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	<title>Comments on: इलाहबाद चिट्ठाकार संगोष्ठी: बधाईयां! शर्म तो बेच खाई, ये तो लफ़्फ़ाजियों का समय है!</title>
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	<description>यहां पर "कुछ" लिखा है!</description>
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		<title>By: Sulabh Satrangi</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5753</link>
		<dc:creator>Sulabh Satrangi</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Nov 2009 10:54:28 +0000</pubDate>
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		<description>इलाहाबाद संगोष्ठी पर कुछ रिपोर्ट पहले पढ़ चूका हूँ. बहुत ज्यादा खुश या प्रभावित इसलिए नहीं था की, शामिल मेम्बरानो ने अपने अपने ब्लॉग पर इसकी चर्चा अपने मन माफिक की थी. 

यहाँ दो बाते कहना चाहूँगा, 
१, आज के समय में ब्लॉग एज में कोई भी कहीं भी हिंदी चिट्ठकारी सम्बंधित आयोजन कर सकता है. ये एक प्रकार से अच्छा ही कहलायेगा. निर्भर करता है परिणामों पर और आगंतुकों की सोच और जिम्मेदारियों पर. 
२. यहाँ कोई मठाधीश नहीं है, ये तो तय है. हर सौ पचास की भीड़ में कोई एक है जो सशक्त नेतृत्व की क्षमता रखता है और जिम्मेदारी (जिम्मेदार हो यह जरुरी भी नहीं है. क्योंकि यदि बात आयोजन भर की है?) लेने की बात करता है. उनका मनोबल भी उंचा इसलिए है की उन्हें सुनने, पढने वाले, उनके आयोजन में शामिल होने वालों की कोई कमी भी नहीं है.  

निष्कर्ष यही है की जब आप भी नेतृत्व करेंगे या कुछ ऐसा कदम उठाएंगे. आप अपने आप को भी क्षमतावान महसूस करेंगे. ये आपकी चिट्ठाकारी सेवा ही है जो बहुतो को सोचने हेतु बाध्य कर रहा है. आप अपना काम करते जाए. दिशाएँ भी खुद तय हो जायेंगी. 

रही बात साहित्य की. ये तो एक कला वर्ग(हाँ अन्य कलाओं से इतर इसका प्रभाव बौद्धिक और चेतनामय ज्यादा होता है) का ही हिस्सा है. सृजन कैसे होता है और कैसे पल्लवित होता है ये काल पर निर्भर करता है. कभी कागज़ का काल सशक्त था तो आज यह भी दिख रहा है की आने वालों दिनों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ही सशक्त होगा. उस समय ब्लोगिंग (चिट्ठाकारी) को कौन नकार सकता है. रही बात हिंदी भाषा और हिंदी चिट्ठाकारी(जो अपने आप में आज का सशक्त साहित्य है)  को लेकर- ये इंडिया है. भाषाओं पर आक्षेप चलता रहेगा. तथाकथित अधिसासियों और मठाधीशों के बीच जंग चलती रहेगी. वैसे ज्यादातर पाठक उसी को अपना आदर्श मानेंगे जो सच लिखने का साहस रखते हैं. फिर हम लेखकों (चिट्ठाकारों) को ख़ुशी भी उन्ही सुधि, सत्यान्वेषी और सहृदयी पाठकों से मिलती है. दुःख तब होगा जब आप गिनती करने लग जाएँ.  

- सुलभ जायसवाल &#039;सतरंगी&#039;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इलाहाबाद संगोष्ठी पर कुछ रिपोर्ट पहले पढ़ चूका हूँ. बहुत ज्यादा खुश या प्रभावित इसलिए नहीं था की, शामिल मेम्बरानो ने अपने अपने ब्लॉग पर इसकी चर्चा अपने मन माफिक की थी. </p>
<p>यहाँ दो बाते कहना चाहूँगा,<br />
१, आज के समय में ब्लॉग एज में कोई भी कहीं भी हिंदी चिट्ठकारी सम्बंधित आयोजन कर सकता है. ये एक प्रकार से अच्छा ही कहलायेगा. निर्भर करता है परिणामों पर और आगंतुकों की सोच और जिम्मेदारियों पर.<br />
२. यहाँ कोई मठाधीश नहीं है, ये तो तय है. हर सौ पचास की भीड़ में कोई एक है जो सशक्त नेतृत्व की क्षमता रखता है और जिम्मेदारी (जिम्मेदार हो यह जरुरी भी नहीं है. क्योंकि यदि बात आयोजन भर की है?) लेने की बात करता है. उनका मनोबल भी उंचा इसलिए है की उन्हें सुनने, पढने वाले, उनके आयोजन में शामिल होने वालों की कोई कमी भी नहीं है.  </p>
<p>निष्कर्ष यही है की जब आप भी नेतृत्व करेंगे या कुछ ऐसा कदम उठाएंगे. आप अपने आप को भी क्षमतावान महसूस करेंगे. ये आपकी चिट्ठाकारी सेवा ही है जो बहुतो को सोचने हेतु बाध्य कर रहा है. आप अपना काम करते जाए. दिशाएँ भी खुद तय हो जायेंगी. </p>
<p>रही बात साहित्य की. ये तो एक कला वर्ग(हाँ अन्य कलाओं से इतर इसका प्रभाव बौद्धिक और चेतनामय ज्यादा होता है) का ही हिस्सा है. सृजन कैसे होता है और कैसे पल्लवित होता है ये काल पर निर्भर करता है. कभी कागज़ का काल सशक्त था तो आज यह भी दिख रहा है की आने वालों दिनों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ही सशक्त होगा. उस समय ब्लोगिंग (चिट्ठाकारी) को कौन नकार सकता है. रही बात हिंदी भाषा और हिंदी चिट्ठाकारी(जो अपने आप में आज का सशक्त साहित्य है)  को लेकर- ये इंडिया है. भाषाओं पर आक्षेप चलता रहेगा. तथाकथित अधिसासियों और मठाधीशों के बीच जंग चलती रहेगी. वैसे ज्यादातर पाठक उसी को अपना आदर्श मानेंगे जो सच लिखने का साहस रखते हैं. फिर हम लेखकों (चिट्ठाकारों) को ख़ुशी भी उन्ही सुधि, सत्यान्वेषी और सहृदयी पाठकों से मिलती है. दुःख तब होगा जब आप गिनती करने लग जाएँ.  </p>
<p>- सुलभ जायसवाल &#8216;सतरंगी&#8217;</p>
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		<title>By: munish</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5736</link>
		<dc:creator>munish</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Nov 2009 20:08:36 +0000</pubDate>
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		<description>Dear e-Svami,
                           Not even professional prose writers can match ur skill and still u r inactive  for so many days , thats not good bhai .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Dear e-Svami,<br />
                           Not even professional prose writers can match ur skill and still u r inactive  for so many days , thats not good bhai .</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5734</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 18:18:59 +0000</pubDate>
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		<description>प्रिय ईस्वामी ,

आपकी यह प्रतिक्रिया संयत नहीं लगी और दुख हुआ .

इलाहाबाद में आयोजित चिट्ठाकारी पर केन्द्रित उस सेमीनार में भाग लेने वाले ब्लॉगरों में मैं भी एक था .  गाड़ी का टाइम ऐसा था कि उद्घाटन सत्र में शामिल नहीं हो सका . पर २३ की दोपहर से लेकर २४ को शाम ०४-१५ तक मन-मिजाज पूरी तरह चिट्ठाकारी में ही रमा रहा . तीनों सत्रों में ठीक-ठाक बात-चीत हुई . जिस सत्र में मेरी भागीदारी थी उसमें मसिजीवी, गिरिजेश राव, विनीत कुमार, डॉ. अरविंद मिश्र, हेमंत, हिमांशु पांडेय और हिमांशु रंजन ये सात वक्ता थे सभी ने दस से पन्द्रह मिनट के समय में अपने चुने हुए विषय पर अपनी बात रखी . 

भूपेन, रियाजुल हक, मनीष, मनीषा पांडेय, संजय तिवारी और अफ़लातून इन छह वक्ताओं ने पांच-पांच मिनट में अपनी त्वरित टिप्पणियां कीं . यहां तक कि अन्त में अमिताभ त्रिपाठी ने दो मिनट का समय मांगा और भाषा पर अपनी कविता प्रस्तुत की . इरफ़ान ने अपने प्रभावी संयोजन से इसे बांधे रखा . 

इस खाकसार ने अपने वक्तव्य में ईस्वामी को भी याद किया और कहा कि जैसा लेखन अनामदास, सृजनशिल्पी, ईस्वामी और घुघुती बासुती जैसे छद्मनामी कर रहे हैं, आधे ब्लॉगरों को वैसा लिखने के लिए एक जन्म और लेना पड़ेगा .

तो यह तो हुआ दूसरे दिन के पहले सत्र का विवरण जिसे मैं विस्तार से प्रत्येक वक्ता के मुख्य विचार के साथ जल्दी ही ब्लॉग पर रखूंगा . फिलहाल आपकी प्रतिक्रिया पर कुछ बातें . पहली तो यह कि आपकी प्रतिक्रिया सुनी-सुनाई/दूसरों की लिखी-लिखाई बातों पर आधारित है . और कार्यक्रमों की रपट भी देखता रखता हूं पर जैसी और जितनी ’सब्जेक्टिव’ और ’कलर्ड’  रिपोर्ट इस कार्यक्रम की ब्लॉग जगत पर देखी, वैसी और कहीं नहीं . जो नहीं आए या आ सके उनका कारण समझ में आता है . पब्लिक मनी का उनका सामयिक दर्द भी समझने योग्य है . पर जो इलाहाबाद आए और वहां मुंडी हिला-हिला कर गदगदायमान हो रहे थे लौट कर उन्हें किस कीड़े ने काट लिया यह समझ के बाहर है .

आपकी इस पोस्ट के बारे में रवि रतलामी और अनूप सुकुल बहुत कुछ कह ही गये हैं उसमें मेरी भी सहमति मानिएगा . आपकी इस पोस्ट के बारे में कहूंगा -- ईस्वामी ऐट हिज़ ’फूहड़’ बेस्ट . बाकी आप अच्छे गद्य लेखक हैं , अपना मर्दाना गद्य लिखते रहिये . ये जाने-छोड़ देने की ’नॉन सेंस’ औरों के लिये छोड़ दीजिए . आपका चुनौती स्वीकार करने का राजपूती अन्दाज़ बहुत अच्छा और संभावनामय लगा .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रिय ईस्वामी ,</p>
<p>आपकी यह प्रतिक्रिया संयत नहीं लगी और दुख हुआ .</p>
<p>इलाहाबाद में आयोजित चिट्ठाकारी पर केन्द्रित उस सेमीनार में भाग लेने वाले ब्लॉगरों में मैं भी एक था .  गाड़ी का टाइम ऐसा था कि उद्घाटन सत्र में शामिल नहीं हो सका . पर २३ की दोपहर से लेकर २४ को शाम ०४-१५ तक मन-मिजाज पूरी तरह चिट्ठाकारी में ही रमा रहा . तीनों सत्रों में ठीक-ठाक बात-चीत हुई . जिस सत्र में मेरी भागीदारी थी उसमें मसिजीवी, गिरिजेश राव, विनीत कुमार, डॉ. अरविंद मिश्र, हेमंत, हिमांशु पांडेय और हिमांशु रंजन ये सात वक्ता थे सभी ने दस से पन्द्रह मिनट के समय में अपने चुने हुए विषय पर अपनी बात रखी . </p>
<p>भूपेन, रियाजुल हक, मनीष, मनीषा पांडेय, संजय तिवारी और अफ़लातून इन छह वक्ताओं ने पांच-पांच मिनट में अपनी त्वरित टिप्पणियां कीं . यहां तक कि अन्त में अमिताभ त्रिपाठी ने दो मिनट का समय मांगा और भाषा पर अपनी कविता प्रस्तुत की . इरफ़ान ने अपने प्रभावी संयोजन से इसे बांधे रखा . </p>
<p>इस खाकसार ने अपने वक्तव्य में ईस्वामी को भी याद किया और कहा कि जैसा लेखन अनामदास, सृजनशिल्पी, ईस्वामी और घुघुती बासुती जैसे छद्मनामी कर रहे हैं, आधे ब्लॉगरों को वैसा लिखने के लिए एक जन्म और लेना पड़ेगा .</p>
<p>तो यह तो हुआ दूसरे दिन के पहले सत्र का विवरण जिसे मैं विस्तार से प्रत्येक वक्ता के मुख्य विचार के साथ जल्दी ही ब्लॉग पर रखूंगा . फिलहाल आपकी प्रतिक्रिया पर कुछ बातें . पहली तो यह कि आपकी प्रतिक्रिया सुनी-सुनाई/दूसरों की लिखी-लिखाई बातों पर आधारित है . और कार्यक्रमों की रपट भी देखता रखता हूं पर जैसी और जितनी ’सब्जेक्टिव’ और ’कलर्ड’  रिपोर्ट इस कार्यक्रम की ब्लॉग जगत पर देखी, वैसी और कहीं नहीं . जो नहीं आए या आ सके उनका कारण समझ में आता है . पब्लिक मनी का उनका सामयिक दर्द भी समझने योग्य है . पर जो इलाहाबाद आए और वहां मुंडी हिला-हिला कर गदगदायमान हो रहे थे लौट कर उन्हें किस कीड़े ने काट लिया यह समझ के बाहर है .</p>
<p>आपकी इस पोस्ट के बारे में रवि रतलामी और अनूप सुकुल बहुत कुछ कह ही गये हैं उसमें मेरी भी सहमति मानिएगा . आपकी इस पोस्ट के बारे में कहूंगा &#8212; ईस्वामी ऐट हिज़ ’फूहड़’ बेस्ट . बाकी आप अच्छे गद्य लेखक हैं , अपना मर्दाना गद्य लिखते रहिये . ये जाने-छोड़ देने की ’नॉन सेंस’ औरों के लिये छोड़ दीजिए . आपका चुनौती स्वीकार करने का राजपूती अन्दाज़ बहुत अच्छा और संभावनामय लगा .</p>
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		<title>By: munish</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5733</link>
		<dc:creator>munish</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 18:02:46 +0000</pubDate>
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		<description>DEAR  e-SVAMI ,
                             It is really shocking to know that u r making up mind to quit hindi blogging. if it happens it would be the saddest episode in this just begun journey of  hindi blogging. u have always led  from the front and it is definitely not  the time to say quits. pls. stay and and don&#039;t let the bastards overcome your constructive  and creative spirit. your prose is razor sharp  , don&#039;t let it go blunt pls.
                                                                                                           Munish</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>DEAR  e-SVAMI ,<br />
                             It is really shocking to know that u r making up mind to quit hindi blogging. if it happens it would be the saddest episode in this just begun journey of  hindi blogging. u have always led  from the front and it is definitely not  the time to say quits. pls. stay and and don&#8217;t let the bastards overcome your constructive  and creative spirit. your prose is razor sharp  , don&#8217;t let it go blunt pls.<br />
                                                                                                           Munish</p>
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	<item>
		<title>By: eswami</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5732</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 03:26:19 +0000</pubDate>
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		<description>@राधे: आप बिल्कुल मुझे पढने से बचिये! वरना मुझे आपको यहां बेनामी टिप्पणियां करने से बचाना होगा -अगली बार अपनी रीढ लगा के अपने आईपी से टिपिया लेना मुन्ना! (...चले आते है!) 

@गुरुदेव: ये लेख भी यहीं रहेगा और चुनौती स्वीकार है. ज्यादा समय नहीं लेंगे और इस अलख को जगाए रखने से अलावा और भी कुछ ठोस काम का आपके सामने आ जाएगा - वो सरकारी खर्च पर, मुख्य अतिथी बन अपनी बलन इकट्ठा करने से बेहतर और तफरीह मारने से काम का करम ही होगा ये भी वादा रहा! 
हम गैर-राजनैतिक चिट्ठाकारो का मनोबल किसी साहित्य-फाहित्य के ठेकेदार के अनुमोदन का गुलाम नही, हां पोडियम प्रेमीयो का होता होगा, हूआ करे! 
अब रही बात नामवर के बारे में पढने कि, जितना पढना समझना था समझ लिया, सब लिखने से पहले फिर - जो कहना था स्पष्ट कह भी दिया, वो भी तब लिखा जब इन नपुंसक मीट्स्-फीट्स् के बचकाने ब्यौरे सात समन्दर पार बैठे बांचने असहनीय हो चुके. मेरे एक ही लेख &quot;साहित्य वो बासी चिट्ठा होता है जो कागज पर प्रकाशित होता है&quot; ने जो अलख जगाई थी उसकी लौ आज और ऊंची है - अभी तो हिन्दी अकादमियो तक ये चिंघाड गूंजी है, कल के कचरा कहने वाले आज समूह् में चमचे जुगाडने बुलावे देते फिरते है - आगे आगे देखिये क्या होता है!
मैंने भी इस छद्मनाम से वो करने का प्रण किया है जो किसी नामवर ने नही किया होगा! फिर आग और औगढियो को किससे द्वेष? नाग और नागा को किससे राग? मोह गया माया मिटी मनवा बेपरवाह! अलख निरंजन!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@राधे: आप बिल्कुल मुझे पढने से बचिये! वरना मुझे आपको यहां बेनामी टिप्पणियां करने से बचाना होगा -अगली बार अपनी रीढ लगा के अपने आईपी से टिपिया लेना मुन्ना! (&#8230;चले आते है!) </p>
<p>@गुरुदेव: ये लेख भी यहीं रहेगा और चुनौती स्वीकार है. ज्यादा समय नहीं लेंगे और इस अलख को जगाए रखने से अलावा और भी कुछ ठोस काम का आपके सामने आ जाएगा &#8211; वो सरकारी खर्च पर, मुख्य अतिथी बन अपनी बलन इकट्ठा करने से बेहतर और तफरीह मारने से काम का करम ही होगा ये भी वादा रहा!<br />
हम गैर-राजनैतिक चिट्ठाकारो का मनोबल किसी साहित्य-फाहित्य के ठेकेदार के अनुमोदन का गुलाम नही, हां पोडियम प्रेमीयो का होता होगा, हूआ करे!<br />
अब रही बात नामवर के बारे में पढने कि, जितना पढना समझना था समझ लिया, सब लिखने से पहले फिर &#8211; जो कहना था स्पष्ट कह भी दिया, वो भी तब लिखा जब इन नपुंसक मीट्स्-फीट्स् के बचकाने ब्यौरे सात समन्दर पार बैठे बांचने असहनीय हो चुके. मेरे एक ही लेख &#8220;साहित्य वो बासी चिट्ठा होता है जो कागज पर प्रकाशित होता है&#8221; ने जो अलख जगाई थी उसकी लौ आज और ऊंची है &#8211; अभी तो हिन्दी अकादमियो तक ये चिंघाड गूंजी है, कल के कचरा कहने वाले आज समूह् में चमचे जुगाडने बुलावे देते फिरते है &#8211; आगे आगे देखिये क्या होता है!<br />
मैंने भी इस छद्मनाम से वो करने का प्रण किया है जो किसी नामवर ने नही किया होगा! फिर आग और औगढियो को किससे द्वेष? नाग और नागा को किससे राग? मोह गया माया मिटी मनवा बेपरवाह! अलख निरंजन!</p>
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		<title>By: राधेश्याम</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5730</link>
		<dc:creator>राधेश्याम</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 02:14:54 +0000</pubDate>
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		<description>आपके जाँबाज तेवर गुरु चेला संपर्क बनाये रखने के लिए ठंडाते नजर आ रहे हैं आपके अनूप जी को दिये जबाब में. क्या दबाब्व आपको सता रहा है. संपर्क का ही ? तो फिर संपर्क स्थापित करने के लिए की गई उनकी सम्मेलन में हे हे...और आपके नन्दी बन दरवाजे पर बैठ जाने वाली हे हे में अंतर कहाँ रहा? यही करना था तो फिर सुबह यह सब तामझाम क्या नाम कमाने के लिए फैलाया था या सनसनी पैदा करने के लिए. आपकी आचमन करने की अदा भी उनके आचमन करने की अदा से कम नहीं लगी. यह देखने के बाद मेरे मन पर आज ही निर्मित आपकी जाँबाजी छबि तुरन्त ही धूमिल हो गई. आईंदा आपको पढ़ने से बचना होगा वरना मैं कोई गलत निर्णय न ले बैठूं, आप तो बाद में नन्दी बन बैठ जाओगे.

कुछ सोचो और रीढ़ की हड्डी सीधे रखना सीखो, अगर है तो वरना स्टील सपोर्ट को रीढ़ की हड्डी जैसा तो न ही दिखाओ</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके जाँबाज तेवर गुरु चेला संपर्क बनाये रखने के लिए ठंडाते नजर आ रहे हैं आपके अनूप जी को दिये जबाब में. क्या दबाब्व आपको सता रहा है. संपर्क का ही ? तो फिर संपर्क स्थापित करने के लिए की गई उनकी सम्मेलन में हे हे&#8230;और आपके नन्दी बन दरवाजे पर बैठ जाने वाली हे हे में अंतर कहाँ रहा? यही करना था तो फिर सुबह यह सब तामझाम क्या नाम कमाने के लिए फैलाया था या सनसनी पैदा करने के लिए. आपकी आचमन करने की अदा भी उनके आचमन करने की अदा से कम नहीं लगी. यह देखने के बाद मेरे मन पर आज ही निर्मित आपकी जाँबाजी छबि तुरन्त ही धूमिल हो गई. आईंदा आपको पढ़ने से बचना होगा वरना मैं कोई गलत निर्णय न ले बैठूं, आप तो बाद में नन्दी बन बैठ जाओगे.</p>
<p>कुछ सोचो और रीढ़ की हड्डी सीधे रखना सीखो, अगर है तो वरना स्टील सपोर्ट को रीढ़ की हड्डी जैसा तो न ही दिखाओ</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5729</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Oct 2009 02:08:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/eswami/?p=286#comment-5729</guid>
		<description>स्वामीजी, तुम्हारा लेख यहीं है। हमारी टिप्पणी भी और बाकी टिप्पणियां भी। इससे अधिक और कुछ नहीं कहना मुझे। कुछ दिन बाद इसे फ़िर पढ़ना। तब शायद यह समझने की स्थिति में हो कि तुम्हें अपने लिखने का मतलब और हमारे एतराज का मतलब समझ में आ जाये। इस बीच हो सके तो नामवर जी के बारे में भी पढ़ लेना। अपने जन्नत नशीं दादाजी की बात भी फ़िर से याद कर लेना कि दुनिया में दो तरह के आदमी होते हैं-रायचंद और करमचंद। उसी लाइन पर कभी करमचंद बनकर इस तरह का कार्यक्रम करवाना। फ़िर उसके बारे में अपनी राय बताना। फ़िर हम बतायेंगे कि उसमें क्या-क्या चिरकुटईयां तुमने कीं। हम शायद बेहतर बता सकें क्योंकि उस समय हम सिर्फ़ रायचंद होंगे।

एक बात और अगर समझ सको तो समझना कि दुनिया में दो चीजों की तुलना करने में आप अक्सर वही पाते हैं जो आप तुलना के पहले ही तय कर चुके होते हैं। 

अफ़सोस इस बात का तुमको अभी भी यह अंदाजा नहीं लग रहा कि एक व्यक्ति सरासर गलत बातों का उदाहरण देते हुये अपनी बात कहता है। उसका तुम विरोध करते हो और वह आकर तुमसे कहता है कि तुमने वही कहा जो वह कहना चाहता था। अगर ऐसा है तो कहीं न कहीं चूक है कहने में। अगर चूक न होती तो जिसका तुम विरोध करने की बात कह रहे हो वह कम से कम यह न कह पाता कि तुमने उसकी ही बात कही।

बाकी ये जो जुमले हैं:
&lt;b&gt;कुछ दिनो में मेरा चिट्ठा नादारद दिखे तो अचरज मत करना! :)  &lt;/b&gt;

लिखने की तुम्हारी उमर चली गयी। ये सब लोग शुरुआत के दिनों में लिखते हैं ताकि लोग उनको दुलराने/मनाने लगें। तुमको इन चोंचलों की कब से जरूरत पड़ गयी?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>स्वामीजी, तुम्हारा लेख यहीं है। हमारी टिप्पणी भी और बाकी टिप्पणियां भी। इससे अधिक और कुछ नहीं कहना मुझे। कुछ दिन बाद इसे फ़िर पढ़ना। तब शायद यह समझने की स्थिति में हो कि तुम्हें अपने लिखने का मतलब और हमारे एतराज का मतलब समझ में आ जाये। इस बीच हो सके तो नामवर जी के बारे में भी पढ़ लेना। अपने जन्नत नशीं दादाजी की बात भी फ़िर से याद कर लेना कि दुनिया में दो तरह के आदमी होते हैं-रायचंद और करमचंद। उसी लाइन पर कभी करमचंद बनकर इस तरह का कार्यक्रम करवाना। फ़िर उसके बारे में अपनी राय बताना। फ़िर हम बतायेंगे कि उसमें क्या-क्या चिरकुटईयां तुमने कीं। हम शायद बेहतर बता सकें क्योंकि उस समय हम सिर्फ़ रायचंद होंगे।</p>
<p>एक बात और अगर समझ सको तो समझना कि दुनिया में दो चीजों की तुलना करने में आप अक्सर वही पाते हैं जो आप तुलना के पहले ही तय कर चुके होते हैं। </p>
<p>अफ़सोस इस बात का तुमको अभी भी यह अंदाजा नहीं लग रहा कि एक व्यक्ति सरासर गलत बातों का उदाहरण देते हुये अपनी बात कहता है। उसका तुम विरोध करते हो और वह आकर तुमसे कहता है कि तुमने वही कहा जो वह कहना चाहता था। अगर ऐसा है तो कहीं न कहीं चूक है कहने में। अगर चूक न होती तो जिसका तुम विरोध करने की बात कह रहे हो वह कम से कम यह न कह पाता कि तुमने उसकी ही बात कही।</p>
<p>बाकी ये जो जुमले हैं:<br />
<b>कुछ दिनो में मेरा चिट्ठा नादारद दिखे तो अचरज मत करना! <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />   </b></p>
<p>लिखने की तुम्हारी उमर चली गयी। ये सब लोग शुरुआत के दिनों में लिखते हैं ताकि लोग उनको दुलराने/मनाने लगें। तुमको इन चोंचलों की कब से जरूरत पड़ गयी?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सिद्धार्थ जोशी</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-2#comment-5728</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ जोशी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Oct 2009 20:55:06 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/eswami/?p=286#comment-5728</guid>
		<description>दूर तक देखूं तो लगता है कि हर नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की ऑथेरिटी की जरूरत तो पड़ती ही है। उन लोगों के लिए यह अधिक मुश्किल का समय होता है जो इस संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। 
जहां तक ताकत को पहचानने की बात है, उसमें अभी लम्‍बा समय और सतत प्रयासों की जरूरत है। अब भी बहुत से नियमित ब्‍लॉगर ऐसे हैं जो गंभीर लिखने की बजाय ऐसा लिखना अधिक उपयुक्‍त मानते हैं जो धारा में है। इस बीच अगर कुछ वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर ब्‍लॉगिंग न करने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों के पास उस ऑथेरिटी को ढूंढ़ते हैं तो उसमें कुछ गलती नहीं दिखाई देती। 

यहां समस्‍या स्‍थाई भाव की है। किस चीज को पकड़कर कहेंगे, कि हम आगे बढ़ गए हैं। 

एक नया रास्‍ता शुरू किया हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का, यानि  अंग्रेजी में लेखन और सार्वभौमिक स्‍वीकृति से दूर एक अलग टापू बना लिया। अब यहां कौन देख रहा है, कौन समझ रहा है, किसे पढ़ने की पड़ी है। नितांत अकेलापन घबराहट पैदा करता है। 

ऐसा नहीं है कि साहित्‍यकारों के साथ ऐसा नहीं होता। एक बार हरीश भादाणीजी के बारे में एक आलोचक ने टिप्‍पणी की कि वे अपनी कविताओं के दृश्‍य माइथोलॉजी में ढूंढते हैं, फिर उन्‍होंने यह भी कहा कि ऐसा जरूरी भी है, क्‍योंकि एक स्‍तर पर पहुंचकर साहित्‍यकार भी अकेला पड़ जाता है और वहां वेद और पुराण ही उसकी सहायता कर पाते हैं। हिन्‍दी ब्‍लॉगरी अभी उस ऊंचाई तक तो नहीं पहुंची कि वेद और पुराणों में रूपकों को खोजकर अपना आगे का रास्‍ता तय करे लेकिन एक पीढ़ी पुरानी ऑथेरिटी की सहायता लेने की छूट तो मिलनी ही चाहिए। 

यह कुछ ऐसी स्थिति है जब आपको ऐसा निर्णय लेना हो जो आपको अज्ञात भविष्‍य की ओर लेकर जा रहा हो और आप अपने पिता या अग्रज से कोई सलाह मांगे। भले ही बाद में करें अपने मन की ही लेकिन निर्णय में आंशिक या पूर्ण रूप से आपको भागीदार मिल जाता है, कई बार विरोध के रूप में भी। 

आपकी पोस्‍ट पढ़कर लगा कि चिठ्ठाकारी सम्‍मेलन में भी यही देखने को मिला। अब आगे का रास्‍ता बन रहा है... आपकी सोच के अनुरूप हम एक दिन अपने इंडिपेंडेंट रूट पर होंगे, तब कोई नई विधा आएगी और वह भी हमसे आगे के रास्‍ते के लिए सहायता मांगेगी... मुझे विश्‍वास है उस पीढ़ी को भी ई स्‍वामी का आशीर्वाद मिलेगा...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दूर तक देखूं तो लगता है कि हर नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की ऑथेरिटी की जरूरत तो पड़ती ही है। उन लोगों के लिए यह अधिक मुश्किल का समय होता है जो इस संक्रमण काल से गुजर रहे हैं।<br />
जहां तक ताकत को पहचानने की बात है, उसमें अभी लम्‍बा समय और सतत प्रयासों की जरूरत है। अब भी बहुत से नियमित ब्‍लॉगर ऐसे हैं जो गंभीर लिखने की बजाय ऐसा लिखना अधिक उपयुक्‍त मानते हैं जो धारा में है। इस बीच अगर कुछ वरिष्‍ठ ब्‍लॉगर ब्‍लॉगिंग न करने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों के पास उस ऑथेरिटी को ढूंढ़ते हैं तो उसमें कुछ गलती नहीं दिखाई देती। </p>
<p>यहां समस्‍या स्‍थाई भाव की है। किस चीज को पकड़कर कहेंगे, कि हम आगे बढ़ गए हैं। </p>
<p>एक नया रास्‍ता शुरू किया हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का, यानि  अंग्रेजी में लेखन और सार्वभौमिक स्‍वीकृति से दूर एक अलग टापू बना लिया। अब यहां कौन देख रहा है, कौन समझ रहा है, किसे पढ़ने की पड़ी है। नितांत अकेलापन घबराहट पैदा करता है। </p>
<p>ऐसा नहीं है कि साहित्‍यकारों के साथ ऐसा नहीं होता। एक बार हरीश भादाणीजी के बारे में एक आलोचक ने टिप्‍पणी की कि वे अपनी कविताओं के दृश्‍य माइथोलॉजी में ढूंढते हैं, फिर उन्‍होंने यह भी कहा कि ऐसा जरूरी भी है, क्‍योंकि एक स्‍तर पर पहुंचकर साहित्‍यकार भी अकेला पड़ जाता है और वहां वेद और पुराण ही उसकी सहायता कर पाते हैं। हिन्‍दी ब्‍लॉगरी अभी उस ऊंचाई तक तो नहीं पहुंची कि वेद और पुराणों में रूपकों को खोजकर अपना आगे का रास्‍ता तय करे लेकिन एक पीढ़ी पुरानी ऑथेरिटी की सहायता लेने की छूट तो मिलनी ही चाहिए। </p>
<p>यह कुछ ऐसी स्थिति है जब आपको ऐसा निर्णय लेना हो जो आपको अज्ञात भविष्‍य की ओर लेकर जा रहा हो और आप अपने पिता या अग्रज से कोई सलाह मांगे। भले ही बाद में करें अपने मन की ही लेकिन निर्णय में आंशिक या पूर्ण रूप से आपको भागीदार मिल जाता है, कई बार विरोध के रूप में भी। </p>
<p>आपकी पोस्‍ट पढ़कर लगा कि चिठ्ठाकारी सम्‍मेलन में भी यही देखने को मिला। अब आगे का रास्‍ता बन रहा है&#8230; आपकी सोच के अनुरूप हम एक दिन अपने इंडिपेंडेंट रूट पर होंगे, तब कोई नई विधा आएगी और वह भी हमसे आगे के रास्‍ते के लिए सहायता मांगेगी&#8230; मुझे विश्‍वास है उस पीढ़ी को भी ई स्‍वामी का आशीर्वाद मिलेगा&#8230;</p>
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	<item>
		<title>By: eswami</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-1#comment-5727</link>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Oct 2009 19:57:56 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/eswami/?p=286#comment-5727</guid>
		<description>@गुरुदेव,

ठीक है भोले भंडारी, मै दोबारा आपका नन्दी बैल बन जाता हूं - अब कोई साण्डिया लेखन नही.
तो अब मै आपका राजा-बेटा ई-स्वामी अपनी अपेक्षाएं [आशाएं नही, अपेक्षाएं] लिख रहा हूं -

१) वो चिट्ठाकार संगोष्ठी थी. एक युनिवर्सिटी द्वारा आयोजित थी. एक पाठक के बतौर मेरे लिये उसमे से चाय पीते चंद चेहरों की तस्वीरों से ज्यादा एक चिट्ठाकार के बतौर अपने साथ सहेज लेने जैसा एक वाक्य ना था! एक वाकया ना था. ये कैसी दिशा दी जा रही है इस विधा को - आओ, मेल-मिलाप करो तफ़री करो - बस यही? आपको साहित्यकार बहुत प्रभावित करते हैं ना[मुझे भी करते हैं] तो लेखन, चिट्ठाकारी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है लेकिन उस तक पर कोई बात नही हुई - जो कुछ प्रभावित करे! तकनीकी या शुष्क विषयों को छोड ही दें.किसी एक चेहरे में कुछ नया बांटने कुछ जानने की प्यास नही दिखी! 
एक पाठक और चिट्ठाकार होने के नाते - हम जैसे कई अन्य इसे अपार्चुनिटी लॉस के रूप मे देखते हैं और दिल से दुखी होते हैं. ऐण्ड वी गॉट टू स्टॉप थिस ब्लीडिंग ऑफ़ टाईम एन्ड रीसोर्सेज. आप और रवि भाई जैसे वरिष्ठ इस बात के लिये हमारे जिम्मेदार हैं. या आगे से हमे पहले से आगाह कर दें कि चाहे ये चांसलरों के तत्वावधान मे हो रहा ये, ये तो मात्र एक चिरकुटाई-सम्मेलन है हे-हे खे-खे होगी बस! 

२) कंटेंट .. कंटेंट .. कंटेंट .. meat no fats!  आपने मीट की या ग्रीट की या चीयर्स.. जो भी किया यदि उनमे से गुलदस्तों, भाषणों और बासी बातों से ज्यादा कुछ है तो उसे सर माथे रखा जाएगा अन्यथा खारिज कर दिया जाएगा और इस वाले आयोजन को तो स्वयं उपस्थित लोग खारिज कर दिये हैं - ये विधा के लिये अच्छा नही होता इस बात का ध्यान रखा जाए. 

३) माहौल कैसा था? हल्का-फ़ुल्का? बढिया लेकिन उस हल्के-फ़ुल्के माहौल में से हमें गंभीर आऊटकम चाहिये! 
मैं दिल से चाहता हूं कि हर अच्छे ब्लागर को ५ स्टार ट्रीटमेंट मिले - क्यों ना मिले गर मेहनत की है लेकिन चिट्ठाकार का लेखन और उसका कॉंशियस दो अलग अलग चीजे नही होतीं - अमिताभ जैसे कलाकार ‘स्लमडाग मिलेनियर’ मे काम नही करते - चूंकि वे उसकी विषयवस्तु को स्वीकार नही करते, ठीक वैसे ही आपसे आपेक्षा है कि क्या आप अच्छे लेखन मे कन्नी काटते हैं? नही ना! यदि कुप्रबंधन था, विषयों का अजेंडे का अभाव था और कुछ भी कसा हुआ नही था वहां तो उसे ’चलता है’ वाले लेखन से चलाईये मत .. उसकी लफ़्फ़ाजी मत कीजिये - चाहे नेटवर्किंग मस्त होले लेकिन आपकी  ब्लागियाही छवि खराब होती है! - हां, आप उसकी छिछलेदारी मत कीजिये - लेकिन वो नौबत ना आए इसकी तैयारी रखिये और माहौल भी. आप पर सबकी निगाहें होती हैं. 

४) अंतत: आप माहौल को बनाने वाले और लामबंद करने वाले सबसे बडे घटक स्वयं होते हैं. ये ओल्ड-स्कूल प्रेम-मिलन [ क्या कहते हैं हिन्दी में प्रिती-भेंट जैसा कुछ.. हां स्नेह-सम्मेलन]  ’बडो भलो’ लगा हो! नाऊ ग्रो अप! अब आप सब कुछ रीयल-डील &quot;काम का मिलाप&quot; कीजियेगा और उस पर लाईव बताईयेगा ताकी हम जैसे भी उससे कुछ सीखें - कोई नई बात, नया फ़ंडा, वॉव फ़ैक्टर वाला - इस आयोजन से बडा वॉव फ़ेक्टर तो गिरगिट के ओपन सोर्स होने मे था. उसे गोष्ठी/संगोष्ठी/बुल-शिटोष्ठी/समारोह/सम्मेलन/आन्दोलन/क्रान्ती कुछ भी कहें लेकिन कम से कम १५-२०% कुछ काम का अत्तर निकले इसकी गुंजाईश जरूर रखें. अन्यथा हमें फ़िर वही टाईमखोटीकरण भेंट का इम्प्रेशन मिलेगा जिसने इस उपरोक्त प्रकार के क्रूर लेखन को मजबूर किया!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@गुरुदेव,</p>
<p>ठीक है भोले भंडारी, मै दोबारा आपका नन्दी बैल बन जाता हूं &#8211; अब कोई साण्डिया लेखन नही.<br />
तो अब मै आपका राजा-बेटा ई-स्वामी अपनी अपेक्षाएं [आशाएं नही, अपेक्षाएं] लिख रहा हूं -</p>
<p>१) वो चिट्ठाकार संगोष्ठी थी. एक युनिवर्सिटी द्वारा आयोजित थी. एक पाठक के बतौर मेरे लिये उसमे से चाय पीते चंद चेहरों की तस्वीरों से ज्यादा एक चिट्ठाकार के बतौर अपने साथ सहेज लेने जैसा एक वाक्य ना था! एक वाकया ना था. ये कैसी दिशा दी जा रही है इस विधा को &#8211; आओ, मेल-मिलाप करो तफ़री करो &#8211; बस यही? आपको साहित्यकार बहुत प्रभावित करते हैं ना[मुझे भी करते हैं] तो लेखन, चिट्ठाकारी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है लेकिन उस तक पर कोई बात नही हुई &#8211; जो कुछ प्रभावित करे! तकनीकी या शुष्क विषयों को छोड ही दें.किसी एक चेहरे में कुछ नया बांटने कुछ जानने की प्यास नही दिखी!<br />
एक पाठक और चिट्ठाकार होने के नाते &#8211; हम जैसे कई अन्य इसे अपार्चुनिटी लॉस के रूप मे देखते हैं और दिल से दुखी होते हैं. ऐण्ड वी गॉट टू स्टॉप थिस ब्लीडिंग ऑफ़ टाईम एन्ड रीसोर्सेज. आप और रवि भाई जैसे वरिष्ठ इस बात के लिये हमारे जिम्मेदार हैं. या आगे से हमे पहले से आगाह कर दें कि चाहे ये चांसलरों के तत्वावधान मे हो रहा ये, ये तो मात्र एक चिरकुटाई-सम्मेलन है हे-हे खे-खे होगी बस! </p>
<p>२) कंटेंट .. कंटेंट .. कंटेंट .. meat no fats!  आपने मीट की या ग्रीट की या चीयर्स.. जो भी किया यदि उनमे से गुलदस्तों, भाषणों और बासी बातों से ज्यादा कुछ है तो उसे सर माथे रखा जाएगा अन्यथा खारिज कर दिया जाएगा और इस वाले आयोजन को तो स्वयं उपस्थित लोग खारिज कर दिये हैं &#8211; ये विधा के लिये अच्छा नही होता इस बात का ध्यान रखा जाए. </p>
<p>३) माहौल कैसा था? हल्का-फ़ुल्का? बढिया लेकिन उस हल्के-फ़ुल्के माहौल में से हमें गंभीर आऊटकम चाहिये!<br />
मैं दिल से चाहता हूं कि हर अच्छे ब्लागर को ५ स्टार ट्रीटमेंट मिले &#8211; क्यों ना मिले गर मेहनत की है लेकिन चिट्ठाकार का लेखन और उसका कॉंशियस दो अलग अलग चीजे नही होतीं &#8211; अमिताभ जैसे कलाकार ‘स्लमडाग मिलेनियर’ मे काम नही करते &#8211; चूंकि वे उसकी विषयवस्तु को स्वीकार नही करते, ठीक वैसे ही आपसे आपेक्षा है कि क्या आप अच्छे लेखन मे कन्नी काटते हैं? नही ना! यदि कुप्रबंधन था, विषयों का अजेंडे का अभाव था और कुछ भी कसा हुआ नही था वहां तो उसे ’चलता है’ वाले लेखन से चलाईये मत .. उसकी लफ़्फ़ाजी मत कीजिये &#8211; चाहे नेटवर्किंग मस्त होले लेकिन आपकी  ब्लागियाही छवि खराब होती है! &#8211; हां, आप उसकी छिछलेदारी मत कीजिये &#8211; लेकिन वो नौबत ना आए इसकी तैयारी रखिये और माहौल भी. आप पर सबकी निगाहें होती हैं. </p>
<p>४) अंतत: आप माहौल को बनाने वाले और लामबंद करने वाले सबसे बडे घटक स्वयं होते हैं. ये ओल्ड-स्कूल प्रेम-मिलन [ क्या कहते हैं हिन्दी में प्रिती-भेंट जैसा कुछ.. हां स्नेह-सम्मेलन]  ’बडो भलो’ लगा हो! नाऊ ग्रो अप! अब आप सब कुछ रीयल-डील &#8220;काम का मिलाप&#8221; कीजियेगा और उस पर लाईव बताईयेगा ताकी हम जैसे भी उससे कुछ सीखें &#8211; कोई नई बात, नया फ़ंडा, वॉव फ़ैक्टर वाला &#8211; इस आयोजन से बडा वॉव फ़ेक्टर तो गिरगिट के ओपन सोर्स होने मे था. उसे गोष्ठी/संगोष्ठी/बुल-शिटोष्ठी/समारोह/सम्मेलन/आन्दोलन/क्रान्ती कुछ भी कहें लेकिन कम से कम १५-२०% कुछ काम का अत्तर निकले इसकी गुंजाईश जरूर रखें. अन्यथा हमें फ़िर वही टाईमखोटीकरण भेंट का इम्प्रेशन मिलेगा जिसने इस उपरोक्त प्रकार के क्रूर लेखन को मजबूर किया!</p>
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		<title>By: अर्कजेश</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286/comment-page-1#comment-5726</link>
		<dc:creator>अर्कजेश</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Oct 2009 18:39:02 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/eswami/?p=286#comment-5726</guid>
		<description>जो भी हो यह ब्लॉग पोस्ट ब्लॉगर सम्मान चेतना की प्रस्थान बिन्दु साबित होगी ।  
आगे कोई सरकारी तत्व इस तरह ब्लॉगरों का फ़ायदा नहीं उठा पायेगा ।  ब्लॉगरजन इस सम्मेलन की सीख से भरे हुए रहेंगे । और पहले से ही चिट्ठापुर के वासी जागते रहो की गुहार मचा देंगे ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जो भी हो यह ब्लॉग पोस्ट ब्लॉगर सम्मान चेतना की प्रस्थान बिन्दु साबित होगी ।<br />
आगे कोई सरकारी तत्व इस तरह ब्लॉगरों का फ़ायदा नहीं उठा पायेगा ।  ब्लॉगरजन इस सम्मेलन की सीख से भरे हुए रहेंगे । और पहले से ही चिट्ठापुर के वासी जागते रहो की गुहार मचा देंगे ।</p>
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