मै चिट्ठे पर विज्ञापन लगाने का पक्षधर नहीं हूं – मेरी सोच मे -
- १. मै अपने विचार पाठको तक पहुंचाने के लिये चिट्ठा लिखता हूं. वो जो समय और स्नेह देते हैं वही पुरुस्कार है, वही सम्मान है. वे मुझे पढने के लिये साईडबार के एनिमेशन्स को क्यों झेलें? क्यों मेरे प्रचार के लिये यहां वहां “पसंद” “नापसंद” जैसे बटनों पर क्लिक करें?
- २. ब्लागलेखन मे आने वाले खर्चों का रोना यदि रोना हो तो ब्लागिंग छोड कर एक अदद साईड-जॉब कर लिया जाना चाहिए! कोई भी ब्लागिंग कर के किसी पर एहसान नही करता.
- ३. हम जो शो-केस कर रहे हैं, विज्ञापन उसके प्रस्तुतिकरण पर बुरा प्रभाव डालते हैं.
मै सोचता था, ओपन सोर्स की बलिहारी है – लिनक्स फ़्री का, अपाचे फ़्री का, पीएचपी फ़्री की, माए-सीक्वल फ़्री का, वर्डप्रेस फ़्री का, थीम्स भी फ़्री की! मात्र होस्टिंग का ही तो खर्च है – हमे चाहिए की हम अच्छा पढें, कोशिश हो कि अच्छा लिखें और हिन्दी के संसाधनो को मजबूत करें. विज्ञापन लगा कर साईट कुरूप क्यों करें?
हमारी सदेच्छाओं पर कुठाराघात किये गए. हमारी साईट अब से एक-डेढ साल पहले से हेक की जा चुकी थी – और हमारी कई फ़ाईलों के मेटा टैग्स के साथ छेडखानी(ऑब्स्फ़्यूकेशन) की गई थी कि वो गूगल रेंकिंग मे नीचे गिरती जाएं. हमारी भली कोशिशों के बाद भी, एक शौकिया चलाई जा रही साईट किसी की आंख में खटकती है – कोई अपना समय बरबाद करता है ये सब करने के लिये, सोच कर ही विधा से वितृष्णा होती है. मोहभंग होता है. क्यों किया, किसने किया? कोई हम मे से ही एक है – नाम मे क्या रखा है, जो किया गया, भारत से ही किया गया!
कभी हमारे फ़ोन नंबर्स को स्पूफ़ किया गया और हमारे नंबरों से ब्लागमंडल के लोगों को फ़ोन किये गए, कभी हमारी साईट्स को हैक किया गया, कभी अक्षरग्राम को विज्ञापनो से बचाने के लिये चंदे कि गुहार लगाने पर हम पर तोहमतें लगीं – कभी कुछ कभी कुछ! ये सब करने वालों की दिलचस्पी थी तो इसी ब्लागजगत मे ही ना! जिसके जो मूंह मे आया जब चाहा कहा! कुछ प्रकरणों मे तो लिटरली कुत्तों के समान भौंके हैं लोग – अनर्गल, किसी ने एक बार अपने ब्लाग पर अनूपजी पर हाथ उठाने की बात लिखी!
अभी ज्यादा दिन नही हुए कि जगदीश भाटिया जी द्वारा ध्यान मे लाए जाने पर मैने एक ब्लाग कंटेट चुराने वाले भारतीय छात्रों द्वारा बनाए जा रहे एग्रीगेटर की स्वयं फ़ोन कर के अमरीका मे रहने वाले उसके डामेन-ओनर से शिकायत की – तब जा कर कार्यवाही की गई! क्यों करते हैं हमारे ही लोग ये सब? उन लौंडे लपाडों का भी यही राग था की हम चुरा सकते हैं – सो हमने चुरा लिया – आप मूर्ख हैं जो अपने माल की सुरक्षा नही कर सके – चोरी फ़िर सीना जोरी! मुझे चोरी से ज्यादा उनकी बदतमीजी ने खिन्न किया था! क्या हश्र हुआ? आज अपने प्रोजेक्ट को कहीं और होस्ट करते होंगें! .. मै जान गया था कि किस स्थान से किया था उन्होने ये सब – किस युनिवर्सिटी के थे, सो बात करने मे समस्या नही थी. हर चीज की कोई हद होती है – गिरी हुई हरकतें करने की भी!
प्रश्न उठता है कि हम क्यों कर रहे हैं यह सब? किसी भी अच्छे प्रयास कि छिछलेदारी किये बिना देसी मन को चैन क्यों नही है? इतने परपीडक क्यों हैं हम?
इस प्रकार अनुभव मुझे और दूसरों को हिन्दी ब्लागजगत में रह कर हुए हैं. लोग छोड गए समूह! इन हरकतों के चलते मेरी प्रतिबद्धता कम तो नही हुई लेकिन मेरी खिन्नता बढी है – शिकायत करने के लिये कोई चेहरा नही है! टंकी पर चढ जाऊं? यहां सबसे पहले टंकी पर मै ही चढा था! और मुझे अनूपजी ने उतारा था! ये बात बहुत कम लोगों को पता है! उस पल का साक्षी पेज अब तक संभाला हुआ है! उससे विघ्नसंतोषियों और गिद्धचिंतकों को सुख ही मिलता है बस!
ये एक नापसंद बात थी कि जो समय मै अपने परिवार और बच्चों को देना चाहता था उस समय में, मैं हैक्ड फ़ाईलों कि मरम्मत कर रहा था! मेरी तकनीकी मदद के लिये आगे कौन आया – एक अमरीकी अंग्रेजीभाषी ओपन-सोर्स का पैरोकार! वैसे हां, उन्ही दिनो की बात है – इस दौरान ही हमारे समूह के लोग पहले ब्लागवाणी पर दोषारोपण में व्यस्त थे, फ़िर उनका रुदालीकरण हुआ अंतत: गंधर्व-किन्नरीकरण … बॉलीवुड स्ठॉयल बेबी!!
इस सब बातों का विज्ञापनों से क्या संबंध है? – संबंध गहरा है … मुझसे जीतू भाई कहते थे की एड लगा लो जो कमाई हो जाए तो हिन्दी भाषा के सहायतार्थ चलाए जा रहे किसी उपक्रम में भेज देना, वे स्वयं यही करते हैं. मै सोचता था कि ऐसा भी हम बिना एड के ही कर सकें तो और बेहतर होगा.
हालिया थुक्काफ़जीतियों और हैकिंग प्रकरणों से मै जितना क्षुब्ध हुआ उतना अधिक सम्मान उन लोगों के लिये उमडा जो निस्वार्थ ओपनसोर्स प्रोजेक्ट्स में सहयोग कर रहे हैं लोगो की मदद कर रहे हैं, सो, अलबत्ता मैने तय किया कि जिस व्यक्ति की बनाई थीम्स हम १.५-२ साल से मुफ़्त प्रयोग कर रहे थे और जो मेरी साईट को सजाने में निस्वार्थ मदद कर रहा था क्यों ना मै उस नेक आदमी के काम आऊं – क्यो ना उसकी थीम्स को क्रय करें हम या उसकी दानपेटी मे सहयोग करें! धन्यवादस्वरूप हमने यही किया, आगे भी ऐसे ही करने के लिये इसी विचार से एड लगा दिये! मेरे निर्णय को हमेशा की तरह गुरुदेव [अनूपजी] का पूरा सहयोग मिला. आगे भी यही करने का विचार है. वैसे भी भारतीय एड एजेंसियों के पब्लिशर प्लान्स बडे चूसू हैं और पुराने अकाऊंट्स को छोड, गूगल ने हिन्दी से किनारा कर लिया है.
हां ये एक ऎड्स एक सांकेतिक विरोध जरूर हैं, यही “पांच रुपैय्या बारा आना ” किसी हिंदी से जुडे काम मे आ सकता था – यदि हमारे समूह मे भी उठने और उठाने की वही भावना होती जो दूसरे समूहो मे पाई जाती है.
मेरे अपने सुधि पाठकों से भावनात्मक जुडाव के चलते ये एक दु:खद प्रकरण है! इसका किसी व्यवसायिकरण या प्रो-बुल्ल्शिट से कोई लेना देना नही है. शायद अच्छा हो कि निकट भविष्य में हम कुछ आनलाईन प्रोजेक्ट्स चला कर उन पे दानपेटी लगा दें. लेकिन फ़िलहाल जो है सो सामने है! मेरे विचार में जब तक समूह के तौर तरीके नही बदलेंगे कुछ नही होगा. – ना टूल्स, ना अनुप्रयोग, ना व्यवसायिकरण ना ही गैर ब्लागर पाठक समुदाय का गठन. ये ही सब चलता रहेगा.
मेरी पसंद:
गाली-गांव में हर छोटा-बडा स्त्री-पुरुष बहुत गंदी गंदी गालियां दे कर बात करता था.
पास गांव वालों को पता चला की इलाके में गांधीजी की सभा होने वाली है – वो गांधीजी के पास गए और बोले की आप अपनी सभा गाली-गांव मे कर लें. आपके कहने पे वे सुधर जाएंगे सो साथ ही उन्हे सभ्यता से पेश आने की नसीहत भी दे दें!
तो सभा गाली-गांव मे आयोजित हो गई. गांधी मंच पर बैठे. नीचे गाली-गांव वाले असभ्य गालीपूर्ण कोलाहल मे व्यस्त -
“ये बुड्ढा स्साला.. [बीप] का.. कहां से आगया”
“इस टकले की [बीप] [बीप] [बीप]”
हर तरफ़ [बीप] ही [बीप] चल रही थी..
मंच से गांधी जी बोलने का प्रयास करते ही रहे -
“देवियों और सज्जनों … मेरी प्रार्थना तो सुनिये….”
“भाईयो और बहनों… बडी खुशी हुई आप सब के बीच आ कर…”
मगर कोई कान ना धरे! अंतत: थक हार के गांधी जी जोर से बोले “सालों तुम्हारी भैन की … मै बस ये बोलने आया हूं कि गालीयाँ देना छोड दो!”
तो क्या यही सच है कि चाहे कितना ही चाहो अंतत: समूह का स्तर व्यक्ति के स्तर पर हावी हो ही जाता है! मुझे नही पता कि मेरे स्थान पर कोई और होता तो क्या सोचता और कैसे विरोध प्रकट करता. फ़िलहाल इस साईट के कुछ कोनों पर अब हम सब सामूहिक रूप से एड झेलेंगें. ओब्वियसली, खुन्नस में हूं!
शेष कुशल!






आपके विचार जानकर अच्छा लगा,
गाली-गाँव प्रकरण बहुत प्रेरक है!
पुराने ब्लॉग पर हमारे द्वारा कल भेजी गई टिप्पणियों को प्रकाशित किया जाय!
भीख माँगने से अच्छा है कि नहीं?
विज्ञापन मुझे भी अखरते है. हाल में अपने चिट्ठे पर लगाया है, यहाँ वहाँ, पोस्ट के बीच में फिर भी नहीं लगाया. क्यों लगाया? क्योंकि देखना था कितना कमाया जा सकता है. तो जवाब है सौ रूपैया मासिक. अब अफ्लातुन या विवादास्पद तो लिखते नहीं, अतः इतने से ही गुजारा करना होगा. कम से कम डूमेन का तो खर्च निकल आएगा.
वो किनारे में वर्डप्रेस के विज्ञापन तो शायद थीम के है. नहीं?
@संजय –
हां – एक क्लिक ना पडी उन थीम्स वालों पर आजतक ..वहां भी देसी विज्ञापन ही चेप देंगे!
मेरे कहने का तात्पर्य था कि मान लीजिये कोई ऐसी सेवा दे रहे हैं जो लोग पैसा देकर खरीदना भी पसंद करें. उत्साह बढाने के लिये लोग कॉन्ट्रीब्यूट करते हैं, और ऐसे जो कमाई हो उसे पहले से घोषित कर के किसी ट्रस्ट को दान दे दी जाए – ऐसे मे दानपेटी का औचित्य बनता है.
यदि किसी ट्रस्ट या नान-प्राफ़िट के सहायतार्थ क्रिकेट मैच खेले जा सकते हैं तो आनलाईन सेवा भी की जा सकती है. उल्लेखनीय है कि दुनिया की तमाम बडी-बडी युनिवर्सिटीज़ अपने पूर्वछात्रों द्वारा दिये गए अनुदानों पर करोडों में खेल रही हैं – बस हिंदी भाषा के कामों में ही दलिद्दर छाया हुआ है!
आपने फ़ोटो में बड़ा गुस्सैल किस्म का सांड लगाया है? क्या बात है…
बहरहाल, हमारे ब्लाग पर हम सब प्रकार के विज्ञापन लगाकर देख चुके आज तक एक पैसे की कमाई नहीं हुई उससे, अब तो जल्दी ही दानपेटी लगायेंगे, देखते हैं कि उधर से क्या आता है?
अब “दान” और “भीख” में क्या अन्तर है इस पर एक लम्बी बहस हो सकती है…।
वैसे यदि आपको पे-पाल के अलावा कोई और दानपेटी पता हो तो इस गरीब को खबर करें…
चित्र वाले सांड को जरा सौम्य बना सकते हों तो कोशिश कीजिये…
@ सुरेशजी, फिलहाल तो ऑनलाइन बैंक के खाते में पैसे डालवाये जा सकते है.
@ ई-स्वामी, बात सही कही, काम करने वालों को पैसा नहीं मिल रहा. मैने पिनाक के लिए दान (भीख कह लो, क्या फर्क पड़ेगा?
) पाने के लिए ब्लॉग तथा साइट पर विज्ञापन लगाया है. काम भी हो रहा है, मगर पैसे नहीं आ रहे.
पिनाक की बात निकली है तो आपको खुशी होगी, वर्डप्रेस 2.8 का हिन्दीकरण भी पूरा हो गया है. केवल अंतिम जाँच का काम चल रहा है.
युनिवर्सिटीज़ अपने पूर्वछात्रों द्वारा दिये गए अनुदानों पर करोडों में खेल रही हैं, यह जान कर अच्छा लगा. अगर आपने कहीं से कुछ पाया है तो देने लायक होने पर लौटाना भी चाहिए.
आपका चित्र चयन “सेंस” कमाल का है.
तो यह राज है हिन्दीनी पर विज्ञापन नजर आने का ! यकिन मानीये विज्ञापन देखने के बाद मै चकरा गया था ! चकराये कैसे नही विज्ञापनो के कारण ही तो हिन्दीनी से हमारे मामा ससुर की बिदायी हुयी थी
आशीष
बेंगाणी जी से सहमत, ऐसे अनोखे चित्र हमें नहीं मिलते…
जिन चिट्ठों को अधिक पढ़ा जाता है और जिन पर पुराने लेखों का बड़ा भंडार है जिन्हें पढ़ने के लिये बहुत से पाठक आते हैं उन्हें वे यह काम सहजता से कर सकते हैं।
महज हिन्दी की सेवा तो अपने ब्लाग बनाने का मकसद नहीं रहा है। हाँ हिन्दी भाषी भाइयों के साथ संवाद बनाए रखना और कुछ काम की बातें उन तक पहुँचाना मकसद रहा है। यदि इस काम को करते हुए केवल ब्लागिंग का खर्च विज्ञापन से निकल आए तो बुरा नहीं है। वैसे भी एक दो विज्ञापन यदि काम के हों तो किसी को झेलने नहीं पड़ते। मेरे दोनों ही ब्लागों पर एक एक विज्ञापन और सर्च बाक्स लगे हैं। कुछ डालर खाते में पड़े हैं। अब तक की ब्लागिंग से हिसाब लगाएँ तो महिने का एक डालर तो हो ही लेगा। फिर भी आप की बातें महत्वपूर्ण हैं।
आपके बात कहने का अंदाज का कायल हूँ….कभी कभी भाषा तल्ख़ हो जाती है ..पर भद्दी नहीं लगती .विचारो में स्पष्टता है .ओर कहने का साहस भी……ओर चित्र देखकर यही कहा जा सकता है की आपकी कम्पूटर से दोस्ती बरसो पुरानी है
सुबह से पोस्ट किया यह लेख अभी बांच पाये। ब्लागजगत में हर तरह के लोग हैं। जैसे दुनिया में होते हैं वैसे ही है। लोग न जाने क्या पाते हैं चिरकुट हरकतें करके। अपने को आगे बढ़ाने की बजाय दूसरे को पीछे घसीटने में ज्यादा मजा आता है।
जहां तक विज्ञापन की बात है तो बहुत दिन से किस्से सुन रहे हैं इसके। अब लग गया है तो इसके भी जलवे देख लिये जायें।
समूह से हरकतें प्रभावित होती हैं लेकिन समूह भी तो हम लोगों से ही बनते हैं। जो भी ओछी हरकतें करते हैं उनको यह समझ होनी चाहिये कि चाहे वे जितना छिपके छिपाके करें देर सबेर सबको पता चल ही जाता है। ऐसे में कभी -कभी खुद भी शर्मिंदगी जरूर होती है कि ये हरकतें हमारी ही की गयी हैं। लोग दूसरे को बेवकूफ़ बना सकते हैं लेकिन खुद को कैसे बनायेंगे और कब तक।
ये ससुरा अच्छा लिखने के चक्कर में तुम्हारी मालवी बिछड़ गयी है। सुलेमानी कीड़े, रायचंद, करमचंद सब न जाने कहां बिला गये।
काहे दुखी होते हो स्वामी जी. जब आपने विज्ञापन नहीं लगाये थे हम तब भी आपकी इज्ज़त करते थे और आज भी करते हैं. शिकायत करने वालों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए. ऐसे विज्ञापन जो पढ़ने में ज्यादा परेशान न करें ठीक हैं. सच बताऊँ तो मुझे कभी कभी विज्ञापन से काफी अच्छे सूत्र मिले हैं.
हाँ ये देख कर बड़ी तकलीफ हुई की आपको बड़ी तकलीफें झेलनी पड़ी कुछ मूर्खों के कारण. अब कुछ बढ़िया लिखे डालिए ज़रा. और एक छोटी पट्टी विज्ञापन की आर एस एस फीड में भी दाल दीजिये. हम आपको वहीँ पढ़ते हैं.
मेरे विचार तो इस विषय पर वही हैं, जो पहले भी व्यक्त कर चुका हूँ। पैसा कमाना बुरा नहीं है। बस चोरी मत करो, बेईमानी मत करो, किसी को धोखा मत दो। आप अब तक विज्ञापन नहीं लगा रहे थे, आप की मर्ज़ी। अब लगा रहे हैं, आप की मर्ज़ी। किसी को यह कहने का हक नहीं है कि आप वह क्यों कर रहे थे, या यह क्यों कर रहे हैं। न ही आप को किसी अन्य विज्ञापन लगाने वाले की नीयत पर उंगली उठानी चाहिए। अरे भाई कैपिटलिज़्म के गढ़ में बैठे ऐसी बातें क्यों कर रहे हो? कोई ज़रूरी नहीं कि आप इस कमाई को दान करें, पर करते हैं तो आप की मर्ज़ी।
दुख बस यह है कि हिन्दी से पैसा कमाया नहीं जा सकता, और खासकर हम जैसे अनाड़ियों द्वारा नहीं कमाया जा सकता।
कला की सफलता — चाहे लेखन की हो, चित्रकारी की हो, संगीत की हो, या कोई और — सदा पैसे से जुड़ी रही है। हाँ पहले गुणवत्ता आनी चाहिए फिर पैसे की चाह। आप अपने ब्लॉग पर लिख रहे हैं, पैसा कमाने की इच्छा नहीं रखते। पर यदि आप नव भारत टाइम्ज़ के लिए लिखते तो क्या तब भी पैसा लेने से मना करते? यदि फिल्मों के लिए लिखते तो क्या तब भी पैसा लेने से मना करते? इस कला और उस कला में क्या अन्तर है — यही न कि हमारी कला अभी उस स्तर की नहीं है? क्या प्रेमचन्द की हिन्दी सेवा में कुछ खोट थी, यदि वे लिखने का मेहनताना लेते थे और उसे दान नहीं करते थे? यदि आप बिक सकने वाली कला को कला नहीं समझते तो आप अल्पसंख्यक हैं। यह शौक आप का पार्ट-टाइम है या फुल टाइम, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?
मेरे विचार में समस्या यह नहीं है कि लोग हिन्दी से पैसा कमाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि यह कि हिन्दी से पैसा कमाना कठिन है। मुझे उस दिन का इन्तज़ार है जब हिन्दी ब्लॉगजगत में एक अमित अग्रवाल उपजे। विज्ञापन मसौदे पर छा न जाएँ तो पाठक को भी दिक्कत नहीं होती। यह आप के ऊपर है कि आप मसौदा ऐसा लिखें कि लोग विज्ञापन से खिन्न न हों।
ऊपर की टिप्पणी में कड़ी केवल “अमित अग्रवाल” की बनानी थी, पर अन्तिम दो पंक्तियों की बन गई। हो सके तो सही करें।
लो भई सारे विज्ञापनों पर क्लिक कर दिया। अगली बार फिर आउंगा तो फिर कर दूंगा। एक भाई फोकट की थीम बेच रहा था सो ले ली … फाकट की …. हें हें हें….
गांधी वाला चुटकला अरसे बाद फिर पढ़ कर मजा आया।