लिखना था भारत के भविष्य के विषय में और भूतकाल बेताल सा ही सर पे सवार रहा सो सोचा उस को पहले कंगूरे पर टांग दूँ! यह पूरा प्रयास अपने आप मे अधूरा है, अधपका है और फ़िर से ड्राफ़्डिया छाप है – हर स्तर पर! यह मानता हूँ मामला बेताल का है सो जरा बे-ताल ही है! क्या मेरे लिए ले दे कर अपने उस भडास को निकालने का जरिया है जो स्कूल मे पढी इतिहास की किताबों से जानी गई हमारी सनातनी दुर्दशा को ले कर अंदर जमा हुआ रहा है? शायद हाँ! “lets get this out too!” अर्थशास्त्र और तकनीक जैसे शुष्क और आंकडो से भरपूर दृष्टिकोण से भी देखने की कोशिश की वो आगे… दो भागो मे लिखे जाने वाले इस प्रयास मे से दूसरे पर अनुगूंज का लेबल होगा वो जरा अलग से, अभी की फ़िक्र का ज़िक्र शुरु करता हूं एक जबरदस्त चिट्ठांश से –
“बारात का केन्द्रीय तत्व तो दूल्हा होता है। जब मैं किसी दूल्हे को देखता हूं तो लगता है कि आठ-दस शताब्दियां सिमटकर समा गयीं हों दूल्हे में।दिग्विजय के लिये निकले बारहवीं सदी किसी योद्धा की तरह घोड़े पर सवार। कमर में तलवार। किसी मुगलिया राजकुमार की तरह मस्तक पर सुशोभित ताज (मौर)। आंखों के आगे बुरकेनुमा फूलों की लड़ी-जिससे यह पता लगाना मुश्किल कि घोड़े पर सवार शख्स रजिया सुल्तान हैं या वीर शिवाजी ।पैरों में बिच्छू के डंकनुमा नुकीलापन लिये राजपूती जूते। इक्कीसवीं सदी के डिजाइनर सूट के कपड़े की बनी वाजिदअलीशाह नुमा पोशाक। गोद में कंगारूनुमा बच्चा (सहबोला) दबाये दूल्हे की छवि देखकर लगता है कि कोई सजीव बांगड़ू कोलाज चला आ रहा है।”
- फ़ुरसतिया

यही सजीव बाँग़डू कोलाज वाला हाल हमारे देश का है! भारत सदियों से एक साथ कई युगों मे जीता रहा है. हमारे दूल्हों की विकासशील वेषभूषा जिसके विवरण की जमीन पर ये लेख खडा है, इस का जीता जागता सबूत है! पर ये सजीव बाँगडू कोलाज आगे क्या आकार लेगा? अपना विचार यह है कि कोलाज में कुछ नए तत्व जुडेंगे कुछ फेड आउट होंगे, पर कोलाज रहेगा कोलाज ही – विकासशील ही रहेगा देश जैसे सदियों से रहता रहा है.
दूल्हे की केस-स्टडी को आगे बढाता हूँ – मेरा एक अनिवासी मित्र, इधर अमरीका से टक्सीडो खरीद कर, उसे बो टाई समेत पहन, उधर डिज़ाईनर लहंगा चुनरी पहनी देसी दुल्हन से “अरेंज्ड मैरिज” कर आया.
जून की गर्मी में वह टक्सीडो उसको विकासशील नही बल्की विकसित दूल्हा सिद्ध कर रहा था. तो ये खालिस भारतीय फ़ील गूड है – टक्सीडो में अरेंज्ड मैरिज कर के हमार गुलाम-दिमाग दूल्हा ‘विकसित’ हो जाता है! विवाह का फोटो अपन को ई-मेल से भेजा गया, अपन ने दूल्हे से पूछा – ये टक्सीडो का क्या चक्कर है बे? “जमता नही है यार वो देसी ताम-झाम – बडा ओल्ड-स्कूल लगता है!” मित्र ने विकासशीलता पर मेल में नाक-भौं सिकोडी, “मेरे ससुर को भी जमी ड्रेस, बोले थे एक-दो ड्रेस हमारी तरफ़ से रहेगी, वैसे वो मूंह से कुछ नही बोले पर आंखो मे दिख रहा था… चाईस किस की है बाबा!?”
आंकडे बताते हैं की टक्सीडो-दूल्हा अल्पसंख्यक है और विकासशील दूल्हे बहुसंख्यक! मगर खबर बनाता, अलग दिखता, नई ट्राई मारता, अट्टेंशन पाता कौन? – मध्यमवर्गीय टक्सीडो-दूल्हा! ज़रा हट के है, नया है, देसी है, आयातित भी है! जंचता है!!
“चोट हो गई!” बरात मे चलने से पहले टक्सीडो दूल्हे के मुच्छड् ताऊ ने जबरदस्ती कर के उसे गुलाबी साफ़ा पहनवा दिया-

“अबे चूप स्साले, पता है अमरीका हो आया है, इहां पीली चूतड लिय घूमता था – ‘अम्मा ढेको धुल्वाई दै’, हमको मत सिखा; बोला ना नंगे सिर नही जाता दूल्हा, चल साफा बँधवा!”
“हे हे .. पीली चूतड से याद आया, दिसा-पानी कर के घोडी चढना, वाँ दुनाली से दुई-चार फायर भी करनी है – पता चले, आ गए दुलहिन लेने!” साफा बांधते मित्र के मामा बोले.
“कन्यादान करवाओगे या ओसे ही तोक के ले आओगे?” एक झटके मे विकसित दूल्हा डिमोशन पा कर फिर विकासशील फील करने लगा! बिल्कुल वैसे ही हमारे देश को भी लगते रहते हैं झटके – रोज़ाना!
उधर किस्सा-पेलक मित्र अपने “ओल्ड-स्कूल” खूसट रिश्तेदारों को फूहड करार दे रहा था, और अपनी सुई “टक्सीडो के चुनाव की क्या बाध्यता रही?” इस विचार पर जो अटकी खोपडिया सटक गई -
नकलचीपन की कुछ देसी हरकतें देख कर ऐसा लगता है हम विकासशील भी नही हैं, पिछवाडाशील हैं. ये ‘पिछलग्गूपन’ की वो अतिवादी स्थिती है जिसमें पश्चिम का पिछवाडा सूँघते सूँघते पूरब की नाक ही वहाँ घुस गई है! हमारा यह पिछवाडाशीलन, हमारी ये रीढविहीन अनुकूलनशीलता दोनो तरफ़ का फ़ील गूड है, जिसे विकासशील होने का सुन्दर लेबल लगा है आगे पीछे की सापेक्षिकता बनी हुई है और हम समझते हैं विकसित हो रहे हैं!
भारत कि दो महान सभ्यताओं को देने वाली सिंधु घाटी और गंगा के मैदानो पर आर्यों के बाद युनानियों ने हमले तो तुर्कों, मुगलों फ़िर हिस्सों मे 3-4 किस्म के गोरों ने राज किए. ३००० वर्ष ईसा पूर्व से तकरीबन २००० वर्ष ईसा पश्चात के ५००० सालों मे इन दो सभ्यताओं के अधिकांश बाशिंदों ने सिर्फ़ कृषि आधारित आत्मनिर्भरता ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर घोर गरीबी में निर्वाह किया है! हमारी हक़ीकत इतनी भयावह रही है और कुरूप की उसके जिक्र से बचने को हम खुद कोढ पे चादर डाल देते हैं. राजशाहियों मे आम आदमी गरीब ही रहा.
हमने देश के पश्चिम मे कोई चीन वालों जैसी दीवार नही बनाई. कोई एक भाषा-एक लिपि वाली नीति नही बनाई, एकछ्त्र शासन नही. ना ही अंततः बनाया एक सचमुच का धर्मनिरपेक्ष संविधान. चीन मात्र इन्ही बिन्दुओं के विस्तार पर ही एतिहासिक तौर पर हमें पछाडता आ रहा है!
चीन एक मात्र ऐसी प्राचीन सभ्यता है जिसका औपनिवेशीकरण नही किया जा सका – कुछ टुकडों मे हुआ, पर वो उभर गए, इधर हमारी लुटिया की पेंदी मे छेद वो-वो हुए हैं ऐसी डूबी की बस्स – रसातल! और जापान ने जो दुर्दिन देखे और उस से फिर उबरे हैं वैसा कुछ हमारे यहाँ होता तो अमिताभ बच्चन और सलमान खान समेत पूरा मेलोड्रामेटिक देश सति हो जाता!
जापान के अनुशासित कर्म-योग के आगे विश्व नतमस्तक है. वही गुण – एक तीर के समान सधा नुकीला समाज! इधर बंटे हुए आपस मे लड मरने से फुरसत नहीं रही.
दूसरे, हमने कभी भी एक बडी बादबानी नाव नहीं बनाईं, जिस पर सवार हो कर, पतवार खोलते, नई जमीन तलाशने निकल जाते! हमने झेली आंधियां जो अपने साथ लाईं नई-नई भाषाएं, पराए धर्म और संस्कृतियाँ – जो हमने बस अपनाए. हम नही बने आंधी ना ही वो दीवार जो आँधियों को रोक सके. हमें जरूरत नही पडी – हो सकता है, शायद इतनी उर्वर थी हमारी भूमी, आवश्यकता नही पडी हो – सोच तो व्यव्हारिक रूप से सँकुचित थी ना चाहे उसका दार्शनिक विस्तार पार-लोक, पर-जनम तक रहा हो. क्या से क्या हुए हैं हम –

पंख कतरे गए गुलाम हुए हम और हमने गाए “जन गन मन अधिनायक जय हे” किसी जार्ज पंचम को खुश करने.
एक मूड ये है –
अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं
और दूसरा ये –
माना के मुश्त-ए-खाक से बढ कर नहीं हूं मैं
लेकिन हवा के रहमों करम पर नहीं हूं मैं
इस किस्म के शेर सुनता हूँ तो अक्सर प्रश्न उठता है भारतीयों ने हवाओं से और बाकी विश्व से अपने संबंध क्या बनाए?
क्या हमारा दर्शन हमारा शगल बन गया? फेवरेट पास-टाईम? क्या रूढियाँ हमारी जीवन शैली बन गईं? क्या हम यथार्थपरक नही रहे? श्रुति-स्मृति आधारित शिक्षा व्यवस्था ने तोतारटंत सामाज नही बनाया?? भ्रमण-श्रवण-मनन का क्या हुआ!
शायद भूल चुके हमारा संबंध हवाओं से क्या हो? हम पिंजरे बनाने वाले और पिंजरो मे ही रहने वाले होते गए होंगे. कभी पिंजरों के डिजाईन अपने हुआ करते थे क्या अब वो भी आयातित हैं टक्सिडो की तरह – समाज मे भी सोच मे भी! आडंबरों के, जात-पात के, भाषा के, धर्म के हर आकार प्रकार के पिंजरे. हमारे पिंजरे हमारा “कंफ़र्ट-ज़ोन” रहे हैं(?) हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, हमें उन पर गर्व है, मेरा भारत महान है. “हमारे में” यही होता है – “हमारी यही रीत है”.
जो बचा रहता हमारे अंदर का बंजारा होते बंजारे, घुमक्कड, जानते अपना संबंध हवाओं से- कल्पनाओं को पंख लगे होते, हवादार सोच, उनकी जिवंतता चाहे फिर हमने वेद ना लिखे होते पुराण ना पाए होते, शास्त्र ना होते – जीवन तो होता! अमरीका के मूल निवासी रेड इंडियंस जैसे स्वतँत्रता की खातिर पूरी कौम पहले आक्रमण से ही लड मर कर समाप्ति की कगार तक लग जाती! बँजारा जानता है स्वतँत्रता क्या होती है!
कैसे सभ्य हम? पूजे राधा-कृष्ण पर रहे प्रेमहीन, अव्यव्हारिक, अपनी डोरियां नहीं खोली, हवाओं मे रिहा नही किया अपने बच्चों को, छटपटाती रूहों को – जाओ उडो प्रेम खोजो जो प्रेम पाओ तो निभाना – हमने चुना किसको करें वो प्रेम, जिसका बाप दहेज दे सके उसको – संयुक्त परिवार पिंजरा हो गया, एक साझा पिंजरा मूल्यों के नाम पर! हमने विधवाओं को सफ़ेद साडियों पहना दीं कफ़न जैसी, जा हवाओं से संबंध खत्म तेरा इद्रधनुषी आकाश आज से सफ़ेद होगा. सफ़ेद साडी पिंजरा हो गई और वो पिंजर!
“कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा”
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा”
मौका पाते ही बुलबुलें गिद्ध हो गईं और गुलिस्तां की छाती तीन टुकडे कर के एक दूसरे के खून से तीन नक्शे बना दिए! सही है गुरु क्या सभ्यता है – मजहब नही सिखाता आपस में बैर!!
कवि जिसने नाविको से सीखने के बाद फरमाया –
“तूफ़ानो की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार”
“वाह वाह.. दोबारा तिबारा चौबारा…”
तालियां, बस चलो! कवि सम्मेलन खत्म अब घर जाओ, सो जाओ!!
क्या कहते हैं और क्या करते हैं हम? क्या पागलपन है ये? विकसित होगी ये कौम पिंजरों मे कैद तोतों की? हँसी आती है और रोना भी!
हमने एकदा गढे शास्त्रियता के बंध, और फ़िर, बंधे-बंधे अतीत से ही, जाते रहे अतीत मे ही खोजने उस उर्जा को जो गढ सके नया – कैसे हो? उडने के लिए चाहिए हवा और चाहिए पंख – हमने पंख कतरे अपने बच्चों के, अतीत महिमामंडित हो गया!
आज़ादी के ५८ सालों बाद भी हमारे देश का किसान आत्महत्याएँ करता है, लोग कर्जे चुकाने के लिए अपने शरीर के अँग बेचते हैं और जान हथेली पर रख कर भी देश छोडने को उद्यत रहते हैं. देश की अर्थव्यवस्था आज भी मानसून का जूआ है. देश की अर्थव्यवस्था खेती पर टिकी है और खेती मानसून पर. ५५% बिजली रोती कलपती पनबिजली परियोजनाओं से आती है और अभी भी मूलभूत ढाँचा नादारद के करीब है!
विकसित और विकासशील होने का फ़र्क हम सकल घरेलू उत्पाद, सूचकांको और कई दूसरे पैमानों से मापते हैं – विकासशील और विकसित दोनो ही सापेक्षिक शब्द हैं और इस आर्थिक सापेक्षिकता मे हम कितना आगे पीछे हैं उस से अर्थ-शास्त्री जूझे रहे हैं. कल्पना कीजिए, भारत मे रातों-रात कोई चमत्कार हो और हम सही माईनों मे विकसित होने की ठान लें, अपनी रीढ लगा लें, धरती पर अपना सम्मान जीतने निकल पडें, आतंकवाद मिटा दें, अंतहीन आंतरिक समस्याएं सुलझा लें, फ़िर भी हम सापेक्षिक तौर पर विकसित नही होंगे, क्या विकसित देश इस दौरान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? वो भी विकासरत हैं और इसी सापेक्षिकता कि खातिर जो आज सेंक्शन्स लगाने, आग लगा कर तमाशबीन बनने से ले कर बम बरसाने तक के सारे प्रपंच करते हैं – क्या कुछ कोशिशें नही होंगी! इतना आसान नही है! आज भी विकसित देश इन्ही तौर तरीकों से एक दूसरे पर काबू रखते हैं. शायद हम बच्चा समझ के छोड देते हैं जाओ बेटा भारत-पाक, आपस मे लडो! नगरपालिका के टूटे नल पर लडती गंदी बस्ति की “भद्र” महिलाओं से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय औकात नही है दोनो देशों की. १९४७ से झोंटा नुचव्वल ही चलता रहता है इधर!
अंग्रेजो के राज मे कुछ राय-साहब बने थे आज खुली अर्थ-व्यवस्था के चलते कुछ नव धनाढ्य बन रहे हैं. पर ये नवधनाढ्य तब तक हीरो नही होगे जब तक वो अपने उत्पाद अपने बाजार और अपनी तकनीक ला कर विश्वस्तर का ना कर दें. १०० करोड का प्रबंधन और नेतृत्व करने के लिए विविधता को और अनेकता को भिन्नता वाला आधार बना कर अलगाव को बढावा देने वाले तत्वों पर लगाम लगानी होगी वो सबसे बडी समस्या है! हमारी विविधता एक अच्छी चीज़ है पर यही हमारे अलगाव का कच्चा माल बन जाती है! तो ऐसा बहुत कुछ है जो बहुत पहले कर लिया जाना चाहिए था वो सब नही किया गया है और इस का चक्रवॄद्धि प्रभाव है आज के भारत पर.
जनसंख्या, बेरोजगारी, बिमारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, गंदगी, अशिक्षा, पिछडापन जैसे मुद्दे आज भी बकाया हैं! हमारी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और ये स्वीकार करने में हमारी हेठी होती है, पिछडापन महसूस होता है! हमारी आत्मनिर्भरता का आधार कृषि है साफ्टवेयर का निर्यात नही है! हमने अपने बाजार खोल कर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की राह आसान की, बडे बडे संस्थानो से निकलने वाले युवकों की राह आसान की पर हमारे अपने उत्पाद नही आ रहे जो हमारे बाजारों मे ही खप सकें. अभी तक गर्व कर सकने लायक कुछ भी नही हुआ है! दूसरे देशों मे इस सब के चलते और अपनी अपनी दूसरी दिक्कतों के चलते भी विकसित होने के लिए उन देशो ने क्या क्या किया जो हमसे आगे हैं और हम उन से क्या सीख सकते है उस पर एक ट्राई अगले लेख मे! … क्रमश:




स्वामीजी,तुम्हारे लेखन से तो ईष्या होने लगी है। विस्तृत टिप्पणी उधार। दूसरे भाग का इन्तज़ार।
guru kuch likhne ke liye chode hi nahi anugunj main. Lagta hai ek href taap denge tumhare article ke liye, wahi apni pravishthi rahi.
काफी दिनो से सोच रहा था कि कुछ लिखु लेकीन युनीकोड पर हाथ थोडा तंग है . दुसरे भाग का बेकरारी से इतजार रहेगा .
आशीष श्रीवास्तव
स्वामी जी , इतना ज्यादा मत रोईए । आपको रोते देखकर दुसरों को भी रूलाई आने लगेगी । समस्यायें सर्वत्र हैं । उनके व्यावहारिक समाधान पर विचार करना और हल सुझाना ज्यादा सार्थक रहेगा ।
अनुनाद
स्वामी जी, समस्यायें तो हैं और आपने उन पर प्रकाश भी अच्छी तरह से डाला है। आपकी लेखनी क जबाब नहीं है।
लेकिन हल क्या है? क्या हम ऐसे ही गरियाते रह जायेंगे? क्या हमारी पीढ़ी कुछ कर सकने में सक्षम है? मानाकि भारत में इतनी कमियां हैं, पर कुछ गिने चुने भले लोगों की वजह से ये देश चलायमान है। हम सब पढ़े लिखे चाहें तो विदेश वैठ कर रोटी कमा खा सकते हैं और सुकून की जिन्दगी जी सकते हैं, लेकिन गरीब और पिछड़ा तो पिछड़ा ही रहेगा। समाज में कोई आदर्श न होगा कि पढ़े लिखे लोग समाज को सुधार सकते हैं। क्या हम पढ़े लिखे लोगों की समाज और देश के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं है? इस मामले में मुझे http://www.goodnewsindia.com जालस्थल अच्छा लगता है जो कि अच्छाइयों को सामने लाता है। हम सब अपने अपने स्तर पर भी छोटी चीज़ें करेंगे तो हालात बदलेंगे।
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