अत्याधुनिक बमों से मासूमों का सर फ़ोड-फ़ाड के ईसाई मिशनरीयों के हाथ बासी बेअसर मरहम लगवाने कि अमरीकी अदा नई नही है.
आज ओबामा की आस्तीन पर नोबल शान्ति पुरुस्कार का बिल्ला चमकाना एक कूटनीति जरूरत है अन्यथा इनके बढाए हाथों से कोई मरहम तो क्या जहर ना ले!
बुश थे स्वयं-भू “वॉर प्रेसिडेंट” और ओबामा हैं स्वयं-भू शान्तीदूत!
एक सोची समझी रणनीति के चलते ये वॉर-प्रेसिडेंट्स और शान्तीदूत अपनी अपनी बारी अपनी अपनी पारी खेलते रहते हैं. एक आता है बम बरसा जाता है दूसरा आता है “च्च्च् अले अले अले .. अंकल ने माला.. बहुत बुले हैं अंकल .. अच्छा लो मैं दवा लगा देता हूं”
किसी अमरीकी राष्ट्रपति को शान्ती के लिये नोबल पुरुस्कार दिये जाने से अधिक विसंगतिपूर्ण कुछ नही हो सकता. कौन बताता है हमें कि ओबामा उम्मीद की किरण हैं? कौन सिखाता है? कब बन गए ये शान्ती के मसीहा?
अमरीकी राजनीतिक परिदृश्य में ओबामा के पदार्पण से ले कर आज तक जिस प्रकार उन्हे मीडिया का सहयोग मिला है वो अभूतपूर्व है. एक अजनबी प्रत्याशी से ले कर एक सफ़ल राजनेता बनने की यात्रा बिना छवि प्रबंधन के पूरी कैसे हो. चुनाव के समय ओबामा को ६१ नोबल पुरुस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों का सहयोग प्राप्त था! – एक पूरी लॉबी सक्रीय थी. हॉलीवुड की सबसे पैसे वाली लॉबी भी थी इनके पीछे. ऐसे में शान्ती नोबल पुरुस्कार मिल चुकना क्या बडी चीज है? वैसे ओबामा के आ जाने से कोई कोई जमीनी हकीकत नही बदली है.
(याद दिला दूं कि केलिफ़ोर्निया में ऐसे ही शोर शराबे के साथ एरनाल्ड श्वॉज्नेगर आए थे – आज और अधिक बदहाली मे है पूरा राज्य!)
अब तक लगभग ७०% ट्विट्टर सदस्यों को ओबामा के चयन पर अचंभा हुआ है और वे इससे सहमत नही दिखते!
कोई कहता है कि पुरुस्कार समय से पहले मिला. यानी अगर वे अगले आठ साल बम ना बरसाते तो दिया जाना चाहिए था – चूंकि वे बरसा सकते होते और नही बरसाये होते तो अपने सर कि सलामती से खुश सब उन्हे पुरुस्कृत करते ही ना!
कोई कहता है कि वे इस पुरुस्कार के हकदार हैं. यानी वे बुश नही हैं – इस सिफ़त से ही उन्हे शान्ती के लिये नोबल पुरुस्कार दे दिया जाना बिल्कुल दुरुस्त है जी!
कोई कहता है कि ओबामा को पुरुस्कार दे कर नोबल पुरुस्कार कमेटी ने शान्ती पुरुस्कार पर जनता का ध्यान पा लेने का ध्येय अर्जित किया है. यानी इतना गये गुजरे थे जिन्हे पहले मिले ये पुरुस्कार!
कोई कुछ लिखता है कोई कुछ …जितने कीबोर्ड हैं उतने दृष्टीकोण हैं.
कीबोर्ड्स खडकते रहते हैं…उनकी नियति है!
चीख लें या धर लें मौन…चौधराहट जारी हैं.






भाग्य का धनी है बन्दा.
ये जो गोबर किया है नोबल प्राइज वालों ने, उसे पोंछना कठिन काम होगा।
बाकी, चौधराहट के चलते बिना धोये-पोंछें चलें, उनकी मर्जी!
चलो अच्छा हुआ… कुछ ज्यादा ही हाइप हो गए थे नोबेल पुरस्कार. इस गोबर से समझदार लोगों को नोबेल की असलियत समझ में आ जायेगी.
मुझे क्या मालूम था कि झक (मक्खी) मारने से नोबेल मिल जाता है ! हम तो कब का दावा ठोँक देते ! कम से कम १० नोबेल तो मिल ही जाते अब तक !
हो सकता है अब उन्हें बम बरसाने में स्वयं ही लज्जा आये, सोचेंगे मैं कैसा शान्तिपुरुष हूँ जो बम बरसाता हूँ ?
And the next noble for literature goes to “Mills and Boon”.
ये बोत गलत बात है जी. शांति का नोबल तो मनमोहन और कॉँग्रेस सरकार को मिलना चाहिए था. चीन पाकिस्तान आदि जितना मर्जी खून बहा लें, वे कुछ नहीं करते.