संदर्भ: अरविंद मिश्राजी ने अपने ब्लॉग पर उत्सुकता जताई थी की राक्षसों का गुरु शुक्राचार्य शुभ क्यों माना जाता है? इसके उत्तर में ज्योतिष दर्शन वाले सिद्धार्थ जोशी जी नें एक पोस्ट भी लिखी थी. उन्होंने इस पोस्ट में शुक्र के शुभ माने जाने के सामाजिक संदर्भ का विश्लेषण किया था. दर असल मैंने सिद्धर्थ वाली पोस्ट पहले पढी थी फ़िर दूसरी वाली पढी.
मैं इस का उत्तर एक पौराणिक कथा में पाता हूं की शुक्र शुभ क्यों हैं. वैसे यह कथा मैनें हाल ही में इन्टरने पर एक पीडीएफ़ में पढी थी, किस पुराण से है, खोजना होगा – जहां तम मुझे याद है मत्स्य पुराण था शायद– उत्सुक व्यक्ति स्वयं मेहनत कर लें. वैसे कथा यहां पर अंग्रेजी में उपलब्ध है.
राक्षसों के गुरु शुक्र पूजनीय और शुभ इस लिये हैं की वे पार्वती के पुत्र हैं.
शिव के गणों में वे पिशाच इत्यादी तो थे ही जो उन्होंने किसी प्रकरण के बाद अपने स्वाभाव के तामसिक गुणों के प्रभाव में उत्पन्न किये थे, और उनके गणों में वे भी राक्षस थे जिन्हें उन्होंने विभिन्न युद्धों में हरा दिया था और फ़िर क्षमादान दे दी थी.
कथा के अनुसार एक बार दैत्यों के राजा जलन्धर नें राहू को शिव के पास इस संदेश के साथ भेजा की वे पार्वती को उसे सौंप दें.
इस संदेश पर शिव क्रुद्ध हुए और उनके क्रोध के प्रभाव से उनके धनुष से एक भयंकर जीव प्रकट हुआ जिसका मुख सिंह जैसा था और शरीर लंबा और शुष्क था. जीव नें राहू पर आक्रमण ही कर दिया लेकिन शिव के यह समझाने पर उसे छोड दिया की संदेशवाहक को आहत न किया जाए. इस भयंकर गण ने शिव से कहा की वह बहुत भूखा है. शिव नें कहा की यदी अधिक भूखे हो तो अपना ही शरीर खा लो, गण नें ऐसा ही किया – अब सिर्फ़ उसका मूंह ही बचा रहा – शिव उसकी इस भक्ति से प्रसन्न हुए. उन्होंने उसे अपना द्वारपाल नियुक्त कर दिया तथा उसे कीर्तीमुख नाम भी दिया.
जालन्धर को जब इस बात का पता चला तो उसने अपनी सेना को कैलाश पर्वत पर आक्रमण करने के लिये भेज दिया. दैत्यों और गणों मे घमासान युद्ध होने लगा. लेकिन जैसे ही कोई दैस्य मरता दैत्यों के गुरु शुक्र उसे नवजीवन दे देते – पुनर्जीवीत कर देते. गणों ने इस बात की सूचना जब शिव को दी तो वे बहुत क्रुद्ध हुए. उस समय उनके मूंह से कृत्या नमक एक शक्ति प्रकट हुई. उसका आकार बहुत बडा था वो युद्ध स्थल पर पहूंची और दैत्यों का नाश करने लगी. उसने शुक्र को उठा कर अपनी योनी में रख लिया और गायब हो गई. यह देख कर देत्य घबरा कर इधर उधर भागने लगे.

इस कथा के एक दूसरे संस्करण में, शुक्र स्वयं शिव के द्वारा निगल लिये जाते हैं. फ़िर शुक्र शिव के पेट में सैकडों साल भटकते रहते हैं. अंतत: वे शिव के योग की शरण में जाते हैं और एक विशिष्ट मंत्र के जाप द्वारा शिव के लिंग से वीर्य बन कर निकलते हैं. वे शिव को नमन करते हैं और पार्वती उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेती हैं. शिव उन्हें तेज उज्जवल स्वरूप दे कर अपने गणों में प्रमुख बना देते हैं.
वैसे वीर्य को शुक्र भी कहा जाता है.
शुक्र के चरित्र के बारे में उपलब्ध है की वे परम तपस्वी थे लेकिन हर बार अपने तप से प्राप्त रस वे अप्सराओं के संभोग कर ह्वास कर देते थे – ऐसा उन्होंने एक से अधिक जन्मों में किया था, शिव का गण बन जाने के बाद इस चक्र का अंत होता है. शिव के तप से ही उन्हें मृत संजीवनी विद्या मिली थी. वे कभी बृहस्पति के सहपाठी थे, फ़िर प्रतिद्वंद्वी बने – वो देवों के गुरु थे और ये दानवों के.
डिक्स्लेमर: इसी प्रकार की कुछ अन्य कथाएं भी उपलब्ध हैं. लेकिन बॉटम लाईन वही है कि शिव ने उप्पर से निगला और नीचे से उगला – इस रिसाईकल में शुक्र का रिवाईवल हो गया! ओम नम: शिवाय.





कुल मिला कर शिव के गण है शुक्र. बड़ा भारी लोकतंत्र है. देवता का गण दानवों का गुरू.
सुना है शुक्राचार्य सब को एक आंख से देखते थे। पुराणों में क्या लिखा है?
बहुत बहुत आभार इस मिथकीय संदर्भ के लिए -दरअसल पुरा (न ) कथाओं में इतना घाल्मेल है की कभी कभी बात की मर्म तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो जता है -आपने मोती निकाल ही लिया -शुक्र और वीर्य की व्युत्पत्ति भी बताई ! ग्रेट !
@ज्ञान दत्त पाण्डेय: हां इसका डीटेल वामनावतार की कथा में है.
जब विष्णु वामनावतार ले कर बाली से उसका राज्य लेने के लिये पहुंचते हैं तो शुक्र उन्हें पहचान लेते हैं. शुक्र बाली को चेतावनी देते हैं कि वे उस वामन को बाहर निकाल दें, क्योंकि वो विष्णु का ही अवतार है. तथा उसे कुछ भी दान आदी देने का संकल्प ना करें. बाली शुक्र की बात नहीं मानता. बाली के राज्य को बचाने के लिये वे बाली दान देने के लिये जिस बर्तन में संकल्प का जल ले कर छोडने वाले होते हैं उस जल को गिरने से रोकने के लिये उस बर्तन में चले जाते हैं. विष्णु एक तिनका इस बर्तन में गए शुक्र की आंख में चुभो देते हैं तब से वे एक आंख वाले हो जाते हैं.
वैसे ज्योतिष में शुक्र से आंखों के गुण भी ज्ञात किये जाते हैं.
यह एक आम भ्रम है कि हिन्दू मान्यता में देवता और ईश्वर एक ही होते हैं, यानि कि इंद्र, पवन, अग्नि आदि भी ईश्वर और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश भी ईश्वर। तभी लोग कहते हैं कि इतने सारे भगवान! लेकिन ऐसा नहीं है।
मूल रूप में पहले शिव थे, उन्होंने अपनी सहायता के लिए अपनी शक्ति के एक रूप को विष्णु के रूप में निकाला और विष्णु से ब्रह्मा निकले। यानि कि ईश्वर यही तीन त्रिदेव हैं जो कि वास्तव में एक ही शक्ति हैं, यानि कि परमात्मा एक हैं।
हम जिनको देवताओं के रूप में जानते हैं, जैसे कि इंद्र, पवन, अग्नि, वरूण आदि, ये सब कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे और ये आदित्य अपने सद्कर्मों और सद्बुद्धि के कारण सुर अथवा देव कहलाए। वहीं कश्यप ऋषि और उनकी दूसरी पत्नी दिति के पुत्र यानि कि दैत्य अपने कुकर्मों और कुबुद्धि के कारण असुर अथवा राक्षस कहलाए।
मोटे तौर पर आप इस सबको यदि किसी कंपनी के तौर पर देखें तो शिव कंपनी के प्रेज़िडेन्ट यानि कि प्रधान हैं, विष्णु चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव ऑफिसर हैं जिनका काम कंपनी को चलाना है, ब्रह्मा चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफिसर हैं जिनका काम कंपनी के ऑपरेशन्स को देखना है (यानि कि सृष्टि में सृजन करना)। देवता लोग अपने-२ विभागों के प्रधान हैं, यानि कि डिपार्टमेन्ट हैड और उनके राजा इंद्र जनरल मैनेजर हैं जिनको सभी डिपार्टमेन्ट हैड रिपोर्ट करते हैं। मैनेजर इंद्र फिर आगे ब्रह्मा अथवा विष्णु को रिपोर्ट करते हैं और यदि आवश्यकता हो तो ब्रह्मा अथवा विष्णु के कहने पर शिव शंकर को भी रिपोर्ट करते हैं।
ईश्वर सभी के लिए एक है, चाहे वे सुर हों या असुर, सभी त्रिदेव के किसी न किसी रूप को पूजते हैं और शक्ति हासिल करते हैं, पुराण इस सब का विस्तृत व्याख्यान करते हैं!
ई स्वामी जी आप तो वास्तव में सबके स्वामी हैं। यह संदर्भ तो मुझे पता नहीं था। एक पुस्तक है नवग्रहों की जन्मकथा। पता नहीं किसने लिखी है लेकिन उसकी लिमिटेड प्रतियां बिकी थीं। बाद में बंद भी हो गई। मैं उस पुस्तक को खोज रहा हूं। लेकिन अब लगता है पुराणों में मुझे ये सब कहानियां मिल जाएंगी।
इस कहानी के लिए एक बार फिर आभार।