एक -
“धारावी, मुंबई की ये झोंपडपट्टी अक्सर एशिया में सबसे बडी करार दी जाती है. ४३२ एकड में फ़ैले इस महानगरीय नर्क के टुकडे पर १०,००० से अधिक लघु इकाईयां बिना कायदे कानून के चल रही हैं जिनसे १० लाख के करीब लोग जीवन यापन करते हैं.प्रति १४४० लोगों के लिय एक पाखाना है.
ये भारत का सबसे नया पर्यटन आकर्षण भी है! …”
स्मिथसोनियन.कॉम पर आज एक अंग्रेजी आलेख पढा जिसकी शुरुआत उपरोक्त उद्गारों से होती है.
पिछले साल की जनवरी से एक ब्रिटिशर – क्रिस्टोफ़र वे और उनके देसी पार्टनर - कृष्णा पुजारी, धारावी के चलित टूर बेच रहे हैं. पर्यटकों के छोटे समूहों को ६.७५ डालर प्रति व्यक्ति की दर से टूर दिये जा रहे हैं.
‘पूरिज्म’ यानी “पूअर + टूरिज़्म” मुंबई की देन नही है, सालों से टूर आपरेटर रियो दी हेनेरो की गंदीबस्तियों के टूर देते आ रहे हैं. दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था रेलवे स्टेशन के टूर देती है जिसकी कमाई से प्लेटफ़ार्मों पे भटकने वाले बच्चों की मदद की जाती है.
लेकिन धारावी के टूर खास तौर पर विवादास्पद रहे हैं. टाईम नाऊ नामक भारतीय चैनल नें इस पर लंबी रपट प्रस्तुत की और गोष्ठी का आयोजन भी. जिसमें पुजारी की इस हरकत की भर्त्सना उन्हें परजीवी कह कह की गई. “इस प्रकार का टूर लोगों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप है – आप उन से जानवरों के समान व्यव्हार कर रहे हैं”.
लेख आगे बढता है जिसमें जॉन लेंकास्टर(अंग्रेजी लेख के लेखक) क्रिस्टोफ़र और पुजारी से हुई बातचीत का ब्यौरा देते हैं.
क्रिस्टोफ़र को ये टूर देने का आईडिया खुद की घुमक्कडी के दौरान ऐसे इलाकों के लिये अच्छे गाईड की अनुपलब्धता के चलते आया. भारतीय पार्टनर के रूप में उसने पुजारी को चुना.
पुजारी जॉन को धारावी का टूर करवाता है. प्लास्टिक रीसाईकिल करते, नंगे बदन लोहा पिघलाते, बोझा ढोते लोग, कसीदाकारी करते बच्चे. सभी व्यस्त हैं. कोई हाथ फ़ैला कर भीख नहीं मांग रहा कोई कुछ बेचने की कोशिश नहीं कर रहा. दुकानें, स्कूल, बार आदी सब हैं गंदीबस्ती में.
टूर के दौरान फ़ोटो लेना और लोगों से प्रश्न पूछना मना है. क्रिस्टोफ़र कहता है की मुनाफ़ा होने पर मुनाफ़े का ८०% वे बस्ती वालों को देंगे.
लेख के अंत में जॉन, जो वाशिंगटन पोस्ट से संबद्ध हैं, कहते हैं की उन्हें इस टूर से काफ़ी कुछ सीखने को मिला और जैसा की भारतीय टीवी चैनल वाले शोर मचाते रहे वैसा कोई शोषित किये जाने का भाव धारावी के लोगों के चेहरों पर उन्हें नही दिखा. इसका श्रेय वे टूर देने वालों की तैयारी को देते हैं. वे पूछते हैं की क्यों नही म्युनिसिपल पार्टी इन बस्तियों में मूलभूत सुविधाएं देने की कोशिश करतीं. क्या ये तमाम चैनल वाले भारत की गरीबी दिखाए जाने पर शर्मसार हैं क्योंकी वे तो भारत को विश्व के साफ़्टवेयर पार्क के रूप में प्रचारित करने में लगे हैं!
धारावी संयुक्त रूप से सालाना ६६५ मिलियन डालर आय कमाती है. ये गरीब ही सही एक जीवंत तंत्र है.
“मीडिया इन गरीब लोगों के लिये क्या करता है? सिवाय बहस करने के? उन्हें लोगों के मन मे क्या चल रहा होता है और जमीनी हकीकत क्या है उससे क्या वास्ता? वे बस चीखना-चिल्लाना जानते हैं.” ये सवाल एक पत्रकार ही ने पूछे हैं भारतीय मीडिया के बारे में! और वैसे वो पत्रकार खुद के सीखने के नाम पर क्या कर के आया? गरीबों को उनके परिवेश में जूझता हुआ जैसे किसी अच्छे से दिखाई गई गरीबी की प्रदर्शनी में देख आया. उसके आने से पहले और जाने के बाद कोई फ़र्क नहीं पडा.
*-*-*
दो-
जब मैं भारत में था, दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम देखा था जिसमें दिखाया गया था की कैसे गरीब लोग रक्त बेच कर गुज़ारा करते हैं. कार्यक्रम में लोगों का इन्टर्व्यू लेते हुए महिला “कितने में रक्त बेचते हो?” “जल्दी जल्दी आने पर पकडे जाने से कैसे बचते हो” “रक्त बेचने के बाद कैसा लगता है” “सुई चुभने पर दर्द तो होता होगा” जैसे सवालों की बौछार एक आदमी पर करती है जिसके जवाब वो दुबला पतला कुपोषित मानव मुस्कुरा कर देता है.
फ़िर महिला कहती है “अपनी बांह पर पडे हुए सुईयों के दाग दिखाओ” आदमी जवाब देता है “खून बेचता हूं माना, लेकिन अपने दाग नहीं दिखाता!”
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा हैं मीडिया वाले – क्या वे किसी परजीवी से कम हैं? किसी के जिस्म के दाग तक प्राईम टाईम में बेच सकते हैं. महिला सवाल कर रही थी या की उस गरीब पर कोडे बरसा रही थी? कार्यक्रम के तौर से ऐसा लग रहा था खून बेचने वाला मजबूर नहीं गुनहगार हो.
यही मीडिया जब किसी और को गरीबी की मार्केटिंग अपने से बेहतर करते हुए देखते हैं तो उन्हें तमाम संवेदनाएं याद आने लगती हैं!
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तीन –
ये भी सालों पहले का किस्सा है. विनोद दूआ एक बार एड्स के रोगियों का इन्टर्व्यू ले रहे थे. हम सपरिवार टीवी के आगे डटे भोजन कर रहे थे. विनोद दुआ पूछते हैं “आप मौत के बहुत करीब हैं ये जान कर कैसा लगता है?”
जवाब देने के बदले रोगी का गला रूंध जाता है आंखों में आंसू आ जाते हैं. मैं क्रोध में खाना खाते हुए उठता हूं, टीवी बंद करता हूं. कुछ देर रुक कर जीवन आगे बढता है! इन पढेलिखों से तो पाषाणयुगी बेहतर थे.
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ये तीन तो सतही उदाहरण हैं जो याददाश्त के हवाले से लिखे. टीवी और अखबार मन को पाठन और ज्ञानार्जन की प्यास के बजाए आज वितृष्णा से भर देते हैं.
मैंने टीवी और अखबारों के एक अच्छे विकल्प के रूप में ब्लागिंग को पाया. लोग अपने लेखन को संवारने की कोशिशें और एक दूसरे की मदद करते हुए अच्छे लगते हैं. माना टिप्पणियां और हिट काऊंट्स बढाना चाहते हैं लेकिन उन्होंने अपनी मानवीयता और संवेदनशीलता के दोहरे पैमाने नहीं रखे हुए!
पहले अमरीकी मीडिया वाले ब्लागिंग में कूदे, सोचना था की फ़्रीलांसिंग की कमाई भी होगी - और उन्होंने मूंह की खाई, अच्छे ब्लागर्स उनसे कई गुना अधिक पढे जाते हैं! अब लगता है देसी पत्रकारों का नंबर है सबक सीखने का! बाकी भाषाओं के ब्लागर्स और पाठकों नें इन्हें भाव ना देना सीख लिया है, हिंदी वाले भी यही करेंगे! कुछ ने आते ही पहला काम किया है फ़िज़ाओं में गंद घोलने का. संप्रेषण की किसी भी विधा के प्रति विकर्षण जगानें में पत्रकारों से अधिक कौन कामयाब हुआ है?
आज टीवी और अखबारों से अधिक विश्वसनीय ब्लाग्स हैं – ये पत्रकारिता की हार है और पत्रकार दयनीय लगते हैं, जनता नें उन्हें बहुत हद तक खारिज कर दिया है वे वैचारिक नेतृत्व नहीं प्रतिक्रियात्मक लेखन कर रहे हैं. उन्हें अटेंशन और सनसनी पाने से अधिक आत्मावलोकन करने की जरूरत है.



१.
सुनील दत्त की शव यात्रा के दौरान एक पत्रकार ने संजय दत्त से पूछा था : ‘आपको कैसा लग रहा है?’ बदले में संजय दत्त का जवाब था : ‘पिता के मरने पर कैसा लगता है?’
२.
भुज में आए भूकम्प के समय सीमेंट-पत्थर के मलबे में फ़ंसे एक व्यक्ति से जो दो पट्टियों के बीच की एक दरार के जरिये बमुश्किल सांस ले पा रहा था,बाहर खड़े पत्रकार महोदय पूछ रहे थे: आपको कैसा लग रहा है?
पत्रकारों के अपढ़ और कुपढपन तथा उनकी संवेदनहीनता पर क्या और कितना लिखें . अनेक उदाहरण हैं . औसत योग्यता के ये कम पढे-लिखे लोग किसी भी तरह के शील और संस्कार से रहित हैं. ये लोग राजनीति और सनसनी के बीच बिना पेंदी के लोटों की तरह लुढकते रहते हैं .
उत्तम विचार!
अच्छा लेख. आँखे खोलने वाला भी. साधूवाद. मैने भी एक-दो बाते गाँठ बान्ध ली है.
मुझे तो समाचारों के सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुति से अत्यन्त चिढ़ हो गयी है। इन्हे सुनते ही मन अशान्त हो उठता है और उसे तुरन्त बदल देता हूँ।
भारतिय मिडीया मे पत्रकारो की कमी है। जो है वे पत्रकार नही है, ये सिर्फ सनसनी बेचना जानते है !