9 responses to “तुम्हारा प्यार, प्यार और हमारा प्यार लफ़डा?”

  1. vivek singh

    मैं आपके बारे में सुन रहा था कि आप अच्छा लिखते हैं मगर देखा तो जाना कि आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं .

  2. ghughutibasuti

    यह सच हे कि पुत्र के विद्रोह या उसे खोने के भय से बहुत से माता पिता उसके प्रेम पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा देते हें । इसका एक और कारण भी है कि बहू से तो वे निबट ही लेंगे । उसका जीवन कठिन बनाना उनके बाँए हाथ का खेल है । बहू के सर से तो क्या वे बेटे के सर से भी प्रेम का भूत उतार सकते हैं । जब बहू हैरान परेशान रहने लगेगी तो देर सबेर प्रेम स्वप्न की बात लगने लगेगा । ऐसे में पुत्र का भी बिना किसी मेहनत के धीरे धीरे प्रेम पर से मोहभंग हो जाएगा । उनका जीवन बिगड़े तो बिगड़े, माता पिता ने तो स्वयं को सही सिद्ध कर ही दिया ना ! ऐसा जवांई के साथ नहीं किया जा सकता अतः पुत्री पर ही बन्धन लगाने पड़ते हैं । आप बेचारे माता पिता की मजबूरी(जवांई को न सता पाने की) समझिए । उनपर दोहरी मानसिकता का आरोप मत लगाइए ।
    घुघूती बासूती

  3. दिनेशराय द्विवेदी

    हम प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकते। मैं, वह, तुम प्रेम के लिए तरसते हैं।

  4. vivek

    समाज की सोच अपनी जगह, सही या ग़लत उसपर टिप्पणी करके कुछ नहीं होने वाला, समय के साथ चीज़ें बदल रहीं हैं, यह भी बदलाव की प्रक्रिया में है. पर वह निरीह लड़की की आर्थिक आधार पर प्रेम विवाह में अड़ंगे की बात, उसपर मुझे एक घटना याद आ गई. (जैसा की मकान मालिक के परिवार से पता चला)

    मैं कॉलेज के अन्तिम वर्षों में जिस कमरे में पेईंग गेस्ट रहता था, मुझसे पहले वहां दो लड़कियां रहा करती थीं, जो की स्टुडेंट थीं. उनमे से एक का अफेयर काफ़ी आगे जा चुका था, और उसके घरवालों को पता चल गया. गुस्सा हुए, कोसा, पर चूँकि बात काफ़ी आगे जा चुकी थी तो मजबूरन लड़की की बात मानकर उसकी शादी उसकी पसंद से ही करनी पड़ी. कुछ सालों बाद लड़की का फ़िर उसी शहर में आना हुआ जहाँ वह पढ़ा करती थी, अपने पुराने मकान मालिक के परिवार से भी मिलने आई. बेचारी काफी दुखी थी, शादी के समय तक न लड़के का न ही लड़की का करियर जम पाया था, और शादी के कारण परिवार की ज़िम्मेदारी इतनी कम उम्र में गले पड़ गयीं. अब बच्चे भी हो चुके थे, लड़का पहले ही खिलंदडे स्वाभाव का था, अभी भी कुछ नहीं कमाता था, उल्टे घर में शराब पीकर अक्सर लड़ता था. यानी जिस प्यार के लिए लड़की कभी विद्रोह करने तैयार थी, आज उसी पर पछता रही थी. अब उसका या उसके बच्चों का भविष्य अनिश्चित ही लग रहा था.

    कुछ बातें आगे न ही बढ़ें तो बेहतर होता है, हकीकत अक्सर हसीं ख्वाब से काफी अलग होती है.

    ऐसी ही कुछ कहानी पड़ोस की ही एक लड़की की, जिसके चौदह साल की उम्र से ही अफेयर कालोनी की आंटियों में चर्चामें थे (अब इस उम्र के ‘प्यार’ को प्यार तो नहीं कहेंगे, सभ्य भाषा में आकर्षण ज़रूर कह सकते हैं). बदनामी से तंग आकर मातापिता ने उसकी शादी सोलह साल की उम्र में ही करवा दी, वह उस समय शायद ग्यारहवीं में थी(लड़का उसकी ही पसंद का था). आज उसके बच्चे किशोरावस्था के नज़दीक हैं, दोनों मियां बीवी १५ -१८ घंटे काम करने के बावजूद गृहस्थी नहीं चला पाते, बच्चे(खासकर लड़की) कुंठित और अर्धशिक्षित माँ की प्रताड़ना सहती हुई बड़ी हो रही है. बच्चे अभी तक तो बूढी नानी के भरोसे जैसे तैसे पले पर अब आगे किशोरावस्था में उनका भगवान ही मालिक होगा, क्योंकि बढ़ते बच्चों के साथ एक मध्यवर्गीय परिवार में उनकी ज़रूरतें और शौक भी बढ़ते जाते हैं. और अब तक बच्चों का काफ़ी कुछ खर्च नाना नानी ने उठा रखा था, हलाँकि उन्होंने भी अब हाथ खड़े कर दिए हैं. और पश्चिमी देशों जैसे पति बदलने का सिस्टम यहाँ (आमतौर पर) है नहीं जिससे की ऐसे मामलों में लड़की के लिए कुछ उम्मीद बाँध सके.

    अब ऐसे प्यार के किस्से आपको हर गली मोहल्ले में मिल जायेंगे, ऐसे अ-सुखान्त प्यार क्या सच में प्यार हैं या ‘लफडा/चक्कर’? यह दोनों घटनाएँ 1995 से 2005 के बीच की हैं, तो ज़्यादा पुरानी भी नहीं हुईं हैं.

    जिस प्यार में गहराई और गंभीरता न हो वह लफडे या चक्कर से ऊपर नहीं उठ पता. प्यार तभी चक्कर या लफडे के लेवल से ऊपर आना चाहिए जब प्रेम-पंछियों के नीचे दाना-पानी-घोंसले-छाया का पक्का इन्तेजाम हो, वरना जवानी के प्यार का बुखार जितनी जल्दी चढ़ता है उतनी ही जल्दी उतरता भी है. और फ़िर हमारे माँ बाप ज़्यादा दुनिया देख चुके हैं, हमारा बुरा तो हरगिज़ नहीं चाहेंगे, बच्चे को भले ही सिर्फ़ प्यार और ‘हमारा अपना छोटा सा स्वर्ग’ दिख रहा हो, उन्हें उसकी पूरी ज़िन्दगी दिखती है, और फ़िर रहना इन पंछियों को इसी समाज के बीच है, चाहे यह कितना ही ख़राब और गई गुज़री मानसिकता वाला हो..

    और मैं कोई दकियानूसी बूढा भी नहीं हूँ, जेन-एक्स पीढी की पैदाईश हूँ. पर बचपन से लेकर अभी तक काफी बिखराव आसपास देखा है.

  5. Manoshi

    लिखते रहो ई-स्वामी। तुम्हारा मस्त मौला अंदाज़ बहुत भाता है।

  6. anil pusadkar

    सत्य वचन स्वामीजी।

  7. masijeevi

    हम व्‍यक्ति के रूप में क्‍या हैं ये कहना तो कठिन है पर एक समाज के रूप में निश्चित तौर प्रेम-विरोधी हैं। प्रेम-विवाहों की असफलता समाज अपनी सफलता के रूप में देखता है, तमगों के रूप गिनता है। ‘हमने तो पहले ही कहा था’ वह प्रिय वाक्‍य है जिसे कहने का अवसर हर ठेकेदार चाहता है और खोज भी लेता है। अगर स्‍त्री के प्रेम के मामले में ये दबंगई ज्‍यादा चल जाती है।

  8. LOVELY

    सच कहा घुघूती जी ने ..उनसे १०० % सहमत हूँ.

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