विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजनों के औचित्य पर कोई विवाद नहीं है. ऐसे सम्मेलनों से हिंदी भाषा का कोई भला नहीं होना हां कुछ देसियों की विदेश भ्रमण की कामना जरूर तृप्त हो जाती है. लेकिन जिस प्रकार मंगलेश डबराल नें विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्देश्य को ही संदिग्ध करार दिया है वो चौंकाने वाला है.
आप कहते हैं -
अभी तक जहाँ भी हिंदी सम्मेलन हुए हैं उन पर हिंदूवादियों और पुनरुत्थानवादियों का ही वर्चस्व रहा है. इनके वर्चस्व को कम करने की कोई कोशिश अबतक नहीं की गई है.
मेरा ऐसे किसी सम्मेलन से दूर दूर तक का कोई नाता नहीं है लेकिन मैं इस कथन पर कडी आपत्ती दर्ज करता हूं. मैं और मेरे जैसे कई अपने सीमित समय और साधनों के चलते हिंदी भाषा से जुडे रहने और उसके प्रयोग को बढाने के लिये प्रयासरत रहे हैं और मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं की इस प्रकार की किसी भी कोशिश से जुडे लोगों का हिंदी प्रसार के पीछे कोई मूलभूत धार्मिक अजेंडा ही रहा होगा. इस प्रकार उस सम्मेलन से जुडे १००० लोगों को एक कतार में खडा कर के सांप्रदायिक होने का आरोप लगाना एक पढेलिखे आदमी का निहायत उज्जडपन है. इस प्रकार की ‘स्टीरियोटाईपिंग’ और ‘जनरलाईज़ेशन’ पर क्या उनकी बिरादरी का कोई वरिष्ठ अपने विचार रखेगा?
अगर कोई हिंदू अंग्रेजी से नाता जोडे तो गद्दार है और अगर हिंदी से जोडे तो पुनरुत्थानवादी है – किस प्रकार का हिंदू? “हिंदूओं” की या इशारा ”सवर्ण हिंदू” की ओर है? तो आप ये स्वीकार करते हैं की आप हिंदूओं को जातियों में बांट कर देखते आए हैं और देखना चाहते हैं? निजभाषा का मान करने वाले क्या इस प्रकार लांछनीय हैं?
वे कहते हैं -
जहाँ हिंदी का स्वरूप लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने की कोशिश नहीं दिखाई दे रही हो उस सम्मेलन में मैं एक लेखक की हैसियत से शामिल नहीं हो सकता.
ये एक गैरज़िम्मेदाराना कथन है. हिंदी का स्वरूप लोकतांत्रिक है इसीलिये हिंदी है – जिस भाषा के नाम का मूल शब्द(हिंद) ही विदेशियों का दिया हो और उसे स्वीकार कर लिया गया हो इससे अधिक लोकतांत्रिकता क्या होगी? जिस भाषा में अंग्रेज़ी समेत अन्य कितनी ही भाषा के शब्द समाहित हों उसकी धर्मनिरपेक्षता पर क्या प्रश्न? क्या भाषिक शुद्धता के पैरोकारों को आप धार्मिक कट्टरवादी करार देना चाहते हैं? और अगर हां तो फ़िर सिद्ध कीजिये. अपने लेख में वे अपने कथन के पक्ष में एक भी तत्थ्य नहीं रख पाते!
चिंता इस बात को लेकर होनी चाहिए कि हम हिंदी को दूसरे देशों में सही तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं. जो हिंदी आज न्यूयॉर्क पहुँच रही है उसके किसी लेखक को आज तक नोबल पुरस्कार नहीं मिला है.
नहीं चिंता तो इस बात की है की मंगलेशजी आप जैसे लेखक/कवि/पत्रकार मात्र विरोध कर के और छातीकूटा कर के अपने कर्तव्यों की इति श्री समझ लेते हैं. नहीं जाना किसी सम्मेलन में मत जाओ लेकिन दूसरों के भाषिक और धार्मिक सरोकारों को गड्ड-मड्ड कर के बीबीसी जैसे मंच पर आप किस स्तरीयता का परिचय दे रहे हैं?
मेरे पास विदेश मंत्रालय की जो चिट्ठी आई उसमें लिखा था कि मुझे बोलने के लिए अधिकतम पाँच मिनट दिए जाएंगे.
इतने कम समय में हिंदी भाषा से जुड़े अपने सरोकारों को सबके सामने रखना मेरे लिए मुश्किल था. इसलिए भी मैं वहाँ नहीं जा रहा हूँ.
जो मंच आपको पांच मिनट से अधिक तवज्जो ना दे वो उस पर अपनी लेखनी की (मूत्र)धार चलाएंगे आप? बहुत बहुत धन्यवाद! अगर आप उपरोक्त विचार उस मंच पर रख देते तो मेरे जैसे ना जाने कितने और हिंदी-प्रेमियों को प्रत्यक्ष में आहत करते लेकिन अब वही काम आपकी लेखनी ने पांच मिनट में पढ कर खत्म हो चुके लेख में कर दिया है साथ ही ऐसे लेख छाप कर बीबीसी हिंदी के सम्मान में वृद्धी भी.




बिल्कुल सही फ़रमाया है आपने।
अभी सुधीश पचौरी का लेख पढ़ रहा था जो उन्होंने न्यूयार्क में हो रहे विश्व हिन्दी सम्मेलन के संदर्भ में इस तरह की प्रतिकूल एवं आरोपात्मक प्रतिक्रियाओं के जवाब में लिखा है। हो सका तो आज सुधीश जी के लेख को साभार प्रस्तुत भी करूंगा, अपने चिट्ठे पर।
सच तो यह है कि चाहे डबराल हों, चाहे महाश्वेता देवी; इन सबकी आस्था का केन्द्र ही भारत से बाहर है। उन्हे “लाल क्रान्ति” चाहिये, भले ही दुनिया ने इस विचार को रद्दी की टोकरी में डाल दिया हो।
महाशेता देवी का कथन की सम्प्रदायवादियों के साथ मंच शेयर नहीं कर सकतीं भी शर्मनाक और कुतर्कपूर्ण है। उनकी परिभाषा में फिट होने वाले ‘साम्प्रादायिकों” से तो भारत भरा पड़ा है, फिर भारत में उनके रहने का औचित्य क्या है?
आपने बेहतरीन अन्दाज़ में हिन्दी साहित्य की बुद्धिहीन जमात के मंगलेश डबराल टाइप लोगों को उघाड़ा है। इनकी दिक़्क़त यह है कि ये लोग राजनीति में मशगूल हैं और भाषाई महत्व के मुद्दों में भी राजनीतिक कीचड़ फैला रहे हैं।
@अनुनादजी: लेख लिखते समय मुझे इन डबराल महोदय (या महाश्वेता देवी) के पोलिटिकल अलाएंस/ओरियेंटेशन के बारे में ना तो कोई जानकारी थी, ना ही मुझे इन दिनों से पहले हिंदी साहित्य/पत्रकारिता के ‘रंगों’ में बंटे होने का अहसास ही था!
लेकिन आज हिंदी जिस गर्त में है वहां ले जाने में इन जैसे तथाकथित ‘हिंदीवालों’ का ‘योगदान’ स्पष्ट है. कोई मिर्गी का रोगी भी दौरा आने पर ऐसे नही बडबडाता जैसे फ़ेन इन्होंने बीबीसी हिंदी पर पूरे होशो-हवास में फ़ैलाई है! आज तो क्षोभ होता है ये सोच कर की क्या इन्टरनेट पर इन जैसों को पढने पढवाने के लिये हम साईट्स और टूल्स बनाया किये?
@सृजन, प्रतीक: आज सोचता हूं क्या वो दिन बेहतर नही थे जब हम इन सब पचडों से दूर ‘साधूवादी’ युग में थे?
मंगलेश डबराल हिंदी के जाने-माने कवि माने जाते हैं। लेकिन इस तरह के ‘पोंछा लगाऊ’(स्वीपिंग रिमार्क्स) देने के पहले उनको सोचना भी चाहिये। इस तरह के कोई भी सम्मेलन होते हैं तो उसमें इसी तरह के कुछ बचकाने बयान हमेशा से होते आये हैं। पता नहीं कौन से पैमाने से मंगलेश डबराल ने यह लिखा
अभी तक जहाँ भी हिंदी सम्मेलन हुए हैं उन पर हिंदूवादियों और पुनरुत्थानवादियों का ही वर्चस्व रहा है. इनके वर्चस्व को कम करने की कोई कोशिश अबतक नहीं की गई है. क्योंकि इसके पहले हुये सम्मेलनों में नामवरसिंह, श्रीलाल शुक्ल आदि लोग जा चुके हैं। वे भी तमाम लोग जा चुके हैं जो इस बार विरोध के कारण कम ,अपनी और मजबूरियों के कारण शायद ज्यादा,न जा पा रहे हों। इस तरह का कोई भी सम्मेलन कोई सोनपरी की छ्ड़ी नहीं होता कि वहां घुमा देने से सारा विश्व हिंदी मय हो जायेगा। जितना मंच पर बोला जाता है उससे कई गुना ज्यादा विमर्श मंच के अलावा होता है। पांच मिनट तो प्रतीक हैं। अगर आपकी बात में दम होगा तो ठेल-ठाल के दूसरे के पास पहुंच ही जायेगी। साथ-साथ घूमते बतियाते, लंचियाते, डिनरियाते, गपियाते, सुस्ताते और न जाने किस-किस नाते।
मंगलेश जी जैसे जाने-माने कवि से यह सहज अपेक्षा होती है कि जब वे देश और देश की भाषा के बारे मेंबोले तो अपने उज्ज्वल पक्षों को सामने रखें। कुंठा निकालने के लिये जिंदगी पड़ी है। लेकिन ये सनसनाहट की चाह आदमी से जो न करवाये।
यह भी जरूरी नहीं है कि बड़े कवि को अपनी बात सही तरीके से रखने की तमीज ‘बाई डिफ़ाल्ट’ हो। नीरज जी ने एक बार लंदन में कविता पढ़ते हुये कविता सुनाई- संविधान दूसरा बनाओ साथियों| यह कार्यक्रम शायद भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित था। इस असहज स्थिति से संचालक ने उबारा यह कहते हुये कि यह कविता नीरज जी के अपने विचार हैं।
इस तरह के सम्मेलन , मेरे ख्याल से,मिलने-जुलने और सूचनायें संपेषण तथा कुछ नये काम करने की योजनाओं की संभावनाओं के प्रस्थान बिंदु होते हैं। इससे अधिक कुछ भी आशा करना इनके साथ अन्याय होगा।
मंगलेश ड्बराल का बयान तुम्हारे लेख न हो तो तोता पाल लूं नियम के तहत दिये गये लगते हैं। मंगलेश जी को मंच मिला उन्होंने उसका उपयोग कर लिया। इससे अधिक की इसकी और कोई उपयोगिता नहीं होती।
जिसको हिंदी के लिये काम करना होगा वह किसी सम्मेलन का मोहताज नहीं होता। अरविंद कुमारजी ने बीस साल मेहनत करके हिंदी का समांतर कोश बनाया। मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुये ,65 साल की उमर में, आगे के दस साल की योजनाओं का खुलासा करते हुये विश्व हिंदी सम्मेलन के लिये उन्होंने लिखा-जुलाई में नेता लोग न्यूयार्क में हिंदी के नारे लगा रहे होगे, हम लोग गाज़ियाबाद वाले घर में नए कामों पर लग चुके हैं..। वे जो कह रहे थे उसे करने में लग गये हैं। हमारा आदर्श और रोल माडल अरविंद कुमार जैसे मेहनती, कर्मठ और नयी राहों के अन्वेशी अरविंद कुमार जी जैसे लोग चाहिये मंगलेशजी के इस तरह के’ बाइटीय ‘ बयान नहीं। है कि नहीं?
भाषा और राजनीति दोनों समाज की थाती हैं। एक दूसरे से अलग तो कतई नहीं हैं। यही वजह है कि कोई हिंदी राष्ट्रभाषा बनती है, और कई सारी लोकभाषाओं की सांस उखड़ रही है। मंगलेश डबराल की कविताओं, संस्मरण और विचार ने हिंदी को एक राह दिखायी। उनकी बातों पर ग़ौर करें। विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजनों को भावुकता में व्याख्यायित करने के बजाय इसमें अंतर्निहित स्वार्थों-नि:स्वार्थों की परतें उघाड़नी चाहिए। इसके लिए आप सबको असाधुवाद और मंगलेश डबराल को साधुवाद।
आपका भी लेख आपका रंगप्रेम ही जता रहा है. मंगलेशजी के लेख से कुछ बातों से आप सहमत भी दीखते हैं. पर आपको भी अपने रंग पर नाज़ है एक तरफ़ आप लिखते है हमने बाहर की बहुत सी बातें अपनाई भी हैं.मुझे तो ये लगता है पिछ्ली पीढी आप वाली पीढी से अधिक लोकतांत्रिकता थी. आपको आपका रंग मुबारक कीजिये हिन्दी का विकास. एक दो लोगों के कोरस के साथ लगे रहिये. पर भारतीय सरकार द्वारा प्रायोजित इस हिन्दी सम्मेलनों से क्या हुआ है? आपको लगता नहीं कि ३मिनट मे जब बात पूरी करनी ही थी तो झाड़्ग्राम मे कर लेते पैसा भी कम लगता और विकास के नाम पर महीनो चर्चा भी हो जाती.पर हिन्दी के लिये विदेश सभी को पसन्द है पर झाड़्ग्राम की जोहमत कोई नही उठाने वाला, लगता है यही सब करके आप भी न्युयार्क के बाद वाली लिस्ट में अपना नाम दर्ज़ कराना चाहते हैं?इसका जवाब ना ही दें तो अच्छा है क्योंकि मुझे भी पता है कि आप जैसे लोगों की वजह से हिन्दी कितना विकास कर रही है.मंगलेश को ब्लाग की वजह से नही जाता.किसी चिट्ठाकार को वहां बुलाया गया? हिन्दी की जो ये छोटी सी दुनिया है इसका कौन प्रतिनिधित्व कर रहा है?
मंगलेश डबराल जैसों की बुद्धि को देखकर दया भी आती है और क्षोभ भी होता है कि इन जैसे अल्पबुद्धि लोग खुद को साहित्यकार और हिन्दी लेखक कहते-मानते हैं।
उनका लेख उनके मानसिक दिवालियापन को ही दर्शाता है और कुछ नहीं।
केसरिया और लाल के चक्कर में हिन्दी को जो चिंदी बनी है वह दुर्भाग्यपूर्ण और दु:खद है.क्या अपनी भाषा के उत्थान के लिये राजनैतिक प्रतिबध्दताओं को बीच में लाना ज़रूरी है.भाषा से प्रेम किसी बच्चे की मुस्कुराहट की तरह होना चाहिये जिसमें हमें कोई मज़हब,आस्था,धर्म और राजनीति नज़र नहीं आती.और हाँ सम्मेलनों से मुझे गुरेज़ नहीं लेकिन मुझे लगता है कि हिन्दी चिठ्ठाकार इन सम्मेलनों से ज़्यादा सार्थक भूमिका निभा रहे है ये जानते हुए कि इसमें मिलना जाना कुछ नहीं है और समय,बिजली और इंटरनेट कनेक्शन इन सभी का ख़र्च जेब से चुकाना है जिसकी कोई सबसिडी कोई राजभाषा समिति नहीं देने वाली है.
स्वामी जी, ऐसे लोगों की एक ही मानसिक धारणा होती है:
तो ऐसे लोगों के संकीर्ण बुद्धि जनक विचारों पर क्या बहस करनी। मेरे अनुसार व्यक्ति को बहस में भी सेलेक्टिव होना चाहिए!!
शानदार!!!
कभी कभी मन में एक सवाल आता है–”क्यों ऐसा होता है कि नाम पा चुकने के बाद साहित्यकार या साहित्य से जुड़ा एक व्यक्ति अहं का शिकार हो जाता है।”
कुछ लोगों की आंख में यदि मोतिया उतर आये तो सारी दुनिया में अंधेरा नहीं होता।
अब उनकी बीमार आंख से उन्हे जैसा दिखेगा वैसा ही सोचते हैं सब चीजों के बारे में अब ये डबराल जी हों या साधूवाद के खत्म होने की घोषणा करने वाले।
पढ़ लिया था, देर से टिप्पणी करने के लिये क्षमा चाहता हूँ. अच्छा लगा विचार पढ़कर.
यह तय है कि मंगेश डबराल जी के साहित्यिक योगदान को कभी नकारा नहीं जा सकता किन्तु फिर भी उन जैसे स्तरिय साहित्यकारों से ऐसे मौकों पर इस तरह का संदेश विचलित करता है.जबकि उनसे योगदान और शुभकामनाओं की आकांक्षा थी.
आपके विचार आकर्षित करते हैं. साधुवाद-(यह अभी जारी है
)
आप ने बिल्कुल सही लिखा है।
हिंदूवादियों और पुनरुत्थानवादियों वाली बात पर राय देना थोड़ा जल्दबाजी होगी मगर मंगलेश जी की बाकी बातों से मुझे पूरा इत्तेफ़ाक है। मैं विदेशी भाषा का विद्वार्थी रहा हूँ और अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि भाषा के विकास का जो तरीका दूसरे देश अपनाते हैं वह हम नहीं अपनाते। जो लोग सम्मेलन में जुटने जा रहे हैं उनमें से कितने प्रमुख धारा के लेखक हैं? कमलेश जी जैसे ग्लोरियस साहित्यकार तो जा सकते हैं मगर केदारनाथ सिंह जैसे साहित्यकारों का क्या? एक ओर अमरकांत जी भूखे मर रहे हैं। उनकी किसी को नहीं पड़ी मगर हिंदी की गरीबी का रोना रोने हर कोई न्यूयार्क जाना चाहता है। खैर इससे भी अहम अंतर यह है कि भाषा को प्रचलित करने का काम मात्र साहित्यकार के सिर पर थोप देना गलत है। योरोपिय देशों में यह काम भाषाविद् करते हैं साहित्यकार नहीं। हमारे यहाँ यह ठीकरा लेखकों के सिर पर फोड़ा जाता है।
यहाँ पहला मुद्दा अपनी भाषा को अपने लोगों के बीच पहले प्रतिष्ठा दिलाने का है। विश्व स्तर पर यह काम तभी होगा जब अपनी भाषा अपने लोगों के बीच लोकप्रिय होगी। दुनियाँ की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिंदी का कोई अता पता विश्व स्तर पर नहीं मिलता। विदेशी मुझसे अकसर पूछते हैं, “क्या आप indian बोलते हो?” और मैं खीझकर रह जाता हूँ।
निश्चय ही अरविंद जी, राहुल सांकृत्यायन जी और हिंदी के लिये UPSC दफ़्तर के आगे सबसे लंबा धरना देने वाले पुष्पेंद्र चौहान जैसे लोगों का ऐसे सम्मेलनों में जाना ज़्यादा ज़रूरी है बजाय कि कमलेश्वर या मंगलेश जी के।
*दुनियाँ की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक होने के बावजूद हिंदी का कोई अता पता विश्व स्तर पर नहीं मिलता।