इलाहबाद: २३/२४ अक्तुबर – एक अस्सी साल के कलमघुसेडू द्वारा हिन्दी चिट्ठाकारी की अस्मिता के साथ बलात्कार! कई हंसते-खिलखिलाते बरिष्ठ चिट्ठाकार इस कृत्य में सहयोग करते पाए गए!
इलाहबाद में “हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया” नामक एक कार्यक्रम यानी ब्लाग संगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमे नामवर सिंह को मुख्य अतिथी बनाया गया. वहां हिन्दी चिट्ठाजगत के तमाम आम-खासियों/मुहल्लेवासियों/भडासियों/संडासियों/शाबासियों समेत रवि श्रीवास्तवजी और अनूप शुक्लाजी ने उछल-उछल कर शिरकत की. नामवर सिंह कोई चिट्ठाकार नहीं हैं बल्कि एक साहित्यकार हैं… ना न्ना ..अब तो वो भी नही, ये बस एक आलोचक मात्र हैं, आलोचना करते हैं –अब इस उम्र में कुछ और तो होना ही ना हुआ.. बैड आर्टिस्ट्स आर गुड क्रिटिक्स!
नामवर सिंह बिना पढे राय बनाने के लिये मशहूर हैं. वे चिट्ठे पढते ही नहीं हैं, उसके लिये कंप्यूटर होना चाहिए, और सर्फ़िग भी तो आना चाहिए! वे बस बिना पढे अंतर्दृष्टी से जानते हैं कि चिट्ठे कचरा होते हैं.
इस चिट्ठों को कचरा कहने वाले घोंघे [ नो पन इंटेंडेड] को बतौर मुख्य अतिथी हिन्दी चिट्ठाकारी की इस तथाकथिक राष्ट्रीय संगोष्ठी मे बुलाया गया, और वे नेट-गटर में तमाम कूडा-कचरा डालने वालों को सबक सिखाने पहुंचे! जनहित में की गई इसी प्रक्रिया में चिट्ठे को सबसे पहले ‘चिट्ठा’ कहने का श्रेय ले, उन्होंने हिन्दी चिट्ठाकारी का देवनागरी.नेट से बना आलोकित दुपट्टा नोच लिया .. इस कूल-एक्ट पर सभा मे सरकारी खर्च से उपस्थित सभी हिन्दी ब्लागर्स ने तालियां बजा कर उनका उत्साहवर्धन किया!
हिंदी चिट्ठाकारों के इस जमघट में ब्लागलेखन की विश्वसनीयता, लोकप्रियता और विधा के आधूनिक सोपानों के उदाहरणों की चर्चा बेमानी थी. इसलिये बुजुर्गवार अलोचक चिट्ठाकारों को को स्वतंत्रता और स्वछंदता का भेद ठीक वैसे ही देने लगे, जैसे किसी अश्लील फ़िल्म में मुश्टंडे नवयुतियों को उनकी स्वछंदता के लिये ‘दंड’ देते हैं! तत्पश्चात वे स्वछंद चिट्ठाकारी पर राज्य के हस्तक्षेप की संभावनाएं बता बता कर चिट्ठाकारों की पिछाडी लाल करते रहे .. “हू इज़्ज़ योर डैड्डी.. हु इज्ज योर डैड्डी”! चिट्ठाकार नॉट्टी नवयुवतियों के समान कराहे “ यू आर . यू आर” .. इस पर प्रसन्न हो कर वे चले गए. चिट्ठाकार अपनी लज्जा त्याग कर इस पूरे क्रियाकलाप का विवरण अपनी सखियों सहेलियों तक पहुंचाने मे जुट गए!
<—स्माईली!
*_*_*
मैं जो कुछ इलाहबाद में हुआ उसका उन उत्साहित रिपोर्टों द्वारा पाठकों को जो इम्प्रेशन मिला वह और भी सटीक तरीके से उपरोक्त शैली में ही लिखता जा सकता था. मगर सोचता हूं की बस इशारा काफ़ी है!
बहुत पढा और पढता ही जा रहा हूं ..
अब सीधे प्रश्न पर आता हूं! क्या हिन्दी चिट्ठाकारी के लिये इससे दयनीय कुछ और हो सकता है? एक ऐसा नॉन-ब्लागर सब हिन्दी चिट्ठाकारों से सामूहिक रूप से एक मुख्य अतिथी के रूप में मुखातिब है और आप सबकी विधा का, ब्लागरी का वर्चुअल शीलहरण पूरे इत्मिनान से कर जाता है! वाट ए शेम! मान सकता हूं की वे ओहदों पर बैठे किन्ही के साथ अपने कनेक्शन्स के चलते वहां होंगे – लेकिन रिपोर्टें पढ कर यही दीखता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी की गरिमा सरेआम कुछ मुफ़्तखोरों कीए गद्दारी के चलते लुट गई और वे इसे अपने उपलब्धी मान कर घूम फ़िर आए!
ये तो मै जानता था कि रवि भाई और गुरुदेव अनूप शुक्ल दोनो सॉफ़्टी हैं – व्यंजल और मौज तक का लेखन! जब नामवर सिंह जैसे औचित्यहीन इंसान को बुलाए जाने पर प्रश्न करने की बारी आई, वहां से सटासट त्वरित रीपोर्टें भेजी जाने लगीं. जब उसकी बची जिंदगी के लिये चिट्ठाकारी पर बिलावजह आलोचनात्मक रवैये पालने पे दीदे खोलू हश्र दिखा कर उसे निपटाना था, बस दोनो हे-हे करने और फ़ोटो-ऑप में व्यस्त हो गए? चिट्ठाजगत के राजनीति का शिकार होने का भय कैसा जब विधा के प्रति वफ़ा दिखाने के समय पर ये किया आपने? किसी और से तो कभी उम्मीद भी नही रखी, पर ये क्या किया आपने? जो विधा आपको ये तमाम सैर सपाटे करवा रही है उसे कचरा कहने वाले आदमी के साथ मंच भी साझा कर आए? बॉस,तीन बार आपकी तरफ़ से चुल्लूभर आर.एस.एस. फ़ीड में डूबकी मार चुका हूं, जान है की पूरा लिखे बिना [और टिप्पणियां पढे बिना ऑफ़कोर्स] जाएगी नहीं! …तीस पर आप उसी आदमी को विधा सीखने के लिये लालयित बता रहे हैं?
<—नॉट सो स्माईली!
लेकिन उस समय बाकियों ने भी क्या किया? किसी एक की जुबां नही खुली कि चिट्ठाकारी को कचरा कहने वाला एक नान-ब्लागर यहां क्या कर रहा है? कैसे आप उस आदमी को बर्दाश्त कर सके? कभी हिन्दी चिट्ठाकारी पर राजेन्द्र यादव को कटाक्ष को झेला जाता है, कभी हिन्दी भाषा के विकास को लेकर मंगलेश डबरवाल के घृष्टकथनों को और रही सही ये नामवर सिंह पूरी करते रहे हैं – फ़िर भी … हिन्दी ब्लागिंग के इतने सालों के बाद.. और तकनीकी पृष्ठभूमी से आने वाले हम जैसे लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद, आज भी एक आम भारतीय हिंदी का ब्लागर तथाकथित साहित्यकारो की पिछाडी धो कर अचमन करता फ़िरता है! फ़िर और फ़िर इन्हे बुलावे भेजे जाते हैं! नाक कटवा ली? अपनी भी और विधा की भी!
और फ़िर उसके बाद क्या करते हो आप सारे मिल के? बेनामी टिप्पणीकारों पे अपनी बेजारीयों का रोना रोते दोपहरिया सोप-ऑपेरा चलाते रहते हो? अपने चिट्ठों का खडे हो कर बखान करते हो और आपस में एक दूसरे की छिछलेदारी- फ़िर चाय मिली या नही.. एसी रूम मिला या मच्छरवाला कमरा इस पर बाकी सब को झिलवाते रहते हो! शाब्बाश मेरे जिगर के छल्लों.. शाब्बाश! बहुत बढिया!!
<—एक और स्माईली
रही सही कसर खत्म नही हुई – कुछ टिप्पणियों के जरिये चमचागिरी मे व्यस्त हो गए हैं ताकी अगली बार का जुगाड जम जाए! जीओ बेटा जीओ!
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और जो नहीं पहुंचे वो क्या कर रहे हैं? सबसे पहले सुरेश चिपलूनकर – अपना गैर जिम्मेदाराना रवैया छोडो और सही मुद्दों पर आओ!
चाहे वो ब्लागवाणी का कुछ समय के लिये अनुपलब्ध होना रहा हो, या सरकारी खर्च पे इलाहबाद में हुआ ये नया हिन्दी चिट्ठाकारी गुडगोबरीकरण कार्यक्रम; दोनो पर सुरेश की प्रतिक्रियाएं उनके हिन्दुत्ववादी होने की तरफ़ इशारा नही करती बल्कि उनके हिन्दूत्वमेनिया के शिकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. हिन्दुत्ववादी होना और हिन्दूत्वमेनिया का शिकार होना दो अलग-अलग माईंड सेट हैं! मुझे तो ये लगने लगा है कि अपने आप पर हिन्दूत्ववादी होने का लेबल लगा कर कोई भी सुरेश से अपने पक्ष में लेखन करवा सकता है. खुद को टाईपकास्ट करवालेने का सीधा फ़ायदा ये है कि आपको एक खास पाठकवर्ग तैयार मिल जाता है. वहीं इसका नुकसान ये है कि आप अपने इसी खास पाठक वर्ग की अपेक्षाओं के बंधुआ हो गए. सही या गलत!
सुरेश को दूसरी बीमारी है “जंपिंग द गन” की! आपको भी याद होगा कि ब्लागवाणी के कुछ समय अनुपलब्ध होने पर भी आपकी[सुरेश से मुखातिब हूं] शिकायत थी तथाकथित वरिष्ठ चिट्ठाकार चुप्पी साधे बैठे थे. हम मे से कई लोग कोशिश करते हैं कि अधकचरी और अधूरी या एकतरफ़ा जानकारी के आधार पर कोई प्रतिक्रिया ना जताएं और मेरे विचार में समय से पहले प्रतिक्रिया दे देना ही है “जंपिंग द गन”.. इस बार फ़िर आपने वही किया है – यू जंप्ड द गन! अगेन!!
आपने एक चिट्ठाकार से चैट की, उनके विचार जाने और मात्र उस आधार पर एक लंबी चौडी पोस्ट लिख मारी -“हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों से परहेज, नामवर सिंह का आतंक और सैर-सपाटा यानी इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन…” शीर्षक पढ कर लगा की आप इलाहबाद से लिख रहे थे . अन्यथा आप जैसे, एक जिम्मेदार और तथ्यपरक ब्लागर को, दुनिया कि हर किसी घटना में, हिन्दूविचारधारा-विरोधी साजिशें नजर आने लगें, और वो, बेधडक, इस पर मय बोल्ड-इटालिक्स-अण्डरलाईन्स लिखने लगें तो मेरे जैसे पाठकों का चौंकना स्वाभाविक है. [चाहे वो ब्लागवाणी का तब अनुपलब्ध होना हो या प्रमेन्द्र के आत्मालाप पर तुम्हारी प्रतिक्रिया] ना तो वो कोई ब्लाग सम्मेलन ही था, उप्पर से बुजुर्गवार नामवर सिंह की दांत-आंतविहीन तस्वीरें देखीं? सिरिमान्जी तो अब जाऊं, की तब जाऊं हो रहे हैं. उनका आतंक कैसा? किस बात पर छोडा गया उन्हें? इसी पर की ये तो कभी भी टें बोल देगा .. उम्र का लिहाज ही था ना! .. फ़िर भी छोडा नही जाना चाहिए था – वो भी जब वो कॉम्मी सब को राज्य के अधिकारों पे झिलवा गया. उस पर ना लिख कर, इतना प्रो-हिन्दु-गैरजरूरी बवाल लेखन? हद्द है! हर वक्त हर मुद्दे को हिन्दूत्ववाद बनाम दूसरे का मुद्दा बनाना छोडो! बडी कोफ़्त होती है!

सुरेश, आपसे पहले और आपके अलावा, एक चिट्ठाकार के रूप में कईयों ने इलाहबाद मे हुए कार्यक्रम पर अपने अपने तरीके से प्रतिक्रियाएं जताईं – वहां पहुंचने वाले, घर से लिखने वाले .. सब लिखे.. हम बांचे, सबको बांचे! कहीं कोई टिप्पणी की? नही! ये सब कुछ पढ कर प्रतिक्रिया ना करने वालों का और संयत प्रतिक्रियाएं करने वालों का प्रतिशत कितना अधिक है! ये सत्य आपके लिये अनपेक्षित क्यों होता है?
आप चुप तो नही रहे, लेकिन जिस तरह से आपने लिखा, आपने नोटिस किया आपके इस लेख की प्रतिक्रिया में क्या हुआ? आपके अपने चिट्ठे पर दूसरों की छीछलेदारी करतीं छद्मनामों से टिप्पणियां आने लगीं – कई टिप्पणीकारों के प्रोफ़ाईल पेज नादारद हैं. और उनके अलावा आप स्वयं अनजाने में उन जाने-पहचाने ट्रॉल्स- जी हां ट्रॉल्स (उन्हे चिट्ठाकार कहना चिट्ठाकारी का अपमान है) को बढावा देने लगे जिनसे हिन्दी चिट्ठाजगत पहले ही त्रस्त है. आपने अपने लेख में कई प्रश्न किये हैं. मेरा आपसे ये प्रश्न है कि बताईये आपके इस लेख से क्या बदल गया?
आप चाहे उपेक्षाप्रूफ़ हों लेकिन आपकी उकसाव-तत्परता और त्वरित-प्रतिक्रियाएं दर्शनीय हो जाती है! देखिये मैने आपकी उपेक्षा नहीं की ये लिखने के लिये कि आप भी कभी कभी अपने हित में और अपने पाठकों के हित में ऐसी घटनाओं की उपेक्षा किया कीजीये!
*_*_*
स्वनामधन्य ब्लागर्स द्वारा नामवर सिंह का विरोध ना किया जाना और सुरेश के लेख की वजह से लिखा जो लिखा. इससे पहले मैने कभी इस प्रकार के आयोजनों पर ना प्रतिक्रिया ही की और ना ही इन का कोई महत्व ही माना! हमेशा पूरी उपेक्षा ही की!
मेरी निगाह मे इन आयोजनों से विधा का एक पैसे का फ़ायदा नही होता, हां कुछ पोडियम प्रेमियों की खुजली जरूर शान्त हो लेती है. ये मुद्दा बस एक मात्र मुद्दा है- हिन्दी चिट्ठाकारों के और वो भी भारतीय हिन्दी चिट्ठाकारों के आत्मविश्वास का मुद्दा! कोई भी पोडियम प्रेमी जो हिन्दी चिट्ठाकारी का असम्मान करने वाले के साथ मंच बांटता है उसे संदेश है कि चुप्पी को मौन समर्थन ना समझा जाए. हमारी अनुपस्थिती में आपको इन नामवरों द्वारा अपने लेखन और विधा का शीलहरण करवाना है तो करवाते रहें हां जिन्होंने इस कुकृत्य के लिये आपके आने जाने और बिस्तर का खर्च दिया है उन्हें मेरे इस लेख की लिंक जरूर थमा दें, यदि गलती से भी हम जैसा कोई बिना बुलाए टपक गया तो उन्हे लेने के देने पड जाएंगे!
कभी आप चिट्ठाकारी के लिये संपादकों और साहित्यकारों का वरदहस्त ढूंढने चल पडते हैं. कभी आप इसमे त्वरित और स्वतंत्र पत्रकारिता के पुट खोजने लग पडते हैं. आज पांच साल बाद आप डिफ़ाईन करने कि कोशिश करने लग पडते हैं कि ब्लाग के लिये चिट्ठा अच्छा शब्द है या नही! कभी किसी समाचार पत्र में एक उल्लेख को तरसते ..अपनी शक्ति का कोई आभास है आपको?!
जिस बात का सबसे ज्यादा जिक्र होना चाहिए था उनमे से एक थी अभय कि फ़िल्म .. ए ट्रू मल्टीमीडिया एफ़्फ़र्ट ..उसे तो तकरीबन हाशिये पर ही डाल दिया गया – जो एक चिट्ठाकार का जमीनतोडू काम थी! अभय आपको सलाम.
अन्यथा आप सब ने नामवर के साथ मंच बांट कर सामूहिक रूप से स्वयं के सथ जो होने दिया है शब्दातीत है?
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आशानुरुप खरा खरा सीधा संवाद बिना लाग लपेट..सलाम!!
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“हे-हे करने और फ़ोटो-ऑप…..” बस यही हुआ सचमुच !
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शुरुआत में तो हम जान ही न पाए कि ये वही नामवर सिंह हैं चिट्ठोँ को कचरा कहने वाले हम समझे हमारे अज्ञातवास के दौरान कोई भारी चिट्ठाकार उभरे हैं. हम फुरसतिया से पूछे भी इस बारे क्योंकि हम कल्पना नहीं कर सकते थे कि ये वही कचरा नामदेवा सिंह हैं.
इन महाशय ने हिंदी चिट्ठाकारी के लिए किया क्या है कोई बताए?
इस आयोजन का मुख्य अतिथि आलोक को क्यों नहीं बनाया गया जो कि हमारी बिरादरी के भीष्म पितामह हैं, पंकज अक्षरग्राम संस्थापक, जीतू नारद संचालक, रविरतलामी सैकड़ों को हिंदी चिट्ठाजगत का रास्ता दिखाने वाले, मैथिली जी ब्लॉगवाणी संचालक, जगदीप दांगी जी, देबू दा इंडीब्लॉगीज संस्थापक, अमित गुप्ता परिचर्चा संचालक और ग्लोबल वॉयसिज पर हिंदी की अलख जगाने वाले, बालेँदु प्रभासाक्षी संपादक, बेँगाणी बंधु, रमण कौल यूनीनागरी टूल वाले, हिंदी टूलकिट वाले हिमांशु या फिर हरिराम जी और नारायण प्रसाद जी जैसे हिंदी कंप्यूटिँग के विद्वान. क्या हिंदीजगत से सुपात्रोँ की कमी थी. मोबाइल के कीपैड पर हाथ थक गया है वरना अभी 20-30 और बताता.
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(जारी…)
लेकिन इन लोगों को बनाते तो सरकारी ग्रांट ना मिलती शायद वो तो वामपंथी मठाधीश साहित्यकारों को डैडी बनाने से ही मिलती है न.
सुरेश जी की आपत्तियाँ भी जायज हैं बस वे भावावेश में इसे हिँदुत्व से जोड़ रहे हैं, हाँ साहित्य में वामपंथी मठाधीशी को लेकर उनके विचारों से सहमत हूँ.
और देखिए इस आयोजन में वक्ता कौन थे हिंदी चिट्ठाजगत में ट्रॉल्लिँग के जन्मदाता लोग.
कुल मिलाकर हिंदी चिट्ठोँ को कचरा कहने वाली जमात ने देखा कि इनकी ताकत बढ़ रही है तो डैडी बनने आ गए, इधर चिट्ठाकार तो माण्डवाली के लिए तैयार बैठे ही थे.
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सुरेश चिपलूनकर जैसे, एक जिम्मेदार और तथ्यपरक ब्लागर .nice
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@shrish मुझे बताया जा रहा है कि स्वयं नामवर सिंह ही कार्यक्रम के आयोजक/प्रायोजक थे और वे खुद मुख्य अतिथी बन बैठे! नाऊ हाऊ कूल इज़ दैट! कल तक कचरा कहो …जब पता चला कि बिग बी भी ब्लागर भए हैं तो खरच-उरच करो और हिन्दी वालों मे अपने भी दो चार चमचे कबाड लो!
ये भी, कि वैसे उनकी भूमिका मुख्य अतिथी बन कर अपनी सौम्य कम्युनिस्ट शैली में चिट्ठाकारों को अंकुश/पाबंदियों आदी के बारे में चमकाने से अधिक नही थी अत: वे सभी को बहुत भले लगे!
और ये भी भई ये सरकारी कार्यक्रम था.ऐसे में आमंत्रण का आधार, पोडियम संभालने वालों का ज्ञान, कार्यक्रम का अजेण्डा, वर्कशॉप का फ़ोकस एरिया, प्रबंधन की गुणवत्ता आदि विषयों के बारे में कोई भी प्रश्न भूल से भी नही पूछना होता है!
.. बस जो बताया जा रहा है उस पर मुग्ध च पुलकित भये रहो!
इस पर अगर कुछ कहोगे तो सुनने को मिलेगा कि आप तो वहां थे नही … सो आपको क्या पता! जय हो!!
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स्वामी जी,
अब तो इलाहाबादी चिक-चिक बंद होनी ही चाहिये। जब आग लगेगी तो धुआं तो उठेगा ही, और ऑख से ऑसू भी निकलनेगे। सहमति और असहमति का दौर तो हमेशा चलता रहता है, कार्यक्रम बहुत से पहलू से जिनसे सहमत नही होया जा सकता है किन्तु जरूरी नही है कि हर समय असमति प्रकट की ही जाये।
जहाँ तक आपने मेरे आत्मालाप का जिक्र किया है तो बताना चाहूँगा, कुछ ब्लागो पर पढ़ा कि ब्लागरो निमत्रण दिया गया था ऐसा मुझे कुछ भी प्राप्त नही हुआ था, निश्चित रूप से दु:ख होना स्वाभाविक ही होगा कि आपके शहर में कार्यक्रम और आपको ही न बुलाया जाये। तब पर भी कार्यक्रम में दो दो दिन उपस्थिति दर्ज की। यह उपस्थित निमत्रण से हट कर व्यक्तिगत सम्बन्धो पर था यही बात रही कि श्री शिद्धार्थ जी से मैने फोन बात की और अपनी शंकाओ निराकरण करवाया। अत: मेरे सम्बन्ध यह धारणा त्याग दे कि आत्मालाप हुआ हो, आप भी अपने आपको रखिये तो पायेगे कि आप भी बिना बुलाये कहीं नही जायेगे।
जहाँ तक सुरेश जी का प्रश्न है आप मै और सुरेश जी तब से साथ साथ है जब हम लोग गिनी हुई संख्या मे थे, 2006-07 की घटनाऐं याद है तो पता हूँ कि आपने भी बहुत बात कुछ ब्लागरों के समर्थन में मोर्चा खोला था जो कि अक्षरग्राम समूह से जुडे थे। उसी प्रकार सुरेश जी ने स्वयं कहा है कि महाशक्ति के साथ उनका भावात्मक सम्बन्ध है, इसे तो मै स्वीकार भी करता हूँ, भले ही मायाजाल पर मै टिप्पणी न करूँ किन्तु मायाजाल से अलग मै भी नही हूँ।
यह ब्लागरों का विषय है वह चिट्ठाकारी में वामपंथ को स्वीकार करे या न करे उन्हे चर्चा करने का पूरा अधिकार है, जो व्यक्ति चिट्ठाकारी को को गाली देता हो उसे हम अध्यक्षता करवाये कम से कम यह तो मै भी स्वीकार नही करूँगा। यह हमारा वैचारिक मतभेत है मनभेद नही, आयोजको के समक्ष यह विषय रहा होगा कि जहाँ से पंडि़ग हो रही है उसका सम्मान भी जरूर है और आयोजको ने यह किया । यह विरोध इसलिये है कि भविष्य में कभी ऐसा न हो कि जिसे ब्लागर खुद आत्मसात न कर सके उसे न बुलाया जाय।
हितं च मनोहरि च दुर्लभं वचः के साथ आपने कमेन्ट को समाप्त करूँगा।
[Reply]
Mr. e -Swami i share your concerns and it really does hurt when i see that people like you who have been the pioneers of this field are being ignored . I also thank you for raising the issue in a befittingly blunt manner. it is high time by all means to call a spade a spade . Every effort must be made to save Hindi blogging from being hi-jacked by the coterie of mischievous and malicious few.
[Reply]
पोस्ट की मूल भावना से सहमत
बी एस पाबला
[Reply]
क्या नामवर सिंह ब्लौगर हैं? यदि नहीं तो क्या वे ब्लौग पढ़ते हैं?
नहीं.
तो वो वहां क्या कर रहे थे?
(मैं भी बस इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहा हूँ)
[Reply]
खरी खरी ।
[Reply]
पहले आपकी पोस्ट के सार तत्व के बारे में – व्यंग्य को पकड़ पाना आसान नहीं है. सेंस ऑफ़ ह्यूमर का सवाल? देखिए, लोग-बाग व्यंग्य की धार को नहीं, शब्दों की मार को पकड़ कर कमेंट मार रहे हैं. हद है! पर आप-हम कुछ नहीं कर सकते.
रहा सवाल नामवर सिंह का – तो – उन्होंने पहली दफा ब्लॉगिंग की ताकत को स्वीकारा. उन्होंने माना कि ब्लॉगिंग एक बढ़िया विकल्प है, और उन्होंने ये भी जोड़ा कि शैशवावस्था की हिन्दी ब्लॉगिंग के पूत के पांव नजर आने लगे हैं (यहाँ पर भी स्वीकारोक्ति और अच्छे सेंस में,) और भविष्य में बड़ी संभावनाएँ हैं. यह उनके पिछले वर्ष के दिए बयान से बिलकुल उलट है जिसमें उन्होंने ब्लॉगिंग को नकार दिया था.
[Reply]
@ravi – मगर आगे क्या किया उन्होने?
१) एक आयोजक/प्रायोजक रहते हुए मुख्य अतिथी बनने के लिए ये बंदा कैसे क्वालिफ़ाई करता है? ऐसा करने की मंशा? और इस पर कोई प्रश्न ना उठाया जाना चिट्ठाकारों की तैयारी और मानसिकता के बारे में क्या दर्शाता है?
२) उनका हृदय परिवर्तन [दलबदल ना सही जी] होते ही सारों आमंत्रितों का बिना कोई शिकायत किये उनकी गोद में जा कर बैठ जाना हिन्दी चिट्ठाकारों की किस मानसिकता का परिचायक है?
३) वे सबको चिट्ठाकारी पर राज्य के संभावित अंकुशों का भय बडे प्यार से दिखा कर चल दिये और किसी ने जरा भी प्रतिवाद नही दर्शाया? दर-असल आपको प्रतिवाद या प्रतिप्रश्न का समय ही कहां दिया गया था! .. क्या ये आलरेडी स्वतंत्रता का हनन हो चुका सा महसूस नही हुआ? और इस पर भी को प्रतिक्रिया नहीं!
होता क्या है, कि आजकल के श्याणों को ना, पंक्तियों के बीच काफ़ी कुछ दिख जाता है – वो जिसे अति-विश्लेषण या कयास कह कर खुद खारिज नही कर पाता .. वही बचा हुआ ही अभिव्यक्त हुआ है… और आश्चर्य नहीं कि ये कई औरों ने भी महसूस किया है! क्या कहियेगा?
[Reply]
1) यह प्रश्न उठाना ही गलत है कि कोई मुख्य अतिथि के लिए क्वालिफ़ाई करता है या नहीं. यह तो आयोजकों पर निर्भर है कि वो किसे चुनते हैं. ब्लॉगरों के लिए एक अ-ब्लॉगर अतिथि. क्या ये जरुरी है कि मुख्य अतिथि ब्लॉगर ही हो? नामवर वैसे भी बड़ा नाम है जिसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता – स्टार प्रचारक का काम तो उन्होंने किया ही. मीडिया में खबर उन्हीं के जरिए बनी और चंद स्थानीय लोग यदि ब्लॉग से जुड़े या ब्लॉग क्या है ये जाना समझा तो नामवर के बहाने. आपके घर आने वाला ‘अतिथि’ तो कोई भी हो सकता है, और उसके क्वालिफ़िकेशन पर उंगली उठाना सरासर गलत है. अगर ऐसे किसी आयोजन में मुख्य अतिथि तय करने का अधिकार मुझे मिले तो मैं सरासर राजेन्द्र यादव को बुलाना चाहूंगा – देश की बहुत सी रचनाकार बिरादरी को नेट पर लाने के लिए (जो इससे डरते हुए तिरछी नजर लगाए बैठी है,) इससे बेहतर उपाय नहीं हो सकता.
2) गोद में जा बैठ जाना? ये तो नेगेटिव प्रोपोगंडा हुआ. वे मुख्य अतिथि थे, आए, अपना मुख्य आतिथ्य का वक्तव्य दिया और चले गए. यकीन मानिए, बाकी ब्लॉगर बंधु तो सेमिनार हाल में कुर्सियों पर ही बैठे रहे
– और वैसे भी वहाँ अतिथियों में वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय भी थे. ज्ञान दत्त पाण्डेय समेत कुछ और लोग भी थे. इन्हें भी क्या खारिज किया जा सकता है?
3) राज्य का भय तो मैंने भी अपने प्रस्तुतिकरण में दिखाया था. लोग-बाग एकाध वाक्य को हाईजैक कर लेते हैं और बस उस पर नेगेटिव प्रोपोगंडा चलने लग जाता है. अगर गलत सलत उलटा सीधा लिखेंगे तो हर राज्य का हर कानून उस पर रोक लगाने को अभी भी सक्षम है. यही बात नामवर ने कही, और वाजिब कही. ये बात तो आप भी यदा कदा कहते लिखते रहे हैं. साथ ही चिट्ठा शब्द के ओरिजिन का तो हो सकता है उन्हें ज्ञान न हो, और बोलने से पहले वेरिफाई न कर पाए हों. हम सभी परिपूर्ण ज्ञानी तो वैसे भी नहीं हैं! तो, यह भी नॉन ईशू ही है जिसे सेंसेशनलाइज किया गया.
[Reply]
हुड़े तेड़े की ।
[Reply]
जिन ब्लोगरो का सम्मेलन था उन में से तो कोई मंच पर नहीं दिखा .
[Reply]
किसी विरोधी के साथ मंच न बांटना बुद्धिमत्ता नहीं है। उस के कहे का विरोध करना उचित है। नामवर की साल भर पहले की टिप्पणी को मुद्दा बनाना भी बुद्धिमत्ता नहीं बुद्धिमत्तता कहा जा सकता है। आज जब पुनरावलोकन के बाद तब जब वे ब्लागरी की ताकत को पहचान और स्वीकार कर रहे हों तब तो और भी गलत। नयी चीज को पुरानों का विरोध झेलना ही पड़ता है। अंततः उस की उपयोगिता और महत्व स्वीकार करना पड़ता है। जब लोग अपनी गलती को ठीक कर लें तो उन्हें पुरानी गलती स्मरण कराई जा सकती है उस के लिए उन्हें नोंचने के व्यवहार को किस तरह परिभाषित किया जा सकता है। हर नकारने वाले व्यक्ति को सहमत करने का प्रयत्न करना काफिले को बढ़ाता है, नकारना, दुत्कारना तो काफिले को छोटा ही करेगा।
[Reply]
कौन सुनेगा, किसको सुनाए…
इसलिए चुप रहते हैं…
जय हिंद…
[Reply]
मुझे लगता है यह प्रतिक्रिया भी खामख्वाह अतिशय नाटकीयता का शिकार है. फुदकनेवाले, पॉडियम पर सजकर धन्य होनेवाले, आजू-बाजू किसने हमारी चर्चा की न की कहां तक हम फैल लिये की मेंहदी रंगनेवाले, नामवर-बेनामवर, यह सारा मसला अंतत: हिंदी की बड़ी सामाजिकता और विमर्श का उसमें जो स्थान है, जैसा घटिया, घेटोआइज़्ड है, वैसा ही स्थान पाएगी, देर-सबेर उसी रास्ते वह आगे चलेगी, अपना चरित्र बनाएगी, बिगाड़ेगी, तो एक गैदरिंग में, यह जानते हुए कि वह सिद्धार्थ त्रिपाठी की किताब के लोकापर्ण की रौशनी में ब्लॉगरों को इकट्ठा करके साहित्यिक श्रद्धा पा लेने, ज़रा सा लहालोट हो लेने के सुख का मौक़ा थी, इतने अर्थ ढूंढ़ने की क्यों कोशिश हो रही है? अंतत: सरकारी खर्चे पर कुछ लोग वहां मिलने-मिलाने को ही इकट्ठा हुए थे, बहस की अदाबाजी में लोग बातें वही कर रहे थे जितनी उनकी बुद्धि थी और रहेगी, वेरी सिंपल, हां, सरकारी खर्चे पर इस तरह इकट्ठा होने की राजनीति पर सहमति-असहमति लोग ज़ाहिर करना चाहें वह अलग बात है, बाकी इतना गाल बजाने को क्या, गुरु, वेस्टिंग के लिए इतना टाईम है आपके पास? एक लातखायी भाषा में जिसमें चार चिरकुट उधारी के चार पंख माथे पर साटे मुकुट पहने हैं के दंभ में किलकते रहते हैं, आप किस बात की खातिर इतना गहरा अर्थ खोजते फिरो, एक तरह से यह भी ध्यान खिंचवाये का चिरकिन स्टंटे हुआ न, न हुआ?
हद है हमरे लघुमाधव इंटर कालीज की दीवार पर ठाड़े चुनाव-नतीजों की धोवाई करते बुद्धि-बलिहारी बिलागर बंधु बिरादर..
[Reply]
@ravi – हां महोदय, ये सरासर जरूरी है कि मुख्य अतिथी कोई चिट्ठाकार हो – हैल्लो!! दुनिया के कि़सी भी चिट्ठाकार मीट में यही होता है मालिक.. वे तकनीकी, मेटा और मुख्यधारा के स्टार ब्लागर्स को सुनने के लिये मरते हैं, अपने आपको बेहतर करने के लिये एक के बाद एक वर्क -शॉप्स में सर खपाते होते हैं. ब्लॉग होस्ट्स के साथ विचार-विमर्श कर रहे होते हैं.. किसी लोकल जुगाडबाज की पीठ नही खुजाते फ़िरते!!
हां आप क्यो ना अगली बार अलबत्ता राखी सावंत का जुगाड कर लेना? पूरा शहर आ जाएगा “ब्लाग विमर्श” सुनने – सॉलिड फ़ोटो ऑप भी है ना! (हे ईश्वर क्या दिन दिखा रहा है!)
कहां हैं आप? राज्य का भय वो आदमी दिखा गया जो स्पष्टत: आपको पढता ही नही! कल तक कचरा कहता था आज अंकुश दिखा रहा है – उसकी निगाह मे आपका और आपके लेखन/विधा का कोई सम्मान ही नही है – और आप उसे स्टार अतिथी मान कर खुश हैं – वाह रवि भाई वाह! ये किसकी बुद्धिमत्तता है और कैसी बुद्धिमानी?
ऐसे तर्कों से क्या होगा? दुनिया कहां है और आप कहां?? आई गिव अप आप जैसों का जब ये हाल है तो बाकि के कैसे होंगे समझ सकता हूं!!… खुदा ही मालिक है!! मै चला सोने!! आल द बेस्ट. कुछ दिनो में मेरा चिट्ठा नादारद दिखे तो अचरज मत करना!
[Reply]
नामवर सिंह का गूगल सर्च रिजल्ट – १६८००
ई-स्वामी का गूगल सर्च रिजल्ट – ३,१४०००
मस्त रहें!
[Reply]
जिसमे जितनी बुद्धि होती है वह वैसी ही बात करता है.
[Reply]
आदरणीय ई-स्वामी जी,
सबसे अन्त में आकर आपने मास्टर-स्ट्रोक जड़ा है… विजयी छक्का कहते हैं ना, वो वाला…
मेरे लेख में जिस “बात” को मैं सबसे अधिक हाइलाइट करना चाहता था, उसे आपने मुझसे कहीं बेहतर ढंग से किया है… यानी नामवर सिंह… जैसा एक लाइन में खड़ा करके आपने सबको उधेड़ा है, बस अब मुझे कुछ नहीं कहना। वैसे भी मैंने यह बहस अपनी ओर से समाप्त घोषित कर दी थी…
कोई माने या ना माने, ब्लॉगरों में “कम से कम” दो खेमे तो शुरु से ही रहे हैं… हिन्दुत्ववादी और नॉन-हिन्दुत्ववादी। एक तीसरा खेमा भी है जो “गुडी-गुडी” बातें करता है, तटस्थ रहता है, विवादास्पद मुद्दों पर अपनी कोई स्पष्ट राय रखता ही नहीं (जिस वजह से उनकी एक विशिष्ट इमेज अक्षुण्ण रहती है)…
प्रमेन्द्र ने खुद स्वीकार किया है कि वे निमंत्रित नहीं थे और इसे मैं “हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों की उपेक्षा” के साथ जोड़कर देखता रहूंगा (भले ही आपको पसन्द ना हो)…
मेरे ब्लॉग पर किसी अमित नामक सज्जन की टिप्प्णी आई है जिन्होंने त्रिपाठी जी के साथ आयोजक होने का दावा किया है… उन्हें यह बताना चाहूंगा कि इस विवाद के बाद किसी भी आगामी ब्लॉगर सम्मेलन में मेरे भाग लेने की कोई सम्भावना नहीं है। इसे मेरा सेल्फ़ डिस्क्लेमर माना जा सकता है कि कृपया मुझे भविष्य में होने वाले किसी भी ब्लॉग़र सम्मेलन का निमन्त्रण भेजने का कष्ट ना करें…
मेरे लेख के तीनों उद्देश्य पूरे हुए – 1) नामवर सिंह को लेकर की गई आपत्ति (जिसे अधिकतर ने सही माना)
2) अधिकांश ब्लॉगरों को सूचना भेजी जाना चाहिये थी – (अधिकांश ने माना कि हमें पता ही नहीं था)
3) हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों की उपेक्षा – इस बात पर मतभेद हैं, जो कि भारत की वर्तमान फ़ितरत को देखते हुए स्वाभाविक हैं…
[Reply]
सोलोड
[Reply]
सोलिड
[Reply]
वक्ताओ मे दो ऐसे वक्ता भी हैं जिन पर ना जाने कितनी पोस्ट लिखी गयी हैं क्युकी उन पर एक बार नहीं कई बार यौन शोषण का आरोप लग चुका हैं । नाम देने से क्या फरक पडेगा ? क्या हिन्दी ब्लॉग जगत की मेमोरी { यादाश्त } इतनी कमजोर हैं । उन दोनों के साथ इलाहाबाद मीट मे एक ही मंच पर बैठ कर वार्तालाप करने से अनूप शुक्ल , मसिजीवी , रविरतलामी , डॉ अरविन्द , मनीषा पाण्डेय , आभा और मीनू इत्यादि को कोई आपत्ति नही हुई क्यों ।
आज के अख़बार मे एक IIT के पीएचडी कर रहे स्कॉलर के यौन शोषण और फिर एक लड़की की ह्त्या करने की ख़बर से जोड़ कर अगर आप इस बात को देखेगे तो शायद आप सब समझ सकेगे की क्यूँ जरुरी होता हैं ऐसे लोग का
बहिष्कार सामाजिक जगहों से । आप सब उनको महिमा मंडित करते हैं , उनके साथ चाय नाश्ता करते रहे इस इंतज़ार मे की कब उनपर लगे आरोप सत्य साबित हो ।
[Reply]
क्या होती है एक आदर्श ब्लोग्गर मीट , कैसे करते हैं उसकी रिपोर्टिंग , कैसे वहां बैठना, चलना और फोटू खिंचवाना ‘चहिये ‘ , और भी बहुत कुछ ……देखें सिर्फ़ यहाँ — maykhaana.blogspot.com
[Reply]
लेख पढ़ते-पढ़्ते सोच रहा था लिखूँगा : “थोड़ा ज़्यादा हो गया स्वामी जी.. वो भी तब जब कि आप वहाँ मौजूद नहीं थे.. नामवर जी के इतने भी अपराध नहीं.. कुछ तो बुढ़ौती का लिहाज़ कर जाते.. .”
मगर आप ने अन्त में मेरी फ़िल्म की बात करके मुझे दुविधा में डाल दिया.. आप तो मुझे चढ़ा रहा हैं और मैं आप का विरोध करूँ.. ? विरोध नहीं करुँगा लेकिन फिर भी असहमत होने की गुंज़ाईश तो आप ज़रूर देंगे..
मुझे लगता है कि आप ने मामले में कुछ अधिक ही हवा भर दी है.. इस संगोष्ठी से न तो नामवर का कुछ बना-बिगड़ा है न अपने ब्लागरों का.. कुछ मेल-मिलाप हो गया, बस! इस से ज़्यादा तवज़्ज़ो देना फ़िज़ूल है..
[Reply]
Suresh Ji ki swikarokti se khushi hui…..
Pata nahi kyun aapke vyang ne atyant prabhivit kiya (Ahahe main aapki baat se sehmat hooun ya na hooun)
(matlab lekhan shailie)
Aur ab meri rai:
Mai aapki baat se chahe 100 fi sadi nahi to 95 % to sehmat hoon hi…
Namvaar ji ke sandarbh main 100%
[Reply]
लगता है इलाहाबाद का धुंया कई दिनों आंखो में चुभेगा …नामवर सिंह से लोगो की मोहब्बत देखने वाली है पर अभय जी एक बात में दम है सर जी ,
“इस संगोष्ठी से न तो नामवर का कुछ बना-बिगड़ा है न अपने ब्लागरों का.. कुछ मेल-मिलाप हो गया, बस! इस से ज़्यादा तवज़्ज़ो देना फ़िज़ूल है”..
[Reply]
ई स्वामी जी
जरा इस लिंक पर भी गौर फरमाएं
http://www.visfot.com/index.php/news_never_die/index.1.html
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कुछ मेल-मिलाप हो गया, बस! इस से ज़्यादा तवज़्ज़ो देना फ़िज़ूल है”..
क्या बात है!!! ऐसी मामुली बातों के लिए कितना पैसा बरबाद किया गया? ये किसी के बाप का पैसा नहीं था. यह आम भारतीयों की कमाई का पैसा था. पता नहीं कब समझेंगे कि सरकारी पैसा मुफ्त का नहीं है. बंदरबाँट में लगे है पूँजीवाद के दुश्मन ही.
[Reply]
“२३/२४ नबंबर” को “२३/२४ अक्तूबर” कर लीजिये।
[Reply]
संजय की बात से पूर्ण सहमति , अपनी जब से खर्च कर के मिले और ब्लोगिंग कोई चौपाल नहीं हैं जहाँ केवल मिलने के लिये आना जन होता हैं । अपने अपने घर हैं , मोबाइल हैं , फ़ोन हैं , चैट हैं , तीज त्यौहार हैं उन पर मिल लिया करे ।
[Reply]
@Suresh Chiplunkar,
सुरेश जी हिँदुत्ववादी और नॉन हिँदुत्ववादी खेमे शुरू से नहीं थे. अलग अलग विचारों की बावजूद मेरे जैसे आस्तिक, अमित गुप्ता जैसे नास्तिक, संजय जैसे राष्ट्रवादी, नीरज दीवान जैसे कम्युनिस्ट, शुएब जैसे उदार एवं सुधारवादी मुस्लिम सब प्रेम से रहते थे. धार्मिक झगड़े तो दूर दूर तक न थे.
फिर कुछ कथित वामपंथी बुद्धिजीवी आए और जो उनके जैसा न था उसे हिँदुत्ववादी घोषित कर दिया. ये दोनों कथित खेमे उन्हीं के बनाए/बनवाए हुए हैं.
[Reply]
“एक ऐसा नॉन-ब्लागर सब हिन्दी चिट्ठाकारों से सामूहिक रूप से एक मुख्य अतिथी के रूप में मुखातिब है और आप सबकी विधा का, ब्लागरी का वर्चुअल शीलहरण पूरे इत्मिनान से कर जाता है! वाट ए शेम!”
क्या नामवरजी आज इतनी फ़ालतू की चीज़ हो गए हैं कि किसी मंच पर अध्यक्षता नहीं कर सकते?
रिपोर्ट में तो कहा ही गया है कि उनके ‘चिट्ठा’ क्लेम का प्रतिवाद किया गया था, वहीं मंच पर – तो फिर, शेम किस बात का!
एक गोष्टी हुई, उसमें खूबियां-कमियां रही होगी…… उसपर बवाल की बजाय स्वागत हो कि ऐसी संगोष्ठियां और हों और ब्लागरों के शिकवे-गिले दूर हों:)
[Reply]
बाकि बातें तो बहुत हो चुकीं अगर वरिष्ठ ? ब्लॉगर जरा उचित समझें तो रचना जी के प्रश्नों का उत्तर देवें | हम भी समझ जायेंगे की चिट्ठे पर की नैतिकता जीवन में कितनी उतारी जाती है |
[Reply]
ये नामवर जी क्या अभी भी इतने नामवर रह गए हैं की उनकी चर्चा की जाये…छोडिये भी बच्चे और बूढे के कहे का बुरा नहीं माना करते…खुश रहिये…
नीरज
[Reply]
@ ई-पंडित,
चलिये आपने हमें बरी कर दिया, धन्यवाद…। अब ये खेमे वामपंथियों ने बनाये या बनवाये हैं जो भी है, खेमे तो हैं, यह अब वास्तविकता है।
“शुरु से” का मेरा आशय यह था कि जैसे ही चिठ्ठों की संख्या में बढ़ोतरी हुई उसके बाद से… जब चिठ्ठाकार कम संख्या में थे तब ये चिक-चिक नहीं थी (हो भी नहीं सकती थी)… भाई जब जनसंख्या बढ़ती है तभी तो विचारधाराओं का टकराव शुरु होता है ना…
नेट जगत में किसी का गला दबाकर कोई आगे नहीं बढ़ सकता, यहाँ सबकी आवाज़ सुनी जायेगी… जो भी मठाधीश “किसी खास आवाज़” को दबाने की कोशिश करेगा उसे माकूल जवाब दिया जायेगा…
[Reply]
इस ब्लागिंग सम्मेलन में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो भारत में रहनेवालों के लिए नया है .. पर हिन्दी ब्लागिंग के रूप में हमें इतने अधिकार ही मिल गए .. कि हम इस आयोजन को इतने कोणों से देख पा रहे हैं .. जो हिन्दी ब्लागिंग के महत्व को तो अवश्य सिद्ध कर देता है .. जय हिन्दी ब्लागिंग !!
[Reply]
बिल्कुल सही बात कही आपने,शायद ब्लॉग का उभरता स्वरूप कुछ लोगो को सही नही लग रहा है..
[Reply]
अधिकॉंश बातें रवि ने कह दी हैं केवल एक बात की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि न जाने क्यों इसे ब्लॉगर मीट मान जा रहा है – ये ठीक है कि इतने ब्लॉगर एक साथ मिले तो हमने गेस्ट हाउसों में औपचारिक कार्यक्रम से इतर ब्लॉगर मीटों का आयोजन भी कर लिया जो अल्ल सुबह या देर रात तक आयोजित हुईं लेकिन औपचारिक कार्यक्रम एक ‘संगोष्ठी’ का ही था ‘ चिट्ठाकारी’ इसका विषय भर था। नामवर केवल मुख्य अतिथि नहीं थे वरन वे उस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) भी हैं, इसी प्रकार कुलपति राय साहब भी थे। यदि हम चिट्ठाकार ये घोषणा करना चाहते हैं कि अकादमिक दुनिया को चिट्ठाकारी पर विचार विमर्श (इसलिए गुटबंदी, राजनीति…..आदि) करने का हक नहीं है तो ये हम किन आधारों पर कहेंगे। जैसे हम साहित्य पर ब्लॉगिंग कर सकते हैं वे चिट्ठाकारी पर संगोष्ठी कर सकते हैं।
हम दोनों दुनिया से हैं इसलिए लगता है कि अकादमिक दुनिया के एंजेंडे तय करना वैसे ही हमारे हक से परे है जैसे कि किसी अकादमिक तीसमारखॉं को ये हक नहीं दिया जा सकता कि वह चिट्ठाकरी के सरोकार तय करे।
[Reply]
इतना खरा – खरा लिखने वाला ब्लॉग जगत मैं कम ही हैं | आपकी स्पस्टवादिता अनुकरणीय है |
मुझे तो लगता है की हिंदी ब्लॉग्गिंग करनेवाले ज्यादातर लोग ब्लॉग्गिंग को हलके में लेते हैं…. स्पस्टवादिता का नितांत अभाव कई बड़े ब्लोगरों मैं भी देखा जाता है …. टिप्पणी भी गोल-मटोल होता है ….
अब आपका आलेख पढ़कर …. उन आयोजन मैं सरिक होने और नामवार सिंह जी को खरी खोटी ना सुनाने पे अपनी गलती स्वीकारनी चाहिए |
[Reply]
इरशाद बड्डे …..जारी रहे….जह जह पैर पड़े संतन के तँह तँह बंटा झार हा हा
[Reply]
जिस संगोष्ठी को लेकर सरकारी अपव्यय का बवाल मचा है उन्हें यह सूचित कर दें कि भारत सरकार हिंदी के प्रोत्साहन के लिए करोडों रुपया खर्च कर रही है और प्रायः हर राज्य में अकादमियां बनाई गई हैं जिनका करोडों का बजट है और जो लाखों के पुरस्कार हर वर्ष प्रदान कर रही है। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी ऐसे आयोजन के लिए बजट बना होता है। ऐसे में जिस संगोष्ठी के लिए नगण्य पैसा लगा हो और जो हिंदी ब्लागिंग के लिए खर्च किया गया हो तो इसमें इतनी हैरानी की बात क्यों? यह तो वही बात हुई- तेली का तेल जले, मशालची का दिल:)
[Reply]
हर्ष जी शायद ये लिंक देना चाहते थे।
http://www.visfot.com/index.php/news_never_die/1842.html
ब्लॉगरों के हमले का शिकार हुए नामवर। यह स्टोरी संजय तिवारी ने विस्फोट पर उसी सेमिनार हाल से ही पोस्ट की थी।
साल भर पहले ब्लॉग जगत को कूड़ा कचरा कहने वाले नामवर सिंह यदि २३ अक्टूबर को इसे लोकतंत्र का पाँचवा स्तम्भ कहने को मजबूर हुए तो इसमें ब्लॉग जगत के ये पहरुए स्यापा क्यों कर रहे हैं? यह तो विजयपर्व सा होना चाहिए था।
जिस माध्यम में कोई भी ऐरा-गैरा नथ्थू-खैरा आकर कुछ भी बेलगाम बकवास करने को स्वतंत्र है, उस माध्यम की ओर यदि चौथेपन में ही सही, नामवर सिंह ने रुख कर लिया तो इसमें इतना लाल-पीला होने की क्या जरूरत है? जिस निर्बाध स्वतंत्रता का सदुपयोग/दुरुपयोग सभी कर रहे हैं उससे नामवर सिंह को बाहर रखने की यह बेचैनी तो बहुत मूर्खता पूर्ण लगती है। उनसे इतना ऑब्सेस्ड होने का मतलब ही है कि आप सभी बुरी तरह भयभीत हो उस बुजुर्ग से। इस मण्डली ने रातोरात इच्छा पूरी कर दी उस चुक रहे आदमी द्वारा एक बार फिर से छा जाने की…।
[Reply]
@”इस आयोजन का मुख्य अतिथि आलोक को क्यों नहीं बनाया गया जो कि हमारी बिरादरी के भीष्म पितामह हैं, पंकज अक्षरग्राम संस्थापक, जीतू नारद संचालक, रविरतलामी सैकड़ों को हिंदी चिट्ठाजगत का रास्ता दिखाने वाले, मैथिली जी ब्लॉगवाणी संचालक, जगदीप दांगी जी, देबू दा इंडीब्लॉगीज संस्थापक, अमित गुप्ता परिचर्चा संचालक और ग्लोबल वॉयसिज पर हिंदी की अलख जगाने वाले, बालेँदु प्रभासाक्षी संपादक, बेँगाणी बंधु, रमण कौल यूनीनागरी टूल वाले, हिंदी टूलकिट वाले हिमांशु या फिर हरिराम जी और नारायण प्रसाद जी जैसे हिंदी कंप्यूटिँग के विद्वान.”– e pandit .
I salute all these luminaries who have been engaged in this pioneering effort. Hindi prevails in blog-land because of these gentleman and we should know more about them.
Shame less defense of that ‘sangoshthee’ is really shocking .
[Reply]
सुबह मैंने यह लेख पढ़ा था। तबसे एकाध बार और पढ़ा। नामवरजी के बारें मेरे पास जो किताबें हैं उनको दुबारा उलटा-पलटा।
इस पर कुछ कहते समय मुझे परसाईजी द्वारा अपने मित्र मायाराम सुरजन को लिखा पत्र याद आ रहा है। उन्होंने लिखा था- हम लोग सब विभाजित व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनालिटी) के हैं। हम कहीं करुण होते हैं और कहीं क्रूर होते हैं। इस तथ्य को स्वीकारना चाहिये। नामवरजी के बारे में तुम्हारी टिप्पणी बेहद क्रूर टिप्पणी है।
सुबह तक चिपलूनकर जी की टिप्पणी नहीं आयी थी लेकिन मैंने कहा था कि यह चिपलूनकर की बात ही कह रहे हो तुम। चिपलूनकर ने इस बात को दोहराया है। तुम शायद अभी भी सहमत न हो।
तुमने लिखा- हिन्दी ब्लागिंग के इतने सालों के बाद.. और तकनीकी पृष्ठभूमी से आने वाले हम जैसे लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद, आज भी एक आम भारतीय हिंदी का ब्लागर तथाकथित साहित्यकारो की पिछाडी धो कर अचमन करता फ़िरता है! मुझे अफ़सोस है कि तुम्हारी तमाम कोशिशों पर पानी फ़ेरते हुये हम लेखकों/साहित्यकारों से प्रभावित होना छोड़ न पाये।
नामवरजी ब्लागिंग के बारे में कुछ भले न जानते हों लेकिन ऐसा लगता है कि तुम भी नामवरजी के बारे में कुछ नहीं जानते। उनकी तो अस्सी साल के ऊपर उमर हो गयी। अब उनको कुछ पाना भी नहीं है। तुमको तो अभी पूरी उमर जीना है।
नामवर जी जिस समय अपने प्रतिभा और सक्रियता के चरम पर थे तब किसी विश्वविद्यालय ने में उनको नौकरी नहीं मिली। छह साल वे खाली रहे। लेकिन अपने मन के खिलाफ़ कहीं काम नहीं किया। आज नामवर जैसी कोई प्रतिभा हिन्दी साहित्य में नहीं है। उनके दुश्मन भी , जो उनकी जोड़तोड़ की राजनीति और बहुत दिनों से कुछ न लिखने की उनकी आलोचना करते हैं, उनकी प्रतिभा और मेधा का सम्मान करते हैं।
उनके बारे में कुछ बातें काशीनाथ सिंह के द्वारा लिखी गयी किताब घर का जोगी जोगड़ा से
और भाषा पर ऐसा निर्बाध नियन्त्रण कि क्या कहिये? क्या मजाल जो कोई शब्द या वाक्य या मुहावरा उनकी इच्छा के बिना अपनी मर्जी से कहीं ताक-तूककर चुपके से या जबरदस्ती घुस आने की जुर्रत करे।
एक ही विषय पर नये नुक्ते,नई बात, नई जानकारियां- जहां सभा कानों से ही नहीं, आखों से भी सुन रही थी।
पचासों ऐसे हैं जिनमे कविता-कहानी का विवेक नामवर को सुनकर आया है।
सैकड़ों हैं जिन्होंने कोई किताब इसलिये खरीदी कि उसका जिक्र नामवर के व्याख्यान में आया था।
हजारों हैं जिनकी साहित्य में दिलचस्पी नामवर को सुनकर हुई है।
और ऐसी संख्या तो लाखों में हैं जिन्हें नामवर को सुनकर हिन्दी स्वादिष्ट लगी है।
शायद लगे कि नामवर के भाई होने के नाते काशीनाथ सिंह तो ऐसा लिखेंगे ही। लेकिन एक बार श्रीलाल शुक्ल ने मुझसे नामवरजी के बारे में बात करते हुये अपने उद्गार व्यक्त किये कि उनके जैसे लोग विरले ही होते हैं। यह बात श्रीलालजी ने तब कही थी जब वे अपना सब कुछ पा चुके थे। नामवर जी से उनको कुछ नहीं चाहिये। यह उनके सहज उद्गार थे।
नामवरजी हिन्दी के सबसे बहुपाठी आलोचक हैं। वे जो भी कहते हैं उसकी उपेक्षा नहीं हो पाती। विनोद कुमार शुक्ल की किताब जो तुम्हारी पसंदीदा किताब है ( नौकर की कमीज/दीवार में खिड़की रहती है )को लोगों ने खारिज कर दिया था। नामवरजी ने बताया कि यह नया गद्य है। लोगों ने अपनी राय दुरुस्त की।
जोड़-तोड़, मठाधीशी और न जाने किन-किन तरह के आरोपों के बावजूद यह निर्विवाद है कि वे हिन्दी समाज की विलक्षण प्रतिभा हैं।
यह कहते समय मैं बता दूं कि न तो मैं मार्क्सवादी हूं न मुझे कोई किताब प्रमोट करानी है न कोई प्रोजेक्ट लेना है।
जिस विश्वविद्यालय के कुलपति हैं वे उसके कार्यक्रम के उद्घाटन पर सवाल उठाकर यह तो नहीं कहना चाहते कि अपने देश की राष्ट्रीय परियोजनाओं के उद्घाटन के लिये हमें विदेशी राष्ट्राध्यक्ष बुलाने चाहिये।
नामवर जी के बारे में कही बात का विरोध करने की बात कहने से पहले यह् भी देख लिया होता। इसके अलावा हम क्या उनकी गरदन पकड़ लेते?
स्वामीजी नहले पर दहला मारने वाले अंदाज में कोई भी तर्क खोजे जा सकते हैं। लेकिन मेरी समझ में नामवरजी पर की गयी तुम्हारी और सुरेश चिपलूनकर जी की टिप्पणियां ओछी, अहमन्यतापूर्ण और क्रूर लगीं। हम बांगला और दूसरी भाषाओं के लेखकों के बारे में बड़े गाने गाते हैं कि वे अपने साहित्य क सम्मान करते हैं। साहित्यकारों का मान रखते हैं और अपने लोगों की धोती खोलते हैं।
और जो मेरे और रविरतलामी के बारे में जो लिखा। उनको अपनी सनद के लिये छांट लिया है:-
१.कई हंसते-खिलखिलाते बरिष्ठ चिट्ठाकार इस कृत्य (बलात्कार) में सहयोग करते पाए गए!
२.हिन्दी चिट्ठाजगत के तमाम आम-खासियों/मुहल्लेवासियों/भडासियों/संडासियों/शाबासियों समेत रवि श्रीवास्तवजी और अनूप शुक्लाजी ने उछल-उछल कर शिरकत की.
३.चिट्ठाकार अपनी लज्जा त्याग कर इस पूरे क्रियाकलाप का विवरण अपनी सखियों सहेलियों तक पहुंचाने मे जुट गए!
४.हिन्दी चिट्ठाकारी की गरिमा सरेआम कुछ मुफ़्तखोरों कीए गद्दारी के चलते लुट गई और वे इसे अपने उपलब्धी मान कर घूम फ़िर आए!
५.जब नामवर सिंह जैसे औचित्यहीन इंसान को बुलाए जाने पर प्रश्न करने की बारी आई, वहां से सटासट त्वरित रीपोर्टें भेजी जाने लगीं.
६.जब उसकी बची जिंदगी के लिये चिट्ठाकारी पर बिलावजह आलोचनात्मक रवैये पालने पे दीदे खोलू हश्र दिखा कर उसे निपटाना था, बस दोनो हे-हे करने और फ़ोटो-ऑप में व्यस्त हो गए?
७.जो विधा आपको ये तमाम सैर सपाटे करवा रही है उसे कचरा कहने वाले आदमी के साथ मंच भी साझा कर आए?
८.हिन्दी ब्लागिंग के इतने सालों के बाद.. और तकनीकी पृष्ठभूमी से आने वाले हम जैसे लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद, आज भी एक आम भारतीय हिंदी का ब्लागर तथाकथित साहित्यकारो की पिछाडी धो कर अचमन करता फ़िरता है!
यह सब बांचकर यही लगा -बस इसी सुर्खी की कमी थी तेरे अफ़साने में पिछले पांच साल की ब्लागिंग के दौरान न जाने कितनी उपाधियां मिलीं। लेकिन एक साथ इतनी कभी नहीं मिली। तुम्हारे बाग की जीनत के भाग खुल गये आज। सिर्फ़ यही लग रहा है कि कुछ पाठिकायें इसे बांचेंगी तो क्या सोचेंगी कि वे हमारी सखी सहेलियां ही हैं क्या?
अब तारीख बदलने वाली है। इसलिये और क्या लिखें? यही अफ़सोस है कि वावजूद तमाम तकनीकी सिखावे के हम रहे खर बुद्धि ही और सच में ब्लागर न बन पाये।
लेकिन सुबह से लगातार सोच रहा हूं कि क्या सच में मैं इलाहाबाद इसीलिये चला गया कि वहां जाने के लिये किराये के सात सौ चौबीस रुपये दिये थे। क्या मैं किसी भी जगह चला जाऊंगा जहां पैसे मिलेंगे? क्या सच में वहां से तथाकथित लाइव ब्लागिंग किन्ही सखी-सहेली के लिये कर रहा था? क्या सच मे मैं मुफ़्तखोर हूं? क्या सच में कोई भी मुझे पैसे से खरीद लेगा और मैं उसके साथ खड़ा हो जाऊंगा? क्या सच में साहित्य और ब्लाग की समझ इतनी ही दो कौड़ी की है जितनी तुमने बताई।
मेरे पास केवल सवाल हैं। जबाब नहीं। क्योंकि तुमने जो कहा और लिखा है वह कुछ सोच-समझ के ही कहा होगा। तकनीकी समझ से बुद्धि और समझ भी थोक के भाव आती है।
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जो भी हो यह ब्लॉग पोस्ट ब्लॉगर सम्मान चेतना की प्रस्थान बिन्दु साबित होगी ।
आगे कोई सरकारी तत्व इस तरह ब्लॉगरों का फ़ायदा नहीं उठा पायेगा । ब्लॉगरजन इस सम्मेलन की सीख से भरे हुए रहेंगे । और पहले से ही चिट्ठापुर के वासी जागते रहो की गुहार मचा देंगे ।
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@गुरुदेव,
ठीक है भोले भंडारी, मै दोबारा आपका नन्दी बैल बन जाता हूं – अब कोई साण्डिया लेखन नही.
तो अब मै आपका राजा-बेटा ई-स्वामी अपनी अपेक्षाएं [आशाएं नही, अपेक्षाएं] लिख रहा हूं -
१) वो चिट्ठाकार संगोष्ठी थी. एक युनिवर्सिटी द्वारा आयोजित थी. एक पाठक के बतौर मेरे लिये उसमे से चाय पीते चंद चेहरों की तस्वीरों से ज्यादा एक चिट्ठाकार के बतौर अपने साथ सहेज लेने जैसा एक वाक्य ना था! एक वाकया ना था. ये कैसी दिशा दी जा रही है इस विधा को – आओ, मेल-मिलाप करो तफ़री करो – बस यही? आपको साहित्यकार बहुत प्रभावित करते हैं ना[मुझे भी करते हैं] तो लेखन, चिट्ठाकारी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है लेकिन उस तक पर कोई बात नही हुई – जो कुछ प्रभावित करे! तकनीकी या शुष्क विषयों को छोड ही दें.किसी एक चेहरे में कुछ नया बांटने कुछ जानने की प्यास नही दिखी!
एक पाठक और चिट्ठाकार होने के नाते – हम जैसे कई अन्य इसे अपार्चुनिटी लॉस के रूप मे देखते हैं और दिल से दुखी होते हैं. ऐण्ड वी गॉट टू स्टॉप थिस ब्लीडिंग ऑफ़ टाईम एन्ड रीसोर्सेज. आप और रवि भाई जैसे वरिष्ठ इस बात के लिये हमारे जिम्मेदार हैं. या आगे से हमे पहले से आगाह कर दें कि चाहे ये चांसलरों के तत्वावधान मे हो रहा ये, ये तो मात्र एक चिरकुटाई-सम्मेलन है हे-हे खे-खे होगी बस!
२) कंटेंट .. कंटेंट .. कंटेंट .. meat no fats! आपने मीट की या ग्रीट की या चीयर्स.. जो भी किया यदि उनमे से गुलदस्तों, भाषणों और बासी बातों से ज्यादा कुछ है तो उसे सर माथे रखा जाएगा अन्यथा खारिज कर दिया जाएगा और इस वाले आयोजन को तो स्वयं उपस्थित लोग खारिज कर दिये हैं – ये विधा के लिये अच्छा नही होता इस बात का ध्यान रखा जाए.
३) माहौल कैसा था? हल्का-फ़ुल्का? बढिया लेकिन उस हल्के-फ़ुल्के माहौल में से हमें गंभीर आऊटकम चाहिये!
मैं दिल से चाहता हूं कि हर अच्छे ब्लागर को ५ स्टार ट्रीटमेंट मिले – क्यों ना मिले गर मेहनत की है लेकिन चिट्ठाकार का लेखन और उसका कॉंशियस दो अलग अलग चीजे नही होतीं – अमिताभ जैसे कलाकार ‘स्लमडाग मिलेनियर’ मे काम नही करते – चूंकि वे उसकी विषयवस्तु को स्वीकार नही करते, ठीक वैसे ही आपसे आपेक्षा है कि क्या आप अच्छे लेखन मे कन्नी काटते हैं? नही ना! यदि कुप्रबंधन था, विषयों का अजेंडे का अभाव था और कुछ भी कसा हुआ नही था वहां तो उसे ’चलता है’ वाले लेखन से चलाईये मत .. उसकी लफ़्फ़ाजी मत कीजिये – चाहे नेटवर्किंग मस्त होले लेकिन आपकी ब्लागियाही छवि खराब होती है! – हां, आप उसकी छिछलेदारी मत कीजिये – लेकिन वो नौबत ना आए इसकी तैयारी रखिये और माहौल भी. आप पर सबकी निगाहें होती हैं.
४) अंतत: आप माहौल को बनाने वाले और लामबंद करने वाले सबसे बडे घटक स्वयं होते हैं. ये ओल्ड-स्कूल प्रेम-मिलन [ क्या कहते हैं हिन्दी में प्रिती-भेंट जैसा कुछ.. हां स्नेह-सम्मेलन] ’बडो भलो’ लगा हो! नाऊ ग्रो अप! अब आप सब कुछ रीयल-डील “काम का मिलाप” कीजियेगा और उस पर लाईव बताईयेगा ताकी हम जैसे भी उससे कुछ सीखें – कोई नई बात, नया फ़ंडा, वॉव फ़ैक्टर वाला – इस आयोजन से बडा वॉव फ़ेक्टर तो गिरगिट के ओपन सोर्स होने मे था. उसे गोष्ठी/संगोष्ठी/बुल-शिटोष्ठी/समारोह/सम्मेलन/आन्दोलन/क्रान्ती कुछ भी कहें लेकिन कम से कम १५-२०% कुछ काम का अत्तर निकले इसकी गुंजाईश जरूर रखें. अन्यथा हमें फ़िर वही टाईमखोटीकरण भेंट का इम्प्रेशन मिलेगा जिसने इस उपरोक्त प्रकार के क्रूर लेखन को मजबूर किया!
[Reply]