11 responses to “चिट्ठाचर्चा: ये दुरूह आत्मपीडक कर्म कर कैसे लेते हैं आप?”

  1. Lovely

    सहमत हूँ .. बिलकुल स्पस्ट लिखा है आपने.

  2. अनूप शुक्ल

    ये दुबारा पढ़ना मजेदार रहा-

    किसी चीज को पटरा करने के दो ही तरीके होते हैं:-

    1.उसको चीज को टपका दो(जो कि संभव नहीं है यहां)

    2.बेहतर विकल्प पेश करो ताकि उस चीज के कदरदान कम हो जायें.

    झटकों में ऊर्जा होती है.उसका सदुपयोग किया जाना चाहिये.बात बोलेगी हम नहीं.ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते.पता नहीं अगली मिर्ची कब लगाये कोई.

    चर्चा का काम मुझे सदैव आनन्दित करता रहा। मौज वहां भी लेते रहे। मैंने देखा कि और लोगों ने भी जो चर्चायें की हैं उनमें से कई लोगों की चर्चायें उनकी कुछ पोस्टों से सुन्दर हैं।

    वैसे तो यह काम गधा गिरी का है । लोगों के लिंक लादे-लादे घूमो और इधर-उधर पहुंचाओ। लेकिन मुझे मजा आता रहा। एक झटके से 1000 पोस्ट नहीं हुई। कई बार बंद होती खुलती रही चर्चा की दुकान। बाद में जब एहसास हुआ कि दुनिया का कोई संकलक इस मानवीय संवेदन की भरपाई नहीं कर पायेगा जो चर्चा कर सकती है तो लग लिये और लगे रहे।

    अब देखो कब तक बजता है बाजा।अब तो पूरी बारात है। कई बाराते हैं। :)

  3. anitakumar

    हम भी आप से बिल्कुल सहमत हैं…।:)

  4. समीर लाल ’उड़न तश्तरी’ वाले

    चिट्ठाचर्चा समूह को हार्दिक शुभकामनाएं ही दे सकते हैं हम भी! बाकी बराएण है जो, वो भी अपना बैण्ड तो बजायेंगी ही..कब लोग उस पर नाचने लगें यह कहना मुश्किल है तो कमतर तो न हीं आंक पायेंगे उन्हें. सब लोगों की चाह है और… !!

  5. संजय बेंगाणी

    तीन चार घंटे खपा कर बदले में गालियाँ खाना साहस का काम है. अतः चिट्ठाचर्चा अब तक जारी है क्योंकि इसे साहसी लोग चला रहे हैं.

    बधाई. शुभकामनाएं.

  6. dr.anurag

    आपमें एक अजीब नेसर्गिक गुण है (या स्वंय अर्जित किया हुआ )…आपकी भाषा प्रवाह किसी भी लेखक को कोम्प्लेक्स दे सकता है …ओर उसपे ये गजब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर .मसलन बानगी देखिये

    “आज ४५ कवियों ने खुल्ले मे की, १५ मुहब्बत पे रोए, २० मुहब्बत में रोए, कुछ ने कोटेशन्स का कविताफ़िकेशन किया. कविताएं पढ कर ये स्पष्ट हुआ की बहुधा डरपोक आदमी छायावादी हो जाता है, सीधे बोलने में उधड लेती है.”
    या ये
    “जी चाहता है आज ऐसे चिट्ठों की चर्चा करूं जिन्हे दर-असल लिखना बंद कर देना चाहिए .

    बस आप जब टंकी पे चढ़ जाते है तब लगता है इस उम्र में आप भी हठी है ….

  7. ePandit

    अक्षरग्राम जैसे कई प्रपंचों की बस अब यादें ही बाकी हैं, उम्मीद करता हूँ इनकी वापसी होगी।
    चिट्ठाचर्चा के पाठक के तौर पर जुड़े रहे हैं, सुनायेंगे कभी अपनी यादें भी।

  8. हिमांशु

    प्रवहित भाषा । हम नये नवेलों को तो आप जैसे पुरनिये ही बेहतर संस्कार दे सकते हैं ।

  9. प्रियंकर

    आत्मीय विश्लेषण ! निर्मम विश्लेषण ! बेहतरीन विश्लेषण ! .

  10. कुश

    ऐसा तो मैंने भी कई बार सोचा है कि जिन्हें लिखना बंद कर देना चाहिए उनकी चर्चा करू.. पर एक बार ऐसी ही किसी ब्लॉग की चर्चा करने पर उनके अनुयायी की गालिया झेल चुका हूँ.. क्योंकि इस देश में दल बनाकर आन्दोलन करना सात मौलिक अधिकारों में आता है..

  11. Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)

    “अगर मेरी हिंग्लिश आपको त्रस्त कर रही है तो बता दूं कि १५ मिनट मे दफ़्तर के लिये निकलना है और शब्दकोश का सर्वर आज स्लो है.”
    जय हो! :)
    कुश सही कहता है कि “इस देश में दल बनाकर आन्दोलन करना सात मौलिक अधिकारों में आता है..”.. सोच रहा हू कि कोई दल जाइन कर लू..

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