मैने सिर पर हैडसेट चढाया, जिससे आसपास वालों को एक अनकहा संदेश मिलता है - ”मुझे तंग ना किया जाए”. पूरी शिद्द्त से कंप्यूटर की स्क्रीन को घूरते कब जबडे भींचे कब त्यौरियाँ चढीं पता नहीं. हिंदी-अंग्रेजी के अखबार, ब्लॉग्स और फ़ीड्स पर्दे पर बिखरीं पडी थीं. कानों में मस्तरेडियो की स्वरलहरियां गूंजाएमान हो रहीं थीं.
कंधे पर एक भारी भरकम गद्देदार हाथ नें हौले से लैंड किया – ये मेरे बॉस का बॉस है! ताज(हैडसेट) सरकाया, गर्दन घुमाई.
“स्टेटस अपडेट कब दोगे?”
“लंच के बाद.”
“ठीक है.”
वो मुस्कुराया और चला गया. इधर त्यौरियां, आंखों पर डला ज़ोर, चेहरे की कसावट वैसी ही रही – “देख रहे हो ना सर्फ़िंग कर रहा हूं” छाप. मैंने कॉफ़ी का एक घूंट भरा, घडी देखी ८:१५. अभी अपने काम शुरु करने का समय ही नहीं हुआ. फ़िर से ब्लॉग्स और खबरें पढने की कोशिशें करने लगा.
खयाल आया इन ब्लाग लिखने वालों और खबरें छापने वालों को क्या भान भी है की मैं कितने ज़रूरी काम छोड कर इन्हें पढता हूं – शुरु करता हूं स्वांत:सुखाय और खीज कर रह जाता हूं – बॉस की निगाह में बुरा बनता हूं सो अलग.
अपनी खीज का विश्लेषण करने लगता हूँ. खुन्नस को एनालाईज़ करने लगता हूं. किस बात का गुस्सा है?
अभिषेक-ऐश्वर्या की शादी की खबरों के ओवरडोज़ का? निठारी और नन्दीग्राम का? क्रिकेट का?
नहीं गुस्सा भारतीयों पर है! गुस्सा खबरें बनाने वालों पर नही है – उन लोगों पर है जो खुद पर इन खबरों के हमले होने देते हैं और स्वयं भी खबरों का हिस्सा बन जाते हैं.
एक क्रिकेट के उदाहरण को ही लें -
लडके क्रिकेट खेलने क्या उतरे बम्मन यज्ञ करने लगे, क्षत्राणियों नें अंगूठे काट कर खिलाडियों के तिलक किये, वैश्यों नें शटर डाऊन कर दिये, बाबूओं नें मैडिकल लीव मारीं, ब्लागर्स नें उंगलियां बोरिक पाऊडर से चिकनी कर ब्लाग रंगे. वीडियो बन रहे हैं गाने लिखे जा रहे हैं. दिमाग में भूचाल आ रहे हैं दिल में आंधियां चल रही हैं. खिदमतगार मज़ारों पे चादरें चढा रहे हैं, कुमारियां लाल दुपट्टों का पिच मैट बना रही हैं. वाह रे अतिउत्साह! हम इतने मेलोड्रामेटिक क्यों हैं?
खालिस माहौल बना दिया गया, हिंदी फ़िल्म में दुर्घटना से एक रील पहले वाले खुशहाली के सीन जैसा – फ़िर दुर्घटना हुई और बाकी रोना धोना भी!
परंपरागत गुस्सा, पुतले-दहन, तोड-फ़ोड, मुण्डन-शुण्डन!
भारतीय टीम की हार के चलते नहीं – भारतीयों के व्यव्हार के चलते मैं क्षुब्ध हुआ हूं.
एक ब्लाग कहता है की हिजडे “खिलाडी घर आया हो रामजी” गा गा कर सचिन की पैंशन का चंदा जोड रहे हैं और लोग उन्हें ऐसा करने से रोकने के बजाए प्रोत्साहित कर रहे हैं. क्या ये पुरुषोचित व्यव्हार है की हम हमारे खिलाडियों की ऐसे भद्द उडाएं?
दूसरी खबर कहती है की हरियाणा के एक गांव वालों नें पंचायत बुला कर क्रिकेट खेलने वालों का हुक्का-पानी बंद करने का निर्णय लिया है. पूरे गांव ने मिल कर क्रिकेट का ही बहिष्कार कर दिया है. भई खेल ने तुम्हारा क्या बिगाडा है? खेल से तुम्हारी क्या दुश्मनी? तुम्हारे देश की टीम किसी खेल में हार गई तो उसे खेलना छोड कर क्या संदेश भेज रहे हो? वैसे इसी नीति से चलोगे तो किसी भी प्रतिस्पर्धात्मक खेल को खेल ही नही पाओगे – कभी ना कभी किसी ना किसी खेल में हारोगे ही! जीतने के लिये कमर क्यों नहीं कसते? ये कसम क्यों नही लेते की अपने गांव में चैंपियन पैदा कारोगे?
ये है मेरा देश- ग्लानीभाव देने वालों और पलायनवादीयों का भारत – अपनी टीम के समर्थन में हार और जीत दोनो में साथ रहना हमारे मूल्यों में कहाँ है? टीवी बता रही है की देश शोकमग्न है – खिलाडी दबे-छुपे देश में वापस आ घुसे हैं!
ये कैसे प्रशंसक हैं हम ” तुम अच्छा खेले तब ही हम प्रशंसक वर्ना हम विध्वंसक” ये क्या तरीका है? ये कैसी सभ्यता है?
वैसे भारत रोज़ अपने हाथों खुद हारता है, उसका कोई रोना-धोना नहीं मचता!
इन तमाम खबरों के शोर में दबी हुई एक खबर देखी की इस साल गीर के जंगलों में शिकारियों ने २ और शेर मार दिये. इन शेरों की संख्या ३०० रह गई है, कुछ साल पहले पढा था की संख्या ४५० थी. किसी को फ़र्क नहीं पडता कोई शोर नहीं होता!
आज पढा कुछ पुराने चावल कहते हैं की हमारी टीम को अच्छे कोच से अधिक अच्छे मेनेजर की जरूरत है. वे कहते हैं की वैसे भी कोई भारतीय कोच बनने लायक ही नही है! मैं कहता हूं की कोच तो क्या हम सक्रीयता से खेल को खेलने वाले प्रशंसक बनने लायक भी हैं? हमारे यहां खेलों के लिये कोई प्रसिद्ध घरेलू लीग्स, कोई सरंचना हो तो बताईये? कोई अधोसरंचना ही नही है! कितने प्रशंसक हैं जो खुद खेल को गंभीरता से खेलते हैं?
मेरा क्रिकेट का स्यापा करने वालों से सवाल है की हमारी संस्कृति में खेल-कूद और व्यायाम पर कितना ज़ोर है? जिस देश में कोई खेल खेलना ही समय की बर्बादी माना जाता हो, बच्चे बस्तों के बोझ तले दबे रहते हों उस देश में किसी खेल को व्यवसाय बनाना क्या कम जोखिम का काम है? गरीब देश की भ्रष्ट सरकारें प्रतिव्यक्ति २ पैसे से भी कम खर्च करती हो खेल-कूद पर, ३० प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो, वहां कितने चैंपियन बनेंगे और कैसे? हम किस गणित से उम्मीद करते है की हमारे खिलाडी विश्वस्तरीय होंगे?
दुनिया भर को प्रोग्रामर्स सप्लाई करने वाले देश में कोई बिल-गेट्स ही पैदा हुआ है अब तक? कोई माईक्रोसाफ़्ट ही बनी है? फ़िर खेलों की तो छोड ही दो! किस बात का रोना? किस बात की निराशा जब आशा ही निराधार रही हो! पहले आधार हो बनाओ!
की-बोर्ड पर टपर-टपर करते भडास निकाल ली है. उपर का पैराग्राफ़ जोड कर रात को प्रकाशित कर दूंगा - गुस्सा कुछ कम है अब – आप सबसे बांट जो लिया है! ९:०० बजने वाली है काम पर लगना है.
माना कुछ अलग सोच रहा हो सकता हूं, पर क्या गलत सोच रहा हूं मैं?


देखो भाई गुस्सा सबको आता है, आपको भी आया तभी लिखा ना.
हारना उतना बुरा नहीं जितना जीत की इच्छा के बिना खेलना. घुटने टेकने को माफ नहीं किया जा सकता.
वैसे भारतीय भुलक्कड़ है, सब कुछ सामान्य हो जाएगा.
जिस देश में 97.5% आयकर रहा हो वहाँ बिलगेट कहाँ से पैदा होगा?
आप सही कह रहे हैं, जब भारतीय खिलाड़ी जीतते हैं तो अपनी सारी हदें पार कर अपने अपने शहरों में जुलूस निकाल कर, पटाखे चला कर, मिठाइयाँ बाँट कर उन्हें भगवान का दर्जा दे देते हैं। हारने पर भी सारी हदें पार कर शवयात्रा, पुतला दहन, मुण्डन आदि कार्यों से जी भर कर कोसते हैं। जैसे क्रिकेट में हार गए जो शेष जीवन व्यर्थ हो गया हो।
हिन्दुस्तान में निठल्ले लोगों की तादाद कुछ ज़्यादा है। अगर लोग इतने फ़ालतू न हों तो ये सब वाहितात काम करने का वक़्त कहाँ मिलेगा। यहाँ लोगों के कंधों पर रखने के लिए किसी बॉस का गद्देदार हाथ नहीं है, इसलिए यह सब पूजा-पाठ चलते रहते हैं।
भारत अभी भी अंग्रेजो की मानसीक गुलामी से बाहर नही आया है। कौन खेलता है क्रिकेट ? इंग्लैंड और उसके भूतपूर्व गुलाम देशो के अलावा ? (न्युजीलैंड और आस्ट्रेलिया के गवर्नर अभी भी ब्रिटेन की महारानी नियुक्त करती है, इनके राष्ट्रीय ध्वज पर अभी भी युनीयन जैक चिपका हुआ है)
खेलो के शंहशाहो अमरीका, रूस , चीन , जापान और अब दक्षिण कोरीया मे से कोई भी क्रिकेट क्रिकेट नही खेलता! किसके पास समय है कि एक खेल के पिछे पूरा दिन या पांच दिन बर्बाद करे !
ऐसे भी क्रिकेट आलसीयो का खेल है। अब किसी खेल मे ड्रिंक,लंच,टी जैसे अंतराल का क्या तुक है ? और ऐसे भी इसमे फुटबाल , हाकी जैसी स्टेमीना की जरूरत नही होती।
कौन समझाये लोगो को ?