शाम से मैं इन्तज़ार करता रहा हूं कि सब आराम से सोने जाएं, ताकि मैं इत्मिनान से यह लिख सकूं.
आज का दिन अनायास ही कुछ एक खास दिन बन गया है. मैं, जो स्वयं को आमतौर पर भविष्योन्मुखी मानता हूं, आज के दिन को यादों के पुरालेखों में सहेज देना चाहता हूं – शायद ऐसे ही किसी दिन कि स्वांत: सुखाय लेखन के लिये ही ब्लॉगिंग का औचित्य बनता है.
आज ना कोई पुरानी गज़ल सुनी, (ना ही कोई नशा किया है) लेकिन मन बहुत भावुक, बहुत नॉस्टेल्जिक हो रहा है! यह कारवां कहां कहां से गुजरेगा मैं खुद नहीं जानता. आज मेरे पहले वाहन, मेरी पहली नई नवेली कार, जिसे मैने तकरीबन एक दशक पहले लिया था, ने जमा एक लाख मील (१६०,०००किमी)सफ़र कर चुकने का सोपान छू लिया. साथ लगा चित्र उसी अवसर पर खींचा गया.
चाहे जितनी गौण लगे, सापेक्षिकता के व्यक्तिगत मानदंडों पर, मेरे लिये यह अद्भुत घटना है. अतीत के प्रस्फ़ुटन में सराबोर मैं, समेट रहा हूं वो एक एक पल जो आज अवचेतन से निकल कर मेरे सामने बिखरता जाता है! यदि मैं उन्हें मन कि गति से लिख पाता तो आज ही हिंदिनी की सर्वर स्पेस बढवानी पडती! लेकिन इसके पहले भी कुछ सोपान रहे उनके बिना बात अधूरी होगी.
उम्र मुझे याद नहीं है. छोटा ही था मैं, तब किसी और मध्यमवर्गीय परिवार की तरह हमारे यहां भी कार नही थी.
एकदा हम घर के लोग बातचीत कर रहे थे. वार्तालाप एक परिचित के प्रसंग पर पहुंचा, जिसने तब हाल ही में कार चलाना सीखी थी. कार चलाने में कितना मज़ा आता होगा, ये सोच कर मैने भी जोश में कह दिया “जब मैं भी बडा हो जाऊंगा ना, मैं भी कार चलाना सीखूंगा!”
मेरे ऐसे बाल सुलभ उत्साह और कल्पनाओं को अपने शाब्दिक तमाचे से तिलमिला देने में माहिर पिताजी यह स्वर्णिम मौका कैसे चूकते – “किसी और की कार चला कर क्या सीखना? जब खुद कि कार ले सकने की हैसियत पैदा कर लो तब तो बात है – पहले उस लायक तो बनो!”
उनके जीने का तरीका भी यही रहा –सदैव स्वयं पहले अपना वाहन खरीदा, फ़िर उसे चलाना सीखा. उसूल किसी चिडिया का नाम है? अब आप समझ गये होंगे – मैं प्रोग्रामर क्यों बना, पाईलेट क्यों नहीं! पाईलेट बनने के लिये हवाईजहाज खरीदना होता!.. और फ़िर मेनफ़्रेम का प्रोग्रामर क्यों नहीं बना!
शायद मेरे खुशी से मर चुकने का भय रहा होगा इसीलिये “हां बेटा, मुझे विश्वास है कि तुम कम आयू में सफ़ल हो कर खुद अपनी कार चलाना सीखोगे!” की प्रजाति का कुछ उन्होने कभी नही कहा! खैर ये भूल-चूक-लेनी-देनी वाला मामला नहीं था – नुकसान तो हो चुका था.
किशोरावस्था में मित्रों को नई नई बाईक पर घूमता देखता मैं, पिताजी को कभी कोई वाहन दिलवाने की जिद नहीं कर सका. जब स्कूटर चलाना सीखी तब भी मन कि त्वचा के नीचे एक फ़ांस रडकती रही – “ये पिताजी की है” फ़िर घर में नई दोपहिया गाडी आई, कुछ फ़र्राई भी. लेकिन तब तक हमारी बूढी बजाज सुपर से कुछ अलग सा ही लगाव हो गया था, जैसे खुद को समझा रह होऊं – बडा हो कर इस तरह का कोई वाहन तो जुटा ही सकूंगा.
मालवा में खटारा वाहन को टंडीरा भी कहा जाता है. टंडीरा स्कूटर की रखरखाव करते-करते, ये लगाव धीरे-धीरे विंटेज-कार लवर्स वाले आध्यात्मिक टंडीराप्रेम में बदल गया. अब मैं बस टंडीरा मेरे पास उपलब्ध होने के अहोभाव में ही उसकी मरम्मत करवाता रहता.
कन्यामित्र को घुमाने के लिये ये बूढी बजाज सुपर फ़िर भी मुफ़ीद नहीं थी लेकिन कोई चारा भी नहीं था. दादाजी की कृपा से घर की लंबी सीट वाली काईनेटिक होंडा का जुगाड यदा कदा हो जाया करता – वे आरामदायक वाहन पर मेरे साथ कहीं जाने का बहाना बना देते. जो मुझे उपलब्ध करवा दी जाती.
अनजाने में मेरे सपनों के पर ज़रा कतर दिए गए थे, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था. घर में कन्याओं के पोस्टर लगाने की सख्त मनाही के चलते कारों के पोस्टरों से ही काम चलाना होता था, मित्रों के बीच “कूल” होने का दबाव तब भी था, जब यह शब्द भारतीय जनमानस के शब्दकोश में नहीं था.
तात्कालिक कन्यामित्र महत्वाकॉंक्षी थी. मेरी खटारा स्कूटर पर पीछे बैठी, देखती किसी बाईक वाले को, और सपने किसी कार वाले के लेती थी. स्कूटर पर भटकते कब मेरे परकटे सपनों पर, मेरे पीछे बैठी परकटी के आसमानी सपनों का संक्रमण हो गया – पता नहीं चला. कारें एक बार फ़िर उन पोस्टरों से निकल मेरे सपनों में घुसपैठ कर चुकी थीं.

परकटी का कोई प्रत्यक्ष विकल्प नहीं था, जैसे टंडीरा का कोई विकल्प नहीं था. वैसे मैं इनका विकल्प ढूंढ भी नहीं रहा था. स्थिती से कोई असंतोष भी नहीं था. लेकिन मुझ पर इन मामलों में असंतोषी एक मित्र की सोहबत का सह-प्रभाव हुआ – उसके देखा-देखी, अपने कमरे में, कारों के पोस्टरों को धकेल, मेरे बिस्तर के सामने वाली दीवार पर ब्रुक शील्ड्स का सबसे बडा B&W पोस्टर जम गया! आशा के विपरीत, इस बार पिताजी ने कुछ कहा नहीं!
इट वाज़ ए डिफ़ाईनिंग मोमेंट!
मेरे कमरे में वो पोस्टर लगे रह देने कि उनकी मौन अनुमति में ही अपने ‘जवान’ होने चुकने की पूंगी फ़ूंक फ़ूंक कर हांफ़ता मैं, अपने नि:श्वास की “टूँऽऽऽ”-स्वरूप पराध्वनी मन ही मन सुन गया – सफ़लता अंतत:!
यहां शीतयुद्ध/शंखनाद/उद्घोष/विजय/पताका/पराक्रम जैसे शब्दों का प्रयोग सरासर अन्याय और अतिशयोक्ति होगी, सो किशोरावस्था की इस घटना का पूंगीवत् वर्णन ही उचित है.
उस पर भी एक अजीब सा डर भी कि पिताजी ने इस पोस्टर प्रकरण पर तो छोड दिया है लेकिन इस एहसान की कसर कहीं और निकाल ली जाएगी. उस दौर कि हवा में कुछ ऐसा था कि किशोर किसी छोटी सी भी खुशी को बिना किसी ग्लानीभाव के सहजता से अनुभव नही सकते थे. हां कुछ ऐसे थे जो इस ग्लानीभाव को जीत कर सिद्धयोगी हो चुके थे लेकिन ऐसे लडकों के संपर्क में मैंने अभी आना था. बिना भय के खुश होने के लिये मुझे अभी बहुतकुछ अनसीखना था.
खटारा स्कूटर को ठीक करवाने पास वाले मैकेनिक की दुकान पर ले जाना होता था. पुरानी स्कूटर और मोपेड से भरी इस दुकान की टूटी, ऑईल-सनी फ़र्शियों और दीवारों पर से उखडते हल्के नीले रंग पर किसी का ध्यान चाहे ना जाता हो, वहां पर चस्पा पोस्टरों से बचना मुश्किल था. चमचमाती भारी भरकम हार्ली डेविडसन मोटरसाईकिलों पर चढीं ४०-२६-४० वाली लैदर बिकिनीधारी बक्सम ब्लॉण्डज़; किसी अंग्रेजी पत्रिका के बीच वाले पन्नों से फ़ाडे गए एरनाल्ड श्वॉज़नेगर और सिल्वेस्टर स्टैलान के रैम्बो वाले पोस्टर्स. कभी मैं उन पोस्टर्स के पहलवानों और कभी अन-हैंडलेबल बाईक्स व उसी श्रेणी की मॉडल्स को देखता, कभी अपनी सुडकती हुई नाक पोंछते खटारा स्कूटर सुधारते, ऑईल सने उन मरियल लडकों को! मैं सोचने लगता, पोस्टर्स उपलब्ध और अनुपलब्ध के बीच का सेतू हैं या सफ़ल-वालों द्वारा संघर्षरत-वालों को अप्राप्य के सपने दिखा-दिखा उनकी भावनाओं से खेलने का माध्यम? पूजाघरों में रखे श्रीयंत्र और तिब्बती मंदिरों में सजे मंडल भी क्या बस इसीलिये हैं? किसी आलौकिक कि कामना मात्र में उस पर त्राटक करते रहने के लिये?
तब यह खयाल नहीं आया कि ये पोस्टर्स हमें अप्राप्य को पाने के लिये उत्साहित करते हैं और वो कहीं गहरे, विचारों से अनछुए तल पर, मुझे बदल भी रहे थे जिसका मुझे भान नहीं था! हां, तब सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, लगन ये सब प्रवचनप्रदत्त खिजाऊ संज्ञाएं भर थीं – इनका अनुभूति से कोई लेना देना नहीं था, आसपास फ़ंडेबाजों के झंडे बुलंद थे और अपनी दृष्टी में हम प्रतियोगी परीक्षाओं में दौडाने के लिये पैदा किये पशुधन मात्र थे- अपने दडबों में पडे किताबों कि जुगाली करना हमारा नसीब था, दडबे कि दीवार पर किसी के खूबसूरत चेहरे का अक्स तक बर्दाश्त नहीं किया जाता था. लेकिन यह सब जल्द ही बदलने वाला था.
(क्रमश:)
(कुछ जमा? यदि हां तो ये भी पढियेगा)






एक बाप के रूप में अब बोलने (लताड़ने) से पहले ज्यादा सतर्क रहूँगा….
अगर आप कभी आत्मकथा लिखने का निर्णय लें तो मैं “किसी भी” कीमत पर खरीदना चाहुंगा.
मीट्रिक सिस्टम को य़ुनिवर्सली लागू हुए काफ़ी समय हो गया. सिर्फ़ दस वर्ष पुरानी कार में MPH देखना अजीब लगा. क्या ये रॉल्स-रॉयस है? (या फ़िर आप ब्रिटेन में हैं?)
ये वाली पोस्ट और इसके पहले वाली पोस्ट भी पढ़ी। क्रमश: का इंतजार है।
@Ghost Buster – इतनी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये धन्यवाद!
मैं USA में हूं यहां पर MPH का ही कंवेन्शन है. ये निस्सान अल्टिमा है! आगे वाले लेखों मे और चित्र भी डालूंगा.
ऐसा लगा जीवन के कई फ्लेश बेक एक साथ कतार बद्ध अलग अलग जगह पर एक साथ चलते है .कभी कभी कुछ सालो के अन्तराल पे ….ब्रुक शील्ड का पोस्टर हमने भी अपने दोस्त के बड़े भाई के यहाँ पहली बार देखा था बचपन में तब हमें पता नहीं की की ये जंगल में हंगामा मचाने वाली लड़की है पर मन को भा गयी थी ….बाद में किसी टेनिस स्टार से इनका तगड़ा अफेयर चला ये भी सुना .अपने दिल के अरमान में हमने भी अपने कमरे में इनके पोस्टर लगाये ….गेब्रिला सबतानी ओर दो तीन सुंदरिया…
आप नोस्तेल्जिक ओर भावुक होकर सही ठेल देते है….वैसे अगर सचमे प्लान बना रहे है आत्मकथा लिखने का तो हमें भी अगला खरीदार मानिए…तब तक अगली रात का इंतज़ार करते है .जब सब सो जायेंगे .
एक सांस में पढ़के चैन मिला…आगे का इंतज़ार रहेगा
मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति
कार का मीटर स्वामीजी की यायावरी की दास्तान दिखा रहा है ! बधाई !
ये हमारे ऊपर भी लागु होता है
मैं प्रोग्रामर क्यों बना, पाईलेट क्यों नहीं! पाईलेट बनने के लिये हवाईजहाज खरीदना होता!.. और फ़िर मेनफ़्रेम का प्रोग्रामर क्यों नहीं बना!
ब्रुकशील्ड का पोष्टर (ब्लू लैगून) का लग रहा है ! पूरानी यादे ताजा हो आयी ! वैसे मेरी फैटीशीयो की सूची मे एक यह भी है किसी द्विप पर कुछ दिन एकांत मे रहा जाये !
हार्ले डेवीडसन तो अपनी पंसदिदा रही है, अब भारत मे खरीदने की तो अपनी औकात अभी तक नही हुयी है इसलिये हमने इसकी भारतिय चचेरी बहन बजाज अवेंजर ली थी! लेकिन फुरसतिया जी की तरह का (अपग्रेडेड प्लान) फटफटीया पर भारत भ्रमण का अधुरा है!
लगता है ऊपर वाला हिंदी फिल्मो का रायटर है.. जिसने सिर्फ किरदार बदल दिए है.. पर कहानी एक ही है.. सबकी लाईफ कुछ इसी तरह क्यों होती है., पिता सारे एक से ही क्यों लगते है,,?
अनूप जी लिंक नहीं देते तो वाकई कुछ मिस हो जाता.. अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इन्तेज़ार है.. और हाँ सर्वर स्पेस अनलिमिटेड ले लीजिये..
बेहतरीन आत्मकथ्य . ईमानदार और सांद्र . यह मध्यवर्गीय जीवन शैली और जीवन मूल्यों में गहरे धंसे पारम्परिक भारतीय पारिवारिक धरातल से टेक ऑफ़ करते उन सपनों की भी कहानी है जिसे कैद करने वाली जंजीर अभी बनी नहीं है . यह लैम्ब्रेटा और बजाज सुपर रूपी टंडीरों से निस्सान अल्टिमा होते हुए ऑडी आदि पर आरूढ होने की कहानी भी है . साथ ही ’मेरी खटारा स्कूटर पर पीछे बैठी, देखती किसी बाईक वाले को, और सपने किसी कार वाले के लेती ’ का वह सिनिसिज्म भी है जो कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता .
यदि यह आत्मकथा छपती है तो अपन भी अंटी ढीली करेंगे और इसकी समीक्षा भी लिखेंगे .
रही बात ब्रुक शील्ड की तो अपने एक दोस्त हैं,भारत के नामी ’मरीन आर्केओलॉजिस्ट’ में गिनती है,वे और हम जब जवानी के दिनों में साथ थे तो वे स्टेफ़ी ग्राफ़ को देख कर अक्सर लंबी सांसें भरते हुए घोषणा करते थे कि वह अगर उन्हें घरेलू नौकर/परिचारक रख ले तो वे खुशी-खुशी तैयार हो जाएंगे . तो भइए उस उमर की फंडेबाजी और फ़िकरेबाजी के तो रबाब ही न्यारे हैं . तब कमरा तो कमरा, दिल की तख्ती पर देसी-बिदेसी न जाने कितने पोस्टर लगे रहते थे .
अगली कड़ी का इन्तजार रहेगा .
भाषा में रवानगी हो तो पाठक खुद ब खुद बहता चला जाता है। निश्चित ही एक ऎसा नमुना यहां देखने को मिल रहा है। आगे इंतजार तो रहेगा ही।
अतीत के इस इमानदार वर्णन मे मुझे सबसे अच्छी लगी “पुंगी”!! कल नागपन्चमी थी और शायद आप अपने ______- की गलियों मे घूमते उन संपेरों ौर दिन भर उनकी पुंगी की आवाजों को भी मिस कर रहे हों शायद..:)
बहुत ही सुन्दर पोस्ट. पिछले पोस्ट में बजाज स्कूटर की तस्वीर देखी बड़े शान से खड़ी है.
मैं अक्सर सोचता हूँ कि कॉर्डियोलोजिस्ट्स को दिल से ऐसा कुछ बहता दिखता है?
वाकई समाँ बाँध दिया आपने . लगा जैसे यह मैं ही हूँ जिसकी कहानी आप सुना रहे हैं .
पर मेरे पास अभी कार नहीं है . हाँ बाइक नौकरी लगने के बाद ही खरीदी और तब ही ड्राइविंग सीखी !
मजाक : इस मरीज को इस अस्पताल तक अनूप जी लाए हैं , उनका कमीशन दे दिया जाए
अद्भुत है स्वामीजी, आत्मकथा तो हमने भी ख़रीदी समझो। वैसे कथा कुछ-कुछ हमारी अपनी भी लग रही है। नॉस्टेल्जिया गए हम भी।