इलाहबाद: २३/२४ अक्तुबर – एक अस्सी साल के कलमघुसेडू द्वारा हिन्दी चिट्ठाकारी की अस्मिता के साथ बलात्कार! कई हंसते-खिलखिलाते बरिष्ठ चिट्ठाकार इस कृत्य में सहयोग करते पाए गए!
इलाहबाद में “हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया” नामक एक कार्यक्रम यानी ब्लाग संगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमे नामवर सिंह को मुख्य अतिथी बनाया गया. वहां हिन्दी चिट्ठाजगत के तमाम आम-खासियों/मुहल्लेवासियों/भडासियों/संडासियों/शाबासियों समेत रवि श्रीवास्तवजी और अनूप शुक्लाजी ने उछल-उछल कर शिरकत की. नामवर सिंह कोई चिट्ठाकार नहीं हैं बल्कि एक साहित्यकार हैं… ना न्ना ..अब तो वो भी नही, ये बस एक आलोचक मात्र हैं, आलोचना करते हैं –अब इस उम्र में कुछ और तो होना ही ना हुआ.. बैड आर्टिस्ट्स आर गुड क्रिटिक्स!
नामवर सिंह बिना पढे राय बनाने के लिये मशहूर हैं. वे चिट्ठे पढते ही नहीं हैं, उसके लिये कंप्यूटर होना चाहिए, और सर्फ़िग भी तो आना चाहिए! वे बस बिना पढे अंतर्दृष्टी से जानते हैं कि चिट्ठे कचरा होते हैं.
इस चिट्ठों को कचरा कहने वाले घोंघे [ नो पन इंटेंडेड] को बतौर मुख्य अतिथी हिन्दी चिट्ठाकारी की इस तथाकथिक राष्ट्रीय संगोष्ठी मे बुलाया गया, और वे नेट-गटर में तमाम कूडा-कचरा डालने वालों को सबक सिखाने पहुंचे! जनहित में की गई इसी प्रक्रिया में चिट्ठे को सबसे पहले ‘चिट्ठा’ कहने का श्रेय ले, उन्होंने हिन्दी चिट्ठाकारी का देवनागरी.नेट से बना आलोकित दुपट्टा नोच लिया .. इस कूल-एक्ट पर सभा मे सरकारी खर्च से उपस्थित सभी हिन्दी ब्लागर्स ने तालियां बजा कर उनका उत्साहवर्धन किया!
हिंदी चिट्ठाकारों के इस जमघट में ब्लागलेखन की विश्वसनीयता, लोकप्रियता और विधा के आधूनिक सोपानों के उदाहरणों की चर्चा बेमानी थी. इसलिये बुजुर्गवार अलोचक चिट्ठाकारों को को स्वतंत्रता और स्वछंदता का भेद ठीक वैसे ही देने लगे, जैसे किसी अश्लील फ़िल्म में मुश्टंडे नवयुतियों को उनकी स्वछंदता के लिये ‘दंड’ देते हैं! तत्पश्चात वे स्वछंद चिट्ठाकारी पर राज्य के हस्तक्षेप की संभावनाएं बता बता कर चिट्ठाकारों की पिछाडी लाल करते रहे .. “हू इज़्ज़ योर डैड्डी.. हु इज्ज योर डैड्डी”! चिट्ठाकार नॉट्टी नवयुवतियों के समान कराहे “ यू आर . यू आर” .. इस पर प्रसन्न हो कर वे चले गए. चिट्ठाकार अपनी लज्जा त्याग कर इस पूरे क्रियाकलाप का विवरण अपनी सखियों सहेलियों तक पहुंचाने मे जुट गए!
<—स्माईली!
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मैं जो कुछ इलाहबाद में हुआ उसका उन उत्साहित रिपोर्टों द्वारा पाठकों को जो इम्प्रेशन मिला वह और भी सटीक तरीके से उपरोक्त शैली में ही लिखता जा सकता था. मगर सोचता हूं की बस इशारा काफ़ी है!
बहुत पढा और पढता ही जा रहा हूं ..
अब सीधे प्रश्न पर आता हूं! क्या हिन्दी चिट्ठाकारी के लिये इससे दयनीय कुछ और हो सकता है? एक ऐसा नॉन-ब्लागर सब हिन्दी चिट्ठाकारों से सामूहिक रूप से एक मुख्य अतिथी के रूप में मुखातिब है और आप सबकी विधा का, ब्लागरी का वर्चुअल शीलहरण पूरे इत्मिनान से कर जाता है! वाट ए शेम! मान सकता हूं की वे ओहदों पर बैठे किन्ही के साथ अपने कनेक्शन्स के चलते वहां होंगे – लेकिन रिपोर्टें पढ कर यही दीखता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी की गरिमा सरेआम कुछ मुफ़्तखोरों कीए गद्दारी के चलते लुट गई और वे इसे अपने उपलब्धी मान कर घूम फ़िर आए!
ये तो मै जानता था कि रवि भाई और गुरुदेव अनूप शुक्ल दोनो सॉफ़्टी हैं – व्यंजल और मौज तक का लेखन! जब नामवर सिंह जैसे औचित्यहीन इंसान को बुलाए जाने पर प्रश्न करने की बारी आई, वहां से सटासट त्वरित रीपोर्टें भेजी जाने लगीं. जब उसकी बची जिंदगी के लिये चिट्ठाकारी पर बिलावजह आलोचनात्मक रवैये पालने पे दीदे खोलू हश्र दिखा कर उसे निपटाना था, बस दोनो हे-हे करने और फ़ोटो-ऑप में व्यस्त हो गए? चिट्ठाजगत के राजनीति का शिकार होने का भय कैसा जब विधा के प्रति वफ़ा दिखाने के समय पर ये किया आपने? किसी और से तो कभी उम्मीद भी नही रखी, पर ये क्या किया आपने? जो विधा आपको ये तमाम सैर सपाटे करवा रही है उसे कचरा कहने वाले आदमी के साथ मंच भी साझा कर आए? बॉस,तीन बार आपकी तरफ़ से चुल्लूभर आर.एस.एस. फ़ीड में डूबकी मार चुका हूं, जान है की पूरा लिखे बिना [और टिप्पणियां पढे बिना ऑफ़कोर्स] जाएगी नहीं! …तीस पर आप उसी आदमी को विधा सीखने के लिये लालयित बता रहे हैं?
<—नॉट सो स्माईली!
लेकिन उस समय बाकियों ने भी क्या किया? किसी एक की जुबां नही खुली कि चिट्ठाकारी को कचरा कहने वाला एक नान-ब्लागर यहां क्या कर रहा है? कैसे आप उस आदमी को बर्दाश्त कर सके? कभी हिन्दी चिट्ठाकारी पर राजेन्द्र यादव को कटाक्ष को झेला जाता है, कभी हिन्दी भाषा के विकास को लेकर मंगलेश डबरवाल के घृष्टकथनों को और रही सही ये नामवर सिंह पूरी करते रहे हैं – फ़िर भी … हिन्दी ब्लागिंग के इतने सालों के बाद.. और तकनीकी पृष्ठभूमी से आने वाले हम जैसे लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद, आज भी एक आम भारतीय हिंदी का ब्लागर तथाकथित साहित्यकारो की पिछाडी धो कर अचमन करता फ़िरता है! फ़िर और फ़िर इन्हे बुलावे भेजे जाते हैं! नाक कटवा ली? अपनी भी और विधा की भी!
और फ़िर उसके बाद क्या करते हो आप सारे मिल के? बेनामी टिप्पणीकारों पे अपनी बेजारीयों का रोना रोते दोपहरिया सोप-ऑपेरा चलाते रहते हो? अपने चिट्ठों का खडे हो कर बखान करते हो और आपस में एक दूसरे की छिछलेदारी- फ़िर चाय मिली या नही.. एसी रूम मिला या मच्छरवाला कमरा इस पर बाकी सब को झिलवाते रहते हो! शाब्बाश मेरे जिगर के छल्लों.. शाब्बाश! बहुत बढिया!!
<—एक और स्माईली
रही सही कसर खत्म नही हुई – कुछ टिप्पणियों के जरिये चमचागिरी मे व्यस्त हो गए हैं ताकी अगली बार का जुगाड जम जाए! जीओ बेटा जीओ!
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और जो नहीं पहुंचे वो क्या कर रहे हैं? सबसे पहले सुरेश चिपलूनकर – अपना गैर जिम्मेदाराना रवैया छोडो और सही मुद्दों पर आओ!
चाहे वो ब्लागवाणी का कुछ समय के लिये अनुपलब्ध होना रहा हो, या सरकारी खर्च पे इलाहबाद में हुआ ये नया हिन्दी चिट्ठाकारी गुडगोबरीकरण कार्यक्रम; दोनो पर सुरेश की प्रतिक्रियाएं उनके हिन्दुत्ववादी होने की तरफ़ इशारा नही करती बल्कि उनके हिन्दूत्वमेनिया के शिकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. हिन्दुत्ववादी होना और हिन्दूत्वमेनिया का शिकार होना दो अलग-अलग माईंड सेट हैं! मुझे तो ये लगने लगा है कि अपने आप पर हिन्दूत्ववादी होने का लेबल लगा कर कोई भी सुरेश से अपने पक्ष में लेखन करवा सकता है. खुद को टाईपकास्ट करवालेने का सीधा फ़ायदा ये है कि आपको एक खास पाठकवर्ग तैयार मिल जाता है. वहीं इसका नुकसान ये है कि आप अपने इसी खास पाठक वर्ग की अपेक्षाओं के बंधुआ हो गए. सही या गलत!
सुरेश को दूसरी बीमारी है “जंपिंग द गन” की! आपको भी याद होगा कि ब्लागवाणी के कुछ समय अनुपलब्ध होने पर भी आपकी[सुरेश से मुखातिब हूं] शिकायत थी तथाकथित वरिष्ठ चिट्ठाकार चुप्पी साधे बैठे थे. हम मे से कई लोग कोशिश करते हैं कि अधकचरी और अधूरी या एकतरफ़ा जानकारी के आधार पर कोई प्रतिक्रिया ना जताएं और मेरे विचार में समय से पहले प्रतिक्रिया दे देना ही है “जंपिंग द गन”.. इस बार फ़िर आपने वही किया है – यू जंप्ड द गन! अगेन!!
आपने एक चिट्ठाकार से चैट की, उनके विचार जाने और मात्र उस आधार पर एक लंबी चौडी पोस्ट लिख मारी -“हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों से परहेज, नामवर सिंह का आतंक और सैर-सपाटा यानी इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन…” शीर्षक पढ कर लगा की आप इलाहबाद से लिख रहे थे . अन्यथा आप जैसे, एक जिम्मेदार और तथ्यपरक ब्लागर को, दुनिया कि हर किसी घटना में, हिन्दूविचारधारा-विरोधी साजिशें नजर आने लगें, और वो, बेधडक, इस पर मय बोल्ड-इटालिक्स-अण्डरलाईन्स लिखने लगें तो मेरे जैसे पाठकों का चौंकना स्वाभाविक है. [चाहे वो ब्लागवाणी का तब अनुपलब्ध होना हो या प्रमेन्द्र के आत्मालाप पर तुम्हारी प्रतिक्रिया] ना तो वो कोई ब्लाग सम्मेलन ही था, उप्पर से बुजुर्गवार नामवर सिंह की दांत-आंतविहीन तस्वीरें देखीं? सिरिमान्जी तो अब जाऊं, की तब जाऊं हो रहे हैं. उनका आतंक कैसा? किस बात पर छोडा गया उन्हें? इसी पर की ये तो कभी भी टें बोल देगा .. उम्र का लिहाज ही था ना! .. फ़िर भी छोडा नही जाना चाहिए था – वो भी जब वो कॉम्मी सब को राज्य के अधिकारों पे झिलवा गया. उस पर ना लिख कर, इतना प्रो-हिन्दु-गैरजरूरी बवाल लेखन? हद्द है! हर वक्त हर मुद्दे को हिन्दूत्ववाद बनाम दूसरे का मुद्दा बनाना छोडो! बडी कोफ़्त होती है!

सुरेश, आपसे पहले और आपके अलावा, एक चिट्ठाकार के रूप में कईयों ने इलाहबाद मे हुए कार्यक्रम पर अपने अपने तरीके से प्रतिक्रियाएं जताईं – वहां पहुंचने वाले, घर से लिखने वाले .. सब लिखे.. हम बांचे, सबको बांचे! कहीं कोई टिप्पणी की? नही! ये सब कुछ पढ कर प्रतिक्रिया ना करने वालों का और संयत प्रतिक्रियाएं करने वालों का प्रतिशत कितना अधिक है! ये सत्य आपके लिये अनपेक्षित क्यों होता है?
आप चुप तो नही रहे, लेकिन जिस तरह से आपने लिखा, आपने नोटिस किया आपके इस लेख की प्रतिक्रिया में क्या हुआ? आपके अपने चिट्ठे पर दूसरों की छीछलेदारी करतीं छद्मनामों से टिप्पणियां आने लगीं – कई टिप्पणीकारों के प्रोफ़ाईल पेज नादारद हैं. और उनके अलावा आप स्वयं अनजाने में उन जाने-पहचाने ट्रॉल्स- जी हां ट्रॉल्स (उन्हे चिट्ठाकार कहना चिट्ठाकारी का अपमान है) को बढावा देने लगे जिनसे हिन्दी चिट्ठाजगत पहले ही त्रस्त है. आपने अपने लेख में कई प्रश्न किये हैं. मेरा आपसे ये प्रश्न है कि बताईये आपके इस लेख से क्या बदल गया?
आप चाहे उपेक्षाप्रूफ़ हों लेकिन आपकी उकसाव-तत्परता और त्वरित-प्रतिक्रियाएं दर्शनीय हो जाती है! देखिये मैने आपकी उपेक्षा नहीं की ये लिखने के लिये कि आप भी कभी कभी अपने हित में और अपने पाठकों के हित में ऐसी घटनाओं की उपेक्षा किया कीजीये!
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स्वनामधन्य ब्लागर्स द्वारा नामवर सिंह का विरोध ना किया जाना और सुरेश के लेख की वजह से लिखा जो लिखा. इससे पहले मैने कभी इस प्रकार के आयोजनों पर ना प्रतिक्रिया ही की और ना ही इन का कोई महत्व ही माना! हमेशा पूरी उपेक्षा ही की!
मेरी निगाह मे इन आयोजनों से विधा का एक पैसे का फ़ायदा नही होता, हां कुछ पोडियम प्रेमियों की खुजली जरूर शान्त हो लेती है. ये मुद्दा बस एक मात्र मुद्दा है- हिन्दी चिट्ठाकारों के और वो भी भारतीय हिन्दी चिट्ठाकारों के आत्मविश्वास का मुद्दा! कोई भी पोडियम प्रेमी जो हिन्दी चिट्ठाकारी का असम्मान करने वाले के साथ मंच बांटता है उसे संदेश है कि चुप्पी को मौन समर्थन ना समझा जाए. हमारी अनुपस्थिती में आपको इन नामवरों द्वारा अपने लेखन और विधा का शीलहरण करवाना है तो करवाते रहें हां जिन्होंने इस कुकृत्य के लिये आपके आने जाने और बिस्तर का खर्च दिया है उन्हें मेरे इस लेख की लिंक जरूर थमा दें, यदि गलती से भी हम जैसा कोई बिना बुलाए टपक गया तो उन्हे लेने के देने पड जाएंगे!
कभी आप चिट्ठाकारी के लिये संपादकों और साहित्यकारों का वरदहस्त ढूंढने चल पडते हैं. कभी आप इसमे त्वरित और स्वतंत्र पत्रकारिता के पुट खोजने लग पडते हैं. आज पांच साल बाद आप डिफ़ाईन करने कि कोशिश करने लग पडते हैं कि ब्लाग के लिये चिट्ठा अच्छा शब्द है या नही! कभी किसी समाचार पत्र में एक उल्लेख को तरसते ..अपनी शक्ति का कोई आभास है आपको?!
जिस बात का सबसे ज्यादा जिक्र होना चाहिए था उनमे से एक थी अभय कि फ़िल्म .. ए ट्रू मल्टीमीडिया एफ़्फ़र्ट ..उसे तो तकरीबन हाशिये पर ही डाल दिया गया – जो एक चिट्ठाकार का जमीनतोडू काम थी! अभय आपको सलाम.
अन्यथा आप सब ने नामवर के साथ मंच बांट कर सामूहिक रूप से स्वयं के सथ जो होने दिया है शब्दातीत है?






दूर तक देखूं तो लगता है कि हर नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की ऑथेरिटी की जरूरत तो पड़ती ही है। उन लोगों के लिए यह अधिक मुश्किल का समय होता है जो इस संक्रमण काल से गुजर रहे हैं।
जहां तक ताकत को पहचानने की बात है, उसमें अभी लम्बा समय और सतत प्रयासों की जरूरत है। अब भी बहुत से नियमित ब्लॉगर ऐसे हैं जो गंभीर लिखने की बजाय ऐसा लिखना अधिक उपयुक्त मानते हैं जो धारा में है। इस बीच अगर कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर ब्लॉगिंग न करने वाले वरिष्ठ साहित्यकारों के पास उस ऑथेरिटी को ढूंढ़ते हैं तो उसमें कुछ गलती नहीं दिखाई देती।
यहां समस्या स्थाई भाव की है। किस चीज को पकड़कर कहेंगे, कि हम आगे बढ़ गए हैं।
एक नया रास्ता शुरू किया हिन्दी ब्लॉगिंग का, यानि अंग्रेजी में लेखन और सार्वभौमिक स्वीकृति से दूर एक अलग टापू बना लिया। अब यहां कौन देख रहा है, कौन समझ रहा है, किसे पढ़ने की पड़ी है। नितांत अकेलापन घबराहट पैदा करता है।
ऐसा नहीं है कि साहित्यकारों के साथ ऐसा नहीं होता। एक बार हरीश भादाणीजी के बारे में एक आलोचक ने टिप्पणी की कि वे अपनी कविताओं के दृश्य माइथोलॉजी में ढूंढते हैं, फिर उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा जरूरी भी है, क्योंकि एक स्तर पर पहुंचकर साहित्यकार भी अकेला पड़ जाता है और वहां वेद और पुराण ही उसकी सहायता कर पाते हैं। हिन्दी ब्लॉगरी अभी उस ऊंचाई तक तो नहीं पहुंची कि वेद और पुराणों में रूपकों को खोजकर अपना आगे का रास्ता तय करे लेकिन एक पीढ़ी पुरानी ऑथेरिटी की सहायता लेने की छूट तो मिलनी ही चाहिए।
यह कुछ ऐसी स्थिति है जब आपको ऐसा निर्णय लेना हो जो आपको अज्ञात भविष्य की ओर लेकर जा रहा हो और आप अपने पिता या अग्रज से कोई सलाह मांगे। भले ही बाद में करें अपने मन की ही लेकिन निर्णय में आंशिक या पूर्ण रूप से आपको भागीदार मिल जाता है, कई बार विरोध के रूप में भी।
आपकी पोस्ट पढ़कर लगा कि चिठ्ठाकारी सम्मेलन में भी यही देखने को मिला। अब आगे का रास्ता बन रहा है… आपकी सोच के अनुरूप हम एक दिन अपने इंडिपेंडेंट रूट पर होंगे, तब कोई नई विधा आएगी और वह भी हमसे आगे के रास्ते के लिए सहायता मांगेगी… मुझे विश्वास है उस पीढ़ी को भी ई स्वामी का आशीर्वाद मिलेगा…
स्वामीजी, तुम्हारा लेख यहीं है। हमारी टिप्पणी भी और बाकी टिप्पणियां भी। इससे अधिक और कुछ नहीं कहना मुझे। कुछ दिन बाद इसे फ़िर पढ़ना। तब शायद यह समझने की स्थिति में हो कि तुम्हें अपने लिखने का मतलब और हमारे एतराज का मतलब समझ में आ जाये। इस बीच हो सके तो नामवर जी के बारे में भी पढ़ लेना। अपने जन्नत नशीं दादाजी की बात भी फ़िर से याद कर लेना कि दुनिया में दो तरह के आदमी होते हैं-रायचंद और करमचंद। उसी लाइन पर कभी करमचंद बनकर इस तरह का कार्यक्रम करवाना। फ़िर उसके बारे में अपनी राय बताना। फ़िर हम बतायेंगे कि उसमें क्या-क्या चिरकुटईयां तुमने कीं। हम शायद बेहतर बता सकें क्योंकि उस समय हम सिर्फ़ रायचंद होंगे।
एक बात और अगर समझ सको तो समझना कि दुनिया में दो चीजों की तुलना करने में आप अक्सर वही पाते हैं जो आप तुलना के पहले ही तय कर चुके होते हैं।
अफ़सोस इस बात का तुमको अभी भी यह अंदाजा नहीं लग रहा कि एक व्यक्ति सरासर गलत बातों का उदाहरण देते हुये अपनी बात कहता है। उसका तुम विरोध करते हो और वह आकर तुमसे कहता है कि तुमने वही कहा जो वह कहना चाहता था। अगर ऐसा है तो कहीं न कहीं चूक है कहने में। अगर चूक न होती तो जिसका तुम विरोध करने की बात कह रहे हो वह कम से कम यह न कह पाता कि तुमने उसकी ही बात कही।
बाकी ये जो जुमले हैं:
कुछ दिनो में मेरा चिट्ठा नादारद दिखे तो अचरज मत करना!
लिखने की तुम्हारी उमर चली गयी। ये सब लोग शुरुआत के दिनों में लिखते हैं ताकि लोग उनको दुलराने/मनाने लगें। तुमको इन चोंचलों की कब से जरूरत पड़ गयी?
आपके जाँबाज तेवर गुरु चेला संपर्क बनाये रखने के लिए ठंडाते नजर आ रहे हैं आपके अनूप जी को दिये जबाब में. क्या दबाब्व आपको सता रहा है. संपर्क का ही ? तो फिर संपर्क स्थापित करने के लिए की गई उनकी सम्मेलन में हे हे…और आपके नन्दी बन दरवाजे पर बैठ जाने वाली हे हे में अंतर कहाँ रहा? यही करना था तो फिर सुबह यह सब तामझाम क्या नाम कमाने के लिए फैलाया था या सनसनी पैदा करने के लिए. आपकी आचमन करने की अदा भी उनके आचमन करने की अदा से कम नहीं लगी. यह देखने के बाद मेरे मन पर आज ही निर्मित आपकी जाँबाजी छबि तुरन्त ही धूमिल हो गई. आईंदा आपको पढ़ने से बचना होगा वरना मैं कोई गलत निर्णय न ले बैठूं, आप तो बाद में नन्दी बन बैठ जाओगे.
कुछ सोचो और रीढ़ की हड्डी सीधे रखना सीखो, अगर है तो वरना स्टील सपोर्ट को रीढ़ की हड्डी जैसा तो न ही दिखाओ
@राधे: आप बिल्कुल मुझे पढने से बचिये! वरना मुझे आपको यहां बेनामी टिप्पणियां करने से बचाना होगा -अगली बार अपनी रीढ लगा के अपने आईपी से टिपिया लेना मुन्ना! (…चले आते है!)
@गुरुदेव: ये लेख भी यहीं रहेगा और चुनौती स्वीकार है. ज्यादा समय नहीं लेंगे और इस अलख को जगाए रखने से अलावा और भी कुछ ठोस काम का आपके सामने आ जाएगा – वो सरकारी खर्च पर, मुख्य अतिथी बन अपनी बलन इकट्ठा करने से बेहतर और तफरीह मारने से काम का करम ही होगा ये भी वादा रहा!
हम गैर-राजनैतिक चिट्ठाकारो का मनोबल किसी साहित्य-फाहित्य के ठेकेदार के अनुमोदन का गुलाम नही, हां पोडियम प्रेमीयो का होता होगा, हूआ करे!
अब रही बात नामवर के बारे में पढने कि, जितना पढना समझना था समझ लिया, सब लिखने से पहले फिर – जो कहना था स्पष्ट कह भी दिया, वो भी तब लिखा जब इन नपुंसक मीट्स्-फीट्स् के बचकाने ब्यौरे सात समन्दर पार बैठे बांचने असहनीय हो चुके. मेरे एक ही लेख “साहित्य वो बासी चिट्ठा होता है जो कागज पर प्रकाशित होता है” ने जो अलख जगाई थी उसकी लौ आज और ऊंची है – अभी तो हिन्दी अकादमियो तक ये चिंघाड गूंजी है, कल के कचरा कहने वाले आज समूह् में चमचे जुगाडने बुलावे देते फिरते है – आगे आगे देखिये क्या होता है!
मैंने भी इस छद्मनाम से वो करने का प्रण किया है जो किसी नामवर ने नही किया होगा! फिर आग और औगढियो को किससे द्वेष? नाग और नागा को किससे राग? मोह गया माया मिटी मनवा बेपरवाह! अलख निरंजन!
DEAR e-SVAMI ,
It is really shocking to know that u r making up mind to quit hindi blogging. if it happens it would be the saddest episode in this just begun journey of hindi blogging. u have always led from the front and it is definitely not the time to say quits. pls. stay and and don’t let the bastards overcome your constructive and creative spirit. your prose is razor sharp , don’t let it go blunt pls.
Munish
प्रिय ईस्वामी ,
आपकी यह प्रतिक्रिया संयत नहीं लगी और दुख हुआ .
इलाहाबाद में आयोजित चिट्ठाकारी पर केन्द्रित उस सेमीनार में भाग लेने वाले ब्लॉगरों में मैं भी एक था . गाड़ी का टाइम ऐसा था कि उद्घाटन सत्र में शामिल नहीं हो सका . पर २३ की दोपहर से लेकर २४ को शाम ०४-१५ तक मन-मिजाज पूरी तरह चिट्ठाकारी में ही रमा रहा . तीनों सत्रों में ठीक-ठाक बात-चीत हुई . जिस सत्र में मेरी भागीदारी थी उसमें मसिजीवी, गिरिजेश राव, विनीत कुमार, डॉ. अरविंद मिश्र, हेमंत, हिमांशु पांडेय और हिमांशु रंजन ये सात वक्ता थे सभी ने दस से पन्द्रह मिनट के समय में अपने चुने हुए विषय पर अपनी बात रखी .
भूपेन, रियाजुल हक, मनीष, मनीषा पांडेय, संजय तिवारी और अफ़लातून इन छह वक्ताओं ने पांच-पांच मिनट में अपनी त्वरित टिप्पणियां कीं . यहां तक कि अन्त में अमिताभ त्रिपाठी ने दो मिनट का समय मांगा और भाषा पर अपनी कविता प्रस्तुत की . इरफ़ान ने अपने प्रभावी संयोजन से इसे बांधे रखा .
इस खाकसार ने अपने वक्तव्य में ईस्वामी को भी याद किया और कहा कि जैसा लेखन अनामदास, सृजनशिल्पी, ईस्वामी और घुघुती बासुती जैसे छद्मनामी कर रहे हैं, आधे ब्लॉगरों को वैसा लिखने के लिए एक जन्म और लेना पड़ेगा .
तो यह तो हुआ दूसरे दिन के पहले सत्र का विवरण जिसे मैं विस्तार से प्रत्येक वक्ता के मुख्य विचार के साथ जल्दी ही ब्लॉग पर रखूंगा . फिलहाल आपकी प्रतिक्रिया पर कुछ बातें . पहली तो यह कि आपकी प्रतिक्रिया सुनी-सुनाई/दूसरों की लिखी-लिखाई बातों पर आधारित है . और कार्यक्रमों की रपट भी देखता रखता हूं पर जैसी और जितनी ’सब्जेक्टिव’ और ’कलर्ड’ रिपोर्ट इस कार्यक्रम की ब्लॉग जगत पर देखी, वैसी और कहीं नहीं . जो नहीं आए या आ सके उनका कारण समझ में आता है . पब्लिक मनी का उनका सामयिक दर्द भी समझने योग्य है . पर जो इलाहाबाद आए और वहां मुंडी हिला-हिला कर गदगदायमान हो रहे थे लौट कर उन्हें किस कीड़े ने काट लिया यह समझ के बाहर है .
आपकी इस पोस्ट के बारे में रवि रतलामी और अनूप सुकुल बहुत कुछ कह ही गये हैं उसमें मेरी भी सहमति मानिएगा . आपकी इस पोस्ट के बारे में कहूंगा — ईस्वामी ऐट हिज़ ’फूहड़’ बेस्ट . बाकी आप अच्छे गद्य लेखक हैं , अपना मर्दाना गद्य लिखते रहिये . ये जाने-छोड़ देने की ’नॉन सेंस’ औरों के लिये छोड़ दीजिए . आपका चुनौती स्वीकार करने का राजपूती अन्दाज़ बहुत अच्छा और संभावनामय लगा .
Dear e-Svami,
Not even professional prose writers can match ur skill and still u r inactive for so many days , thats not good bhai .
इलाहाबाद संगोष्ठी पर कुछ रिपोर्ट पहले पढ़ चूका हूँ. बहुत ज्यादा खुश या प्रभावित इसलिए नहीं था की, शामिल मेम्बरानो ने अपने अपने ब्लॉग पर इसकी चर्चा अपने मन माफिक की थी.
यहाँ दो बाते कहना चाहूँगा,
१, आज के समय में ब्लॉग एज में कोई भी कहीं भी हिंदी चिट्ठकारी सम्बंधित आयोजन कर सकता है. ये एक प्रकार से अच्छा ही कहलायेगा. निर्भर करता है परिणामों पर और आगंतुकों की सोच और जिम्मेदारियों पर.
२. यहाँ कोई मठाधीश नहीं है, ये तो तय है. हर सौ पचास की भीड़ में कोई एक है जो सशक्त नेतृत्व की क्षमता रखता है और जिम्मेदारी (जिम्मेदार हो यह जरुरी भी नहीं है. क्योंकि यदि बात आयोजन भर की है?) लेने की बात करता है. उनका मनोबल भी उंचा इसलिए है की उन्हें सुनने, पढने वाले, उनके आयोजन में शामिल होने वालों की कोई कमी भी नहीं है.
निष्कर्ष यही है की जब आप भी नेतृत्व करेंगे या कुछ ऐसा कदम उठाएंगे. आप अपने आप को भी क्षमतावान महसूस करेंगे. ये आपकी चिट्ठाकारी सेवा ही है जो बहुतो को सोचने हेतु बाध्य कर रहा है. आप अपना काम करते जाए. दिशाएँ भी खुद तय हो जायेंगी.
रही बात साहित्य की. ये तो एक कला वर्ग(हाँ अन्य कलाओं से इतर इसका प्रभाव बौद्धिक और चेतनामय ज्यादा होता है) का ही हिस्सा है. सृजन कैसे होता है और कैसे पल्लवित होता है ये काल पर निर्भर करता है. कभी कागज़ का काल सशक्त था तो आज यह भी दिख रहा है की आने वालों दिनों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ही सशक्त होगा. उस समय ब्लोगिंग (चिट्ठाकारी) को कौन नकार सकता है. रही बात हिंदी भाषा और हिंदी चिट्ठाकारी(जो अपने आप में आज का सशक्त साहित्य है) को लेकर- ये इंडिया है. भाषाओं पर आक्षेप चलता रहेगा. तथाकथित अधिसासियों और मठाधीशों के बीच जंग चलती रहेगी. वैसे ज्यादातर पाठक उसी को अपना आदर्श मानेंगे जो सच लिखने का साहस रखते हैं. फिर हम लेखकों (चिट्ठाकारों) को ख़ुशी भी उन्ही सुधि, सत्यान्वेषी और सहृदयी पाठकों से मिलती है. दुःख तब होगा जब आप गिनती करने लग जाएँ.
- सुलभ जायसवाल ‘सतरंगी’