हाल ही में मैने अघोरा १,२ और ३ ये तीनो पुस्तकें पढीं. अंग्रेजी में लिखी डॉ. रॉबर्ट ई. स्वोबोदा की यह पुस्तकमाला अपने आप में अनूठी हैं. लेखक एक अमरीकी हैं, भारत से आयुर्वेदाचार्य बनने वाले पहले विदेशी व्यक्ति भी और पठनीय भी.
उनकी कई पुस्तकों मे से ये अस्सी के दशक में लिखी गईं थीं. किताव पढ लेना आसान है, समीक्षा करना कठिन! पुस्त्तकें अच्छी लगीं अत: उनके बारे में कुछ लिखना चाहता हूं और कुछ अपने मन की भी.
वैसे तो, “धर्म” शब्द का उल्लेख आते ही मेरे सर पर एक छोटा पॉकेट-साईज़ हथौडा जरा हौले से ही सही, पडता जरूर है.
फ़िर जब मामला हिंदू धर्म के ज़िक्र का हो तो सिर पर हथौडा पडा, बेसबॉल का बैट या सिलबट्टे का पत्थर यही शोध का विषय हो लेता है. मस्तिष्क में सुनी-सुनाई रूढोक्तियों का कोलाहल होने लगता है जिनकी प्रतिध्वनियां देर तक पीछा नही छोडतीं.
…ये धर्म है! जीवन शैली है! धर्मों की खिचडी है! धर्मों का आधार है!! दूसरे धर्मों के बनने का कारण है!!! विरोधाभासी विचारधाराओं कि धक्कमपेल है. हिंदू कौन हैं, कौन थे? वेदांती? मनुवादी? मूलत: आर्य थे.. नहीं जी आर्यों और द्रविडियों के मिश्रण से जन्मा तथाकथित हिंदू धर्म. अच्छा ब्राह्मी नामक भाषा थी कोई संस्कृत से पहले? पाली में लिखा है की … !!
कोलाहल कम नही होता .. कहते हैं शिव तो द्रविडों के भगवान थे और विष्णु आर्यों के.. नहीं आर्य मूलत: इंद्र के पुजारी थे. यज्ञ में हविष्य कौन देते थे? और एक री-पीटा री-री-पिटापिटाया कथन – ज्ञानियों द्वारा सबसे अधिक दोहराया हुआ, जिसके बिना जैसे इस धर्म का उल्लेख अधूरा हो - “ये नाम ही विदेशियों ने दिया था, भूखंड के मूलनिवासी मूर्तीपूजकों को” – कितना सस्ता है ये तोतारटंत! कितनी काँय-कॉंय है!
इस कोलाहल के बाहर कुछ बहुत रहस्यमय बचा रहता है. वो जो उसके मूल स्वरूप में बहुत जतन से, विशेष प्रकार से जीवन जी कर सहेजा जाता है. आमतौर पर हिंदू धर्म के उन कठिन फ़लकों का जिक्र ही नहीं होता – जिनकी बात निकलते ही कई असहज हो जाते हैं पुस्तक उन्हीं गूढ विषयों पर रची गईं हैं.
सच्चाई तो ये है कि सही अर्थों में एक हिंदू होना बडे सरदर्द का कारण हो सकता है इसलिये कोई भी हिंदू सही मायनों मे हिंदू होता ही नहीं – सारे तोते होते हैं. चलिये करोडों मे से कोई एक होता होगा, ऐसे एक हिंदू थे विमलानन्द. यही छद्मनाम दिया है रॉबर्ट ने अपने दुश्प्राप्य गुरु को [यह काल्पनिक चरित्र नहीं, वैसे इसकि संभावना नगण्य है. लेकिन विचार जरूर आता है कि ऐसे यथार्थ चरित्र होते भी होंगे क्या?].
पुस्तकमाला के अनुसार विमलानन्द एक अघोरी थे. और उनकी इच्छा के अनुसार पुस्तकें उनके अवसान के बाद लिखी गईं. तीनों किताबें विमनानन्द की जीवनशैली से जुडे संस्मरणों और विमलानन्द के दिलचस्प संभाषणों और किस्से कहानियों का का सुंदर ताना-बाना हैं. इसके चलते भी किताबे अपने मूल विषय से हटती नहीं हैं – वो हमें हिंदू धर्म के बारे में, ध्यान और तंत्र के बारे में इतना कुछ सिखाती हैं कि पढ कर ‘ज्ञानी हो चुका’ सा महसूस होता है.
पुस्तक पढते हुए प्रतीति होती है कि सचमुच हिंदू लेबल बाहरवालों ने ही अपनी सुभीती के चलते दिया. सही मायनों में हिंदू होना यानी बस साधक होना है, बिना किसी लेबल के.
कई विषय ऐसे होते हैं जिनको लेकर आमजन बहुत असहज महसूस करते हैं. ऊपरी उत्सुकता के चलते कुछ जान या पढ भी लिया तो भी जिज्ञासा और लगन इतनी गहरी नहीं होती कि विषय पर कोई व्यव्हारिक समझ विकसित कर लें. कठिनाईयों को बढाने में रही-सही कसर अधकचरी सामग्री और छद्म-गुरु पूरी कर देते हैं.
वाममार्ग इस प्रकार के प्रायोगिक गूढ विषयों में प्रमुख है. जिसके दुर्लभ साधक बहुत यत्न से इसे मुख्यधारा से बचा कर रखते हैं और गुरु-शिष्य परंपरा ही इसके ज्ञान को आगे बढाती है. वैसे देखा जाए तो आमजन की असहजता साधकों के हित में ही काम करती है. पुस्तकमाला कि पहली पुस्तक अघोरा –एट द लेफ़्ट हैंड ओफ़ गॉड इन्हीं साधकों की जीवनशैली पर प्रकाश डालती है – विमलानन्द के माध्यम से.
पुस्तकमाला की दूसरी पुस्तक है अघोरा – कुण्डलिनी. इस पुस्तक कि विशेषता है कुण्डलिनी के बारे में व्यव्हारिक चर्चा.
वैसे तो कुण्डलिनी के विषय पर अन्य कई रचनाकारों ने बहुत अच्छा लिखा और कहा है. ओशो रजनीश का नाम लिये बिना विमलानन्द के उन पर अकाट्य विचार रखे हैं. जो मुझ जैसे ओशो की शैली के [अन्यथा] प्रशंसकों को भी उनका सही स्तर दिखा देते हैं.
विमलानन्द की सबसे बडी खासियत है कि वो सहज हैं, स्पष्ट हैं और सरल हैं. इनके विचारों में कोई केऑस या अंतर्द्वंद्व नहीं है. सबकुछ तालमेल में है. यह सुख ओशो के यहां नही मिलता.
वैसे तो कुण्डलिनी जैसे विषय पर स्वामी शिवानन्द की ‘कुण्डलिनी योग’ जैसी प्रमाणिक पुस्तकें भी हैं जो आसन/प्राणायाम/मुद्राओं और बंधों से संबंधित तकनीकी जानकारी भी देती हैं. हां, इस पूरी किताब में कहीं भी कोई तकनीकी शुष्कता नही मिलती.
किताब सेक्स और ब्रह्मचर्य जैसे विषयों को बहुत ही मजेदार और सहज तरीके से समेटती है. विमलानन्द का हंसते-हंसते किसी भी कठिन सिद्धांत को समझा देना बहुत प्रभावित करता है.
जितना बडा सच ये है कि बिना प्रयोग किये किसी व्यव्हारिक विधी के बारे में पढ लेने मात्र से कुछ लाभ नही होता उतना ही बडा सच ये भी है कि प्रत्यक्ष गुरु कि प्रतीक्षा में इस प्रकार कि कोई पुस्तक ही साधक का मनोबल बनाए रखती हैं.
पुस्तकमाला की तीसरी पुस्तक है अघोरा- द लॉ ऑफ़ कर्मा. इस श्रृंखला की पुस्तकों में यह सबसे कम प्रभावित करती है – कदाचित इसलिये कि लेखक से अपेक्षाएं बढती ही जाती हैं.
यह पुस्तक हिंदू दर्शन के दो सबसे महत्वपूर्ण कीवर्डज़ “कर्म” और “ऋणानुबंध” के बारे में परिज्ञान देती है. कुछ महत्वपूर्ण बातों का दोहराब भी होता है और समयरेखा पर कुछ अलग अलग किस्सों और चरित्रों के सूत्र आपस में जुडते भी दिखते हैं.
इस पुस्तक की सबसे बडी विशेषता है रेसकोर्स कि गतिविधियों को हिंदू दर्शन से जोड कर, जीवन के खेल में कर्मों के विनिमय का प्रभाव समझाना.
कुल मिला तीनो पुस्तकें निराश नहीं करतीं और यदि हिंदू धर्म पर कुछ हट कर पढना हो तो मैं इनकी संस्तुति जरूर करूंगा. हां लेखक ने जहां भी अपने विचार रखे हैं वहां पुस्तक की भाषा कुछ क्लिष्ट जरूर हो जाती है. पढने कि गति को थोडा कम कर के ही मैने उन हिस्सों को बेहतर समझा है. इसके रहते हुए भी पाठन की लय अक्षय रहती है.
इन पुस्तकों की और समीक्षाएं यहां पढी जा सकती हैं:






अच्छी जानकारी!
अभिभूत कर देते हैं आप !
चौबीस घंटे में आदमी क्या क्या करे और क्या क्या पढ़े?
आप समय प्रबन्धन कैसे करते हैं? अपने जैसे बाकियों से सलाह लेने के बाद एक लेख दीजिए न ।
मौका मिला तो जरूर पढ़ेंगे.
दिलचस्प लगती है आप रिकमेंड कर रहे है तो .भारत में मिलने की संभावना कितनी है ?
@Dr.Anurag भारत में यह उपलब्ध है.
इसमें तो किताबों के किस्से हैं! किताबों में लिखा क्या है ई त बताया ही नहीं जी। ताज्जुब की बात है भैये कि इत्ती किताबें बांच लेते हो और ऊ भी अंग्रेजी में। इन किताबों के बारे में जानकर जानकारी बढ़ी।
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