‘ट्रॉल्ल‘ इन्टरनेट पर उस व्यक्ति को कहा जाता है जो जानबूझ कर संवेदनशील मुद्दों पर आपत्तीजनक, अपमानजनक और भडकाऊ बातें लिखता है. कई बार तो कानूनी कार्यवाही की नौबत आ जाती है. (कृपया दी हुई विकी कडी पढें!)
ट्राल्स के बारे में ये जानीमानी बात है की इनके पास खाली समय की कोई कमी नहीं होती, विघ्नसंतोष में सुख पाने की मनोवृत्ती होती है, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की कमी होती है और अपने निजी जीवन में कोई सम्मानजनक स्थान नही होता.
इसका उद्देश्य कुछ भी हो सकता है – वैमनस्य फ़ैलाना, लोगों का समय नष्ट करना, उन्हें खिन्न करना. अरुचिपूर्ण, अनुपयोगी और अनुत्पादक लेखन! एक शब्द में ’टेस्ट-लैस’!
ट्राल्लिंग करने वाला लोगों के ध्यानाकर्षण का भूखा होता है. तंग आ कर चालू अंग्रेजी वाले इन्हें “अट्टेंशन होर” [वेश्यावत ध्यानाकर्षणा व्यहार करने वाला] कहने लगे हैं – जो एक किस्म का अपशब्द होते हुए भी फ़ोरम्स पर ‘ट्रॉल्स’ से अधिक प्रचलित शब्द हो गया.
ट्रॉल्स का हश्र तय है. जैसे सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिये उछल-कूद या तोड-फ़ोड करता बदतमीज़ बच्चा चांटा खाने से लेकर कमरे के बाहर कर दिये जाने तक किसी भी किस्म की सज़ा पाता है वैसे ही ऐतिहासिक रूप से ट्रॉल्स को डिसकशन फ़ोरम्स या ईमेल ग्रुप्स पर से लानत-मलामत कर के बैन किया जाता रहा है. जो बगिया लगाना जानते हैं उन्हें खरपतवार से निपटना आता है. मॉडरेटर्स की नियमावली पूर्व-निर्धारित होती है और समूह के भले के लिये अनुशासन की कार्यवाही करना पडती है.
चेताने पर ट्रॉल्स अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं और समूह की नींव रखने वालों को फ़ासीवाद, तानाशाही, तालिबानियत की तोहमतें लगाते हैं. घडियालीआंसू और बकवाद शुरु करते हैं अत: कई बार उन्हें बैन करने की कार्यवाही एक झटके में की जाती है – बिना किसी पूर्व सूचना के- जनता इतनी त्रस्त हो चुकती है राहत की सांस लेती है – “गुड रिड्डेंस”! शहीदी सुख लेने का कोई मौका नहीं मिलता. कई बार तो ट्रॉल्स के घर,दफ़्तर आदी के पते से से आने वाले किसी नई सदस्यता के निवेदन तक को खारिज कर दिया जाता है.
समय के साथ ये हुआ है की जो लोग कल तक डिसकशन-फ़ोरम्स से जुडे थे वे आज चिट्ठाकारी से आ जुडे हैं, पीछे पीछे ट्रॉल्स भी आए और इनसे जुडी समस्याएं भी. मंतव्य ये है की इन्टरनेट पर सक्रिय रहने वालों का एक पुरानी बीमारी से सामना होता रहा है. कुछ नया नही है. मैने इस विषय पर पहले भी लिखा है और एक अमरीकी ब्लागर का अनुभव भी यहां बांटा है. समाधान हैं -तकनीकी भी और कानूनी भी.
तकनीकी रूप से अगर देखें तो समूहों के वेब-आधारित एग्रिगेटर्स [जैसे की हिंदीब्लाग्स, नारद आदी] का प्रारूप डिसकशन फ़ोरम्स [जैसे की परिचर्चा] से भिन्न होता है.
एग्रीगेटर का काम होता है पाठकों को सूचित करना की किसी ने अपनी स्वयं की वेबसाईट पर कुछ लिखा है. क्या लिखा है वो लिखने वाला जाने और क्या प्रतिक्रिया करनी है वो प्रतिक्रिया करने वाला जाने! एग्रीगेटर्स समभाव की भावना से चलते हैं, वे चिट्ठाकारों के विवेक पर विश्वास करने की अवधारणा के हिमायती होते हैं. उनके आत्मानुशासन, संवेदनशीलता और सहनशीलता पर निर्भर होते हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बडे पैरोकार होते हैं. वे सैद्धांतिक रूप से माडरेशन के हिमायती नहीं लेकिन कोई भी एग्रीगेटर स्वछंदता की धमाचौकड़ी और अतिक्रमण के अतिरेक का महीन फ़र्क करने के लिये स्वतंत्र होता है.
ट्रॉल्स से निपटने के कई स्तर पर कई तरीके होते हैं -
१. नज़र-अंदाज़ करना.
२. ब्रांडिंग करना – जैसे की फ़ीड के आगे लिख सकते हैं – “सावधान: भडकाऊ चिट्ठा”
३. अपमानित करना – चिट्ठे की कडी की फ़ांट बाकियों से छोटी कर देना. ये तकनीक बेशर्मों पर काम नही करती.
४. ट्रोल्ल रेटिंग देना.
५. तकनीकी/गैर-तकनीकी/विषयवत वर्गीकरण कर देना.
६. सदस्यता देना – जैसे की अगर एग्रीगेटर सबके लिये खुला है और फ़ीड जोडने पर कोई नियमावली नही हो तो ये विकल्प खुला है.
७. माडरेशन - मिडियेशन से शुरु होता है, रिस्ट्रीक्शन से होते हुए परिणिती बैन करने तक जा सकती है.
८. डिलीशन – चिट्ठे की कडी हटाना. या उसे स्टेल टेक्स्ट में बदल देना.
९. बैन करना – ये समूह के सदस्यों के अधिक तंग हो जाने पर किये जाने वाली कार्यवाही है. कई बार इसका सहारा तब लिया जाता है जब व्यक्तिगत हमले होने लगें, सूचनाएं तोड-मरोड कर प्रस्तुत की जानी लगे और समय या सामूहिकता नष्ट करवाने के प्रयास किया जाने लगें.
१०. बहिष्कार करना- समूह ट्राल्स का सामूहिक बहिष्कार कर देता है – उनकी सदस्यता तो नही हटाई जाती लेकिन उन्हें पढना बंद कर दिया जाता है. उनके विषय में बात करना या प्रतिक्रियाएं भी बंद कर दी जाती हैं. ये रास्ता जनता खुद चुनती है, हां उन्हें ये बताने की आवश्यकता होती है की समस्या बडी नही है और उसका स्वाभाव क्या है. समस्या खडी करने वाली की मानसिकता विघ्नसंतोष और ध्यानाकर्षण की मारी हुई है. दयनीय है. अनुभवी प्रयोगकर्ताओं के अनुसार - शुष्क तकनीकी रूप से देखा जाए तो ट्राल्स द्वारा किये गये लेखन के प्रति निर्णय लेना कठिन नही होता क्योंकी किसी प्रकार की पक्षिय-विपक्षिय भावनात्मकता का अधिक स्थान नही होता. उस्तादों के हिसाब से बहिष्कार सबसे कारागर उपाय है लेकिन अगर सामूहिक रूप से लगातार किया जा सके!
हां दूसरे विकल्प तो खुले ही हैं!




कहीं पे निगाहे कहीं पे निशाना..
वैसे प्रसंगवश न भी होता तो भी यह लेख जानकारीवर्धक है. आभार.
‘ट्रॉल्ल’ तो बहुत से हैं, अब आपकी सलाह मानना तो प्रबंधकों के हाथ में है। वैसे कार्यवाइयाँ होने लगे तो ज़्यादातर ट्रॉल्ले तो खुद ब खुद शांत हो जायेंगे। वो गुस्सा भड़काते हैं तो शांत रहने वाले भी उलटे-सीधे कृत्य करने लगते हैं।
आपके इस लेख में टंकण की बहुत अधिक अशुद्धियाँ हैं। प्रूफ़-रीडिंग करें। मैं कुछ गिना रहा हूँ।
कडी-कड़ी
नही- नहीं
मनोवृत्ती- मनोवृत्ति
अनपे- अपने
फ़ैलाना- फैलाना
तोड-फ़ोड- तोड़-फोड़
पडती- पड़ती
शुरु- शुरू
जुडे-जुड़े
बिमारी-बीमारी
ब्लागर-ब्लॉगर
धमाचौकडी- धमाचौकड़ी
वर्गिकरण- वर्गीकरण
और भी बहुत सारी हैं, ग़ौर करेंगे तो दिख जायेंगी। धन्यवाद।
@नीरज
धन्यवाद!
@शैलेश
धन्यवाद, टंकण की गलतियां सुधार ली हैं वर्तनी बेहतर करने की कोशिश जारी है!
बढिया जानकारी हिन्दी में विस्तार से दी. धन्यवाद.
वैसे तो ये भी उसी प्रसंग की एक कड़ी है पर प्रसंग हो ना हो जानकारी अच्छी है.
आपकी वो चिट्ठाकारों के वर्गीकरण वाली सिरीज खतम हो गयी क्या ??
अच्छी जानकारी है. नेट पर हिंदी के प्रसार को देखते हुए हमारे लिए इस तरह की जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है. बहुत धन्यवाद!
सही है। काफ़ी दिन बाद इत्मिनान से पढ़ा तुम्हारा लेख। इस पर शायद विनय जी ने भी कुछ लिखा है आज! ये सारे लफड़े तो होंगे ही बढ़ते ब्लाग्स के साथ।
अक्सर ऐसा भी होता है कि लोगों को अपने और दूसरों के बारे में गलतफ़हमी भी होती है। मेरी समझ में तो ऐसे ब्लाग को नजर अंदाज करना ही सबसे बेहतर तरीका है फिलहाल! बढ़िया से बढ़िया लिखने वाला भी प्रतिक्रिया चाहता है। घटिया लेखन भे इस भावना से मुक्त नहीं होता कि लोग उसके लेखन की चर्चा करें।
जैसे-जैसे घटिया लेखन की उपेक्षा होती जायेगी उसकी खीझ बढ़्ती जायेगी!
सही जानकारी. आगे के लिए मार्गदर्शन भी है.
बहुत सही जानकारी. ज्ञान बढाने के लिए धन्यवाद स्वामीजी.
बहुत ही सामयिक और प्रासंगिक लेख। ट्रॉल्लिंग की समस्या से निपटने के तकनीकी उपायों पर आपने अच्छी तरह से प्रकाश डाला। मैं इसके क़ानूनी उपायों पर एक पोस्ट लिख रहा हूं।
वैसे, कुछ ऐसे महाचिट्ठाकार और चिट्ठा आचार्य भी हैं जो इस तरह की समस्या से निपटने के प्रयासों को टिटहरी द्वारा आकाश के गिरने पर अपने पैरों से रोक लेने के ख्याल की तरह देखते हैं। मानो इंटरनेट एक मानवजनित तकनीक न होकर अलौकिक और दिव्य किस्म की चीज हो जो मानव के नियंत्रण एवं नियमन की क्षमता से परे हो। यह सही है कि किसी भी तकनीक का दुरुपयोग पहले होता है और उससे निपटने के उपायों की तलाश बाद में की जाती है। ज़ुर्म पहले होता है और उससे निपटने के लिए क़ानून भी बाद में बनते हैं और उनको लागू कर सकने में भी वक्त लगता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दुष्प्रवृत्तियां सदप्रवृतियों पर हावी हो सकती हैं। ऐसा कभी नहीं हो सकेगा। शैतानी ताकतों के पास चाहे जितनी मायावी शक्तियां हों, जब दैवी ताकतें संगठित और योजनाबद्ध होती हैं तो शैतानी प्रवृत्तियों को परास्त होना पड़ता है।
आने वाले समय में इंटरनेट शैतानी प्रवृत्तियों और दैवी प्रवृत्तियों के बीच महासंग्राम का कुरुक्षेत्र बनेगा और चिट्ठा जगत इसके केन्द्र में रहेगा। यह अच्छा है कि यह युद्ध वास्तविक जगत में नहीं होगा और इसमें किसी की जान नहीं जाएगी, रक्तपात नहीं होगा। लेकिन इंसानों का मन जो दैवी और शैतानी ताकतों की प्रयोगशाला है और जो उसे युद्ध एवं शांति के लिए प्रेरित करता है, वह इंटरनेट पर सर्वाधिक सक्रिय होने जा रहा है।
ऐसे लोग जो साहित्य की हवाई दुनिया में जीते हैं, करते-धरते कुछ हैं नहीं वास्तविक जगत की जटिल चुनौतियों से निपटने की दिशा में, केवल ऐं-वें बातें करके और मसखरी करके तालियां बटोरते हैं, वे कुछ ठोस कार्य करने वालों और समस्याओं से जूझने का प्रयास करने वालों के बारे में ऐसी ही हास्यास्पद और फूहड़ बातें करते रहते हैं। वे बात से पेट भरने वाले लोग हैं, भात से भरने वाले नहीं।
उनके टिटहरी वाले उपमान पर मुझे एक आख्यान याद आता है। एक टिटहरी ही थी जिसके अंडे समुद्र में बह गए थे और उसकी विनती पर द्रवित होकर अगस्त्य ऋषि ने समुद्र को चुल्लू में पी लिया था और टिटहरी को उसके अंडे वापस दिला दिए थे। इसलिए हे वाग्वीर फुरसतिया जी, टिटहरी भले समर्थ न हो, लेकिन उसकी विनती भी इतनी कारगर हो सकती है कि कोई अगस्त्य जैसा समर्थ उसकी सहायता के लिए आगे आ सकता है। यह धरती ऐसे वीरों से कभी रहित नहीं रही है जो दुष्टों और आततायियों का नाश करने के लिए आगे न आ सके।
अति-प्रासंगिक और सूचनापूर्ण आलेख के लिए आभार ।
ट्राल्स का मानसिक विश्लेशण आपने प्रस्तुत किया। बिलकुल नई जानकारी, पहले इसके बारे में कहीं सुना पढ़ा नहीं था।
बहुत ही बढ़िया लेख स्वामी जी। हिन्दी के प्रसार के साथ इस विषय में जागरुकता भी बढ़नी चाहिए।
विकिपीडिया वाले लेख में निम्न पंक्तियाँ पठनीय हैं:
आपका लेख बहुत सही व प्रसंगात्मक है । हमारे ज्ञान में भी वृद्धि हुई । मैं काफी समय से तरीका १० पर चल रही हूँ, किन्तु यह अन्य बन्धुओं के असंयम के कारण कामगार नहीं सिद्ध हो रहा । मेरा तो यहाँ तक सुझाव है कि मत पढ़ो । यदि कब प्रतिबन्ध का समय आ गया है जानने के लिए पढ़ना है तो केवल एक व्यक्ति जो नारद का मॉडरेटर हो पढ़े, बाँकी लोगों को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है । मैं स्वतंत्रता की सदा से हिमायती हूँ, किन्तु स्वतंत्रता तब तक ही ठीक है जब तक यह दूसरों का अपमान न करती हो. । और हमें भी तो इसी स्वतंत्रता का उपयोग करने का अधिकार है ।
घुघूती बासूती
नहीं, अभी तो टंकण की गलतियाँ खत्म नहीं हुई हैं। अभी भी ‘कड़ी’ कडी है और ‘मनोवृत्ति’ मनोवृत्ती। प्रूफ़-रीडिंग करें। इसे आलोचना न समझें।
बेहतर जानकारी है…सत्य भी है आज के माहौल को देखते हुए!!
शैलेष जी
ईस्वामीजी के लेखों में से प्रूफ रीडिंग करते करते आपसे भी टंकण की दो- चार गलतियाँ हो ही गई-
कार्यवाइयाँ =कार्यवाहियाँ
ज़्यादातर= ज्यादातर
ग़ौर= गौर
प्रूफ़= प्रूफ
आपका नाम शैलेश या शैलेष, किस तरह लिखा जाता है?
जो सही समझें वह मान लेवें।
ये लो देखो दादा-
कार्रवाइयां (नई हिन्दी के मुताबिक़)
ज़्यादातर (प्यारी बिंदु के साथ)
ग़ौर (प्यारी.. के साथ)
प्रूफ़ (प्या… हम्म)
बिंदु इच्छा औऱ स्वादानुसार लगाया करें. कोई ज़ोर-ज़बरनदस्ती नाही है.
@सागर भाईसा
मेरे नाम की शुद्ध वर्तनी है- शैलेश (शैल ईश= शैलेश)।
आपने मेरे चार शब्दों में जो अशुद्धियाँ निकाली है वो गलत है। चारों शुद्धतम रूप में लिखे गए शब्द है। आप कोई भी प्रमाणित हिन्दी शब्दकोश उठा लें। जैसाकि नीरज दीवान जी ने आपको बताया कि कार्यवाइयाँ नई हिन्दी के द्वारा प्रमाणित है। ज़्यादातर (अरबी के ज़्यादा में फ़ारसी का ‘तर’ प्रत्यय लगा है)। गौर संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब होता है गोरा रंग, गौर वर्ण जबकि ग़ौर अरबी का शब्द है जिसका अर्थ है सोच-विचार, चिंतन। प्रूफ़ इसलिए सही है कि अग्रेज़ी भाषा में प्रायः ‘फ़’ ध्वनि प्रयोग में आती है ‘फ’ ध्वनि कम ही प्रयोग आती है। यह तर्क तो नहीं है, पर सत्य अवश्य।
बहुत ही सटीक लेख , अगर कुछ दिन पहले पढा होता तो शायद अधिक समझ मे नहीं आता लेकिन अब परिस्थितयों को देखते हुये सटीक , धन्यवाद !