१) हमसे एक परिचित दंपत्ति ने अपनी हाल ही मे जन्मी पुत्री का नाम रखा है ‘आरोही’. मुझे शक है, की नाम कन्या की गायनातुर संगीतमारी माता ने दिया है. जो भी है जी, नाम सुन्दर है. मेरे आस-पास के नवजात बच्चों के नाम हैं – प्रणव, अन्विता, युवना, यजुर – ये सभी अप्रवासी भारतीयों के बच्चो के नाम हैं. मेरे पुत्र के नामकरण का वृत्तांत तो सभी ने पढा ही है.
इन सुन्दर नामो वाले ये बच्चे अपने अपने नामों के अर्थ रट लेंगे और जिस तरह के अनिवासी माता-पिताओं की संताने हैं वे, ये लगभग असंभव है कि वे कभी देवनागरी में अपना नाम लिख भी पाएंगे!
हमारा भाषाप्रेम सुन्दर या पौराणिक या हट कर नाम देने तक सीमित क्यों है? उसके आगे, क्या हमें हिन्दी से और फ़िर उसके आगे संस्कृत से एलर्जी है? इसके कारणों की पडताल मै मन ही मन करता रहा हूं.
२) मैने hangover और escapist का हिन्दी अर्थ देखना चाहा – दो अच्छी ऑनलाईन डिक्शनरी हैं – शब्दकोश और W3-हिन्दी डिक्शनरी. शब्दकोश.कॉम मे दोनो का अर्थ नही मिला और दूसरी में हैंगओवर का सटीक अनुवाद नही मिला –”अवशेष” दिया हुआ था. अब ऐसे मे मैं क्या करूंगा?
जैसा कि मै ऐसे मे करता हूं एक गुप्त-हथियार है उसे काम मे लेता हूं – स्पोकन संस्कृत डिक्शनरी जहां से मुझे escapist के लिये पलायनवादी और hangover के लिये हत्शिष्ट और अतिलंबित इन दोनो शब्दों को आसानी से ‘बना’ लेने के लिये जानकारी मिल गई.
नशे वाला हैंगओवर अतिलंबन होगा और कॉलोनियल हैंगओवर औपनिवेशिक हत्शिष्ट.
लेकिन कोई इन्हे काम मे लेगा नहीं “कठिन” जो है! मुद्दा है कि इन तथाकथिक कठिन शब्दों को आ उनके आसान विकल्पों को प्रयोग करने मे हम झिझकें नहीं!
जो शब्द हिन्दी मे नही मिले वो संस्कृत मे मिलेंगे ही, मिलेंगे नही तो एकदम वैज्ञानिक रीति से बनाए जा सकेंगे – मूल भाषा और आधारभूर रचना तो वही है – और सर्वाधिक वैज्ञानिक भी.
कहना ये चाह रहा हूं कि यदि हम संस्कृत, फ़ारसी और उर्दू से विमुख हो चुके हैं तो हिन्दी को बचा ही नही सकते – आज हमारे दृष्टीकोण में उर्दू औपचारिक/अव्यव्हारिक है, फ़ारसी वैदेशिक और संस्कृत पौराणिक तो हिन्दी का कबाडा होने से हम कैसे रोक सकते हैं? जबकी हम इन तीनो के समृद्ध होने का सीधा लाभ हिंदी के लिये ले सकते हैं.
अंग्रेजी को कोसना आसान है लेकिन हिंदी की जडें जिन भाषाओं में है उन तक फ़िर लौटना और उन्हें दोबारा प्रयोग करना, उन्हे बढाना कई गुना कठिन है. हमारा इन भाषाओं के लिये एक आकर्षण जरूर है लेकिन वहीं उनसे एक प्रकार की अजनबियत और भय भी है – चूंकि हमने इन्हे कुछ स्कूलों में जबरदस्ती पढाए जाने के अलावा स्वेच्छा से नही पढा है. तो हम अपने बच्चो को पौराणिक और अच्छे अर्थो वाले नाम तो देते हैं लेकिन जिन भाषाओं से वो नाम आए उन्हे कभी नही अपनाते.
फ़िर नए ज्ञानियों की एक कतार ये कहती है कि अरे टेंशन क्यों लें? सीधे सीधे हैंगओवर को ही हिंदी मे स्वीकार कर लेते हैं – अंग्रेजी के प्रति दुराग्रह क्यों? एक प्रतिप्रश्न ये उठता है कि यहां “स्वीकार” कर लेते हैं और “पूंछ डाल” लेते हैं के बीच की रेखा कौन खींचेगा? करने को तो आप ब्रिटिश हुकूमत भी स्वीकार कर लेते ना? नहीं की! क्यों? हिन्दीप्रेमी का मतलब अंग्रेजी के प्रति दुराग्रह नहीं बल्कि हमारी अपनी भाषाओं कि तरफ़ आग्रह है बस.
इस साल के हिंदी दिवस पर व्यंग्यात्मक या स्यापाग्रस्त होने का काम नहीं करुंगा. पिछले साल की तुलना में मैने इस साल बहुत से चिट्ठाकारों के लेखन मे जबरदस्त बदलाव देखा है, अच्छा लिखने और अच्छे से लिखने का आग्रह बढा है. मुझे तसल्ली है! जडें तो मजबूत हैं निजभाषा की, खाद-पानी देना हमारा फ़र्ज़ है.
चलते चलते (हाय नी! इन्फ़्लेमेबल!!)-







बेहतरीन आलेख…
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.
कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.
जय हिन्दी!
समीरलालजी की बात मान लें.
पीछे जाना मुश्किल हो सकता है. वर्तमान को ही समृद्ध करें….
“बहुत से चिट्ठाकारों के लेखन मे जबरदस्त बदलाव देखा है, अच्छा लिखने और अच्छे से लिखने का आग्रह बढा है. ”
तो अब, चिट्ठों को साहित्य कहा जाएगा कि नहीं? यह प्रश्न तो अभी बना हुआ है ना:)
हम तो कब से कह रहे है जी……आपकी इस बात में दम है …..”जडें तो मजबूत हैं निजभाषा की, खाद-पानी देना हमारा फ़र्ज़ है.”