तब मैं वक्त का बादशाह था. वक्त मेरे कहे में तो नहीं था, लेकिन मेरे पास उसकी कोई कमी भी नहीं थी. अब मैं बकौल अनूप शुक्लाजी ’अधूरे कामों का बादशाह’ हूं. तब आवलोकन का समय भी था और उत्सुकता भी. अब मैं बकौल मेसेंजर स्टेटस “मस्त।व्यस्त” हूं – चूंकी “त्रस्त” शब्द के प्रयोग से अपने ही अहंकार को चोट लगती है.
परिवेश के आवलोकन के लिये ठहरना होता है, समय लेना पडता है और महसूस करने के लिये उपलब्ध होना पडता है – संपूर्णत:! इस सब का समय है कहां? बंदा बंटा हुआ है. उसकी नज़र भी, और नज़रिया भी. अनुभव और अनुभूती दोनों अमेज़ान के जंगलों में रहने वाली अनखोजी जनजातियों को आऊटसोर्स हो गई हैं.
यही वजहें हैं की खालिस किरदार, किताबों और चलचित्रों के बाहर अधिक नहीं मिले. फ़िर जो मिले भी चरित्र, कुछ घंटे साथ चले, और चले गए. बात उनके असर की है! भीड में चेहरे, जो याद रह जाएं.
एक दर्जी था, एक मित्र ने मिलवाया था. मुसलमान था – धर्म से ही नहीं, सोच से भी. एक बहुत घिचपिचनुमा मुस्लिम मुहल्ले में, अपने घर के पहले कमरे में काम किया करता था. अपने फ़न का माहिर था. शहर के कई नामी-गिरामी कारिगरों का उस्ताद रहा था. वो उसके ’हाथ के नीचे’ से निकले थे. बच्चे थे.
ये बस अपने लिये काम करता था. जितने की मेहनत बनती उतना ही पैसा लेता था. बाज़ार उसके भाव तय ना करते. अपने मूड का मालिक, लंबा कद, एक दम छरहरा, दाढी के बालों ने पकना शुरु किया-किया ही था. मैंने आंखों के भाव से इतना अधिक जवान आदमी कोई और नहीं देखा. हंसता था तो लगता था हंस रहा है. मेरी शादी के मौके पर सूट सिले थे उसनें. वो मेरा नाप लेता, सूट के कपडे पर निशान लगाता- ना कहीं नाप नोट करता ना बातचीत का सिलसिला ही रोकता. हौले से फ़ीते का इस्तेमाल ऐसे करता जैसे फ़ीता बस आसपास लहरा रहा है. उस्तादी और एफ़्फ़र्टलेसनेस का भी क्या सहसंबंध होता है! उसपर माहिर किस्सागोई और मस्त तबियत. ऐसे लोग होते कहां हैं.
पचपन पार का था, लगता पैंतालिस का भी न था. बातों बातों में मुस्कुराते हुए बोला
“वो तो गमज़ा लग गया हाल में, वर्ना एकदम जवान धरा था!”
उसके आगे उसने और क्या क्या कहा याद नहीं है. अपनी सुई उसके अंदाज़ पर ही अटक गई. अपने दु:ख से एकसाथ इतना अटैचमेंट और डिटैचमेंट दिखाने वाला ऐसा वाक्य मैंने किसी और के मूंह से नहीं सुना कभी! “गमज़े” का एक साथ ऐसा एक्सेप्टेंस और रिजेक्शन भी पहले महसूस नहीं हुआ था! तौलनें बैठूं तो, “वाट लग गई” में इससे ज्यादा रिजेक्शन है. फ़िर उसके वाक्य में से “मुझे” / “मैं” नादारद थे – जो आगे से सवाल भी ना कर सकूं की क्या हुआ था तुम्हारे साथ! ना ही उसके तरीके में कोई डिनायल या एस्केपिज़्म ही था.
दु:ख के भाव का सबसे पर्फ़ेक्ट एनालिसिस मैंने बौद्ध धर्म की किताबों में पढा है, और आम तौर पर दु:ख के भाव को लेकर इंसानी नज़रिये का ऐसा संतुलन सिखाते-सिखाते बौद्ध धर्म की किताबों की सांस फ़ूल जाती है – लेकिन फ़िर भी अनुयायी के पल्ले नहीं पडता.
दर्जी को संतुलन का सहज भान था, जीवन को वो अपनी मौलिकता से जी रहा था. और ये भान हमेशा ज्ञान पर हावी हो जाता है! भान हमारी पश्चिमिकृत स्कूलिंग का हिस्सा नहीं है, हमारे शिक्षा-तंत्र में उसके सहज पनपनें के लिये कोई हाशिया तक मुहैया नहीं है. जीवन के आवलोकन और उसके प्रथम-पुरुष अनुभव को भी नहीं. कोई तैयारी नहीं है, इसीलिये मस्त तबियतें भी नहीं हैं, तासीर भी नहीं… मज़ा भी नहीं है यार!
विवाह के बाद मैं वापस अमरीका आ गया और फ़िर उस दर्जी से कभी मिला नहीं. खैर, जब भी दिखती है झलक, बांटना चाहता हूं.






सोचने पर मजबूर किया आपने। और सोचा तो ध्यान आया कि यह सन्तुलन मैं अपने पिताजी में देखता हूँ। और भी कई लोगों में देखता हूँ। हाँ, कह सकता हूँ कि कम पश्चिमीकृत लोगों में देखता हूँ। या कहना चाहिए कम महानगरीकृत।
पश्चिमिकृत – पश्चिमीकृत
आवलोकन – अवलोकन
अनुभूती – अनुभूति
ऐसी घटनाएं जो दिल का छू जाती हैं संस्मरण बन कर दिल ंमें घर कर जाती हैं और इससे सुनने और सुनाने में मजा भी आता है।
दीपक भारतदीप
पूराने दिन किस खुशी में याद किये जा रहे है? विदेशी दर्जी ने कपड़े बिगाड़ दिये क्या?
प्लेटो के ‘फिलॉसफर किंग’ की तरह के ही जीव होंगे ये उस्ताद जी . अब ऐसे दार्शनिक को कोई दर्जी कैसे कहे भला . कोई भी व्यसाय करते हुए दार्शनिक हुआ जा सकता है . खेती करते हुए,कपड़ा बुनते हुए,चमड़ा छीलते हुए,हजामत बनाते हुए और बोटी काटते हुए कवि-दार्शनिक हो जाने वालों की हिंदुस्तान में लम्बी परम्परा रही है . आपके द्वारा वर्णित उस्ताद जी उसी परम्परा का हिस्सा हैं . दुखवाद और बाज़ारवाद ऐसे उस्तादों से ही नज़रें चुराता बचता फिरता है .
ये भान ही तो है जो लापता है। तलाश जारी है।
अपने संस्मरण को इतना उम्दा तरीके से सुनाते हुए आप भी कम दार्शनिक नहीं नजर आ रहे हो. कुछ बातें और शक्शियत एक गहरा असर छोड़ जाती हैं और हमेशा याद रहती हैं.
bare umda tareeke se likha hai, maslan- hansta hai to lag reha tha ki hans reha hai.
Lekin Author ke chehre ko kya hua, fav. saand ki jegah ye peela jheebh dikhata jeev kaise
बहूत खूब
उम्दा है, बहुत कुछ सीखा आज मैंने !