चिट्ठाचर्चा पर हजारवीं पोस्ट सजी है. इस सामूहिक चिट्ठे के आरंभ की कहानी भी अपने आप मे हिन्दी चिट्ठाकारों की उस ठसक का प्रमाण है, जिसने समूह को इस मुकाम पर पहुंचाया है.
आज जब चिट्ठाचर्चा की तुलना देसीपंडित से करता हूं तो पाता हूं कि आज अंग्रेजी वालों के पास भी इसकी टक्कर का कोई उपक्रम मौजूद नही है!
सबक:
चिट्ठाचर्चा के लंबे इतिहास का जिक्र होते ही अक्षरग्राम, अनुगूंज, ब्लागनाद, बुनो कहानी, संजय, सर्वज्ञ, चिट्ठाविश्व व नारद जैसे अनेको प्रपंचो और उनसे जुडे किस्सों की यादें भी ताजा हो जाती हैं. पॉडभारती, इन्डिब्लॉगीज़ और निरंतर के लिंक्स को एक बार फ़िर कुरेद लेने का मन हो आता है. इनमे से कई प्रपंचों के तो अब जीवाश्म भी नही मिलते, ऐसे में चिट्ठाचर्चा की ये लंबी पारी सचमुच प्रशंसनीय है.
चिट्ठाचर्चा इस बात का प्रमाण है कि लंबी अवधि में वे ही उपक्रम चलते हैं जिन्हें मात्र आधारभूत संरचना बनाने वाले सृजनशील विश्वकर्माओं के अलावा समर्पित संरक्षक भी मिलें. यदि ऐसा हुआ होता तो हमारे कई अन्य उपक्रम आज भी टिके होते.
यादें:
वो एक अगल दौर था. डिसकशन फ़ोरम्स पर हिन्दी के सेक्षन बनवाना, अपने हिन्दी टूल्स को अंग्रेजी फ़ोरम्स पर रिलीज़ कर देना, हिन्दी मे टिप्पणियां छोडना और लोगों को “थिंक फ़ोनेटिक” कह कर हिन्दी के ट्रांसलिटरेशन टूल्स पकडा देना और “क्ष” कैसे बनता है “ज्ञ” कैसे बनता है आदी समझाना – ये सब उस समय के हमारे हिन्दी प्रसार के शगल थे जिस दौर में चिट्ठाचर्चा का जन्म हुआ था.
तब जीतू ने अपने ब्लाग के मेटा टैग्स में वे तमाम ‘खास’ शब्द तक डाल रखे थे जो खास सामग्री ढूंढते लोगों तक को उनके चिट्ठे तक पहुंचा देते थे. चिट्ठाकार एक दूसरे की आई.पी. एड्रेस जानते थे और इस प्रकार के की वर्ड सर्च करते जब किसी आपस वाले के चिट्ठे पर पहुंचते तो बडे मजे ले कर खुलासे किये जाते थे. कितना कुछ याद आ रहा है.
उपर याद किये गए तमाम नाम इस बात का भी प्रमाण है कि मात्र ई-मेल द्वारा संपर्क के जरिये कई बडे काम अंजाम दे दिये गए.
तारीफ़:
चिट्ठाचर्चा आसान नही है. हिन्दी चिट्ठाजगत के कई अतिरथी और महारथी चिट्ठाचर्चा करने के नाम पर भाग खडे होते हैं. इस काम को करने के लिये रुचि, धैर्य, समभाव और समय सबकुछ चाहिए. यह एक कठिन काम है और इसका जिम्मा लेने वाला हर व्यक्ति जानता है कि उसकी चर्चा को गुरुदेव [अनूप शुक्ला] की कसौटी पर कसा जाएगा.
यही वजह है कि हर चर्चाकार अपना अच्छा प्रभाव छोडना चाहता है, अपनी अनूठी छाप छोडना चाहता है यह सत्य उनकी मेहनत मे दिखता है. गुरुदेव चाहे प्रोत्साहित करें लेकिन मूंहफ़ट टिप्पणीकार कन्नी काटने वालों को बक्शते नहीं हैं, ये जानते हुए चर्चा करना बडी हिम्मत का काम है!
बात, जो मै समझ नही पाता हूं वो ये है कि विचारों के दोहराव और बासीपन से भरी ढेरों पोस्ट पढने के बाद आप उनपर खुन्नस निकाले बिना और उन्हे नजर-अंदाज कर के कुछ पोस्ट्स का ही जिक्र कैसे कर पाते हैं? असीम सहनशील कर्म है! स्वयं को आप इतनी पीडा कैसे दे पाते हैं?
कई बार दिखता है कि चर्चाकार की व्यक्तिगत रुचियां और सरोकार चिट्ठों के चुनाव पर अपना असर दिखाते हैं – ये एक बहुत ही मानवीय बहुत ही ऑर्गेनिक पहलू है.ये तो होगा ही. फ़िर भी, मुझे ताज्जुब होता है कि क्या किसी का कभी कुछ ऐसा लिखने का मन नही किया-
“आज ४५ कवियों ने खुल्ले मे की, १५ मुहब्बत पे रोए, २० मुहब्बत में रोए, कुछ ने कोटेशन्स का कविताफ़िकेशन किया. कविताएं पढ कर ये स्पष्ट हुआ की बहुधा डरपोक आदमी छायावादी हो जाता है, सीधे बोलने में उधड लेती है.
जिसने दूसरों कवियों के यहां सबसे ज्यादा वाह-वाह की, आज का स्टार कवि हो गया है. ब्लागवाणी पर आज अधिक टिप्पणी पाए लेखो मे खोज लो पहचान मे आ जाएगा, इधर उल्लेख कर के मंच के अभिजात्य का टंडीराकरण नही करना मुझे!”
या
“अगर एग्रीगेटर्स में क्राईटेरिया बे्स्ड सॉर्टिंग उपलब्ध ना होती तो आज की चर्चा मात्र २ घंटे ५५ मिनट में खत्म करने मे मेरी वाट लग जाती. ये दिखाने के लिये की मै सबको पढता हूं, मैने रेंडमली चिट्ठाजगत की नई पोस्ट का स्वागत करें वाली मेल मेसे कुछ नयों का जिक्र भी करना है. अगर मेरी हिंग्लिश आपको त्रस्त कर रही है तो बता दूं कि १५ मिनट मे दफ़्तर के लिये निकलना है और शब्दकोश का सर्वर आज स्लो है.”
या
“जी चाहता है आज ऐसे चिट्ठों की चर्चा करूं जिन्हे दर-असल लिखना बंद कर देना चाहिए .. मुझे लगता है आज का दौर ही ऑसमली बैड परोसने का है लोगों का टेस्ट ही खराब हो गया है, स्टीवन स्पीलबर्ग की २०० मिलियन मे बनी ट्रांसफ़ार्मर्स २, fmylife.com, रियालिटी शोज़, दुनिया की इकॉनोमी सबकुछ तो हैं ऑसमली बैड.
ऐसे में एक ऑसमली बैड चिट्ठों की चर्चा हाजिर है.. मै जानता हूं की ऐसा कर के मैं उनका तुगलकी तंत्र मजबूत करूंगा लेकिन मैं अपने दर्द सहने की सीमा जानना चाहता हूं शायद उनका अतीरेक भी!”
सचमुच यार दिल पे हाथ रख के कह दो कि कभी ऐसा कुछ लिख कर मिटाया नहीं आपने?
वैसे होता है कि कभी कभी “ऑसमली बैड” पोस्ट को अधिक तवज्जो मिल जाती है, मैने स्वयं अनुभव किया है कि कुछ चर्चाओं मे चर्चाकार बहुत कुछ समेटने के दबाव में पोस्ट की सबसे दमदार बात का जिक्र करना भूल कर कम महत्वपूर्ण हिस्से की चेप कर जाता है. लेकिन वो भी क्या करें .. अब तादाद ही इत्ती बढ गई है.
एक बात जो कहीं कही नही गई है:
चिट्ठाचर्चा का महत्व तब पता चलता है जब कोई लोकप्रिय एग्रीगेटर कुछ समय के लिये बिस्तर पकड ले. ऐसे मे चिट्ठाकारी करने वाले की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं आप – चर्चाकार को सचमुच गागर मे सागर भरना होता है सागर का सेंपल नहीं. और वक्त आने पर चर्चाकारों ने ये जिम्मा भी बखूबी निभाया है. ऐसे में गुरुदेव और कई अन्य “मैं हूं ना” मोड मे आ जाते हैं.
ये मानवीय जीवटता का वो पहलू है जिसको सचमुच नमन करता हूं मैं.
विकल्प:
चिट्ठाचर्चा की तर्ज पर अन्य कई प्रयत्न किये जाते रहे हैं लेकिन वे उतने सतत नही रह पाए हैं – आशा है विकल्प हमेशा मौजूद रहेंगे मात्र विकल्प होने के लिये नहीं पठनीय व विश्वसनीय होने के लिये भी. बढते हुए समूह मे विकल्पों को हमेशा स्वागत किया जाता है.
शुभकामनाएं:
चिट्ठाचर्चा समूह को हार्दिक शुभकामनाएं!





सहमत हूँ .. बिलकुल स्पस्ट लिखा है आपने.
ये दुबारा पढ़ना मजेदार रहा-
किसी चीज को पटरा करने के दो ही तरीके होते हैं:-
1.उसको चीज को टपका दो(जो कि संभव नहीं है यहां)
2.बेहतर विकल्प पेश करो ताकि उस चीज के कदरदान कम हो जायें.
झटकों में ऊर्जा होती है.उसका सदुपयोग किया जाना चाहिये.बात बोलेगी हम नहीं.ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते.पता नहीं अगली मिर्ची कब लगाये कोई.
चर्चा का काम मुझे सदैव आनन्दित करता रहा। मौज वहां भी लेते रहे। मैंने देखा कि और लोगों ने भी जो चर्चायें की हैं उनमें से कई लोगों की चर्चायें उनकी कुछ पोस्टों से सुन्दर हैं।
वैसे तो यह काम गधा गिरी का है । लोगों के लिंक लादे-लादे घूमो और इधर-उधर पहुंचाओ। लेकिन मुझे मजा आता रहा। एक झटके से 1000 पोस्ट नहीं हुई। कई बार बंद होती खुलती रही चर्चा की दुकान। बाद में जब एहसास हुआ कि दुनिया का कोई संकलक इस मानवीय संवेदन की भरपाई नहीं कर पायेगा जो चर्चा कर सकती है तो लग लिये और लगे रहे।
अब देखो कब तक बजता है बाजा।अब तो पूरी बारात है। कई बाराते हैं।
हम भी आप से बिल्कुल सहमत हैं…।:)
चिट्ठाचर्चा समूह को हार्दिक शुभकामनाएं ही दे सकते हैं हम भी! बाकी बराएण है जो, वो भी अपना बैण्ड तो बजायेंगी ही..कब लोग उस पर नाचने लगें यह कहना मुश्किल है तो कमतर तो न हीं आंक पायेंगे उन्हें. सब लोगों की चाह है और… !!
तीन चार घंटे खपा कर बदले में गालियाँ खाना साहस का काम है. अतः चिट्ठाचर्चा अब तक जारी है क्योंकि इसे साहसी लोग चला रहे हैं.
बधाई. शुभकामनाएं.
आपमें एक अजीब नेसर्गिक गुण है (या स्वंय अर्जित किया हुआ )…आपकी भाषा प्रवाह किसी भी लेखक को कोम्प्लेक्स दे सकता है …ओर उसपे ये गजब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर .मसलन बानगी देखिये
“आज ४५ कवियों ने खुल्ले मे की, १५ मुहब्बत पे रोए, २० मुहब्बत में रोए, कुछ ने कोटेशन्स का कविताफ़िकेशन किया. कविताएं पढ कर ये स्पष्ट हुआ की बहुधा डरपोक आदमी छायावादी हो जाता है, सीधे बोलने में उधड लेती है.”
या ये
“जी चाहता है आज ऐसे चिट्ठों की चर्चा करूं जिन्हे दर-असल लिखना बंद कर देना चाहिए .
बस आप जब टंकी पे चढ़ जाते है तब लगता है इस उम्र में आप भी हठी है ….
अक्षरग्राम जैसे कई प्रपंचों की बस अब यादें ही बाकी हैं, उम्मीद करता हूँ इनकी वापसी होगी।
चिट्ठाचर्चा के पाठक के तौर पर जुड़े रहे हैं, सुनायेंगे कभी अपनी यादें भी।
प्रवहित भाषा । हम नये नवेलों को तो आप जैसे पुरनिये ही बेहतर संस्कार दे सकते हैं ।
आत्मीय विश्लेषण ! निर्मम विश्लेषण ! बेहतरीन विश्लेषण ! .
ऐसा तो मैंने भी कई बार सोचा है कि जिन्हें लिखना बंद कर देना चाहिए उनकी चर्चा करू.. पर एक बार ऐसी ही किसी ब्लॉग की चर्चा करने पर उनके अनुयायी की गालिया झेल चुका हूँ.. क्योंकि इस देश में दल बनाकर आन्दोलन करना सात मौलिक अधिकारों में आता है..
“अगर मेरी हिंग्लिश आपको त्रस्त कर रही है तो बता दूं कि १५ मिनट मे दफ़्तर के लिये निकलना है और शब्दकोश का सर्वर आज स्लो है.”
जय हो!
कुश सही कहता है कि “इस देश में दल बनाकर आन्दोलन करना सात मौलिक अधिकारों में आता है..”.. सोच रहा हू कि कोई दल जाइन कर लू..