25 responses to “साहित्य वो बासी चिट्ठा है जो कागज़ पर प्रकाशित किया जाता है”

  1. dr.anurag

    इसे कहते है ठेठ ब्लोगिया पोस्ट …एक दम धाँसू …अब देखिये ना मंटो अश्लील करार दिए गए पर छिप कर जितने पढ़े गए आज अमरता की श्रेणी में है….उनके लिखे में न ढेरो मुश्किल शब्द है .न लम्बी फिलोसफी ….
    जब २४ घंटे न्यूज़ के चैनल आये लोगो ने कहा अखबार बंद हो जायेगे .यहाँ तो दो तीन ओर नए आ गए ….किताबे नहीं बिकेगी…इंडिया टुडे ओर आउटलुक वीकली निकलने लगी…इन्टरनेट पे एम् पी -३ का डाउनलोड मुफ्त है तो म्यूजिक कैसे बिकेगा …बिक रहा है ….कुल मिलाकर साब कुछ चल रहा है …परेशानी उन लोगो को है जो समय के साथ ताल मेल मिलाकर नहीं चल रहे है …जिन्हें इस सुविधा का इस्तेमाल आता है .वे मजे में है ….वैसे भी इश्तेहारी जमाना है….

    कुत्ता प्रकरण खासा दिलचस्प है.

  2. अविनाश वाचस्‍पति

    आपने जो प्रश्‍न उठाए हैं, वे सामयिक और ज्‍वलंत और जीवंत हैं। पर इनका शमन करने में ये और भड़क जायेंगे। पर मात्र भड़भड़ाने के भय से इससे बचना संभव नहीं है। इसलिए ब्‍लॉगिंग को साहित्‍य माना जा सकता है, चाहे कुछ कम प्रतिशत ही माना जाए। पर कुछ प्रतिशत अधिक भी माना जा सकता है। ऐसा नहीं है कि जो छप गया वो पोस्‍ट। जो नहीं छपा वो साहित्‍य। अनछपा भी साहित्‍य है और सब छपा हुआ भी साहित्‍य नहीं है।

  3. sशरद कोकास्

    पहले तो ये बताईये कि ये मुद्दा उठाया किसने ? अरे भाई ब्लोग तो एक माध्यम है . जैसे पत्रिकाएँ हैं .अब पत्रिका भी कई तरह की होती है . किताबे हं किताबे भी कई तरह की होती हैं. अच्छा लिखने वाले कहीं भी लिखें अच्छा ही लिखेंगे कभी कभी ट्रक के पीछे भी दुश्यंत का शेर लिखा मिल जाता है कभी पब्लिक टॉयलेट की दीवार पर भी कविता की कोई पंक्ति दिख जाती है .और कविता पोस्टर के बारे में क्या कहेंगे . विग्यापन मे बच्चन की कविता का इस्तेमाल होता है .होर्डिंग पर कभी अच्छी कविता दिख जाती है . जो लिखा जा रहा है उसे साहित्य ही कहा जायेगा हाँ उसके साथ विशेषण जोड सकते हैं आप हिन्दी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य , कथा साहित्य , अश्लील साहित्य ,सडक साहित्य ( बहुत पहले ट्रक के पीछे लिखे साहित्य को यह नाम दिया गया था शायद सारिका में) बाल साहित्य ,नारी साहित्य खेल साहित्य ..और खोजिये ऐसे ही नाम मिल जायेंगे ब्लोग साहित्य को सिर्फ ब्लॉग साहित्य ना कहकर अलग अलग नाम दिये जा सकते है और वहाँ अलग अलग विशयो पर लिखा जायेगा तो यही कहा जायेगा इसलिये कंफ्युस होने की कोई ज़रूरत नहीं बहर हाल मुद्दा अच्छा है अभी से फंडा क्लीयर हो तो क्या बात है

  4. संजय बेंगाणी

    तमाम तरह के लेखकों को ब्लॉग लिखने से कौन मना कर रहा है. वे लिखे तो हम भी गधे लोग सीख ले कि कैसे लिखा जाता है. या फिर उन्हे कोई भय सता रहा है?

  5. ज्ञानदत्त पाण्डेय

    असल में ब्लॉग को किर्रू लेवल बताते जो साहित्यवादी हैं, वो विज्ञापन देने लायक भी नहीं हैं उन्हें पाठक चाहियें। :-(
    पर यह भी है कि ब्लॉग वाले को क्या फरक पड़ता है कि साहित्याचार्य क्या आयं-बांय-शांय कह रहे हैं!

  6. Dr.Arvind Mishra

    पठनीय उत्कृष्ट आलेख -बाटम लाईन- ब्लॉग एक माध्यम है !
    इस पर साहित्य लिखे या कचरा यह सबको समभाव से सहेजेगा
    मगर साहित्य क्या है यह बहस तब तक चलती रहेगी जब तक साहित्यकार शेष हैं
    देखिये कब तक यह बहस चलती है ! अवसान पर तो खैर यह है ही !

  7. समीर लाल

    हमारे मन की बात और कलम एवं बेबाक बिंदास शैली आपकी. बधाई.

  8. Lovely

    मन की बात कह दी आपने ..संजय जी से सहमत हूँ.

    कुते वाली घटना रोचक लगी.

  9. दिनेशराय द्विवेदी

    साहित्य साहित्य है और ब्लाग ब्लाग है। ब्लाग अभिव्यक्ति का एक माध्यम भर है। यहाँ कुछ भी लिखिए। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा में।

  10. हिमांशु

    शानदार प्रविष्टि । पूरे आलेख में अनेकों स्थलों पर साहित्यकार और चिट्ठाकार के मध्य की महीन रेखा ढूढ़ता रहा ।

    इन पंक्तियों ने तो एक अजीब-सी खुराक दी इस साहित्यिक मन को –
    “जरा सोचिये, अगर हमारी दृष्टी में साहित्य वो बासी चिट्ठा हो जो मटमैले कागज़ पर प्रकाशित किया जाता है तो? अगर हमारी दृष्टी में आत्मकथा वो आर.एस.एस. फ़ीड है जो जीवनभर अटकी रही और अंतत: सीधे प्रिंटर पर भेज दी गई, तो? बस दृष्टीकोण का ही तो फ़ेर है!”

  11. बालसुब्रमण्यम

    आपने इतनी उत्तेजना से लिखकर इस नोन इश्यू को अहम इश्यू बना डाला!

    आपकी बात से सहमत हूं, ब्लोग सिर्फ एक माध्यम है। उसमें साहित्य लिखा जाए या कुत्ते की शादी कराई जाए, यह ब्लोगर का निजी मामला है। पाठकों को जो पसंद हो, पढ़ ले, जो न पसंद हो, न पढ़े, बात खत्म।

    ब्लोगिंग जारी रखें, इन पछड़ों से दूर रहते हुए।

  12. संगीता पुरी

    मेरे ख्‍याल से ‘साहित्‍य’ के नाम पर अधिक बवाल होने के कारण ही अन्‍य भाषाओं की तुलना में हिन्‍दी साहित्‍य की इतनी बुरी दशा है।

  13. अशोक पाण्‍डेय

    हम जबरिया लिखबै यार कोई का करिहैं (अगर कॉपीराइट का उल्‍लंघन हुआ है तो फुरसतिया भइया से माफी मांगते हुए) :)

  14. ashok

    sahitya kya hai aur kya nahi yah prastuti ke madhyam se tay nahii hota.
    par yah bhi katu saty hai ki blog par abhi 95% kuda hai aur print me 25 %.

  15. Dr.Manoj Mishra

    बहुत उम्दा लिखा है .

  16. darpansah

    “साहित्यकारों की ये ठसक है, की वो जो परोस रहे हैं, वह ट्वैल्व-कोर्स गॉरमे डिन्नर है ”

    bahut satya kaha, aur saath hi saath french course menu bhi yaad ho aaya…

    ek aur baat: “जंगल जंगल पता चला है चड्डी पहन के फ़ूल खिला है’ विशुद्ध साहित्य है…”

    apke kehne ka mantavya to samajh gaya hoon…

    udharan bhi accha hai lekin , shayad apko pata ho ise gulzaar ne likha hai…

    acchi post 4 out of five.

  17. अर्कजेश

    वाह अनूप जी मजा आ गया, क्या फ़ाडू लिखा है । आप जैसे ब्लॉगर के रहते किसकी जुर्रत है जो ब्लॉगरों को खोंचा मारकर, खुद सुरक्षित रह सके ।
    ब्लॉग मुफ़्त में उपलब्ध हैं, इसीलिये कमतर नहीं हो जाते । और रही बात माध्यम की तो “मोल करौं तलवार का पडी रहन दो म्यान”|
    ब्लॉगरों को कुछ फ़र्क पडने वाला नहीं है कि साहित्यकार या खुद कोई ब्लॉग्गर भी ब्लॉगिन्ग को क्या प्रमाण पत्र देता है।
    ये बात और है कि आने वाले समय में ब्लॉगिंग बडे रचनाकार पैदा करेगी । अभी-अभी तो बच्चे ने वर्णमाला सीखी है और लोग प्रश्न करने लगे की यह मुन्शी प्रेमचंद या निराला बन पायेगा या नहीं |
    यह सब बेहूदा सवाल हैं । हर माध्यम की अपनी भूमिका है । कोई यहां दावा भी नहीं किया जा रहा है कि ब्लॉगर साहित्य स्रुजन कर रहे हैं । आपके कहने का तात्पर्य यह भी है कि घोडे-गधे हर भूमि में पाये जाते हैं यहां तक कि मैंने सुना है काबुल में भे गधे पाये जाते हैं ।
    ब्लॉगर अपनी मस्ती में लिख रहा है । जिसको जो विवेचना करनी है करता रहे ।
    ब्लॉगिंग के लिये आपका सूत्र बिल्कुल फ़िट्ट है “हम तो जबरिया ………

  18. amit

    पिछले कुछ समय से पढ़ता/सुनता आ रहा हूँ कि फलाने साहित्यकार ने ब्लॉगिंग को नकारा, तो किसी ने पश्चिम का वाहियात समय बेकार करने का माध्यम कह लताड़ा तो किसी ने असफ़ल घसियारों का छपाई माध्यम कह कर अलंकरित किया। और मैं यह सोचता रहा – who gives a flying f*ck as to what these so called litterateurs say about blogging?!! इनको पढ़ने वालों का दायरा दिन प्रतिदिन सिमटता जा रहा है, इसलिए इनके वाहियात और कॉम्प्लेक्स ग्रस्त विचारों की पहुँच भी सिमटती जा रही है। यदि बैल-गाड़ी बनाने वाला यह बोले कि उसकी बैल-गाड़ी क्लॉसिक है और चौ-पहिया मोटर गाड़ियाँ फास्ट फूड टाइप कचरा हैं तो किसी को कोई फर्क पड़ेगा क्या? मैं नहीं समझता कि पड़ेगा।

    बाकी आपकी बात सही है कि सेब की संतरे से तुलना हो रही है। यदि इन साहित्यकारों ने एकाध औसत या निम्न दर्जे के ब्लॉग पर नज़र डाली और यह मत बना लिया कि सभी ब्लॉग बेकार हैं तो फिर उनका साहित्य के मामले में भी यही रवैया होगा कि यदि किसी साहित्यकार ने एकाध खराब रचना बना डाली तो सभी साहित्यकार कचरा परोसते हैं!! ;)

  19. amit

    par yah bhi katu saty hai ki blog par abhi 95% kuda hai aur print me 25 %

    अशोक जी, क्या इन नतीजों को दर्शाते आंकलन की रिपोर्ट है कोई? यदि हाँ तो जन-उद्धार हित उसको उपलब्ध करवा सकें तो बहुत कृपा होगी। :) वैसे इस संभावना को नहीं नकारूँगा कि प्रिंट की तुलना में ब्लॉग पर अधिक कूड़ा हो सकता है जिसका एक प्रबल कारण यह होगा कि प्रिंट की भांति ब्लॉग एडिटोरियल प्रॉसेस से होकर नहीं गुज़रते। यह ब्लॉगिंग का एक सशक्त एडवांटेज भी है क्योंकि यहाँ कोई बाध्यता नहीं है किसी के लिए, कोई भी कुछ भी छाप सकता है, संपादक की कैंची का कोई भय नहीं है!! इस स्वतंत्रता का ट्रेड ऑफ़ क्वालिटी कंट्रोल में है जो कि मेरे अनुसार स्वीकारणीय है!

  20. dhiru singh

    ब्लॉग आज़ादी से लिखने का माध्यम है और अखवार या किताब के लिए बाप या भाई का कन्धा चाहिए . क्यौकी सम्पादक का बेटा ही सम्पादक बनेगा उस सम्पादक का जो अखबार का मालिक भी हो

  21. अजित वडनेरकर

    मस्तीभरा आलेख।
    ज्ञानजी के ब्लाग से चल कर इधर आया। उन्होंने हमें गलत ढंग से कोट किया है।

  22. अजित वडनेरकर

    ज्ञानजी ने हमारी गलतफहमी दूर कर दी है। हम से समझने में भूल हुई।

  23. सिद्धार्थ जोशी

    कीम भ्रामरी न्‍याय

    जय हो स्‍वामी जी की।

    खैर परफेक्‍ट ब्‍लॉगिया चिंतन।

    मेरा मानना है कि ब्‍लॉग साहित्‍य नहीं है। न ही इसे होना चाहिए। क्‍या क्‍यों और कैसे यहां क्‍यों बताउं। एक नई पोस्‍ट लिखूंगा।

    एक बार फिर स्‍वामीजी की जय हो। दोनों स्‍वामियों की।

    कीट भ्रामरी न्‍याय। वाह — खोपड़ी में अन्‍दर तक घुस गया।

  24. दरभंगिया

    यह साहित्य है या नहीं यह प्रमाणपत्र चाहिए क्या?

    वैसे मैंने नहीं सुना कि किसी ब्लॉग पर लिखी रचना के लिए किसी ब्लॉगर को साहित्य सम्मान मिला हो. तो यह तय है कि कम से कम जो सम्मान बाँटते हैं वे इसे साहित्य नहीं मानते.

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