58 Comments

  1. सिद्धार्थ जोशी

    दूर तक देखूं तो लगता है कि हर नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की ऑथेरिटी की जरूरत तो पड़ती ही है। उन लोगों के लिए यह अधिक मुश्किल का समय होता है जो इस संक्रमण काल से गुजर रहे हैं।
    जहां तक ताकत को पहचानने की बात है, उसमें अभी लम्‍बा समय और सतत प्रयासों की जरूरत है। अब भी बहुत से नियमित ब्‍लॉगर ऐसे हैं जो गंभीर लिखने की बजाय ऐसा लिखना अधिक उपयुक्‍त मानते हैं जो धारा में है। इस बीच अगर कुछ वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर ब्‍लॉगिंग न करने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों के पास उस ऑथेरिटी को ढूंढ़ते हैं तो उसमें कुछ गलती नहीं दिखाई देती।

    यहां समस्‍या स्‍थाई भाव की है। किस चीज को पकड़कर कहेंगे, कि हम आगे बढ़ गए हैं।

    एक नया रास्‍ता शुरू किया हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का, यानि अंग्रेजी में लेखन और सार्वभौमिक स्‍वीकृति से दूर एक अलग टापू बना लिया। अब यहां कौन देख रहा है, कौन समझ रहा है, किसे पढ़ने की पड़ी है। नितांत अकेलापन घबराहट पैदा करता है।

    ऐसा नहीं है कि साहित्‍यकारों के साथ ऐसा नहीं होता। एक बार हरीश भादाणीजी के बारे में एक आलोचक ने टिप्‍पणी की कि वे अपनी कविताओं के दृश्‍य माइथोलॉजी में ढूंढते हैं, फिर उन्‍होंने यह भी कहा कि ऐसा जरूरी भी है, क्‍योंकि एक स्‍तर पर पहुंचकर साहित्‍यकार भी अकेला पड़ जाता है और वहां वेद और पुराण ही उसकी सहायता कर पाते हैं। हिन्‍दी ब्‍लॉगरी अभी उस ऊंचाई तक तो नहीं पहुंची कि वेद और पुराणों में रूपकों को खोजकर अपना आगे का रास्‍ता तय करे लेकिन एक पीढ़ी पुरानी ऑथेरिटी की सहायता लेने की छूट तो मिलनी ही चाहिए।

    यह कुछ ऐसी स्थिति है जब आपको ऐसा निर्णय लेना हो जो आपको अज्ञात भविष्‍य की ओर लेकर जा रहा हो और आप अपने पिता या अग्रज से कोई सलाह मांगे। भले ही बाद में करें अपने मन की ही लेकिन निर्णय में आंशिक या पूर्ण रूप से आपको भागीदार मिल जाता है, कई बार विरोध के रूप में भी।

    आपकी पोस्‍ट पढ़कर लगा कि चिठ्ठाकारी सम्‍मेलन में भी यही देखने को मिला। अब आगे का रास्‍ता बन रहा है… आपकी सोच के अनुरूप हम एक दिन अपने इंडिपेंडेंट रूट पर होंगे, तब कोई नई विधा आएगी और वह भी हमसे आगे के रास्‍ते के लिए सहायता मांगेगी… मुझे विश्‍वास है उस पीढ़ी को भी ई स्‍वामी का आशीर्वाद मिलेगा…

  2. अनूप शुक्ल

    स्वामीजी, तुम्हारा लेख यहीं है। हमारी टिप्पणी भी और बाकी टिप्पणियां भी। इससे अधिक और कुछ नहीं कहना मुझे। कुछ दिन बाद इसे फ़िर पढ़ना। तब शायद यह समझने की स्थिति में हो कि तुम्हें अपने लिखने का मतलब और हमारे एतराज का मतलब समझ में आ जाये। इस बीच हो सके तो नामवर जी के बारे में भी पढ़ लेना। अपने जन्नत नशीं दादाजी की बात भी फ़िर से याद कर लेना कि दुनिया में दो तरह के आदमी होते हैं-रायचंद और करमचंद। उसी लाइन पर कभी करमचंद बनकर इस तरह का कार्यक्रम करवाना। फ़िर उसके बारे में अपनी राय बताना। फ़िर हम बतायेंगे कि उसमें क्या-क्या चिरकुटईयां तुमने कीं। हम शायद बेहतर बता सकें क्योंकि उस समय हम सिर्फ़ रायचंद होंगे।

    एक बात और अगर समझ सको तो समझना कि दुनिया में दो चीजों की तुलना करने में आप अक्सर वही पाते हैं जो आप तुलना के पहले ही तय कर चुके होते हैं।

    अफ़सोस इस बात का तुमको अभी भी यह अंदाजा नहीं लग रहा कि एक व्यक्ति सरासर गलत बातों का उदाहरण देते हुये अपनी बात कहता है। उसका तुम विरोध करते हो और वह आकर तुमसे कहता है कि तुमने वही कहा जो वह कहना चाहता था। अगर ऐसा है तो कहीं न कहीं चूक है कहने में। अगर चूक न होती तो जिसका तुम विरोध करने की बात कह रहे हो वह कम से कम यह न कह पाता कि तुमने उसकी ही बात कही।

    बाकी ये जो जुमले हैं:
    कुछ दिनो में मेरा चिट्ठा नादारद दिखे तो अचरज मत करना! :)

    लिखने की तुम्हारी उमर चली गयी। ये सब लोग शुरुआत के दिनों में लिखते हैं ताकि लोग उनको दुलराने/मनाने लगें। तुमको इन चोंचलों की कब से जरूरत पड़ गयी?

  3. राधेश्याम

    आपके जाँबाज तेवर गुरु चेला संपर्क बनाये रखने के लिए ठंडाते नजर आ रहे हैं आपके अनूप जी को दिये जबाब में. क्या दबाब्व आपको सता रहा है. संपर्क का ही ? तो फिर संपर्क स्थापित करने के लिए की गई उनकी सम्मेलन में हे हे…और आपके नन्दी बन दरवाजे पर बैठ जाने वाली हे हे में अंतर कहाँ रहा? यही करना था तो फिर सुबह यह सब तामझाम क्या नाम कमाने के लिए फैलाया था या सनसनी पैदा करने के लिए. आपकी आचमन करने की अदा भी उनके आचमन करने की अदा से कम नहीं लगी. यह देखने के बाद मेरे मन पर आज ही निर्मित आपकी जाँबाजी छबि तुरन्त ही धूमिल हो गई. आईंदा आपको पढ़ने से बचना होगा वरना मैं कोई गलत निर्णय न ले बैठूं, आप तो बाद में नन्दी बन बैठ जाओगे.

    कुछ सोचो और रीढ़ की हड्डी सीधे रखना सीखो, अगर है तो वरना स्टील सपोर्ट को रीढ़ की हड्डी जैसा तो न ही दिखाओ

  4. munish

    DEAR e-SVAMI ,
    It is really shocking to know that u r making up mind to quit hindi blogging. if it happens it would be the saddest episode in this just begun journey of hindi blogging. u have always led from the front and it is definitely not the time to say quits. pls. stay and and don’t let the bastards overcome your constructive and creative spirit. your prose is razor sharp , don’t let it go blunt pls.
    Munish

  5. प्रियंकर

    प्रिय ईस्वामी ,

    आपकी यह प्रतिक्रिया संयत नहीं लगी और दुख हुआ .

    इलाहाबाद में आयोजित चिट्ठाकारी पर केन्द्रित उस सेमीनार में भाग लेने वाले ब्लॉगरों में मैं भी एक था . गाड़ी का टाइम ऐसा था कि उद्घाटन सत्र में शामिल नहीं हो सका . पर २३ की दोपहर से लेकर २४ को शाम ०४-१५ तक मन-मिजाज पूरी तरह चिट्ठाकारी में ही रमा रहा . तीनों सत्रों में ठीक-ठाक बात-चीत हुई . जिस सत्र में मेरी भागीदारी थी उसमें मसिजीवी, गिरिजेश राव, विनीत कुमार, डॉ. अरविंद मिश्र, हेमंत, हिमांशु पांडेय और हिमांशु रंजन ये सात वक्ता थे सभी ने दस से पन्द्रह मिनट के समय में अपने चुने हुए विषय पर अपनी बात रखी .

    भूपेन, रियाजुल हक, मनीष, मनीषा पांडेय, संजय तिवारी और अफ़लातून इन छह वक्ताओं ने पांच-पांच मिनट में अपनी त्वरित टिप्पणियां कीं . यहां तक कि अन्त में अमिताभ त्रिपाठी ने दो मिनट का समय मांगा और भाषा पर अपनी कविता प्रस्तुत की . इरफ़ान ने अपने प्रभावी संयोजन से इसे बांधे रखा .

    इस खाकसार ने अपने वक्तव्य में ईस्वामी को भी याद किया और कहा कि जैसा लेखन अनामदास, सृजनशिल्पी, ईस्वामी और घुघुती बासुती जैसे छद्मनामी कर रहे हैं, आधे ब्लॉगरों को वैसा लिखने के लिए एक जन्म और लेना पड़ेगा .

    तो यह तो हुआ दूसरे दिन के पहले सत्र का विवरण जिसे मैं विस्तार से प्रत्येक वक्ता के मुख्य विचार के साथ जल्दी ही ब्लॉग पर रखूंगा . फिलहाल आपकी प्रतिक्रिया पर कुछ बातें . पहली तो यह कि आपकी प्रतिक्रिया सुनी-सुनाई/दूसरों की लिखी-लिखाई बातों पर आधारित है . और कार्यक्रमों की रपट भी देखता रखता हूं पर जैसी और जितनी ’सब्जेक्टिव’ और ’कलर्ड’ रिपोर्ट इस कार्यक्रम की ब्लॉग जगत पर देखी, वैसी और कहीं नहीं . जो नहीं आए या आ सके उनका कारण समझ में आता है . पब्लिक मनी का उनका सामयिक दर्द भी समझने योग्य है . पर जो इलाहाबाद आए और वहां मुंडी हिला-हिला कर गदगदायमान हो रहे थे लौट कर उन्हें किस कीड़े ने काट लिया यह समझ के बाहर है .

    आपकी इस पोस्ट के बारे में रवि रतलामी और अनूप सुकुल बहुत कुछ कह ही गये हैं उसमें मेरी भी सहमति मानिएगा . आपकी इस पोस्ट के बारे में कहूंगा — ईस्वामी ऐट हिज़ ’फूहड़’ बेस्ट . बाकी आप अच्छे गद्य लेखक हैं , अपना मर्दाना गद्य लिखते रहिये . ये जाने-छोड़ देने की ’नॉन सेंस’ औरों के लिये छोड़ दीजिए . आपका चुनौती स्वीकार करने का राजपूती अन्दाज़ बहुत अच्छा और संभावनामय लगा .

  6. munish

    Dear e-Svami,
    Not even professional prose writers can match ur skill and still u r inactive for so many days , thats not good bhai .

  7. Sulabh Satrangi

    इलाहाबाद संगोष्ठी पर कुछ रिपोर्ट पहले पढ़ चूका हूँ. बहुत ज्यादा खुश या प्रभावित इसलिए नहीं था की, शामिल मेम्बरानो ने अपने अपने ब्लॉग पर इसकी चर्चा अपने मन माफिक की थी.

    यहाँ दो बाते कहना चाहूँगा,
    १, आज के समय में ब्लॉग एज में कोई भी कहीं भी हिंदी चिट्ठकारी सम्बंधित आयोजन कर सकता है. ये एक प्रकार से अच्छा ही कहलायेगा. निर्भर करता है परिणामों पर और आगंतुकों की सोच और जिम्मेदारियों पर.
    २. यहाँ कोई मठाधीश नहीं है, ये तो तय है. हर सौ पचास की भीड़ में कोई एक है जो सशक्त नेतृत्व की क्षमता रखता है और जिम्मेदारी (जिम्मेदार हो यह जरुरी भी नहीं है. क्योंकि यदि बात आयोजन भर की है?) लेने की बात करता है. उनका मनोबल भी उंचा इसलिए है की उन्हें सुनने, पढने वाले, उनके आयोजन में शामिल होने वालों की कोई कमी भी नहीं है.

    निष्कर्ष यही है की जब आप भी नेतृत्व करेंगे या कुछ ऐसा कदम उठाएंगे. आप अपने आप को भी क्षमतावान महसूस करेंगे. ये आपकी चिट्ठाकारी सेवा ही है जो बहुतो को सोचने हेतु बाध्य कर रहा है. आप अपना काम करते जाए. दिशाएँ भी खुद तय हो जायेंगी.

    रही बात साहित्य की. ये तो एक कला वर्ग(हाँ अन्य कलाओं से इतर इसका प्रभाव बौद्धिक और चेतनामय ज्यादा होता है) का ही हिस्सा है. सृजन कैसे होता है और कैसे पल्लवित होता है ये काल पर निर्भर करता है. कभी कागज़ का काल सशक्त था तो आज यह भी दिख रहा है की आने वालों दिनों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ही सशक्त होगा. उस समय ब्लोगिंग (चिट्ठाकारी) को कौन नकार सकता है. रही बात हिंदी भाषा और हिंदी चिट्ठाकारी(जो अपने आप में आज का सशक्त साहित्य है) को लेकर- ये इंडिया है. भाषाओं पर आक्षेप चलता रहेगा. तथाकथित अधिसासियों और मठाधीशों के बीच जंग चलती रहेगी. वैसे ज्यादातर पाठक उसी को अपना आदर्श मानेंगे जो सच लिखने का साहस रखते हैं. फिर हम लेखकों (चिट्ठाकारों) को ख़ुशी भी उन्ही सुधि, सत्यान्वेषी और सहृदयी पाठकों से मिलती है. दुःख तब होगा जब आप गिनती करने लग जाएँ.

    - सुलभ जायसवाल ‘सतरंगी’

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