10 responses to “अरे, मुझे तो लगा था की लौ नहीं है यहां!”

  1. अनूप शुक्ल

    भला हो अभय का। दुबारा मालवी अन्दाज के दर्शन हुये। बहुत दिन से पुरानी पोस्टें याद करके मिस कर रहे थे स्वामीजी को। कल ज्ञानजी की पोस्ट पर कमेंट देखकर मजा आया। आज पोस्टै पेल दिये। ऐसेइच लिखते रहो भाई। हफ़्ते में कम से कम एक पोस्ट। बोल्ड में जो है वो तो ब्यूटीफ़ुल भी है। :)

  2. प्रमोद सिंह

    सींगवाली अदा के ये टेक अच्‍छे हैं. सींग सलामत बने रहें.

  3. neelima

    बहुत गंभीर और उपयोगी पोस्ट लिखी है आपने ! धन्यवाद !

  4. संजय बेंगाणी

    मेरा मानना है की जो भी मन में आये लिखना है, कॉमिक्स पर भी. लोग जाहे सिंगहेन कहे या कुछ और…

  5. काकेश

    सींग वाले स्वामी जी पे दिल आ गया.लिखते रहें जी.

  6. Dr.Anurag Arya

    अब देखिये न ब्लॉग में भी बाजारवाद आ गया है ,हमारे C.A साहब आज आ कर चाय पी गए ओर जाते जाते पूछ बैठे की आप ब्लॉग से कितना कमा रहे है ?अमिताभ बच्हन रोज का इत्ते लाख कमाते है…..

  7. अभय तिवारी

    कहते हैं कि बैल को आराम से बैठ कर जुगाली करने देने में ही हित है.. जब सींग मारता है तो एक ही बार में सारी कसर निकाल देता है.. कई मुद्दे समेट डाले आप ने.. बढ़िया है ये तेवर..

  8. Gyan Dutt Pandey

    सही लिखा है जी।
    मुझे लगता है कि जटिलताओं के बावजूद सही-साट जिन्दगी जी सकते हैं। थोड़ा कछुआ-वृत्ति लानी होगी अपने में।

  9. Shiv Kumar Mishra

    हम लोग मानसिक रूप से कितने नियंत्रित हैं ये गौर करने की बात है. की एक आभासी दुनिया के लोग – टीवी पर बैठे [ ये मात्र आभास बेचते हैं, अनुभव भी नहीं] सब को नियंत्रित कर रहे हैं! उनकी सलाह सुनते भारत वाले, अमरीकन इश्टाईल में, पीसी पे, घर से शेयर मार्किट से जुडे, सोफ़ेस्टिकेडेट तरीके से ’ट्रेड’ कर के गर्त हो रहे हैं. किस्मत पे रोने का नई केलेंडर बदलते रेने का .. स्टाईल में रेने का!

    शानदार!

  10. अमरीका के विलक्षण आमिश “कछुए”!

    [...] पर मेरे पिछले लेख पे ज्ञानजी की इस टिप्पणी नें प्रेरित किया मुझे.   [...]

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