9 responses to “किस्से हैं किरदारों के: वो दर्जी!”

  1. आलोक

    सोचने पर मजबूर किया आपने। और सोचा तो ध्यान आया कि यह सन्तुलन मैं अपने पिताजी में देखता हूँ। और भी कई लोगों में देखता हूँ। हाँ, कह सकता हूँ कि कम पश्चिमीकृत लोगों में देखता हूँ। या कहना चाहिए कम महानगरीकृत।

    पश्चिमिकृत – पश्चिमीकृत
    आवलोकन – अवलोकन
    अनुभूती – अनुभूति

  2. दीपक भारतदीप

    ऐसी घटनाएं जो दिल का छू जाती हैं संस्मरण बन कर दिल ंमें घर कर जाती हैं और इससे सुनने और सुनाने में मजा भी आता है।
    दीपक भारतदीप

  3. संजय बेंगाणी

    पूराने दिन किस खुशी में याद किये जा रहे है? विदेशी दर्जी ने कपड़े बिगाड़ दिये क्या? :)

  4. प्रियंकर

    प्लेटो के ‘फिलॉसफर किंग’ की तरह के ही जीव होंगे ये उस्ताद जी . अब ऐसे दार्शनिक को कोई दर्जी कैसे कहे भला . कोई भी व्यसाय करते हुए दार्शनिक हुआ जा सकता है . खेती करते हुए,कपड़ा बुनते हुए,चमड़ा छीलते हुए,हजामत बनाते हुए और बोटी काटते हुए कवि-दार्शनिक हो जाने वालों की हिंदुस्तान में लम्बी परम्परा रही है . आपके द्वारा वर्णित उस्ताद जी उसी परम्परा का हिस्सा हैं . दुखवाद और बाज़ारवाद ऐसे उस्तादों से ही नज़रें चुराता बचता फिरता है .

  5. दिनेशराय द्विवेदी

    ये भान ही तो है जो लापता है। तलाश जारी है।

  6. समीर लाल

    अपने संस्मरण को इतना उम्दा तरीके से सुनाते हुए आप भी कम दार्शनिक नहीं नजर आ रहे हो. कुछ बातें और शक्शियत एक गहरा असर छोड़ जाती हैं और हमेशा याद रहती हैं.

  7. Tarun

    bare umda tareeke se likha hai, maslan- hansta hai to lag reha tha ki hans reha hai.

    Lekin Author ke chehre ko kya hua, fav. saand ki jegah ye peela jheebh dikhata jeev kaise

  8. आशीष कुमार 'अंशु'

    बहूत खूब

  9. डा०अमर कुमार

    उम्दा है, बहुत कुछ सीखा आज मैंने !

Leave a Reply

गूगल ट्रांसलिटरेशन चालू है(अंग्रेजी/हिन्दी चयन के लिये Ctrl+g दबाएं)