हर साल अपने जन्मदिन पर एक निगाह गुज़रे बरसों पर डालता हूं और चिंतियाता हूं -
- अब पहले की तुलना में कितना अलग सोचने लगा हूं?
- क्या खुद को मन की बात समझाने के लिये बेहतर विचार/शब्द या भाषा मिली?
- क्या मैंने ऐसी बढिया अभिव्यक्ति पढी की एक साथ लेखक से जला और प्रशंसा की – “ऐसा तो मै भी नहीं कह सकता”
- क्या कोई ऐसी पुरातन चीज़ पढी की सोचना पडे लेखक अपने समय के किताना आगे था.
- क्या मैने किसी ऐसे विषय पर कुछ नया पढा जिसमें मैं कभी ना उस्ताद बन सकता हूं ना उसमें दिलचस्पी ही खोता हूं!
- क्या मेरे जीवन घटनाओं के एक खास समय होने की कोई वजह है? क्या घटनाएं अकस्मात हुईं? क्या मैं नियंत्रक था या ईश्वर या ब्रह्मांड? क्या मेरे मन में किसी घटना के जन्म और समय को तय करने की शक्ति है?
मैं इस आखरी विचार के बारे में बात करना चाहता हूं! इस बारे में मैं अक्सर सोचता हूं – शायद इस लिये की कई दार्शनिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सभी नें इस बारे में एक जैसे काफ़ी चिंतन किया है!
आईंस्टाईन कहते हैं – “मानव उस पूर्णता का हिस्सा है जिसे हम ब्रह्मांड कहते हैं, यह हिस्सा समय और फ़ैलाव में सीमित है. वो बस खुद को महसूस करता है, उसके विचार और भाव बाकियों से कटे हुए हैं.. ये उसका मतिभ्रम है. ये भ्रम एक किस्म की जेल है जो हमें व्यक्तिगत इच्छाओं और कुछ नज़दीकी लोगों के मोह से बांधे रखती है. हमारा काम होना चाहिए इस जेल से मुक्त हों – सभी जड और चेतन को हमारी संवेदना का हिस्सा बना कर!”
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जंग ये प्रिय वचन कहते हैं – “हम एक नियत समय पर पैदा होते है, एक नियत स्थान पर और, शराब चुआने के बरसों के जैसे, हममें अपने जन्म के साल और मौसम के विशिष्ट गुण होते हैं. ज्योतिष इससे अधिक कोई और दावा नहीं करता!”
आईंस्टाईन ये भी कहते हैं – “ईश्वर कौडियाँ नहीं खेलता!”
और कर्ल जंग ये भी कहते हैं – “सारे परिवर्तनों में एक विश्वव्यवस्था है, सारी अस्त-व्यस्तता में एक अनुशासन है.”
तो जब आईंस्टाईन ने ये कहा था की “उप्पर वाला कौडियां नही खेलता” – तब वो ये कहना चाहते थे की हर चीज़ पूर्वनिर्धारित है और अपने समय पर होती है? क्या वो नसीब या किस्मत में भरोसा करते थे?
तो क्या कर्ल जंग का ये मानना था की घटनाएं चाहे जितनी क्रमहीन और आकस्मिक नजर आएं, कितनी ही अलग-अलग लगें वो सब समयबद्धता से ही हो रही है.
चलिये कुछ और उस्तादों को पढते हैं -
“संयोग तैयार मन का साथ देता है!” – लूई पास्चर
“संयोग हमेशा चौकस की पक्ष लेता है!” – युरिपिड्स
“संयोग ईश्वर का छद्मनाम है, जब वो अपने काम पर हस्ताक्षर ना करना चाहता हो” – अनतोली फ़्राँस
“संयोग जैसी कोई चीज ही नही होती, और जो हमें दुर्घटना लगती है वो नसीब के सबसे गहरे उद्गम स्थल से निकलती है.” – फ़्रेडरिक शिल्लर
“क्या अंधे संयोग को ये पता था की प्रकाश का अस्तित्व भी है, की प्रकाश का अपवर्तन कोण (रिफ़्रेक्शन) कितना होता है और सारे जीवों की आंखें उसका सबसे दिलचस्प तरीके से इस्तेमाल करने के लिये लगा दीं? ऐसे और दूसरे कई आवलोकन, हमेशा से, और हमेशा तक मानवता के साथ बने रहेंगेग, ये विश्वास करने के लिये की कोई है जिसने सब कुछ बनाया है, जो सर्वशक्तिमान है, अत: उससे डरा जाना चाहिए. ” – इसाक न्यूटन
तो इन उस्तादों के हिसाब से बात कहां तक पहूंची ? -
१. अगर ईश्वर है तो संयोग का कोई अस्तित्व ही नही होना चाहिए – कुछ भी अकस्मात नहीं होता!
२. अगर ये बात सच है तो हम ये भी कह सकते हैं की सब कुछ एक योजना के तहत हो रहा है इसलिये कुछ भी अकस्मात नही है [उलट भी सत्य है] – अत: हर घटनाक्रम की सामयिकता भी तय है!
३. अगर बात नं. २ सही है तो हम संयोग या इत्तेफ़ाक जैसे शब्द का प्रयोग ऐक साथ हुई घटनाओं के सह-संबंध की आकस्मिकता को दर्शाने के लिये कर ही नहीं सकते! हमें एक दूसरे शब्दों की जरूरत पडेगी जो “ईश-इच्छा” या “प्रभू की मर्जी” हो सकता है – जिसे दैव-योग भी कह सकते हैं!
४. और पाईंट नं. ३ के हिसाब से हम ये निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं की हर चीज की टाईमिंग के लिये ईश्वर/ब्रह्मांड जिम्मेदार है!
एक दूसरा प्रकार का आवलोकन ये भी है -
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है की आप किसी मित्र, जिससे आप काफ़ी समय से नही मिले, के बारे में सोच रहे हैं और वो दरवाजे पर दस्तक दे या उसका फ़ोन आ जाए!
या आप किसी गाने को गुनगुनाते हुए रेडियो चालू करें और ठीक वही गाना डीजे द्वारा बजा दिया जाए!
इस प्रकार की घटनाओं की “तुल्य-कालिकता” या हिंदी में बोलें तो “टाईमिंग” को अभिव्यक्त करने के लिये कार्ल जंग नें “सिंक्रोनिसिटी” शब्द दिया है!
सिंक्रोनिसिटी दो या अधिक घटनाओं के उस अनुभव को कहते है जो अर्थपूर्ण तरीके से तो होती हैं, लेकिन जो असंबद्ध या अनियत होती हैं. सिंक्रोनस या तुल्य-कालिक [समयबद्ध] होने के लिये घटनाओं को संबद्ध होना चाहिए लेकिन ऐसा होने का संयोग बहुत ही नगण्य़ होता है! जैसे दोस्त के बारे में सोचा और उसी दोस्त का फोन तभी आया!
मैं इस फ़ंडे के बारे में काफ़ी सोचता हूं क्योंकी मेरे जीवन की कई विशिष्ट घटनाएं इस अनियत लेकिन अर्थपूर्ण टाईमिंग के चलते हुई हैं. उन्हें आसानी से आकस्मिक या संयोग करार नहीं दिया जा सकता!
मुझे विश्वास है की आपको भी इस प्रकार के अनुभव हुए होंगे! और अगर हाँ तो ऐसे में क्या हो रहा था? क्या हमारा दिमाग किसी प्रकार से ब्रह्मांड से जुडा है और कभी कभी हमें मजे देने के लिये दैव-योग की झलकियां दिखा दी जाती हैं? या ये हमारे सामूहिक अवचेतन मन (कलेक्टिव अनकांशियस) का कमाल है? तो अगर दैव-योग है तो कोई अवचेतन-मन-योग भी है! एक दूसरे से जुडे हैं या अलग अलग हैं? क्या ये-अवचेतन-मन-योग दैव-योग का ही हिस्सा है? क्या उससे पंगा लेने वाला एलिमेंट?
क्या एक (या एकाधिक) मन ब्रह्माण्ड या ईश्वर के क्रियाकलाप को प्रभावित कर सकते हैं? अगर खुदा कौडियां नही खेलता तो ऐसा होना भी उसकी ही मर्जी पर निर्भर है?
दलई लामा इसे अगले स्तर पर ले जाते हैं -
वे कहते हैं – “मैं सिंक्रोनिसिटी के पथप्रदर्शन पर चलता, अपनी अपेक्षाओं को मेरे मार्ग में नहीं आने देता!”
लेख का शीर्षक देखिए – मैने कहा था ना यह चिरकुट चिंतन है.
देखें तो पाएंगे की टैरो कार्ड रीडिंग, प्रश्न ज्योतिष, शकुन/अपशकुन, आई-चिन्ग – भविष्यवाणी और घटनाओं का समय या परिणाम जानने की की ऐसी सभी तरकीबों के भीतर सिंक्रोनिसिटी पर भरोसा टिका है! मानवता नें इस फ़ंडे पर तब से विश्वास किया है जब से इसे ये नाम भी नहीं मिला था. सिंक्रोनिसिटी के अनुभव इन्ट्यूशन और देजा वू वाले अनुभवों से नितांत अलग किस्म के हैं और उन पर आधारित भविष्यवाणी की विधाएं भी अलग हैं!
कर्ल जंग का प्रिय कथन था – “वो याददाश्त बहुत कमजोर होगी जो सिर्फ़ पीछे जाती हो!”
ये तो थी सिंक्रोनिसिटी की बात – ऐसी एकाधिक घटनाएं हुई हैं जो बहुत दिलचस्प हैं और उनकी टाईमिंग बहुत आश्चर्यजनक है – एक अगल लेखमाला ही बन सकती है उन पर!.. एक और चीज़ है जो काफ़ी दिलचस्प है, जिसे अंग्रेजी में सेरेन्डिपिटी कहते हैं – उस पर फ़िर कभी!
सिंक्रोनिसिटी के लिये हिंदी शब्द क्या होगा? खोजा लेकिन मिला नहीं!
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सिंक्रोनिसिटी विकी





सिंक्रोनिसिटी तो होती रहती है लेकिन इतना गहन चिंतन मनन कभी नहीं किया। आपके लेख से मुझे एक नया मुद्दा मिला जीवन के बारे में सोचने और समझने का, धन्यवाद!
जन्मदिन की शुभकामनायें।
जन्म दिन मुबारक। यह कहने में तो सिंक्रोनिसिटी नहीं है – आप न बताते तो हम कैसे बधाई देते?
यह लेख बहुत अच्छा लगा।
सारे दर्शन, सारी खोजें, सारे विचार एक ही और जाते हैं। एक, बस एक। वह एक था, वह एक है, वह एक ही रहेगा। हम उस एक में हैं, या कि एक हम सब में है। सही तो यही है कि मैं ही वह एक हूँ, आप भी वह एक ही हैं, सब एक ही हैं। सब के सब एक हैं। बस हमारी सोच है कि हम अलग अलग हैं।
मैंने पूरी पोस्ट को कॉपी-पेस्ट करके सहेज लिया है। इतने सारे अहम विचार एक साथ उपलब्ध कराने के लिए शुक्रिया। अब इनको आराम से पढूंगा और गुनूंगा।
पहले पहल तो हैप्पी बर्थडे।
देजा वू तो मुझे कई बार होता है
बहुत भारी लिखा है बिलकुल बाफले जैसा।
ऐसा कई बार होता है कि हम किसी के बारे में सोचते हैं या बात करते हैं और वो व्यक्ति उसी समय हाज़िर हो जाता है। अब वो कोई दोस्त है, हमउम्र है या उससे अनौपचारिक संबंध है तो अक्सर कहा जाता है ‘लो शैतान का नाम लिया और शैतान हाज़िर’। यदि किसी से इतनी निकटता नहीं है तो शाश्वत रूप से कहा जाता है कि सौ साल जियोगे या बड़ी लंबी उम्र है।
ऐसे संयोगों में कई बार व्यक्ति दूसरे शहर से चला आता है।
रेडियो चालू करने पर सोचा हुआ गाना आ जाने की घटना भी कई लोगों के साथ घटती है। ऐसा भी होता है आप काम से घर जा रहे हैं और सोचें कि आज आपकी माँ या पत्नी ने वो वाला व्यंजन बनाया होगा और जब आप घर पहुँचते हैं तो उसी व्यंजन से आपका स्वागत होता है। कई बार हम किसी से कुछ कहते हैं और सामने वाला कहता है ‘तुमने तो मेरे मुँह की बात ही छीन ली’ यानी वो भी हमारी ही बात कहने जा रहा होता है। इन सब बातों के लिए मैं सोचता था कि ये टेलीपैथी है।
ऐसा भी होता है आपको किसी स्थान को देखकर लगे कि यहाँ तो आप शायद पहले भी आ चुके हैं जबकि आप पहले वहाँ कभी नहीं गए होते हैं। कोई घटना आपको ऐसी लग सकती है जैसे वो घटना आप पहले भी देख चुके हैं। यही देजा वू है और इसे ही पूर्वाभास कहा जा सकता है।
हिन्दी फ़िल्म उद्योग में संभवत: पचास के दशक में कुछ घटनाएँ ऐसी भी हुई हैं जिसमें दो संगीतकारों ने एक ही जैसे गीत रचे, जिन्हें सुनकर लगता था कि कोई एक दूसरे की नकल है जबकि उस जमाने में संगीत की नकल या चोरी नहीं होती थी। इसे सिंक्रोसिनिटी कहा जा सकता है और हिन्दी में लोग इसके लिए संयोग या दैवयोग शब्द का ही उपयोग करते हैं।
यह संयोग ही है कि जन्मदिन के मौके पर लिखी पोस्ट आज देख पाये। सो जन्मदिन मुबारक।
पहले तो स्वामी जी को विलंबित बधाई बड्डे के लिए(विलंबित न लेना चाहें तो अगले वाले के लिए एडवांस समझ लें)। पूरी आशा है कि हैप्पी गया होगा और आने वाले सभी हैप्पी हैप्पी आएँगे और जाएँगे।
देरी के लिए बालक को क्षमा करें, अभी-२ नज़र पड़ी तो चूहा दौड़ाते हुए बधाई टिकाने चला आया।
बाकी, लिखे का हैं ऊ ज़रा समझ न आया, कुछ चिरकुटई चिंतन(बकौल स्वामी जी) और synchronicity की बात चल रही हैं, तो लगता है कि दोबारा पढ़ समझना पड़ेगा कि आखिर लिखे क्या हैं।
वैसे हिन्दी में इसको “अर्थपूर्ण इत्तेफ़ाक” भी कह सकते हैं, नहीं?