
[यह लेख निर्मल-आनन्द वाले अभय तिवारी जी की एक हालिया टिप्पणी पढने के बाद लिख रहा हूँ.]
“सींग रहित स्वामी जी का चेहरा देख कर अच्छा नहीं लगा.. कहीं ये सींग कटाकर बछ्ड़ों में शामिल होने की कोशिश तो नहीं..? बातें भी कॉमिक्स की हो रही हैं..
सींग फिर उगाये जायँ..!”- अभय तिवारी
ठीक से लिखना सीख रहा हूं. जब की-बोर्ड तोड के हटता हूं तो कभी-कभी ब्लागर्स कहते हैं की ये वाला गरिष्ठ/भारी हो गया भई! कॉमिक्स वाली पोस्ट में ‘यूजर-फ़्रेंडली’ होने की कोशिश कर रहा था और अभयजी नें पकड लिया. ऐसी कोशिश बाज़ार के दबाव में नहीं कर रहा था. वो क्या है सुपाच्य ’कंटेंट’ लिखने के लिये सोचा की सरल बात लिखूं - जैसे की पुरानी कॉमिक्स पर. ऐसा शॉर्ट-कट सचमुच की कठिन बात को तमीज़ से लिखने की जद्दोजहद से आसान पडता है. लेकिन अभयजी की टिप्पणी बडी सामयिक निकली.. मुझे बचा लिया.
भारत में जब स्टाक मार्किट उछल रहा था तो कई निवेशक ब्लागर्स भी उछल रहे थे – आजकल सब दूर सिट्टीपिट्टी गुम है! सोच रहा था इस पर लिखूं. दुविधा ये है की क्या लिखूं, कहां से शुरु करूं और किसे सींग मारूं? जिन्हें सींग मारनी चाहिए, काफ़ी ऊपर हैं अपने कद से! फ़िर अपन अर्थशास्त्री नहीं हैं ..उमडते-घुमडते विचारों को ’ड्राफ़्डिया मोड़’ का इज़्ज़तदार नाम दे कर उगल दे रहा हूं-
धीरे धीरे समझ में आने लगा है की दुनिया के पिरामिड में सबसे उपर बैठे लोग ही सबसे तेज़ लोग हैं. दुनिया की दिशा सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी मानसिकता पर निर्भर है. अगर उनके इरादे नेक हैं तो दुनिया दिन पर दिन ‘अच्छी’ होगी और अगर वे ‘कपटी’ हैं तो जीना दिन पर दिन दूभर होगा.
आज हम जिस दुनिया में हैं वहां जीना दिन पर दिन कठिन है. कठिनाईयों से भी अधिक आने वाले कल की कठिनाईयों का भय है!
भय है तो उससे बचने के तरीके हैं. बचने के तीन आसान तरीके जो आम आदमी अपनाता है, वो हैं -सतहीपन, मूल्यों का खंडन और व्यक्तिगत अलगाववाद. सोर्स बताए बिना कह दूं की ये साईकोलोजी पर की गई गूढ रिसर्च का परिणाम है – मेरा कयास नहीं.
उदाहरण के लिये थाईलैंड की लडकी वेश्यावृत्ती में धकेले जाने के बाद नशा कर के शरीर बेचती है, नशे की वजह से भूख नहीं लगती, शुरु में दिन-रात लगातार भूखी काम करके भी तरोताज़ा महसूस करती है.. ताकी अपने परिवार के लिये कुछ पैसे जुगाड सके और धीरे ..धीरे.. एक दिन नशे का डोज़ बढाते बढाते बेसमय मौत मर जाती है. वहां का समाज, कानून और व्यवस्था वे सब इस से अनुकूलन स्थापित कर चुके हैं - सेक्स-टूरिज़्म नाम की इन्डस्ट्री बन गई है! “बाज़ार” बन गया है. इस सीन में तीनों चीजें शामिल हैं – सतहीपन, मूल्यों का खंडन और व्यक्तिगत अलगाववाद! (जब ये तीनो हों तो एक नया बाज़ार बन जाता है. लेकिन पहले कुछ तैयारी चाहिए – उस पर आगे.)
इसी सतहीपन, और व्यक्तिगत अलगाववाद के चलते ”इन्टरटेनमेंट” का बाज़ार बन गया है और वो बाजार को भी चला रहा है. उपर से रईस दिखने वाले अमरीकी लोगों का सतहीपन है उपभोक्तावाद के चलते क्रेडिट कार्ड पर जीवन, मूल्यों के खंडन के चलते परिवार नामक संस्था गर्त में और व्यक्तिगत अलगाव है वर्चुअल-वर्ल्ड में गोते – चाहे वीडियोगेम हों, इन्टरनेट, टीवी, नशा या कुछ और.
मनोवैज्ञानिक कहते हैं की इन्टरनेट/टीवी/मीडिया जोडता नहीं है. वो तोडता है, वो तोडता है आपको आपके तात्कालिक परिवेश से और फ़िर अपने आभासी परिवेश से अनुकूल तरीके से जुडे होने का आभास देता है. गौर से देखिये!
ये मीडिया के आयाम हैं. मीडिया बन चुका है हमारे भय से निपटने के निकास भी और हमारे भयभीत रहने के पहले कारण भी! पहले भारत में सोचा जाता था की अमरीका इतना अमीर है की उनकी ऊब से निपटने के उपाय हैं टीवी मीडिया. आज ये सोचा जा रहा है की इन्ही मीडिया जनित ब्रेनवाशिंग के चलते शेयर मर्केट में निवेश खोने वाले अमरीकी, बाकी दुनिया से आतंकित अमरीकी इन्हीं मे अपने निकास ढूंढ रहे हैं – है ना मजेदार!
हाल ही में एक ब्लाग पढा की भारत में निवेश के गुर देने वाले टीवी चैनलों ने वहां के निवेशकों का और कबाडा कर दिया है. हम लोग मानसिक रूप से कितने नियंत्रित हैं ये गौर करने की बात है. की एक आभासी दुनिया के लोग – टीवी पर बैठे [ ये मात्र आभास बेचते हैं, अनुभव भी नहीं] सब को नियंत्रित कर रहे हैं! उनकी सलाह सुनते भारत वाले, अमरीकन इश्टाईल में, पीसी पे, घर से शेयर मार्किट से जुडे, सोफ़ेस्टिकेडेट तरीके से ’ट्रेड’ कर के गर्त हो रहे हैं. किस्मत पे रोने का नई केलेंडर बदलते रेने का .. स्टाईल में रेने का!
उधर भारत का मर्द सबसे अधिक ’सेक्स’ और ’जोक्स’ पर सर्च करता है. उसका इन्टरनेट-समय ऐसे ’गरिष्ठ’ लेख खराब कर देते हैं – यदी जीवन में सेक्स और हंसी उपलब्ध हो तो टीवी पर कॉमेडी सर्कस चले ही क्यों? चिरकुटाई और टाईम-पास का बोल बाला है. स्थितियों पर नियंत्रण का अभाव और दिशाहीनता का भाव ही उसकी मूल वजह है. इस तरह के लेख पेरेलल सिनेमा की तरह होते हैं! फ़िर खयाल आता है की इस पलायनवाद को छोडे बिना गंभीर विमर्श संभव नहीं है. विमर्श ही काफ़ी नहीं है – बिल्ली के गले में घंटी कौन चूहा बांधेगा!
दर-असल ये सारे बाजार बनाने से पहले उसकी तैयारी की गई थी. मसलन दुनिया भर में बाज़ारवाद से पहले उपभोक्तावाद और उस से पहले उधारवाद लाना जरूरी था (ये ‘उधारवाद’ शब्द मैंने गढा है). उधार सारी दुनिया की सबसे बडी समस्या बन कर उभर रहा है. भारतीय उपभोक्ता भी इसकी चपेट में आने लगे हैं.
ये बाज़ारवाद चंद लोगों के द्वारा रचा गया एक खतरा है. बाजार उनके दबाव में अपना रुख तय कर सकता है लेकिन बाजार के दबाव में व्यक्ति अपना रुख तय नहीं कर सकता. हम एक बहुत भयग्रस्त समाज में जी रहे हैं – आर्थिक आतंक फ़ैला है! लाईफ़ इन्शोरेंस, हैल्थ इन्शोरेंस, व्हिकल इन्शोरेंस, मैंटेनेंस कॉंट्रेक्ट, होम-सिक्योरिटी सिस्टम- ये सब भारत में भी और फ़ैलेंगे.
लेकिन इन सब हालातों को बनाने के पीछे हैं कौन? वैश्विक अर्थव्यवस्था चाहने वालों के मंसूबे ठीक नहीं हैं. उनकी तरफ़ इशारा करना जरूरी है- मात्र बातें या कोई कांस्पिरेसी थ्योरी नही ठोस तथ्य. उनके नाम और काम जाननें जरूरी है. आपको दिलचस्पी है तो मैं लिखूंगा जरूर!





भला हो अभय का। दुबारा मालवी अन्दाज के दर्शन हुये। बहुत दिन से पुरानी पोस्टें याद करके मिस कर रहे थे स्वामीजी को। कल ज्ञानजी की पोस्ट पर कमेंट देखकर मजा आया। आज पोस्टै पेल दिये। ऐसेइच लिखते रहो भाई। हफ़्ते में कम से कम एक पोस्ट। बोल्ड में जो है वो तो ब्यूटीफ़ुल भी है।
सींगवाली अदा के ये टेक अच्छे हैं. सींग सलामत बने रहें.
बहुत गंभीर और उपयोगी पोस्ट लिखी है आपने ! धन्यवाद !
मेरा मानना है की जो भी मन में आये लिखना है, कॉमिक्स पर भी. लोग जाहे सिंगहेन कहे या कुछ और…
सींग वाले स्वामी जी पे दिल आ गया.लिखते रहें जी.
अब देखिये न ब्लॉग में भी बाजारवाद आ गया है ,हमारे C.A साहब आज आ कर चाय पी गए ओर जाते जाते पूछ बैठे की आप ब्लॉग से कितना कमा रहे है ?अमिताभ बच्हन रोज का इत्ते लाख कमाते है…..
कहते हैं कि बैल को आराम से बैठ कर जुगाली करने देने में ही हित है.. जब सींग मारता है तो एक ही बार में सारी कसर निकाल देता है.. कई मुद्दे समेट डाले आप ने.. बढ़िया है ये तेवर..
सही लिखा है जी।
मुझे लगता है कि जटिलताओं के बावजूद सही-साट जिन्दगी जी सकते हैं। थोड़ा कछुआ-वृत्ति लानी होगी अपने में।
हम लोग मानसिक रूप से कितने नियंत्रित हैं ये गौर करने की बात है. की एक आभासी दुनिया के लोग – टीवी पर बैठे [ ये मात्र आभास बेचते हैं, अनुभव भी नहीं] सब को नियंत्रित कर रहे हैं! उनकी सलाह सुनते भारत वाले, अमरीकन इश्टाईल में, पीसी पे, घर से शेयर मार्किट से जुडे, सोफ़ेस्टिकेडेट तरीके से ’ट्रेड’ कर के गर्त हो रहे हैं. किस्मत पे रोने का नई केलेंडर बदलते रेने का .. स्टाईल में रेने का!
शानदार!
[...] पर मेरे पिछले लेख पे ज्ञानजी की इस टिप्पणी नें प्रेरित किया मुझे. [...]