हर जटिल समस्या का एक सीधा, आसान और गलत हल होता है. अनुभव एक आश्चर्यजनक चीज़ होती है, जब कोई गलती दोहराते हैं तो उसे पकडना आसान हो जाता है.
किसी जटिल समस्या को और अधिक जटिल करने का सबसे आसान तरीका है उसे समझे बिना बहुत आसान हल ढूंढने का प्रयास करना.
अक्सर देखा गया है की छोटे समूह जटिल समस्याओं का बेहतर हल निकालते हैं जैसे जैसे समूह बडा होता जाता है, अच्छे सदस्यों के जुडने पर भी पता नही क्यों मूर्खता का प्रतिशत बढता जाता है और समाधान ढूंढने की प्रक्रिया धीमी होती जाती है. कुछ लोग कहते हैं मूर्खता का प्रतिशत नही बढता सिग्नल इज़ टू नॉईस रेश्यो गडबडा जाता है! अपने राम ने इसका मतलब ये निकाला है की ज्यादा शोर मचाने वाले सदस्य ज्यादा मूर्खताएं करते दीखते हैं जो चुप है वो फ़िर भी बच जाते हैं. समूह को परियोजना के आकार के हिसाब से कसा हुआ और छोटा ही होना चाहिए.
वे ही उपक्रम सफ़ल होते हैं जिनको चलाने वालों की अपनी रुचि उनकी सफ़लता में होती है. खासतौर पर, ओपन सोर्स प्रोजेक्ट्स असफ़ल कब कब होते हैं?
१. सदस्यों के थक जाने पर या बोर हो जाने पर.
२. अच्छे प्रयोगकर्ता ना मिलने पर.
३. नेतृत्व के अभाव में
४. समूहों में अहं के टकराव के चलते दल बनने पर.
वैकल्पिक समाधानों का सबसे बडा फ़ायदा है चुनाव की स्वतंत्रता ये फ़ायदा जितना प्रयोगकर्ता का है उससे अधिक स्वयं समाधान बनाने वाले को होता है. सामूहिक परियोजनाओं को सफ़ल करने के अपने-पराये अनुभव जन्य सूत्र क्या मिले हैं?
संप्रेषण और सामूहिक परियोजनाएं
आभासी मंडलियों [वर्चुअल टीम्स] को बनाने और उन पर आधारित परियोजनाएं चलाने में दो समस्याएं सबसे बडी हैं – संप्रेषण और जान-पहचान बनाने की.
इसके लिये जरूरी है की सदस्य आपस में जब भी संभव हो व्यक्तिगत रूप से मिलें और संप्रेषण की हर उपलब्ध तकनीक का प्रयोग कर के नियत समय पर नियत अवधी के लिये तय आवृत्ति बाद जरूर मिलें और एक दूसरे की प्राथमिकताओं का सम्मान करते हुएएक दूसरे के बारे में जानें.
बाऊंड्री स्पैन्निंग और सफ़लता
समूह में १५% लोग ऐसे होने चाहियें जो वैकल्पिक संसाधनों की व्यवस्था व्यक्तिगत संपर्कों के चलते कर सकें. ऐक ऐसे माहौल में जब व्यक्तिगत रुचि ही किसी सदस्य के जुडाव की वजह हो, सदस्य की अनुपलब्धी की स्थिती में बाह्य सहायता ले सकें. लेकिन ऐसा बहुत जरूरी होने पर ही करना चाहिए अन्यथा मंडली को जोडे रखने में कठिनाईयां आती हैं और एकता का भाव प्रभावित भी हो सकता है.
इस प्रकार के बाह्य संसाधनों को अन्य परियोजनाओं में आंतरिक संसाधन बनाना भी एक अच्छी पहल है.
काम का वर्गिकरण
काम का वर्गिकरण ऐसा हो की एक हिस्से के काम का प्रभाव दूसरे हिस्से पर ना हो. दुनिया भर में फ़ैली टीमें कभी नहीं सोतीं. सदस्यों को सिर्फ़ सुरुचिपूर्ण और जोखिम वाले काम ही देने की कोशिश की जानी चाहिए. बोरियत भरे काम सदस्य बारी बारी से करें तो बेहतर. ये पक्का करना बहुत जरूरी है की जो भी काम किये जा रहे हैं वे महत्वपूर्ण हों और समूह को उनकी जरूरत हो. आभासी मंडली की सफ़लता का सबसे बडा राज़ है सही स्वयंसेवकों का चुनाव करने की क्षमता.
बोरियत और दोहराव से भरी परियोजनाओं को शुरु ही नही करना चाहिए.
आखिर में ..
देखा है की खास तौर पर जब चिट्ठाकार जब आपस में जुडते हैं तो इन दोनो बडी समस्याओं(संप्रेषण और जान-पहचान) का हल पहले से उपलब्ध होता है चिट्ठाकार एक दूसरे को पढ कर और एक दूसरे को लिख कर अन्य विषयों पर अपने विचार पहले से ही संप्रेषित कर चुकते हैं और जान-पहचान बना चुकते हैं. अक्सर सदस्यों का चुनाव या उनसे जुडाव उन्हें पढ कर उनमे बारे में जान कर पहले होता है और परियोजनाएं बाद में शुरु की जाती हैं. यह वर्चुअल टीम बना कर परियोजना शुरु करने का एक नायाब तरीका है.
इसका मतलब ये भी है की एक समझदार समूह में जब समर्पित सदस्य साथ में काम करें तो व्यक्तिगत सरोकारों, पूर्वाग्रहों पर अधोरेखाएं ना खींचे बल्की सामूहिक परियोजनाओं के लिये जरूरी तालमेल बनाने में इन्हें अडचन के रूप में देखें. अच्छे सदस्य के लिये परियोजना का ध्येय और उसकी सफ़लता सर्वोपरि हो जाती है.





देर आयद बहुत दुरूस्त आयद.
बहुत दिनों बाद दिखे और जब दिखे तो खूब लिखे. अच्छे टिप्स दिए हो सरकार. आपको तो अब अनुभव हो चुका है.
धन्यवाद.
ये पोस्ट मेरे तो बहुत ही ज्यादा काम की है.
मूर्खता का प्रतिशत बढता जाता है और समाधान ढूंढने की प्रक्रिया धीमी होती जाती
सत्य वचन
इस पर कबीर का एक दोहा भी तो है जिसका अर्थ है कि मूर्ख व्यक्ति जब तक मौन रहता है तब तक सामने वाला उसको बुद्धिमान समझता है, जैसे ही वो मुँह खोलता है उसकी औकात पता चल जाती है!!
बड़ी अच्छी बात लिखी.लेकिन छुट्टे नोट्स के अलावा थोड़े बड़े नोट्स लिखते तो बेहतर था.सीखने को मिला काफी कुछ.
बहुत ज्ञानवर्धक और शोधपरक आलेख. आनन्द आ गया पढ़कर.
कुछ लोग कहते हैं मूर्खता का प्रतिशत नही बढता सिग्नल इज़ टू नॉईस रेश्यो गडबडा जाता है! अपने राम ने इसका मतलब ये निकाला है की ज्यादा शोर मचाने वाले सदस्य ज्यादा मूर्खताएं करते दीखते हैं जो चुप है वो फ़िर भी बच जाते हैं.
–बिल्कुल सही मायने में अर्थ निकाला, महाराज!
अच्छा है। नोट्स पढ़कर आगे के इम्तहान पास किये जायें।
टॉम पीटरस् और रॉबर्ट वॉटरमैन ने १९८० के दशक में एक प्रसिद्ध किताब, In search of Excellence लिखी है। इस किताब में वे अमेरिका की प्रसिद्ध कम्पनियों के बारे में बात करते हुऐ बताते हैं कि वे कैसे बढ़ीं। उनका कहना है कि,
“अच्छी कंपनियों में सफलता का राज है कि उनका प्रमुख व्यक्ति एक अच्छा नेता था और जो अपने सिद्धन्तों पर अड़ा रहा, जिसके कारण वह कंपनी इतनी बढ़ पायी। बाद में कंपनी ने, उसकी बातों को अपनी संस्कृति में ढ़ाल लिया। जिससे वे आगे बढ़ीं।”
इस बात को वे उदाहरण सहित किताब में समझाते भी हैं। मुझे यह किताब बहुत अच्छी लगती है। मेरे विचार से पढ़ने योग्य है।
मेरे विचार में, इस किताब की बातें जीवन में सब जगह लागू होती है। यदि प्रमुख व्यक्ति अच्छा नेता नहीं है, उसके सिद्धान्त न केवल खोखले हैं पर ढ़ुलमुल हैं, वह साधारण है औरों से ऊपर नहीं है तो ही मुश्किल आती है। आपकी नीव ठीक नहीं रहती और मुश्किलें बढ़ती रहती है।
अच्छा ज्ञानवर्धक लेख!
“अगली कड़ी का इंतजार है” नहीं लिखूँगा क्योंकि मैं इस लेख को छपने के काफी दिन बाद पढ़ रहा हूँ, मेरे इस लेख को पढ़ने तक वह छप चुकी है और मैं उसे पढ़ने वाला हूँ।