संसद में बिल गेट्स: अमरीकी प्रतियोगितात्मकता प्रस्ताव

अंड-संड खबर है गुरु! (कालेज के दिनों मे ऐसे ही समां बांधते थे हम!) लग रहा है दुनिया भर के देसियों को अपनी कमर कस लेने का टाईम आ गया है.

सी-स्पैन२ चैनल पर बिल गेट्स को अमरीकी सीनेट में विचार-विमर्श करते हुए देखा. पूरा मसाला बहुत जबरदस्त है. इस के बारे में आगे बात करता हूं पहले एक दूसरी बात-

जैसा की हिंदिनी के सुधी पाठक जानते ही हैं – हाल ही में ब्रिटेन से विदेशी डाक्टर्स को बाहर निकालने की कवायद शुरु हुई. जिन भारतीय डाक्टरों को हाथोंहाथ लिया जाता था उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा. इसी के चलते किसी देसी डाक्टर की आत्महत्या की खबर भी छपी.

विदेशी डॉक्टरों को बाहर किये जानें की वजह ये बताई गई की अब ब्रिटिश नागरिकों की शिक्षा में निवेश कर के अच्छे ब्रिटिश डॉक्टर्स की नई पीढी तैयार कर ली गई है और विदेशियों की कोई जरूरत नहीं रह गई!

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अच्छे मित्र, और मेरी भूतपूर्व कंसल्टिंग कंपनी के कार्यबल प्रबंधक जेम्स और मैं गुज़रे महीने आऊटसोर्सिंग के विषय पर बात कर रहे थे. वे ही सब बातें, प्रोग्रामिंग का काम भारत और चीन में चला जाएगा – अमरीका में डिज़ाईनिंग, शोध और आर्किटेक्चर का काम अधिक होगा. अधिक सृजनात्मक काम यहां होंगे आदी. जेम्स कह रहे थे की वैश्विकरण के समय में अमरीकी नौकरियां बाहर जाने से कोई नहीं रोक सकता! बहस जारी थी मैं उन्हें कह रहा था की हर व्यक्ति अधिक जटिल और सृजनात्मक काम कर सके उस स्तर पर पूरे समाज को पुनर्शिक्षित करना अमरीका की बढती हुई आबादी के चलते संभव नहीं हो सकेगा. आऊटसोर्सिंग जितना पैसे की बचत का मामला है उतना ही मानव संसाधनों की कमी से जुडा मसला भी है. लेकिन आने वाला समय कुछ और होगा -अमरीकी जल्दी ही ब्रिटेन की राह पकड कर अपनी शिक्षा-व्यवस्था में भारी परिवर्तन और निवेश करेंगे. आऊटसोर्सिंग की जगह इनसोर्सिंग आने वाले अमरीका का महामंत्र होगा क्योंकी भारत ना सही चीन ही सही एक बडे प्रतिद्वंदी के रूप मे उभर रहा होगा.

जेम्स ने जवाब दिया की अमरीका हमेशा आव्रजन की प्रक्रिया से आ कर बसे अनिवासियों के बौद्धिक दम के भरोसे चलता रहा है और इसके चलते विदेशियों का आना कम तो नही होगा.

मैने कहा की विदेशियों का आना और काम का बाहर जाना दोनो चीजें एकसाथ एक ही इन्डस्ट्री में अधिक देर तक नही हो सकतीं.

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अमरीकी सिनेटर्स नें आज प्रतियोगितात्मकता प्रस्ताव प्रस्तुत किया. आज सांसदीय शिक्षा और श्रम कमेटी नें बिल गेट्स की अनुशंसाओं को सुना.  बिल गेट्स की अनुशंसाओं की आडियो कडी में भारत और चीन के छात्रों से अमरीकी छात्रों की तुलना की गई.

भारतीय छात्र गणित और विज्ञान में रुचि क्यों लेते हैं पूछने पर बिल गेट्स बताते हैं “क्योंकी उनके पास वॉलस्ट्रीट नहीं है!” कमेटी के लोग मुस्कुरा देते हैं.

सही बात है अधिकतर भारतीय छात्र वेल्थ मेनेजमेंट और हेज़ फ़ंड मेनेज करने के सपने नही देखते. शायद आज भी प्रोग्रामर बनने के सपने देखने वाले बहुत हैं. आईआईएम-ए के इक्का दुक्का को छोड दो!

जो नौकरियां विदेशी कंपनियों की कृपा से भारत में आई हैं उनमें से अच्छी वापस भी जा सकती हैं. जो विज़ा विदेशियों को कार्य पर लगाने के लिये लाखों की संख्या में दिये जाते थे वे कुछ सौ तक ही सिमट सकते हैं. ये सब हो सकता है जब एक बार अमरीका अपना आंतरिक दल खडा कर ले! और सच मानिये पिलानिंग तो यही चल रही है!

उधर से बिल गेट्स संसद सदस्यों को बताते हैं की किसी वीसा धारी को ग्रीन कार्ड मिलनें मे एक दशक तक लग जाता है. जैसे वे ये बात ना जानते हों! इस पूरे ड्रामे के बाद में भी इस बाबद कुछ होना जाना नहीं है. कमेटी के लोग एक दफ़ा फ़िर मुस्कुरा देते हैं.

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उपरोक्त बातें कल लिखीं थी, उपसंहार करने का समय नहीं मिला. आज सुबह उठता हूं तो देखता हूं की टाईम्स आफ़ इंडिया पर बुश की एच१ वीसा की संख्या दुगुनी करने की अनुशंसा पर खबर छपी हुई है. ये भी की भारत के हिस्से के एच१ की रेवडी १५ दिन में बंट-बूंट के खतम हो जाएगी बाकी सारे टूंगते रह जाएंगे.

बस यहीं खुन्नस आनी शुरु हो जाती है इन गधों पर, कहने को राष्ट्रीय अखबारें बेचने बैठे हैं साहब. किसी खबरी एजेंसी से टोप के खबर छाप दी वो भी कम महत्वपूर्ण वाली खबर (कडियां खुद खोज लो.). हां, अधिक महत्वपूर्ण वाली खबर बता कर उसका विश्लेषण कोई ब्लागची कर ही देगा उसके लिये खबरची अपना दिमाग क्यों चलाए?

अपन नें सीधी पिछले महीने की वाशिंगटन पोस्ट खोली, जब बिल गेट्स का झन्नाटेदार लेख छपा था- अमरीका को प्रतियोगी कैसे बनाएं रखें! वाह मेरे पट्ठे और इस  हफ़्ते अनुशंसाएं लिख-लुख कर सिनेटर्स को घुट्टी में भी पिला दीं. साथ ही और एच१ की मांग भी कर दी. अनुशंसाओं वाला दस्तावेज़ ये रहा – इत्मिनान से पढ लेना!

अब अगर मेरी बात पर दोबारा आऊं तो – एक तरफ़ काम की आऊटसोर्सिंग हो रही है, दूसरी तरफ़ बंदे बुलाए जा रहे हैं, तीसरे अमरीकी वर्क-फ़ोर्स को तैयार करने की बात हो रही है तो चल क्या रहा है?

भई, सरकारी अमला गति पकडे और स्कूलों के कोर्स बेहतर बनाएं जाएं, शिक्षकों की गुणवत्ता और वेतनभत्ते सुधारे जाएं इन सब में बहुत समय लगेगा. लेकिन दीर्घकालीन योजना की शुरुआत तो कर दी गई है. लंबे आसार तो ठीक नही हैं भारतीय इंजीनियर्स के लिये.

लेकिन इसी बीच शोध और सृजनात्मक काम बाहर भेजने की जोखिम भी नहीं ली जा सकती – उसके लिये लोगों को यहीं बुलाना होगा और दुनिया भर से सृजनशील खोपडीयों को ब्रेन-ड्रेन करते रहना होगा. वो भी अच्छीखासी तादाद में. तो एच१ वाले आएंगे,  ग्रीन कार्ड पाएंगे की नहीं वो उनकी किस्मत. ये हो गई प्रति-स्पर्धात्मक पहल.

आगे जाकर आप देखोगे की “डैड-एण्ड जॉब्स” या ऐसी नौकरियां जिनमें उन्नती के अधिक अवसर ना हों वेही भारत से बाहर भेजी जाएंगी – ऑपरेशनल और फ़ंक्शनल वाले काम. अमरीकी कार्यदलों को प्रोजेक्टाईज़्ड या अधिक पैसा देने वाले परियोजनाओं किस्म के काम करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा.

इसका क्या मतलब है? भारतीयों को क्या करना चाहिए? अपनी शोध, अपने ब्रांड, अपने बाज़ार बनाने चाहिये. अपने छात्रों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दे कर उन्हें भारत में अच्छी नौकरियों में बनाए रखने की जरूरत है. हम भी ये सोच कर हमेशा नही चल सकते की भारत मां के लाल थोक में पैदा होते हैं तो किये जाओ एक्सपोर्ट. भईये ऐसे नहीं चलेगा. अगर हमारे देश उनके बाज़ार बन गए तो एक दिन हमारे शिक्षातंत्र और विकास की गति पर भी उनका ही कडा नियंत्रण होगा फ़िर तो हो गया बेडा गर्क.  हमारी सबसे बडी शक्ति है हमारी संख्या और यही हमारी सबसे बडी कमजोरी भी है.  हमारे शिक्षित नागरिकों की संख्या ही बडा फ़र्क पैदा करेगी.

घणीं रिसर्च करने के बाद इस पूरे प्रपंच के लेखे जोखे वाला ब्लाग हाथ लग गया – उसकी कडी ये रही.  

अब अंग्रेजी में इसका सार भी दे दूं -

Provisions in the bill include:

  • Double funding for NSF and Department of Energy Office of Science by FY2011
  • Direct federal agencies that fund S&T research to set a goal of 8% of their R&D budgets to fund high-risk frontier research
  • Authorize NIST at $937 million by FY2011 and requiring NIST to use a minimum of 8% of its funding for high-risk, high-reward research
  • Authorize competitive grants to States for elementary and secondary education alignment with the requirements of post-secondary education, the 21st century workforce, and the Armed Services
  • Establish training and education programs at summer institutes hosted at the National Laboratories and increase support for the Teacher Institutes for the 21st Century program at NSF
  • Expand the Robert Noyce Teacher Scholarship Program at NSF
  • Assist States in establishing or expanding statewide specialty schools in math and science that students from across the state would be eligible to attend and providing expert assistance in teaching from National Laboratories’ staff at those schools
  • Increase the number of teachers prepared to teach AP/IB and pre-AP/IB math, science, and foreign language courses
  • Develop and implement programs for bachelor’s degrees in math, science, engineering, and critical foreign languages with concurrent teaching credentials and part-time master’s in education programs for math, science, and critical foreign language teachers to enhance both content knowledge and teaching skills
  • Create partnerships between National Laboratories and local high-need high schools to establish centers of excellence in math and science education
  • Expand NSF graduate research fellowship and traineeship programs, require NSF to work with institutions of higher education to facilitate the development of professional science master’s degree programs, and expand NSF’s science, mathematics, engineering and technology talent program

[आवश्यक पाद टिप्पणी:

आलसी वाले पाठकों से निवेदन: जब मैं कोई कडीयां देता हूं तो उन्हें क्लिक कर पढ लिया करो यार -वर्ना आपकी टिप्पणियों से समझ में आ जाता है ;-)

कम आलसी वालों से निवेदन: इस वाले लेख के विषय पर और अधिक जानकारी चाहें तो टिप्पणी में लिखें!

धन्यवाद]

 

3 responses to “संसद में बिल गेट्स: अमरीकी प्रतियोगितात्मकता प्रस्ताव”

  1. आशीष

    यह सब कुछ अपेक्षित ही था। आज नही तो कल अमरीका को अपनी शिक्षा निती पर पुनर्विचार करना ही था।
    मेरे ख्याल से भारत की बढत का कारभ उसकी शिक्षा व्यवस्था है। हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को कितना भी कोस ले लेकिन सच यह है कि भारत मे आज भी उच्च शिक्षा सस्ती है। भारत सरकार का शिक्षा बजट कम होने के बावजूद एक इंजीनियर ४-५ लाख मे तैयार हो जाता है। ये खर्च मै ४ वर्ष के इंजीनियरींग के पाठ्यक्रम का दे रहा हूं, जो कि अमरीका की तुलना मे नगण्य है। मेरा अपना ४ वर्ष की इंजीनियरींग(१९९४-९८) का खर्चा १० हजार रूपये सालाना था, जिसमे ५ हजार रूपये शिक्षण शुल्क और बाकी पुस्तके एवं अन्य खर्चे था।

    दूसरा अंतर मानसिकता है।
    भारत मे आज भी पढ़ने लिखने को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। पढे लिखे और कम पढे को अलग नजरो से देखा जाता है। ‘पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब’ वाली उक्ति आज भी भारतिय समाज मे अपना स्थान बरकरार रखे हुय है, सचिन, धोनी और सानिया भी इस स्थिती को बदल नही पा रहे है।
    अमरीकी मानसिकता(वर्तमान पिढी़) की तथाकथित फ्रिडम की है, वे अपनी जिन्दगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पढ़ने लिखने मे गंवाना नही चाहते, वे अपनी फ्रीडम का आनंद लेना चाहते है। आम अमरीकी बच्चा मैकडी और फास्ट फुड की बदौलत मोटा और डम्ब बन रहा है। इसे बदलना इतना आसान नही होगा, समय लगेगा ! कम से कम एक पिढी़ का समय, यह समय है हमारे पास अपनी बढ़त मजबूत बनाने का।

    हमे अमरीका को पिछे छोड़ने के सपने को देखने की बजाये जापान, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश जो नयी व्यवस्था मे अप्रासांगिक होते जा रहे है कि जगह पर खुद को स्थापित करना होगा। चीन भी इस स्थान के लिये प्रयास कर रहा है। अमरीका हमारे लिये प्रतिद्वंद्वी नही होकर बाजार होना चाहिये।

    अमरीका अपनी जगह पर बना रहेगा, क्योंकि उनसे बड़ा डरपोक कोई नही है। इसलिये उसकी नितीयो के साथ चलना ही बुद्धीमानी होगी।

  2. अनुराग मिश्र

    बहुत सही विश्लेषण है। भारत में शोध और अनुसंधान को बहुत बहुत बढ़ावा देना पड़ेगा। एक उदाहरण के तौर पर भारत में प्रति वर्ष ५०० इंजिनियर पीएच.डी हासिल करते हैं जबकि अमेरिका में ७५००.

  3. अनूप शुक्ला

    लेख तो जानकारी पूर्ण है। टिप्पणी में आशीष के विचार भी सही हैं। यह बात तो हमें भी सही लगती है कि अमेरिका से बड़ा डरपोक कोई नहीं है!

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