डॉ. अमर को बिग बी उनके अपने कबीले के नहीं लगते, यानी मैं भी उन्हें अपने कबीले का नहीं लगता (बिग बी और मैं एक ही कबीले के हैं).
वैसे बिग बी और मैं, डॉ. अमर को अपने कबीले के लग भी नहीं सकते.. हम अपनी उदारता और ओढी हुई इन्क्लूसिवनेस के चलते आम आदमी के करीब होना चाहें ना, तो भी नहीं!
देखिये, डॉ अमर एक आम आदमी हैं, हम जैसे कोई सेलिब्रिटी तो हैं नहीं… यही वजह है!
बिग बी और ई-स्वामी हैं हिंदी स्पीकिंग सेलिब्रिटीज़.. एक कबीले के हुए.. गहरी घुटती है जी, एक गुटके में से बिजली (खैनी) खाते हैं..गुटका खत्म होने पे उधर वो तमाखू निकालते हैं और इधर मैं चूना..अंडरस्टैंडिंग है, केमिस्ट्री है.. वो चूना लगा के तमाखू रगड रहे हैं..तब तक हम सरौते से सुपारी कतर रहे हैं.. वो हौले से हिदायत देते हैं ‘ऊंगली बचा के’.. हिंदी की दुर्दशा पर बात-चीत चल रही है.. टीवी,पेपर वाले फ़ूटेज़,कवरेज,लबरेज़ आदी ले रहे हैं.. अब तो कोई डिस्टर्बंस भी फ़ील नहीं होता.. कूल कैजुअल एकदम! हम दोनों का यही है, हमारे तमाम फ़ैन्स की खुश हो जिसमें वो करते हैं.. वर्ना मात्र हिंदी बोल लेने से दो लोग एक कबीले के नहीं हो जाते. अब अगर ऐसी सेलिब्रिटी होंगी तो उनकी सफ़लता से चिढने वाले भी होंगे! डॉ. अमरजी चिढ गए.. मुझे उनसे सहानुभूति नहीं हो पा रही है है क्योंकि मुझे तो बस अपने कबीले की सेलेब्रिटीज़ से ही सहानुभूती होती है!
अब की बार इन्टरनेशनल मेनस्ट्रीम मीडिया में क्या स्स्याप्पा हुआ, मेरा वर्शन सुनें -
मेरी पिछली पोस्ट में मैंने बिग बी को अपने कबीले का कहा! अगर कोई भी ७०+ आई.क्यू. वाला, लेख को पढेगा तो समझ लेगा की लेख में ‘कबीला’ एक प्रोवर्बियल/एब्स्ट्रैक्ट टर्म की तरह प्रयोग किया गया है.
मैंनें यह रेखांकित नहीं किया की किन हालातों में बिग बी हिंदी से जुडे रहे और उनके जतन के पीछे की भावना क्या थी! सोचा डॉ. अमर जैसे आम लोगों कों उन हालातों का अंदाज़ा होगा – जो की स्पष्ट तौर पे उन्हें नहीं था! दन्न से कम्यूनिस्टों की माफ़िक विरोध दर्ज कर दिया …असंतुष्टों की माफ़िक अमिताभजी द्वारा मात्र हिंदी में ही लिखने की मांग भी अपने ब्लाग पर धर दी! आपकी टैग है “अपन तो बस लिखेला और ठेलेला” ये कैसे चलेला?
परिवेश और भौगोलिक दूरियों के चलते हिंदी से जुडे रहने के लिये अनिवासियों को ज्यादा मशक्कत करनी पडती है. अमिताभ बच्चन जैसी हस्ती का मुंबई जैसे शहर में साहित्यिक आग्रह बनाए रखना आज के अंग्रेज़ीदां कॉस्मोपोलिटन भारत में रहते हुए भी कोई कम मशक्कत है? ये झुमरीतलैया के रामभरोसे हाई इस्कूल की छुट्टी के बाद इंग्लिस इस्पीकिंग इस्कूल में जा कर गिट-मिट गिरामर रटने से अलग किस्म की मगजमारी है! जिसपे गुजरती है, जानता है!
एक्ज़ाम्पल: बात सन २००० की है. एक रात मुझे माईग्रेन [आधासीसी का सरदर्द] अटैक आया.. सिर दर्द बढता ही गया.. मैं दर्द के मारे छटपटा रहा था. लगता था दिमाग की जैसे कोई नस फ़ट जाएगी.
फोन पे ९११ घुमा कर आपात्कालीन एंबूलेंस बुलाई गई. पीछे पीछे मित्र अस्पताल पहूंचे. वहां मुझे नारकोटिक्स के स्तर के तेज़ दर्द निवारक दिये गये जिनके प्रभाव में मैं २-३ घंटे पता नहीं क्या-क्या बडबडाता रहा.. फ़िर सो गया!
होश में आ जाने पर और तबियत ठीक हो जाने पर यार लोगों नें मुझे बताया गया की मेरी अंग्रेजी बडी धांसू है! काहे से की हमने दवा के नशे में सारी बडबडाहट शुद्ध हैवी वेट अंग्रेजी में करी.. “वाह बे तू तो सपने भी अंग्रेजी में देखता है!”
तब मुझे एहसास हुआ था की मैंने खुद के साथ क्या कर डाला था.. ये हिंदिनी/ब्लागिंग/विकियां आदी उस अपराधबोध का प्रयश्चित है की घर से दूर बसने के बाद अपनी भाषा से इतनी दूरी कैसे बना ली थी? - चलिये खुशी की बात है की अब सपने हिंदी में आते हैं! भारत के तमाम लोग जैसी अंग्रेजी बोलने लिखने और समझने के लिये तरसते हैं , वो अंग्रेजी बडे जतन दर-किनार किया हूं.. क्यो? अपने इन्टरनेशलनी डिस्ट्रिभ्यूटेड फ़ैन्स से संवाद स्थापित करने के लिये ही ना!
अब बात करें बिग बी की.. उन्हें तो मैं अंग्रेजी में पढ कर भी खुश था..पर आप जैसे हिंदी वालों के आग्रह पर, आप ये देखिये की वो किस आयू के हैं और कितने मनोयोग से कंप्यूटर पर हिंदी लिखना सीख रहे हैं. उन्होने हिंदी में ब्लागिंग की, तो अंग्रेजी वालों ने कहा हम आपका ब्लाग पढने ना आएंगें – अमिताभजी ने कहा जी चाहे तो आईये या मत आईये, मैं जब जी होगा हिंदी में लिखूंगा -श्री अमिताभ बच्चन के हिंदी ब्लागिंग करने से अधिक ये बात अपील कर गई!
उन्होंने आगे कहा की लेकिन आपको चिंता की जरूरत नहीं मैं हिंदी में जो भी कहूंगा आपके लिये अंग्रेजी में भी लिखूंगा.. इस बीच डॉ. अमर जी जैसों नें मात्र हिंदी में ही लिखिये की मांग धर दी .. ये तो ज्यादती है भई.. अगर आपको स्वयं पर अंग्रेजी थोपे जाना रास नहीं आती, तो अंग्रेजी वाले को हिंदी थोपे जाना क्यों रास आएगी – बिग बी और मेरे जैसी सेलेब्रिटिज़ के प्रशंसक हर भाषा में हैं.. बिग बी मुझसे ज्यादा उदार हैं अत: दोनो भाषाओं के प्रशंसकों को खुश कर रहे हैं. मैं व्यस्तता के चलते मात्र हिंदी वालों को! आपको इतन तो समझना चाहिये!
अमरजी का लॉजिक है “नहीं जी.. अमिताभ नें तो हिंदी फ़िल्मों में काम किया.. हिंदी की कमाई खाई उनका सेलेब्रिटी होने के नाते हिंदी के लिये ये करना बनता है की वे मात्र हिंदी में ब्लागिंग करें.” अरे भाई मैंने अंग्रेजी में लिखी कंप्यूटर की पुस्तकें पढ कर कभी ये सोचा की मैं अंग्रेजी की कमाई खाता हूं तो हिंदी के साफ़्टवेयर्स क्यों बनाऊं.. मात्र हिंदी में ब्लाग क्यों करूं? ये तो कोई लाजिक नहीं हुआ! लेकिन हम सेलेब्रिटीज़ की सोच आम आदमी के पल्ले पडे तब तो!
मन ही मन, ले देकर ये एहसास तो होता ही है की अमिताभ और मेरा सेलेब्रिटी स्टेटस ही कभी कभी हमारे लिये समस्याएं खडी करता है..लेकिन डॉ. अमर जैसे आम आदमी की अव्यव्हारिक अपेक्षाओं से जूझना हमारे इस सार्वजनिक जीवन का अंग है!
बस यही कामना है की उप्पर वाला उन्हे हम जैसे सेलिब्रिटी बनाए ताकी वे हमारी परिस्थितियां समझ सकें!




अब डाक्टर अमर कुमार के बयान का इंतजार है!
कबीले तो हज़रत मुहम्मद तोड़ गए। अब कबीले कहाँ? फिर कबीला बिना सरदार नहीं होता तो बताएँ आप का सरदार कौन?
सेलेब्रिटी और आम आदमी के बीच दूरी बनी रहती है.
intajaar me ham bhi hain..
हिन्दुस्तान में असली सेरीब्रेटी वही है जिसकी फोटो जूस वाला लगाये, खैनी के पाउच पर छपे, टैम्पो के पीछे चिपके.
बात ठीक कही बन्धू.
बेचारे अमिताभ बच्चन सेलेब्रिटी होने के नाते कितने दुःख झेल रहे है ?सचमुच जब अमर सिंह के साथ खड़े होते है तब लगता है वाकई कितना मुश्किल है इस उम्र में आकर एक भाई का मिलना ? बाराबंकी में किसान अमिताभ बच्चन जब अंग्रेजी में अपने टूर के बारे में लिखते है तो मन हिलोरे लेता है……की हाय सूटकेस चोरी हो गया…ब्लॉग में ढूंढता हूँ की शायद राज ठाकरे पर कुछ लिखा हो…….बेचारा आम आदमी तो ठहरा …..अफ़सोस कुछ नही मिलता …फ़िर सोचता हूँ के पेट दर्द के मारे लिखना भूल गए होगे …..अगले दिन पता चलता है की उन्होंने माफ़ी मांग ली …..हिन्दी बोलने के लिए ……सचमुच लगता है देखो कितने लाचार है वे……इनकम टैक्स का नोटिस भेजने पर पूरा देश ऊपर नीचे हो गया था की च… च …आदमी बीमार है ओर तुम उसे इनकम टैक्स का नोटिस भेज रहे हो जो मुफ्त में चवनप्राश बेच रहा है ….. तब लगता है देखो सेलेब्रेटी होने के कितने नुक्सान है .की आप हिन्दी में ब्लॉग लिखने लगे ओर फ़िर राज ठाकरे नाराज हो गए तो …उनकी मर्जी है भाई ……उनका ब्लॉग है ….जो चाहे लिखे ….अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी तो कोई चीज होती है न………जिम्मेदारी -विम्मेदारी सब बुद्धिजीवियों के काम है……हम उनका दर्द नही समझ सकते कैसे समझे …..एक तो ठहरे आम आदमी .दूसरे उत्तर प्रदेश के जहाँ जुर्म कम है…..कबीला फ़िर .बदले है वो ?कौन सा कबीला है ई?
क-बिला वजह, बिला वजह की टेंशन ली जा रही है… जिसको जो लिखना है लिखते रहने दीजिए.. जिसको जो कहना है कहते रहने दीजिए… जिसको जो सहना है सहते रहने दीजिए… इसी का नाम परलोक.. मेरा मतलब है लोक तंत्र है..
बहुत अमर पोस्ट है।