एक कहानी दो लोगों के बीच की सबसे सरल राह होती है. एक दिन मैं और मेरा मित्र ऐसी ही राह पर टहल रहे थे यानी मैं उसे टंडीरा-कथा सुना रहा था-
“एक बार पिताजी टंडिरा पर रात को कहीं से लौट रहे थे. शहर के मनहूस गड्ढे मानसून के बाद और गहराए हुए थे. गाडी की उदास हैडलाईट के थके हुए प्रकाश में पिताजी को एक गड्डे कि गहराई का सही अंदाज़ नहीं हुआ. टंडीरा गड्ढे में धचके से उतरी लेकिन उससे सिंगल पीस में उबरी नहीं. टंडीरा .. यानी पुरानी बजाज सुपर स्कूटर, बीच में से – पायदान के स्थान से टूट कर दो टुकडे हो गई. अगला पहिया और उस पर जमा हैंडिल अलग, पिछला सीट व इंजिन वाला हिस्सा दूसरी ओर विलग!”
मित्र: “क्या! फ़िर से बोल!!”
“स्लोमोशन में रीप्ले – अबे पायदान के नीचे का लोहा जंग लग-लग कर पूरा सड चुका था, लेकिन रबर मैट नें अंदर की रामकहानी ढंक रखी थी! गड्डे में पडे पत्थर की टक्कर से टंडीरा फ़ोल्ड हो गई, और अगले ही पल उसके दो-फ़ाड होते ही पिताजी गड्डे के दोनो ओर पैर टेक कर खडे हो गए, झटके से बंद हुई गाडी का पिछला हिस्सा खरोंचे देता हुआ गिर पडा, हैंडिल वाला हिस्सा हाथ में रह गया!”
“हा हा हा…ओह माई गॉड… फ़िर?”
“फ़िर क्या बे, जैसा कि होता है, पिताजी की मदद के लिये भीड इकट्ठा हुई! टंडीरा को ठेले पर लाद कर, उसे उसके पोस्टरमय खानदानी दवाखाने पहुंचा दिया गया. जहां पर अगली सुबह मुआयने के बाद उसे बडे अस्पताल पहुंचाने का फ़रमान जारी कर दिया गया.
पायदान वाले हिस्से पर नीचे लोहे के मोटे अस्तर की वेल्डिंग करवाई गई, वैसे मेरी उम्मीद से अधिक खर्च किया गया. मैं टंडीरा के इस पलस्तरीकरण पर प्रसन्न था लेकिन अब वो घर वालों के दिल से उतर चुकी थी. आनन फ़ानन में तब नईनवेली कायनेटिक होंडा का आगमन हुआ था. मुझे टंडीरा का अनाधिकारिक हस्तांतरण हो चुका था और अब उसकी रखरखाव का जिम्मा मेरा था.”
“सही है, मतलब बिल्ली के भाग से छींक्के टूटे?”
“अबे क्या खाक टूटे छिंक्के? अपनी चारागरी से कुछ ही महीनों में बीमारन के चेहरे कि रंगत क्या पलटी, घर के फ़रनीचर बनाने वाले मिस्त्री का दिल उस पर आ गया. उसके काम के भुगतान के समय उसने पिताजी से मेहनताने में ‘जहां है जैसी है’ के आधार पर टंडीरा मांग ली और पिताजी ने उसे अनुग्रहित कर दिया, माना मालिक वो हैं यार पर मुझ से पूछा भी नही! भई जीर्णोद्धार के बाद मेरी प्यारी टंडीरा तो गई, अब मैं इस सुक्कड* लूना के भरोसे हूं.” [*सुक्कड=anorexic]
“इसे कहते हैं, अण्डा सेवे मुर्गी और ऑमलेट खाए फ़कीर! कारपेंटर की तो ऐश हो गई.”
मन ही मन मैने सोचा कि टंडीरा और लूना से मेरे रिश्ते में मूलभूत फ़र्क ये है कि, जब थी, तब टंडीरा मेरे भरोसे थी लेकिन उसके जाने पर मैं लूना के भरोसे हो गया हूं – जो कतई भरोसेमंद नहीं है. फ़िर इस लूना से कोई भावनात्मक लगाव भी नहीं है.
“हांऽऽ वही! अब ५० सीसी में क्या सेक्स अपील? और तू हर डायलॉग में मुहावरे मत घुसेड भई” मैने आसमान से जमीन की ओर देखते हुए कहा, “देख इधर तो आधूनिकीकरण की गंगा उलटी बह रही है लोग स्कूटर से मारूती पे जा रहे हैं और अपन टंडीरा से लूना पे!”
अब मित्र सोचने लगा! उसे कुछ देर सोचने देते हैं.
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हम भारतीय एकसाथ कई युगों की संस्कृतियों में जी रहे होते हैं. इसकी मिनिस्क्यूल टॉपोलॉजी (अल्प सांस्थिती) किसी भी कस्बाई शहर में तमाम अगाडी-पिछाडी मुहल्लों के सह-अस्तित्व में देखी जा सकती है.
आर्थिक क्षमता के आधार पर बंटे मुहल्ले (एचाअईजी/एमआईजी/एलआईजी), धर्मविशेष बाहुल्य वाली बसाहटें. ये मुहल्ले किसी ना किसी तरह से एक जैसे मानसिक-नक्शे वाले लोगों को उनके अपने दायरों में और उनके अपने दौर में साथ-साथ रखते हैं.
इन दायरों के जरा बाहर निकलते ही, कॉलेज के पहले वर्ष में अपने लंबे बालों में भृंगराज तेल चुपडे, सलवार कमीज में आने वाली लडकी के सजने-संवरने का अंदाज़ दूसरे सेमिस्टर तक पहुंचते जबरदस्त महानगरीकृत हो जाता है. अपनी अम्मा की पसंद के चौडी चौकडी वाले बुश्शर्ट पहनने वाले लडकों के तेवर बदल जाते हैं.
इस मित्र से यह मित्रता कुछ ऐसे ही समय में हुई थी जब मैं अपने दायरों से ज़रा ज़रा बाहर देखने लगा था! मित्र मंडली में गांव से आने वाले, व्यवसायिक परिवारों से आने वाले और कार्पोरेट सीढियां चढे हुओं की संताने शामिल हुई थीं.
इनमे से कई मित्र बहुत ही स्किल्ल्ड छुपे रुस्तम थे. उनके किस्सों से मैने सीखा कि खुशियां अपने आप आप तक नहीं पहुंचती- उन्हे बडे विवेक और चतुराई से चुराना जाना होता है. अभिभावकों को लूप में रख कर जो खुशियां जी जाती हैं उन पर हैप्पीनेस टेक्स लगता ही है और नंबर दो में जी गई खुशियों को जीने के लिये आपको बढिया चकमेबाज होना आना चाहिये. चार्ली चेप्लिन द्वारा जिये गए किरदारों जैसा चकमेबाज!
मेरे परिवेश में तो बदलाव आ रहा था. समाज के बदलाव की दिशा, आज वाली ही थी -सुविधाओं का आधुनिकीकरण और विचारों का पश्चिमीकरण -
“कृषिदर्शनो मा देहदर्शनं गमय
केरोसीनो मा गैस स्टोवं गमय
बही-खातो मा कंप्यूटरं गमय
स्कूटरो मा मारूतीं गमय” किस्म की!
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हां तो, सोच विचार कर मित्र बोला – “…तो क्या करेगा पाण्डू?.. तूझे कुछ दिन तो लूना ही चलानी होगी, हां कारों के सपने देखने के लिये तू स्वतंत्र है”. मैं जानता था कि उसे भी कुछ नही सूझेगा. वो मेरे पिताजी से इतन डरता था कि घर में आते ही दडबे में कूच करने का इशारा देने लगता था. उसके तीन साल बाद तक साईकल या लूना – यही अपने वाहन थे. सचमुच कोई चारा नहीं था और मैं सायकल को लूना से अधिक प्राथमिकता देता था. शायद इसी का प्रभाव था कि यदा कदा काईनेटिक होंडा की मांग करने पर अनुग्रहित कर दिया जाता था.
मित्र के पिताजी कभी कभी बंबई जाते तो उसके अनुरोध पर वहां से विदेशी कारों के ईयरली डाईजेस्ट उठा लाते. हम उन्ही की तस्वीरे देख देख कर निहाल होते रहते.
मैंने देखा और महसूस किया कि अपने अपने हिस्से की खुशियां जीना बहुत ही ‘डिमाण्डिंग टास्क’ है. सबसे मुश्किल काम!
शहर में इला अरुण का बहुप्रतीक्षित पॉप कंसर्ट था, चूंकि कार्यक्रम रात को होना था मैंने पिताजी से काईनेटिक होंडा मांग ली.
उस रात का वो मनोरंजक कार्यक्रम –वाह! किशोरों-किशोरियों की भीड में नाचता गाता मैं सोच रहा था कि कितनी यादगार है ये रात! घर जा कर माता-पिता को एक एक गीत की खबर दूंगा! मैं सचमुच खुश था!
कार्यक्रम के बाद जब मैने गाडी स्टार्ट करने कि कोशिश की तो कुछ ना हुआ! चेक करने पर पाया कि किसी ने तेज धार के औजार से ढक्कन काट कर गाडी की बैटरी चुरा ली है – वहां खडी दूसरी गाडियों को भी नुकसान पहुंचाया गया था. गाडी धकेल कर एक परिचित के यहां छोडी और पसीने में तरबतर पैदल घर पहुंचा. पूरी घटना बताने पर पिताजी ने इस नुकसान पर जिस निर्दय नॉनस्टॉप अंदाज़ में कोसा, रात सचमुच यादगार हो गई.
मैं यह घटना भूलना भी नही चाहता था. नंबर एक में जी गई खुशी पर हैप्पीनेस टेक्स देना मुझे मंजूर था लेकिन ये थोडा ज्यादा हो गया था! काश मैने बताया ही ना होता कि मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में जा रहा हूं. काश मैने गाडी ना मांगी होती. काश मेरी जेब में वो बैटरी डलवा देने के पैसे होते.
मैने प्रत्यक्ष में कोई प्रतिक्रिया नहीं की. कुछ दिन बाद चुपचाप ब्रूक शील्ड्स के पोस्टर का स्थान चकमेबाज चार्ली चैप्लिन के, “द किड” वाले पोस्टर को दे दिया और पढाई के साथ-साथ कोई छोटी-मोटी नौकरी करने का फ़ैसला कर लिया.
कायनेटिक होंडा में नई बैटरी ठीक करवाई गई.
फ़िर एक और दुर्घटना का शिकार होने के बाद मरम्मत पर तमाम पैसा खर्च करने पर भी उसका माईलेज गिरता गया. स्वीकारता हूं कि मैने उसकी सुधार मरम्मत में कभी कोई रुचि नहीं दिखाई थी!
अंतत: पिताजी ने एक शाम उसके हाल पर चिंता प्रकट की, जैसे अप्रत्यक्ष कह रहे हों कि अब इसका भी जीर्णोद्धार करो.
अगले ही दिन मैंने उसे बेच कर, शाम को रुपये पिताजी के हाथ में दे दिये ‘धिस पीस ऑफ़ क्रेप इज़ नाट वर्थ माए टाईम एण्ड योर मनी – एण्ड इट नेवर वॉज़!’ और सायकल उठा कर अपनी पार्ट टाईम जॉब करने चला गया. – ना अण्डा सेवे मुर्गी ना आमलेट खाए फ़कीर!
पिताजी ने मुझे नया वाहन चुनने का जिम्मा दिया. एक ही हफ़्ते में वे नई एलएमएल वेस्पा पर सवारी करने लगे थे!
आज प्रस्तुत है एक लाख मील वाला चित्र!







रोचक विवरण।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
अतीत के प्रस्फुटन …दिल से निकले है …काफी टूट फुट लिए है…पर सलीके से रफू बाँध के ऐसे मस्त मस्त डेंटिंग पेंटिंग लिए हुए है की रोयल्स रोल्स को भी मात कर दे …..कसम से एक ठो नोवल पे आपका अधिकार बनता ही है…झकास लेखन ….
वाह, रोचक रहा मामला।
वैसे अपने को किशोरावस्था में साइकल मिली थी, खराब हुई ठीक हुई खराब हुई ठीक हुई का सिलसिला चला और फिर स्कूल के बाद उसको छोड़ दिया कि बस बहुत हुआ। जब कॉलेज के बाद पहली फुलटाईम नौकरी लगी तब पहली मोटरसाइकल खरीदी थी, दो-ढाई साल बाद उसको बेच दूसरी ली। फिलहाल वही चल रही है। गाड़ी अभी तक इसलिए लेने से कतराता आ रहा हूँ कि मोटरसाइकल चलाना छूट जाएगा यदि एक बार गाड़ी ले ली, और मोटरसाइकल चलाना अपने को बहुत प्रिय है, जो एहसास और मज़ा उसमें है वह तो ओपन टॉप कन्वर्टिबल में भी नहीं है!
अच्छा संस्मरण लिखा है। बचपन की न जाने कितनी यादें दायें-बायें हो गयीं। मुझे अपने घर की एक साइकिल भी याद आ रही है जिसके एक ही ब्रेक था बहुत दिन तक। साइकिल तब खरीदी छूट के दाम पर जब भारत यात्रा करने निकले।
हम पिछली पोष्ट देख के सेण्टीया गये थे कि स्वामीजी की पहली गाड़ी स्कुटर थी। ये तो आज पता चला कि वो डिमोशनीया के लूना पर मतलब की हमारे लेवलीया गये थे।
हमरी शुरूवात भी पापा की लूना से हुयी थी, ये बात और है कि पापा ने स्कूल पैदल जाना शुरू कर दिया था। रूकिये रूकिये पापा का स्कूल घर से दो खेत छोड़कर ही था !
हम और हमारी लूना, कभी हम लूना की सवारी करते कभी लूना हमारी। मतलब की पैडल मारते हुये चलाते ! लेकिन कसम से जब उसमे पेट्रोल होता तो तीन तीन सवारी ढोयी है!
चल मेरी लूना !
बढ़िया संस्मरण रहा, बेहद रोचक. टंडीरा और लूना के बीच कहीं न कहीं अपने आप को भी ढूंढ पाये, इससे मामला और भी दिलकश हो गया. अन्य संस्मरणों का अग्रिम स्वागत है. मौका पायें तो जाने ना दें.
अतीत के प्रस्फुटन यानी ब्लैक एंड व्हाइट फ़्लैशबैक की शानदार कीमिया तैयार की है। देशकाल और किरदार के कन्वर्ज़न की बेहतरीन तस्वीरें दिखाईं आपने।
होंडा सिविक टाईप की सवारी लग रही है,