6 responses to “अतीत के प्रस्फ़ुटन –३: “तू चल.. मै भी आऊंगा स्साले!””

  1. संजय बेंगाणी

    गजब किस्सागोई है. एकदम ब्लॉगिया….

  2. रमन शुक्ल

    इस प्रकार की चूतियामेटिक हरकतों कि महत्ता रहती थी! स्वामी जी यह दौर पूरे १९९९ तक ही चला हैउसके बाद तो जैसे सब बदल गया ये लेख भी मस्त था एकदम बिंदास और यकीन मानिये साहित्य भी था न की जंक फ़ूड :)

  3. अनूप शुक्ल

    घर में बैठकर संघर्ष कर रहे बच्चों के लिये जरूरी पोस्ट! लेकिन बच्चे तो अभी मोर फ़न हैव कर रहे होंगे।

  4. nitin

    पुत्ररत्न के जन्म पर आप को बहुत बहुत बधाई! विशिष्ट को ढ़ेर सारा प्यार और आशीर्वाद!!

  5. दरभंगिया

    आपके शुभेच्छुओं ने यह बता दिया कि आपको पुत्र की प्रप्ति हुई है.

    ई-बधाई स्वीकार करें.

    इस मौके पर एक “सोहर” प्रस्तुत की जाय. :)

  6. SHUAIB

    क्या ये लेख मुझ जैसों केलिए लिखा है ;)
    बधाई स्वीकारें :)

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