सफ़लता। हिंदूस्तानीं, मैनें, आदि शब्दों में अनुस्वार ग़लत लगे हैं। कि और की में अन्तर कीजिए। दो चार गूगल ऍड भले ही डाल दीजिए। क्षमा करें मैं चाहता हूँ इंटरनेट पर हिन्दी का जो शब्द-भंडार बने वह सही वर्तनी से ही बने।
ऐश: “मसलन ये माना जाता है की हमें अंग्रेजी नहीं आती! हम तो बचपन से ही अंग्रेजी सीखते हैं!”
जिस दिन से मैने ऐश को ओपरा के शो पर यह बात कहते सुना, मैं यह जान गया की इस औरत में आत्म-सम्मान का कोई भाव नहीं है.
उस दिन के बाद से मैने ऐश की कोई फिल्म नहीं देखी, और न ही भविष्य में कभी देखुंगा.
मुझे तो बच्चन परिवार पर तरस आ रहा है. ऐश बच्चन परिवार पर एक गन्दे दाग से ज्यादा कुछ नहीं है.
एक बात और, इतने दिन हो गये, मैने कभी करण जौहर को हिन्दी में बात करते नहीं सुना. वह महाशय भी अपने टूटी-फूटी अंग्रेजी में ही बकवास करते रहते हैं …
एक बार दूर से टीवी की आवाज सुनने में लगता है की यह आदमी हिन्दी में बात कर रहा है. पर थोङा ध्यान से सुनने पर यह पता चलता है बाबू जी अंग्रेजी में गिट-पिट कर रहे हैं…. लोग कैसे झेलते है इस प्रकार के लल्लूओं को …..
पापी पेट का सवाल?
@तरुण,पंकज – सही कह रहे हो.
@अभिनव – धन्यवाद.
@सृजन शिल्पी – अंतर्राष्ट्रीय स्तर तो क्या राष्ट्रीय स्तर पे भी निजभाषा को सम्मान देने वाले हैं कहां?
@दिव्याभ – अंग्रेजी के आर्थिक लाभ और निजभाषा का गौरव दो अलग अलग चीजें हैं.
@रमण कौल – यही कहना चाह रहा हूं. की एक ओर चाहे पिछडे ही सही अपनी भाषा से प्रेम करने वाले मेक्सिकन्स हैं दूसरी ओर अंग्रेजी जानने वाले भारतीय हैं जिनके देश में कन्या भ्रूण हत्याएं, किसानों की आत्महत्याएं आदी रोज की कहानी है. अपनी एक राजभाषा का सम्मान करने लगने से प्रगति नहीं होती या समाज नहीं सुधरता लेकिन एक स्वस्थ्य एकीकृत समाज की नींव जरूर पडती है – उदाहरण:चीन,जापान,फ़्रांस और जर्मनी.
@हिमांशु:
@प्रेमलता: नहीं, दुनिया देखने की चाह!
पता नहीं जब सारी हिन्दी फिल्म नगरी के सितारे (सितारियाँ)अँग्रेजी में ही बोलते हैं तो हॉलिवुड स्टार क्यों नहीं बन जाते? खाते तो हिंदी की हैं यशोगान अँग्रेजी का ही करेंगे! स्वयं को अंग्रेजीदा समझने में गर्व महसूस होता है! साधारणतय: एक अंग्रेजी बोलने वाले को अधिक समझदार, सभ्य और उच्च शिक्षित समझा जाता है। यही आम राय है! किसी देश में भ्रमण किया जाये तो एयरपोर्ट पर उसी देश की भाषा में मोहर लगेगी अपने भारत में कौनसी भाषा में लगती है? दूसरे तभी सम्मान करेंगे जब आप भी कुछ आत्म-सम्मान पाले हुए हों! अब दुम हिलाने वालों का सम्मान कौन करे?
हिमांशु भाई ने आपके चिट्ठे में टिप्पणी की, “जिस दिन से मैने ऐश को ओपरा के शो पर यह बात कहते सुना, मैं यह जान गया की इस औरत में आत्म-सम्मान का कोई भाव नहीं है.
उस दिन के बाद से मैने ऐश की कोई फिल्म नहीं देखी, और न ही भविष्य में कभी देखुंगा.”
ऐश को क्या फ़र्क पड़ेगा? परिवर्तन चाहते हैं? …त्यागपत्र नहीं, संशोधन में भी विश्वास रखिए। अपनी आवाज पहुँचाइए वहाँ तक जहाँ पहुँचनी चाहिए। यह बात संबंधित व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए कि हिमांशु भाई क्यों नहीं देखते ऐश के चलचित्र! तब बात बनती है वरना तो, ‘मुर्गा जान से गया और खाने वाले को स्वाद नहीं आया।’
और आपका कथन की, “मुझे तो बच्चन परिवार पर तरस आ रहा है. ऐश बच्चन परिवार पर एक गन्दे दाग से ज्यादा कुछ नहीं है.” अरे भइया, यह नेता-अभिनेता लोग हैं – हम ठहरे अपढ़-गंवार! (कम से कम उनके लिए जिनकी अँग्रेजी ‘मम्मी’ हुआ करती है). अब हम इन लोगों के प्रपंच कहां समझ पाएंगे। अगलों का तो सब कुछ ‘डबल’ हो गया अब कहा करे कोई ऐश को ‘दाग-धब्बा!’ उनकी बला से!
स्वामी जी, यह मैक्सकिन लोगों का भाषा-प्रेम वाला जज़्बा यदि भारत के बाजार में उतारें तो कैसा रहे? बीवी कह रही थी पिछले दस-ग्यारह सालों से यह हिन्दी का ‘घर फूँक तमाशा’ करने से तो कुछ चल नहीं रहा – कोई और धँधा ईजाद किया जाये। मुझे लगता है यह चल जाएगा, यूँ तो मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ पर फिर भी हायर सैकेंडरी में ‘इक्नॉमिक्स’ से कुश्ती करने का अवसर मिला था ‘प्रिंसिपल ऑव डिमांड’ यही कहता है कि जहाँ जिस चीज की कमी हो वहाँ उसकी मांग बढ़ जाती है …तो अपने देश में आत्म-सम्मान, भाषा-प्रेम वाला जज़्बा जैसी ‘वस्तुएं’ चल निकलेंगी! क्या राय है? या पत्रकारिता में कोई ‘एंटी-चमचागिरी’ घुट्टी तैयार की जाए तो चल निकलेगी कि नहीं! ये जो मेरे विचार है, यह कोई ‘कॉपीराइट’ या ‘पेटैंटिड’ नहीं हैं – आप सब इनका उपयोग कर सकते हैं। मैं कोई अमिताभ बच्चन नहीं हूँ कि
तरह-तरह कि पाबंदिया लगाता रहूं या ‘कॉपीराइट’ बेच दूं।
सुनता हूँ अमरीका में कहीं ‘हिंदी दंगल’ होने जा रहा है? कहते हैं यूएन और पता नहीं कहां-कहां हिंदी की जुगत भिड़ानी है! अपने घर में तो जम नहीं रही फिर वहां…..? मुझे क्या? मैं भी कई बरसों से इस दंगल में जाकर देखना चाहता हूँ पर क्या करुं – मेरा कोई चाचा/मामा नेता तो है नहीं कि मुफ्त में सैर करवा दे! अपना धंधा कोई ऐसा है नहीं कि ‘हॉलीडे’ अफोर्ड कर सकूं। शायद आप में से कोई जाये तो ‘भाषणबाजों’ से मेरे दो-एक सवाल पूछ ले – डर हो तो मेरा नाम धर दे कि ‘उसने कहा था।’ प्रश्न ये हैं:
1. आप व्यक्तिगत तौर पर हिंदी के लिए क्या कर रहे हैं?
2. आप अपने भाड़े पर आये हैं या सरकारी-भ्रमण पर? यदि सरकारी भाड़े पर आये हैं तो क्या यदि आपको यह स्वयं वहन करना पड़ता तो आते?
3. आपके बच्चे किन विद्यालयों में पढ़ते है?
चाहें तो भीड़ में हाथ खड़े करवा कर देख लें – खुल जाएगी हिंदी के ठेकेदारों की पोल!
बहुत-सी नामी-गिरामी हस्तियां आती हैं ऑस्ट्रेलिया, कभी उन्हें न्यूजीलैंड का न्यौता दो ( एयर-फेअर, खाना-पीना और रहने का इंतजाम) वो भी अपनी जेब से तो भी इन्हें ‘दक्षिणा’ चाहिए। यही लोग हैं हिन्दी के सिर-मौर! यह मेरा स्वयं का अनुभव है। फिर मैंनें इनकी कक्षा ली तो खिसियाकर कहेंगे, ‘चलिए अगली बार आएंगे अपने खर्चे पर! किसकी अगली बार? और मुझे कहां शौंक चढ़ा जाता है कि इन्हें मुफ्त के रोट परोसूं? पर जब-तब इनकी भावुक कविताएं, लेख व रचनाएं पढ़ता रहता हूँ…..फिर मुस्करा लेता हूँ….मुस्कराना मेरा काम है….माँ-बाप ने घर का नाम ‘हैप्पी’ वैसे ही तो नहीं रखा होगा! अब कोई महोदय कह रहे थे कि ‘हैप्पी’ नहीं ‘हैपी’ होता है…मैंने कहा ‘म्हारे हरियाणे’ में ऐसा ही बोला जाता है, अपना भी एक्सेंट् है कि नहीं? फिर एक बोले कि वैसे तो आप हिन्दी की वकालत किया करते हो और साथ जोड़ रखा है, ‘हैप्पी?’ मैंने कहा भइये, अपने अँग्रेजीदा ‘पिता श्री’ ने रखा था, हटा दूं तो माँ-बाप की तौहीन वाली बात हो जाए! हाँ, अपनी चलती तो बेटे का नाम भारत है! समझ आई कि समझाऊं…कहो तो फिर कोई कुरूक्षेत्र-पानीपत रचाऊं? वैसे आपके बच्चों के क्या नाम हैं? गोल्डी, जेनट, जॉनी! छोड़ो नाम नहीं – काम की बात करें? मैं कोई अँग्रेजी का विरोधी तो है नहीं! हाँ, अपनी भाषा की वकालत की जाए, उसके सम्मान की बात हो तो यह तो हमारा ‘मौलिक-अधिकार’ है कि नहीं!
बीच-बीच में अँग्रेजी का प्रयोग इसलिए किया कि आपको पता रहे कि मैं कोई पढ़ा-लिखा पत्रकार हूँ। आखिरकार भारतीयों के लिए अँग्रेजी मैया का सहारा तो चाहिए ना! हा! हा! हा!!!
काफी हो गया – लगता है किसी ने मेरी भी दुखती रग छेड़ दी! झेलो अब!
साधुवाद!
बहुत बढ़िया लेख । सार्थक और सामयिक । एकदम सटीक मिसालों के साथ।
आपके धाम पर अब अक्सर आना होगा । अभी तक अंजान था ये मानुस आपसे
कुछ सीखने को मिलेगा ही ।
आख़िर हमारी समस्या क्या है? हम अंग्रेजी से इतने घबराए हुए क्यों हैं?
पुराना लेख है, पर विषय उतना ही सामायिक है जितना की पुरूष स्त्री के समानता का. अंग्रेजी अब किसी देश की भाषा नही रह गयी, बल्कि पुरा विश्व वयवसाय के लिए इसका प्रयोग करता है. मैंने लन्दन में पढ़ा कि बच्चे अंग्रेजी की परीक्षा में उत्तीर्ण नही हो पा रहे. मुझे आश्चर्य नही लगा क्योंकि अपने यहाँ भी बच्चे हिन्दी में या अपनी मातृभाषा की परीक्षा में चूक जाते हैं.
रही बात अंग्रेजी प्रेम की तो ऐश्वर्या राय ने किस भाव से कहा यह तो मैं नही कह सकता परन्तु इतना अवश्य पता है कि मुझे फक्र होता है कि हम ही एक ऐसे हैं दुनिया में हो हर जगह पसरे हुए हैं. यह हमारी मजबूरी नही बल्कि हमारी क्षमता है. हम कहीं भी रह सकते हैं और किसी के साथ भी अपना मतलब निकल सकते हैं. इसके अलावा अपने देश में भी एक ऐसी भाषा की जरूरत है जो हमारे क्षेत्रीय भाषा विवाद से हमें बचा सके और अंग्रेजी अच्छे तरह आड़े हाथ आती है.
हिन्दी बोलने वालों में कमी नही हुई है इतना हम देख सकते हैं, हो सकता है लोगों ने हिन्दी पढ़ना-लिखना कम कर दिया हो. तो इसकी वजह यह है कि हिन्दी में छापने से ज्यादा घाटे का सौदा आज के समय में कोई और नही है. इसके कारण ढूँढिये तो एक और पी एच डी की थेसिस तैयार हो जायेगी.
हम स्पेनिश की तरह नही हो सकते क्योंकि हम हिन्दी भाषियों के पास हमेशा से एक दूसरी भाषा रहती है मसलन भोजपुरी, अवधी, मगही, मैथिली, गुजराती, पंजाबी और भी बहुत सारे. अब हमारी दुविधा यह है कि हम अगर कट्टर हों तो किसके लिए, मातृभाषा या राष्ट्रभाषा? तो फिर अंततः हम किसी भाषा के कट्टर ना होते हुए यदि अपनी भाषा, राष्ट्रभाषा और कोई भी विदेशी भाषा सीखते या बोलते हैं तो मुझे कोई बुराई नही दिखती. उल्टा मैं कट्टरपंथ के विरोधी लोगों की क़तर में खड़ा हूँ.
मुझे नही लगता कि हिन्दी को ऐसी प्रेम की जरूरत है. क्योंकि मुझे हिन्दी के किसी और भाषा के सामने तुच्छ या गुम होने का डर नही.
सधन्यवाद
कौतुक