तेरा, मेरा, उसका सच!


स्वाभाववश जब मीडिया किसी बात को उछाल रहा होता है, अपन रुख पीसी की ओर को कर लेते हैं. पर जब पी सी खोला और रमण भाई को टेरी श्यावो पर पढा तो सोचा टीवी वाली बहन जी की बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए, सो पीसी पे से हटा बुद्दू-बक्से पे डटा और लेप-टाप उठाया – मल्टिटास्किंग मोड मे आया, जब तक इस केस के पुराने लेख पढता टेरी श्यावो का देहान्त हो गया – टाईमिंग इस एवरीथिंग!

सब से पहले रमण भाई अपना भी यही खयाल है, .. अभी मैने अपनी वसीयत नही लिखी है, पर कल रात इसी केस के बारे मे पढता पढता सोया था, और अगर मेरी मानसिक हालत खुदा-ना-खास्ता, कद्दू या घीये से भी नरम हो जावे तो बिंदास निपटा दो!

तो अगर मेरी मानसिक हालत खुदा-ना-खास्ता, कद्दू या घीये से भी नरम हो जावे तो निपटा दो लेकिन..

लेकिन, निपटाने से पहले इस पर ब्लाग लडे जाने चाहिए की हमें अभी समय से पहले ही कद्दू घोषित किया गया है, या हम सदैव से कद्दूअवस्था को ही प्राप्त रहे पर ये अब तक की खोज के पहले छुपाए रहे.
फ़िर कुछ ब्लागर मौन रहें ये बताने को की हम कद्दू हैं या नही, ये किसी का सरदर्द नही है क्योंकी जब कद्दू नही थे तब भी उनकी आत्ममोहित निगाह मे कद्दूवत ही थे – वगैरह, सो फ़ाईनली तंग आ कर चाहे कितनी ही कद्दूअवस्था को प्राप्त होवूं या नही, हम खुद नली खींच दूंगा – शायद फ़िर ये तय होगा की कमीना खूद नली खींच कर शहीदी सुख पा रहा है पर कद्दू का अभी और रायता बनाया जा सकता है तो नली वापस लगाई जाए इत्यादी – इस पर भी शोध हो, जितना सोचा था उतना कद्दू नही है पर फ़िर भी निपटाया जा सकता था! ब्लागनाद पर एक आध कविता भी हो, ब्लागर का जनाजा है जरा धूम से निकले टाईप!

वैसे फ़िलासाफ़िकली (खुराफ़ातिकली) स्पीकिंग, ब्लागर का आर-एस-एस फ़ीड से वही संबंध होता है जो टेरी का खाने की नली से था. इसी नली से वो अपने ब्लाग जीवन से जुडा होता है. आप बस मजे लेने के लिए ही नली से छेडछाड कर सकते हो – ब्लागर सांसत मे आ जाएगा. यह प्रयोग पहले किसी कविता-ओनली टाईप ब्लागर को वर्ड-प्रेस पर ला कर, दो दिन की पेल फ़ीड करने के बात जब वो पूरे मूड मे आए, फ़िर किया जाए!

बहरहाल, जिस इसाईयत की दुहाई दे कर टेरी को ब़चाने की कोशिश हो रही थी , जो धर्म भ्रूण हत्या तक के खिलाफ़ है उसी धर्म को मानने वाले झूठे राष्ट्राध्यक्ष बडे आराम से दूसरे देशों पर तेल के लिए बम बरसाते रहते हैं और उन हजारों मासूमो की मौत पर एक खबर भी नही बनती. एक टेरी को नली से भोजन दिया जाए या नही इस पर रोज बहस, इस केस पर हुआ फ़ैसला भविष्य के कितने और फ़ैसलों पर असर डालेगा वो कयास एक, और उधर बंबई की गंदी बस्तीयों में कितनी औरतें पेट पालने के लिए रोज एड्स से मौत का जूआ खेलती हैं – रोज, वहां चुप्पी? समाज पर लानत है ये सच!

One response to “तेरा, मेरा, उसका सच!”

  1. अनूप शुक्ला

    हमारे गांव में जब बरात जाती थी तो कद्दू सहज सुलभ तथा सस्ता होने के कारण खूब खिलाया जाता था.बराती ऊबते तो लड़की वाले कहते खाओ तो कद्दू से न खाओ तो कद्दू से.यही मामला तम्हारा भी है.वैसे सूचना के लिये बता दूं कि स्वामी लोग अपना श्राद्ध खुद कर लेते है-पता नहीं दूसरे करें या न करें.

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