8 Comments

  1. sbai

    रोचक विवरण।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  2. dr.anurag

    अतीत के प्रस्फुटन …दिल से निकले है …काफी टूट फुट लिए है…पर सलीके से रफू बाँध के ऐसे मस्त मस्त डेंटिंग पेंटिंग लिए हुए है की रोयल्स रोल्स को भी मात कर दे …..कसम से एक ठो नोवल पे आपका अधिकार बनता ही है…झकास लेखन ….

  3. amit

    वाह, रोचक रहा मामला।

    वैसे अपने को किशोरावस्था में साइकल मिली थी, खराब हुई ठीक हुई खराब हुई ठीक हुई का सिलसिला चला और फिर स्कूल के बाद उसको छोड़ दिया कि बस बहुत हुआ। जब कॉलेज के बाद पहली फुलटाईम नौकरी लगी तब पहली मोटरसाइकल खरीदी थी, दो-ढाई साल बाद उसको बेच दूसरी ली। फिलहाल वही चल रही है। गाड़ी अभी तक इसलिए लेने से कतराता आ रहा हूँ कि मोटरसाइकल चलाना छूट जाएगा यदि एक बार गाड़ी ले ली, और मोटरसाइकल चलाना अपने को बहुत प्रिय है, जो एहसास और मज़ा उसमें है वह तो ओपन टॉप कन्वर्टिबल में भी नहीं है! :)

  4. अनूप शुक्ल

    अच्छा संस्मरण लिखा है। बचपन की न जाने कितनी यादें दायें-बायें हो गयीं। मुझे अपने घर की एक साइकिल भी याद आ रही है जिसके एक ही ब्रेक था बहुत दिन तक। साइकिल तब खरीदी छूट के दाम पर जब भारत यात्रा करने निकले। :)

  5. ashish

    हम पिछली पोष्ट देख के सेण्टीया गये थे कि स्वामीजी की पहली गाड़ी स्कुटर थी। ये तो आज पता चला कि वो डिमोशनीया के लूना पर मतलब की हमारे लेवलीया गये थे।
    हमरी शुरूवात भी पापा की लूना से हुयी थी, ये बात और है कि पापा ने स्कूल पैदल जाना शुरू कर दिया था। रूकिये रूकिये पापा का स्कूल घर से दो खेत छोड़कर ही था !

    हम और हमारी लूना, कभी हम लूना की सवारी करते कभी लूना हमारी। मतलब की पैडल मारते हुये चलाते ! लेकिन कसम से जब उसमे पेट्रोल होता तो तीन तीन सवारी ढोयी है!
    चल मेरी लूना !

  6. Ghost Buster

    बढ़िया संस्मरण रहा, बेहद रोचक. टंडीरा और लूना के बीच कहीं न कहीं अपने आप को भी ढूंढ पाये, इससे मामला और भी दिलकश हो गया. अन्य संस्मरणों का अग्रिम स्वागत है. मौका पायें तो जाने ना दें.

  7. अतुल शर्मा

    अतीत के प्रस्फुटन यानी ब्लैक एंड व्हाइट फ़्लैशबैक की शानदार कीमिया तैयार की है। देशकाल और किरदार के कन्वर्ज़न की बेहतरीन तस्वीरें दिखाईं आपने।

  8. Neeraj Rohilla

    होंडा सिविक टाईप की सवारी लग रही है, ;-)

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