७. कूडासंकलन: किशोरावस्था में आपकी अजीबोगरीब हरकतों पर जब कन्याएं आपके बारे में “ही इज़ वीयर्ड” बोलती थीं आप खुश हो जाते थे? आपको सनकी या खब्ती कहलवाने में आनन्द मिलता है? आप संकलन ब्लागर बनिये. जितनी बेजरूरत और अजीबो-गरीब चीजों की सूचना संकलित करेंगे लोग उत्सुकता के मारे उतना समय आपकी साईट पर व्यतीत करेंगे. आप कुछ सोच पाएं उस से पहले आपके जैस कूडा संकलक जुडते जाएंगे और अपना माल ला ला कर साईट पर धर देंगे – चाहे जहां से जुगाड के लाएं. ऐसी कूडासंकलन ब्लाग्स चलाई जा रही हैं जिनमें पोस्ट-सीक्रेट नामी गिरामी है! लोग अपने तथाकथित सीक्रेट वहां डालते रहते हैं. एक और साईट है जहां लोग अपनी गलतियां बताते रहते हैं, कहीं कोई कैसे नौकरी से इस्तीफ़ा दिया इसे संकलित कर रहा है कहीं कैसे बर्खास्त किया गया उसे – जनता माल भेज रही है. आसानी के लिये हिंदी वाले भारत भर के बीडी बंडलों के कवर-चित्र आदी से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, चाहें तो कब्ज की दवा के विज्ञापनों से भी. कल्पना कीजिये २० साल बाद आपका ब्लाग बीडी बंडल/कब्ज दवा विज्ञापनों के कवर-चित्रों का वर्चुअल संग्रहालय बन जाएगा. हमारे हिंदी ब्लागमंडल में ऐसे ब्लाग्स के लिये अभी काफ़ी स्कोप है.
इस सूची को आगे बढाऊंगा ज़रा मसाला तैयार होने पर!
अब जरा टिप्पणियों की बारी – पिछली पोस्ट पर आई टिप्पणियां मजेदार थीं लेकिन कम थीं, वजह भी समझता हूं!
तरूण says:
Added on अप्रैल 7th, 2007 at 6:32 pm -Edit
अब लगे हाथ ऐसे ही बता दीजिये हम किस वाले में फिट बैठते हैं, कहीं बैठते भी हैं या आम जनता की भीड में आते हैं, लगता है आप चिट्ठे पढते ही नही उनका अच्छा अवलोकन भी करते हैं।
तरुण आप भी फ़्री-स्टाईल फ़ाईटर हैं. थोडी मस्ती और थोडा चिंतन!
अनूप शुक्ला says:
Added on अप्रैल 7th, 2007 at 9:47 pm -Edit
पिटोगे बबुआ, पिटोगे! सच ऐसे बयान नहीं किये जाते! वैसे एक बात काबिले संशोधन है। हम जो लिखते हैं वह बताकर लिखते हैं कि ये फलाने का है वो अलाने का है। ऐसा करना चोरी में तो नहीं आना चाहिये। ये डकैती हो सकती है चोरी नहीं। हम तो इस्टाइल तक बताके लिखते हैं। पिछले लेख में तकनीक पालकी लिखा तो बताया कि ये शब्द राकेश खंडेलवाल की इस्टाइल का है। बाकयदे आभार व्यक्त किया है। ये चोरी नहीं है, डकैती मान सकते हैं। वैसे तुमको बतायें कमलेश्वर कहा करते थे- मेरी उमर ५५५० साल है। इसमें ५० साल उनकी उमर ५५०० साल उनके पूर्वज लेखकों की उमर। अपने पूर्वजों का माल हमारे बाप का माल है। उसमें कैसी चोरी। भाई हमे चोरी के आरोप से बरी करो,भले ही डकैती का मुकदमा चलाओ।
वैसे लेख चौकस है। आगे का इंतजार है। बहुत दिन बाद मौज-मजे के मूड में आये हो। इसे बनाये रखो। दुनिया में कुछ और है नहीं बस कुछ दिन की मौज है। ले लो!
Debashish says:
Added on अप्रैल 8th, 2007 at 1:40 pm -Edit
होली तो आसपास नहीं पर इतनी धुलाई या फिर किसी का “परनिंदा द्वारा सफल ब्लॉगर कैसे बनें” का नुस्खा आजमाया जा रहा है।
हम लोग एक दूसरे की खूबियों खामियों को जानते हैं और ये जानते हैं की दूसरे हमें सप्रेम स्वीकार करते हैं – कहीं ना कहीं ये सत्य हमें कंफ़र्ट ज़ोन दे ही देता है! इसके चलते हम अपने दायरे से बाहर हाथ नही डालते! हमें टाईप-कास्ट किया जाना आसान हो चुका है. इसमे क्या समाचार है! मुद्दा है इससे बचें कैसे? हम भी और नये भी!
जब से जीतू ने नारद कथा शुरु की मुझे सब पुरानो की तारीफ़ों का ओवरडोज़ हो गया… हम वो क्या कहते हैं ..’इतिहास का हिस्सा’ हो गये! हम सभी अपनी अपनी सीमितताओं में बंधे हैं. अपनी सीमितताओं के चलते जो बन पडता है करते हैं और सीख ही रहे हैं. वैसे भी जयजयकार और महिमामंडन लायक कोई है नहीं , कुछ किया नहीं तो पुरानों की मौज क्यों ना ली जाए? बकौल देबू ’निंदा’ ही सही, क्यों ना की जाए? वरिष्ठता-कनिष्ठता के अभिजात्य-औपचार का स्थान इस माध्यम और विधा पर वैसे भी लागू नहीं.
वैसे मुझे मालूम है जिन-जिन का नाम लिया है सब कभी ना कभी हिसाब बराबर करेंगे!
हमे कभी छोडा है किसी नें! आपसी मौज-मस्ती में ये तो चलता रहता है! बाकी चोरी-डकैती तो सब पढवाने के बहाने हैं!
kakesh says:
Added on अप्रैल 8th, 2007 at 3:21 am -Edit
अभी तो बहुत सी श्रेणीयां शेष हैं.. आपका क्रमश: ढाढस बंधाता है कि आगे आप और लिखेंगे . वैसे आजकल एक ये क्रमश: वाली श्रेणी भी विकसित हो रही है..जो एक पोस्ट में अपनी बात नहीं रखते वरन क्रमश्: चस्पा कर गायब हो जाते हैं अब लोग इनके ब्लौग पर आकर खोजते रहते हैं कि क्या कुछ नया आया और नया न मिलने पर पुराना ही पढ़कर चले जाते हैं. इस श्रेणी में हम भी आते हैं.
धन्यवाद काकेश! आप अपने कंप्यूटर पर कोई फ़ीड रीडर डाऊनलोड कर लें और उस में नारद की फ़ीड जोड लें ये समस्या हल हो जाएगी – नए ब्लाग अपडेट होने का पता चलता रहेगा बिना साईट्स पर जाए. कोई समस्या हो तो eswami [at] gmail [dot] com पर मेल कर दें.
शशि सिंह says:
Added on अप्रैल 7th, 2007 at 11:53 pm -Edit
हा हा हा… बहुत खुब। [:)] एक सवाल: उपरोक्त छह वर्गीकरण के बाहर क्या हिंदी ब्लॉगिंग का अस्तित्व है? यदि है तो आपका यह सिद्धांत उन्हें मौलिकता का प्रमाण पत्र बांट रहा है… [;)] तरूण भाई खुश हो जाइये स्वामीजी ने हमें मौलिक कहा।
Pratik Pandey says:
Added on अप्रैल 7th, 2007 at 11:55 pm -Edit
बहुत खूब स्वामी जी
अभय तिवारी says:
Added on अप्रैल 8th, 2007 at 12:27 am -Edit
लगातार दूसरी प्रविष्टि में अनुभवजन्य ज्ञान..
जगदीश भाटिया says:
Added on अप्रैल 8th, 2007 at 1:54 am -Edit
वाह! एकदम मौलिक लेख
धन्यवाद सभी को!
शशी भाई आप मौलिक हैं मुहल्ला वालों से प्रतिक्रियात्मक पंगे लेने के मामले मे भी!
सागर चन्द नाहर says:
Added on अप्रैल 8th, 2007 at 5:03 am -Edit
मुझे भी अपना शिष्य स्वीकार करें, गुरुदेव
हा हा ..सागर भाई!, गुरुदेव का टाईटल फ़ुरसतिया जी के लिये सुरक्षित है! उनके तो हम सारे चेले हैं ही! ;)





बीडी वाली आइडिया मस्त है, स्वामी जी. एकाध साइट क्यो ना बना ली जाए. जितुजी पहल करें.. अक्षरग्राम पर खोल लेते हैं..
अपने को तो चूर्ण वाला विज्ञापन ज्यादा पसन्द आया
कितना पैसा लेकर विज्ञपान लगाया है?
मुझे इस लेख पर ई-मेल में काफ़ी टिप्पणियां मिल रही हैं – भाई सीधे यहां लिखिए, प्रकाशित करने की अनुमति समेत मिली रचनाजी की टिप्पणी सधन्यवाद प्रस्तुत है –
स्वामी जी,
नमस्कार!
कई दिनो से आपका ब्लॉग पढ रही हूँ..लेकिन टिप्पणी चाह्ते हुए भी नही कर पाती…आपके लेखन की आक्रामक शैली मुझे बहुत पसँद है..आपकी किसी पुरानी पोस्ट मे ‘मालवी’ और ‘निमाडी’ भाषा का जिक्र देखकर खुशी हुई..उस समय निमाडी मे टिप्पणी टाइप भी की लेकिन प्रेषित नही कर पाई…आज आपने जिक्र किया की इस माध्यम और विधा मे कोई वरिष्ठ या कनिष्ठ नही होता तो हिम्मत कर पाई आपको लिखने की…मै आपके बनाये टूल ‘हिंदिनी’का उपयोग करती हूँ..लेकिन उसका उपयोग ऑफलाइन नही कर पाती….
आपकी अभी की दो पोस्ट जिस मजे के अन्दाज मे लिखी है, उसके लिये मेरी टिप्पणी ये थी– (लेकिन एसा कहूँ या नही इसी असमन्जस मे रही)
‘चिट्ठाजगत मे चल रही घटनाओं का अवलोकन करके उस पर एक पोस्ट लिखने का आइडिया अपने भी कहीं से चुराया लगता है!!’
आप चाहें तो ये मेल ऐसे ही या सम्पादित करके टिप्पणी के रूप मे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर सकते हैं.
धन्यवाद.
रचना
एक नया आईडीया हम भी दे देते है !
गुप्तरोगो या बवासीर के शर्तिया इलाज के विज्ञापनो के संग्रह का। यकिन मानिये सारे भारत मे विज्ञापनो से रंगे हुयी दिवारो मे कम से कम ७०% दिवारे इन्ही के विज्ञापनो से रंगी हुयी मिलेंगी।
अच्छा है जारी रहें।