अतीत के पहले और दूसरे प्रस्फ़ूटन में ज़रा फ़र्क रहा – पहला प्रस्फ़ुटन स्वयं-स्फ़ूर्त था और दूसरा सुविचारित. मेरा मानना ये है कि लेखन का दौरा आना चाहिये – दौर नहीं! पाठक छूटें ना ये सोच कर या ‘अगली किस्त जल्दी लिखियेगा’ के दबाव तले चिट्ठाकारी में लगातार लिखने का दौर बनाए रखना आत्मघाती भी हो सकता है.
कथा सुनाते हुए पाठक को संबोधित करना मनोहर श्याम जोशी की शैली है, इस लेखमाला की शैली भी वैसी ही रही है. चिट्ठाकारी के लिये यह सहज भी है.
अतीत के पहले प्रस्फ़ुटन में उस छोटे दौर का ज़िक्र था जो सबसे खुशनुमा, सबसे प्यारा था – टंडीरा, कायनेटिक होंडा और परकटी तीनो थे – सबकुछ सुंदर था, श्वेत श्याम वाला क्लासीक था.
दोबारा पढने पर लगता है कि अतीत का दूसरा प्रस्फ़ुटन जिसमें टंडीरा के बिक जाने की घटना का जिक्र है वो लेखन या स्मृतियों मे से किसी से भी न्याय नहीं कर सका – जल्दबाजी का शिकार हो गया, या बकौल फ़ुरसतियाजी ‘लेख का शीघ्रपतन हो गया’. उससे स्मृतियों कि रंगीनियां और संगीनियां कम नहीं हो जातीं. पाठक समझ सकते हैं कि काईनेटिक होंडा के बिकने तक अपना दोपहिया जीवन कितना नीरस रहा; इसके बारे में ना लिख कर, अपने आपको उस खुश्क केक्टस-केक्टस दौर से बचा लिया है मैने.
चलिए अब अगली बैठक जमाते हैं:
बुध की दशा में शुक्र की अंतर्दशा चल रही थी – अपने आस-पास दो तीन सुख एकसाथ जमा हुए- कन्याएं, कारें और कंप्यूटर्स. पिताजी का स्थानांतरण पास के शहर से अब गृहनगर में हो गया था. अब उन्हें सुबह सुबह स्कूटर ले कर जाने कि आवश्यकता नही रहती थी अलबत्ता वे पैदल दफ़्तर चले जाते थे. अब नई एलएमएल वेस्पा भी अपने ही पास उपलब्ध हो चुकी थी लेकिन इस ग्रहदशा के चलते मैं तो कार वाला हो चुका था!
अपनी छोटी मोटी पार्ट टाईम जॉब के साथ मैने कंप्यूटर हार्डवेयर का एक कोर्स भी कर डाला था, अब मित्रों के साथ जान-पहचान वालों को कंप्यूटर असेंबल कर के बेचने/अपग्रेड करने आदि के छोटे मोटे कामों कि वजह से अपने खर्चो के लिये कुछ आत्मनिर्भरता बन गई थी. उधर कंप्यूटर विज्ञान की स्नातकोत्तर स्तर कि पढाई जारी थी, नये मित्र बन गए थे और पूराना मित्र इंजीनियरिंग की पढाई पूरी कर के गृहनगर आ गया था. वो आगे की पढाई के लिये अमरीका पहुंचने कि तैयारी में लगा था. उसके पिताजी एक कंपनी में काफ़ी उच्चपद पर कार्यरत थे. उनकी दो कारों मे से कोई एक कार घर पर होती थी जो अब मय-सारथी(मेरा-मित्र) मुझे उपलब्ध थी. इस बात पर हम दोनो की बांछें खिली हुईं थीं.
मित्र का घर युनिवर्सिटी के नज़दीक था. मैं सुबह-सुबह लूना से उसके घर पहुंचता, एक-डेढ घंटा सो कर चाय-नाश्ते के बाद ‘ड्राईवर’ मुझे डिपार्टमेंट पहुंचाता. लाईब्रेरियन से अपनी सैटिंग के चलते यदि मूड होता तो मित्र डिपार्टमेंट या युनिवर्सिटी की लाईब्रेरी में बैठा पढता वरना कन्याओं से सैटिंग जमाता – जोभी!
ज्ञानीजन बता चुके थे कि घर में बैठे रहने वाले लडकों कि कद्र कम होती है सुब्बे-सुब्बे निकल्लो और रात को एंट्री मारो. मैने मां को कई बार बातचीत में कहते सुना था “बडा बिज़ी रहता है वो, कोई काम कैसे कहूं, सुबह से ही डिपार्ट्मेंट के लिये निकल जाता है फ़िर देर तक कभी लाईब्रेरी तो कभी लैब्स उस पर पार्ट-टाईम जॉब. खाने पीने की भी सुध नही रखता”.
ऐसी कई छोटी-छोटी टिप्स और ट्रिक्स जो जीवन को आसान करती गईं -
“घर पर सबसे सामने सिर्फ़ पढाई से संबंधित फ़ोन ही अटेंड करो”.
“कन्यामित्र से पंगा हो तो मरसियाब्रांड सूरत की वजह पढाई की टेंशन बताओ”
“स्पोर्टस मैगज़ीने के स्थान पर पीसीक्वैस्ट और डाटाक्वैस्ट लगवा लो”
उधर मित्र के घर में यह इमेज कि रात को देर तक पढता रहा, कुछ देर सो लूं फ़िर जाऊंगा कॉलेज.
शहर की युनिवर्सिटी कार से आने वाले छात्र तब थे ही कितने? मित्र और मुझे कार से चढते-उतरते वक्त चेहरे के भाव रजनीशी विरक्ति वाले रखना होते थे – “मैं कार में बैठा हूं कार मुझमे नहीं बैठी” छाप.
“मैं इस क्रीचर-कंफ़र्ट से उपर उठ चुका हूं और व्यायाम की आवश्यकता को समझता हूं” का संदेश देने के लिये कभी कभी मित्र और मैं माऊंटेन बाईक्स से भी कॉलेज पहुंचते! कभी कोई छात्र पैदल जाता दिखे तो उसे खुद हो कर लिफ़्ट देना भी इस छवि-बनाओ आंदोलन में शामिल था. कारण? उस जमाने कि कन्याओं को इम्प्रेस करने में इस प्रकार की चूतियामेटिक हरकतों कि महत्ता रहती थी!
उधर पार्ट-टाईम जॉब पर अलग-अलग कारों से पहुंचाना, यह इमेज बनाता कि पढाना मेरा शौक अधिक है, पैसा कमाने का जरिया कम! छात्रों में से कुछएक साधनसंपन्न अब अपने चेलो-चपाटों की बलन मे शामिल हो गए थे. जिंदगानी का मजा आने लगा था बॉस.
अपने दडबे की दीवार पर चिपका चार्ली चैप्लिन का “द किड” वाला पोस्टर मुझे एक सर्टिफ़िकेट सा नज़र आता था- चकमेबाजों की ही इज्जत है प्यारे.. नो हैप्पीनेस टैक्स अप्लाईड!
कार में घूमते हुए कई बार मैं मित्र के आगे उस ईला अरूण कंसर्ट की दुर्घटना वाली रात मुझ मे आए बदलाव का ज़िक्र करता, जिसके बाद मैं एक झूठा और मेनिपुलेटिव इंसान बन गया था.लेकिन इन बाहरी बदलावों के लिये क्या मैं दोषी था? नहीं!
अपने जुगाडूपने से सेट किये टुच्चे-मुच्चे संसाधनों और छवि के सक्रीय प्रबंधन के बाद घरवालों का व्यव्हार मेरी तरफ़ बदल गया था. लेकिन मन ही मन मैं सबसे दूरी महसूस करता था. ये दूरी मुझे एक सुरक्षा घेरा देती थी, अब किसी की जुबान, कोई शाब्दिक चाबुक मुझे आहत करने के लिये उठ नही पाती थी. मैं ऐसे कोई कारण ही नही बनने देता था. शायद वक्त वक्त का फ़ेर था!
फ़िर भी मैं देखता और महसूस करता था की अपने गृहनगर में, घर पर रह कर पढना और किसी होस्टल में रह कर घर से दूर पढना दोनो कितने अलग किस्म के अनुभव होते हैं. और होस्टल वाले मध्यमवर्ग से आए लडकों को उपलब्ध नाकुछ संसाधन देख कर गृहनगर में एक अच्छा कोर्स करना मुझे एक जबरदस्त डील लगता था – चाहे वो अपनी स्वछंदता और कितनी ही मस्ती करने कि गुहारे लगाते रहें, मैं जानता था आई वाज़ हैविंग मोर फ़न!
मैं जब चाहता कार चलाना सीख लेता लेकिन मैने ऐसा किया नहीं. मुझे पिताजी के शब्द अक्षरश: याद थे – “किसी और की कार चला कर क्या सीखना? जब खुद कि कार ले सकने की हैसियत पैदा कर लो तब तो बात है – पहले उस लायक तो बनो!”
एक दिन घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई, दरवाज़ा खोलने पर देखा मित्र मिठाई के डब्बे समेत खडा है. मुझे एक तरफ़ धकेल कर वो अंदर घुसा और सीधे पिताजी के पैर पड़ कर आशीर्वाद लिया. फ़िर मिठाई का डब्बा खोलते हुए बोला “मेरा यू.एस. से एम.एस. का इन्विटेशन लैटर आ गया है” …
“ओ त्तेरी..”… मैं बोल उठा!
अब वो उछल कर मेरी तरफ़ बढा और हम गले मिले!
“तू चल.. मै भी आऊंगा स्साले!”
(क्रमश:) [चलियेजी अगली कडी पढने से पहले मित्र और मेरी इस यात्रा का विवरण भी पढिये!]





गजब किस्सागोई है. एकदम ब्लॉगिया….
इस प्रकार की चूतियामेटिक हरकतों कि महत्ता रहती थी! स्वामी जी यह दौर पूरे १९९९ तक ही चला हैउसके बाद तो जैसे सब बदल गया ये लेख भी मस्त था एकदम बिंदास और यकीन मानिये साहित्य भी था न की जंक फ़ूड
घर में बैठकर संघर्ष कर रहे बच्चों के लिये जरूरी पोस्ट! लेकिन बच्चे तो अभी मोर फ़न हैव कर रहे होंगे।
पुत्ररत्न के जन्म पर आप को बहुत बहुत बधाई! विशिष्ट को ढ़ेर सारा प्यार और आशीर्वाद!!
आपके शुभेच्छुओं ने यह बता दिया कि आपको पुत्र की प्रप्ति हुई है.
ई-बधाई स्वीकार करें.
इस मौके पर एक “सोहर” प्रस्तुत की जाय.
क्या ये लेख मुझ जैसों केलिए लिखा है
बधाई स्वीकारें