कभी कभी अपने चिट्ठे पर लिखा कुछ, दोबारा पढ लेना आनन्द देता है. उससे अधिक आनन्द देती है कोई ऐसी टिप्पणी जिसमे अपने मनपसंद हिस्से की ही बानगी मिल जाए.
इटालियन कवि एन्टोनियो पोर्शिया कहते हैं – “मुझे पता है मैने तुम्हे क्या दिया, तुमने क्या लिया वो पता नहीं”. इसीलिये जब लिखी बात पहुंच जाती है, पावती मिल जाती है, तसल्ली हो जाती है!
अपवाद स्वरूप किसी लेख पर इतनी उदार प्रशंसा मिल जाती है कि सफ़ाई देने का मन हो आता है! डॉ. अनुराग ने टिप्पणी की “आपमें एक अजीब नेसर्गिक गुण है (या स्वंय अर्जित किया हुआ )…आपकी भाषा प्रवाह किसी भी लेखक को कोम्प्लेक्स दे सकता है …ओर उसपे ये गजब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर .”
इन्टरनेट के इस कडीप्रद युग में अपने लेखन को लेकर कोई मुगालता या खुशफ़हमी भी तो नही पाली जा सकती. अत: मुझे लगता है कि इस पर सफ़ाई देना बहुत जरूरी है. चूंकि ये मात्र धन्यवाद देने वाली प्रशंसा नही है.
सुनील गावस्कर से किसी ने पूछा बॉल चाहे जैसी आए, स्ट्रेट ड्राईव्स कैसे लगा लेते हैं? तो उनका जवाब था “गल्ली क्रिकेट”!
बचपन में अपने घर की गली मे क्रिकेट खेल चुका हर व्यक्ति जानता है, कि जब तक सीधे पटिये नही चलाए, रन नही मिले. तो बचपन में जो सीमितताएं थी उन्होने एक फ़ायदा दे दिया. हां बाकी कलात्मकता परिपक्वता के साथ आ जाती है.
ये आम आदमी का भी सच है. मेरे लिये, सीधे इन्टरनेट पर लिखना गल्ली-क्रिकेट खेलने जैसा था. डिसकशन फ़ोरम्स, ई-मेल ग्रुप्स और फ़िर तकनीकी चिट्ठाकारी में साहित्यिक नही, शतरंजी लेखन चलता है – बात को आगे बढाता हुआ – लेन-देन करता हुआ. कुछ समेटा हुआ कुछ सटकाता हुआ. सीखता हुआ ढलता हुआ. अमित गुप्ता को देखिये वो भी ऐसा ही लिखता है – आपको कभी बडा प्यारा लगेगा और कभी बडा लडाका. संजय बैंगाणी के अपेक्षाकृत सभ्य और सौम्य लेखन में भी इसकी हल्की सी झलक मिलेगी आपको.
फ़ोरम्स पर अगर लेख या संदेश में मौलिकता, ऊर्जा और गति नही है तो वो प्रत्युत्तर देने लायक नही पाया जाता. कई बार एक व्यक्ति को काफ़ी देर तक अपनी हांकने का पूरा मौका दे कर प्रत्युत्तर में सीधे गलाघोंट लेखन किया जाता है. पंगेबाजी को छोड दें तो चिट्ठाकारी मे उस प्रकार के लेखन से निजात है – ये स्वांत:सुखाय है लेकिन ये भी प्रवाहमय होने की मांग से बरी नही है.
तो कथ्य को प्रवाहमय बनाने की कोशिशों में मै क्या-क्या चोरी-चकारी, नकल-पट्टी और उठा-पटक ट्राई मार चुका हूं, साझा कर लेता हूं-
पहली ट्रिक – चोरी:
दुनिया के तमाम जबरदस्त लेखकों और नेताओं मे एक गुण समान होता है – वे संवाद-विवाद-कुशल, वाक-चातुर और विद्वान होते हैं.
वो जब लिखते हैं तो ऐसे जैसे अंधेरे में कोबरा डंस कर गायब हो जाए. स्ट्राईक-आऊट!
जो लोग आज चिट्ठाकारी को अक्सर त्वरित लेखन, क्षणिक उच्छवास की अभिव्यक्ति आदी के लेबल देते हैं उन्हें समझना चाहिए की सूक्तियां लिखने वाले तमाम महान विचारक तेजी से गहन सोच कर अपनी बात कह चुकते थे – आज संप्रेषण की गति ही तेज है. अगर अपनी बात सीधे कह चुकना है और वो भी ठीक से, तो मुझे ऐसी शैली चुराना होगी– ये चुनौती देनी होगी स्वयं को और लेकर चलना होगा की शुरु मे तो ९८.८६% बार असफ़ल ही होंगे हम!
एफ़ोरिस्म कलेक्शन[सूक्तियां] पढता तो हूं लेकिन सारी सूक्तियां ‘सुभाषित’ नही होतीं.
“Silence is golden” बॉर्डर-लाईन प्रवचनात्मक है. इससे बचना चाहता हूं. हिन्दी चिट्ठाकारी में इस प्रकार का लिखने वाले बहुत हैं.
“Life is but a moment, death also is but another.” उससे बेहतरीन है, ये फ़िलॉसोफ़िक है, हल्का भी है भारी भी और इसमे डार्क ह्यूमर का टच है – इस तरह से सोचने की कोशिश, इस शैली को चुराने की कोशिश करता हूं.
फ़िर बीते हुए महान लेखकों पे सवासेर कौन हैं? आने वाले कल के महान लेखक! हैना!!
मेरा देखना रहा है कि, सूक्तियां लिख चुके महान लेखक और आज के अल्हड किशोर बहुत अलग अलग तरीके से सोचते हैं. सोचना भी हुआ. लेकिन ज्यादा मजेदार तरीके से हमेशा अल्हड किशोर ही सोचते हैं. वो कुछ अलग प्रकार से कल्पनाशील होते हैं.
अत: सूक्तियां पढने से ज्यादा मजा आता है दो-तीन माह मे एक बार कुछ देर IRC quote database पढने में. इन्टरनेट पर रिले चैट करते समय जब कोई बहुत मजेदार बात लिख देता है तो उसे एक खास डाटाबेस मे सहेजने के लिये भेजा जाता है. यह डाटाबेस एक जबरदस्त स्रोत है. कल्पनाशीलता भरे वाक्य विन्यास और कुछ हट कर कहते-सोचते लोगों को पढ कर अपने लकीर के फ़कीर छाप सोचने के तरीके से कुछ देर ही सही निजात मिल जाती है.
बानगी देखिये -
“<Jelena> Silence is golden. Duct tape is silver.”
“<xterm> The problem with America is stupidity. I’m not saying there should be a capital punishment for stupidity, but why don’t we just take the safety labels off of everything and let the problem solve itself?”
ये आधुनिक सूक्तियां हैं. हमारी हिन्दी चिट्ठाकारी ने भी कुछ दिया है – मसलन “टंकी” – आने वाले समय में बस जिक्र ही काफ़ी होगा!
स्वीकारता हूं की इस प्रकार का की चीज़ पढना मुझे आनंद देता है – चूंकी ये कल्पनाशील, ऊर्जावान और गतिमान कथ्य है! इससे भी सीखने की ट्राई मारता हूं!
दूसरी ट्रिक- नकल:
प्रकाशन की त्वरितता में कला का ह्वास देखने वाले कई हिन्दी साहित्य प्रेमी कुछ इस प्रकार से सोचते हैं – “जैसे कलात्मक हॉकी को एस्ट्रोटर्फ़ नें पॉवर प्ले में बदल दिया और उसका सत्यानाश कर दिया, वैसे इन्टरनेट भी लेखन की कलात्मकता को बदल देगा उसे कमतर कर देगा”.
अपने अनुभव के आधार पर मै कह सकता हूं कि ये ठीक वैसा मामला नही है. बल्कि जैसे शास्त्रीय गायक को जो काम करने के लिये १ घंटा चाहिए, बॉलीवुड की फ़िल्म में किसी राग पर आधारित गायन करने वाले को वैसा ही प्रभाव छोडने के लिये मात्र पांच मिनट मिलते हैं. (और अक्सर वो फ़िर भी अपना प्रभाव छोड जाते हैं.) – अब चुनौती है तो टेकनीक भी चाहिये होगी और टेकनीक है तो उसकी नकल भी होगी. आज विकीपीडिया पर लिखे गए लेख देखिये आप – बहुत आम लोगों ने बहुत जल्दी बहुत अच्छा लिखना सीखा है – और उन्होने नि:संकोच अच्छी शैलियों का अनुसरण [नकल कह लीजिये] किया है. ये तो उच्छावासी लेखन नही है न – विकी पर योगदान देने वालों का बडा प्रतिशत चिट्ठाकारी भी करता है.
नकल करने में भी इंजीनियरिंग लगती है – इन्टरनेट पर चिट्ठा लेखन की भी अपनी इंजीनयरिंग है, और गुणवत्ता के पैमाने भी वैसे ही हैं – वही प्रिसिजन और एक्युरेसी वाले पैमाने! चिट्ठाकारी में एक्युरेसी है किसी एक मुद्दे पर, एक बात को, सही तरह से एक बार कह देना. और प्रिसीजन है आदत – हर बार, जब भी कहो टारगेट को लगातार सही हिट कर सको!
फ़िर भी पठनीय वो नही होगा जो हर बार अपनी सही बात ज्यादा लोगो तक ज्यादा अच्छे से पहुंचा पाएगा.
पठनीय वो होगा जो जरूरी बात बिना गरिष्ठ हुए, बिना विरल हुए, पढने,देखने,सुनने की सहज गति में ठीक ध्येय तक पहुंचा दे. कई बार मेरे लेखन से अधिक चित्रों के चुनाव की प्रशंसा हुई – आज के पाठकों की मल्टीमीडिया सजगता देखने वाली है.
फ़िर भी कोई आए और पढे उसके लिये भाषा का प्रवाह बना रहना चाहिए विषय चाहे जो हो. मतलब फ़िर वही है – बॉल चाहे जैसी आए रनो का प्रवाह चाहिये तो दिशा साध के सही स्पीड से स्ट्रेट ड्राईव करो – बार बार लगातार! इसका ये भी मतलब है कि आप चाहे जिस विषय पर लिख रहे हैं, थाली के बैंगन किस्म का लेखन नही किया जा सकता – विषयवस्तु समेत सबकुछ जनता की निगाह मे हैं – आपकी शैली भी, चित्रों का चुनाव भी और आपके चिट्ठे का कलेवर भी.
लेखन की टेकनीक होती हैं और वो काम भी करती हैं ये सिद्ध करना चाहता हूं. यदी मै खुद से और पाठकों से बेईमानी करूं तो आराम से ४०-५० टिप्पणियां कबाडने वाले लेख लिख सकता हूं. ऐसे प्रयोग किये हैं मैने और सफ़ल हुआ हूं.
लेकिन वो अलग किस्म की टेकनीक्स हैं. उनसे पहले कुछ दूसरी शुरुआती तकनीकें हैं – वाक्य सरंचना की और लेख सरंचना की. नौ रसों, छ: अलंकारों के कॉम्बिनेशन और भाषाई उठापटक की, जो हमेशा काम करती हैं प्रवाह चाहे ना बने उसका आभास जरूर देती हैं -
“राम को माँ ने उठाया और वो अपना बस्ता ले कर स्कूल की ओर चला गया” [शान्त रस] के साथ फ़टाफ़ट गौण किस्म की खिलवाड की जा सकती है -
“माँ ने राम के नीचे से बिस्तर हटाया, ऊपर से बस्ता लगाया, स्कूल की ओर धकेला” [माँ की पॉवर दर्शाने के लिये, हास्य]
“माँ के जगाते ही, तरकश सा बस्ता धारण कर राम ने स्कूल की ओर कूच कर दिया” [उपमा – राम का उत्साह दर्शाने के लिये]
“..मॉं ने बस्ते का बोझ लादा, स्कूल पहुंचने तक राम का राम नाम सत्य होता रहा” [करुण, माईल्ड लेयरिंग]
आदी.
प्रवाह बनाने के लिए ऐसी तकनीक का प्रयोग किया है मैने – जैसे – यहां पर – “मेरे कमरे में वो पोस्टर लगे रह देने कि उनकी मौन अनुमति में ही अपने ‘जवान’ होने चुकने की पूंगी फ़ूंक फ़ूंक कर हांफ़ता मैं, अपने नि:श्वास की “टूँऽऽऽ”-स्वरूप पराध्वनी मन ही मन सुन गया – सफ़लता अंतत:!”
जब कहीं कोई वाक्य विन्यास अपील करता है, उसकी सरंचना और शैली की नकल करने में मै पीछे नही हटता, हिन्दी का हो या अंग्रेजी का! जिसने की सरम उसके फूटे करम!
तीसरी ट्रिक: चेलागिरी
मुझे हास्य या विनोद जितना पसंद है व्यंग्य उतना ही नापसंद है – हां मैं कभी कभी व्यंग्य करता हूं लेकिन मुझे लगता है कि व्यंग्य कटुता का ही एक परिष्कृत नाम है. इसलिये मैं कभी भी व्यंग्यकारों का बडा फ़ैन नही बन पाया. हां हास्य आप स्वयं को विषयवस्तु से ऊपर या नीचे रख कर लिख सकते हैं.. लेकिन व्यंग्य से फ़िर भी बचा जा सकता है.
Humor is the affectionate communication of insight.
Leo Rosten
Satire is focused bitterness.
Leo Rosten
ठीक वैसे ही यदि मीर, मोमिन या गालिब से हल्काफ़ुल्का कोई नाम हो तो उसे शायर-कवि कहने में मुझे कुछ वैसा ही महसूस होता है जैसा किसी रेडिकल मुस्लिम को आजकल वंदेमातरम गाने मे होता होगा.
मुझे लगता है कि कोई बात अपने आप मे यदि काव्यात्मक है तो वो दिख जाएगी. वर्डप्रेस एक साफ़्टवेयर है जिसके बानाने वाले कहते हैं “कोड इज़ पोएट्री” ये कथन ही जितना सच है उतना काव्यात्मक भी है – बिना किसी कोशिश के. व्यंग्य भी ऐसा ही होता है – कोई सच स्वयं व्यंग्य हो सकता है. बिना लेखक की कोशिश के कि वो व्यंग्य लगे! उस पर कोई रोक नही है.
इसीलिये मैं दूसरे बिंदास, बेलैस और अच्छे चिट्ठाकारों को मनोयोग से पढता हूं और उनकी शैली से मन ही मन बिल्कुल चेला बन कर सीखने की कोशिश जरूर करता हूं. (कितना सीख पाया हूं वो डिप्रेशन की कोई गोली पहले खाने के बाद लिखा जा सकता है.) लेकिन प्रवाह के लिये बिंदास,बेलौस,भदेस लगने के भय को हटाना होगा, बल्कि उसे कई बार अपनाना भी होगा!
चौथी और सबसे बडी ट्रिक: मन का रेडियो बजने दे ज़रा!
मै खुद कई बार सोचता हूं की इस “भाषा के प्रवाह” का जनक क्या है? इसका स्रोत क्या है! मजेदार बात तो ये है कि इस प्रवाह का विश्लेषण शुरु होते ही मामला कुछ गरिष्ठ हो जाने वाला है- विसंगती है या विडंबना – शायद दोनो ही. फ़िर् भी कोशिश करता हूं कि मामला पैलेटेबल हो. धीरे धीरे आगे बढते हैं.
स्पॉन्टेनिटी [स्वयं:स्फ़ूर्तता] का मूल है इन्स्टिंक्टिव [सहज-अभिव्यक्तिवाला] लेखन, लेकिन वो कैसे होता है?
बहुत सोच विचार के फ़िलहाल इस नतीजे पर हूं की अपनी स्पॉन्टेनिटी मेटा-कॉग्निशन जैसी कोई चीज़ है – जो पकड मे नही आती लेकिन बिना इन्टरनल/एक्सटरनल स्टिमुलेशन के हरकत मे भी नही आती, उतनी पूरी इंस्टिंक्टिव भी नही है – कुछ-कुछ ही है. [हो गई ना अंग्रेजी की टांग-खिंचाई, माफ़ी!]
प्रवाहों का नैसर्गिक तूफ़ान रात की रात में “शिकवा” और “जवाब-ए-शिकवा” लिखने वाले इकबाल के यहां मिलता है, परवीन शाकिर और अमृता प्रितम के यहां मिलता है – ये नैसर्गिक हैं – बॉर्न टेलेंट. वे होते ही किसी दूसरी दुनिया के स्टेट-ऑफ़-माईंड मे हैं!
भाषा प्रवाह के लिये या तो पूरी तरह किसी मूड में रुकना होता है या किसी भाव मे बहना होता है. मै जहां जाना चाहता हूं पहुंचने के दो रास्ते हैं – एक कीबोर्ड [डिस्कशन फ़ोरम्स वाले अंदाज में] हो कर जाता है दूसरा कलम से हो कर [साहित्यिक शैली मे]. मेरे लिये यह एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति नही है – सच है. वहां तैर कर लहरों से लड कर भी जा सकते हैं और सही समय पर सही दिशा मे पतवार खोल कर भी. प्रवाह दोनो स्थितियों मे हासिल हो जाएगा.
उदाहरण के लिये – विनोद कुमार शुक्ल और धूमिल को पढना अलग-अलग अनुभव हैं. एक सौम्य हैं दूसरे धारदर – प्रखर और प्रवाहमय दोनो हैं. सीखने के लिये सब अच्छों को पढना और उनकी थोडी बहुत मिमिक्री कर लेने मे कोई हर्ज नही मानता यदि उन अलग अलग मूड्स/शेड्स से सीख कर अपने नैसर्गिक/मौलिक लेखन को पठनीय बना सकूं.
तो, छोटी-छोटी कोशिशें करते रहना होती है! अपने लिये तो ये किसी स्तर पर अभिनय करने जैसा है, इसके लिये किसी मूड मे उतरना पडता है जो कहना चाहता हूं उसे पहले महसूस करना पडता है. जब महसूस होने लगता है तो उसकी तीव्रता मापनी पडती है, उस माप के विचार उभरने लगते हैं की बोर्ड पर उंगलियां चलने लगती हैं, शब्द मिलने लगते हैं – लिखते समय चेहरे के भाव, रक्तचाप, श्वास की लंबाई और गति, ये सब विषयवस्तु से बाकायदा प्रभावित होते हैं लेकिन ये स्विच-ऑन स्विच-ऑफ़ जैसा नही है. मूड काफ़ी देर तक लेख की विषयवस्तु के हिसाब से बना रहता है. तो ये उतना त्वरित – जितना दिखता है, उतना आवेश जैसा नही है – आवेग है – अपने मौसम से आता है और कुछ लिंगरिंग, या कह लें हैंग-ओवर सा बच भी जाता है. थोडा मेथड एक्टिंग का पुट है!
वैचारिक प्रवाह लहर है – उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है, जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ (सापेक्षिक हास्यास्पद) कोशिशें –
“टाईम पत्रिका वालों नें भी जले पे सर्फ़ वाशिंग पाउडर छिडक दिया है कसम से – कोई इन्हें समझाए जख्म हमारे दाग भी नहीं बने अभी, अबे मिटेंगे कैसे?” – हम काहे बनें टाईम पर्सन ऑफ़ द् ईयर से
यहां मामला आईरॉनिक है! वैसे ये राजकपूराना स्टाईल है [ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा – चरित्र हंस रहा है देखने वाला रो रहा है] , जो मूलत: चार्ली चेप्लिन के निर्देशन से चुराई गई हैं.
“हंसता था तो लगता था हंस रहा है” – किस्से हैं किरदारों के: वो दर्जी से
ये वो केस है जब कभी कभी जब किस्मत साथ देती है और सही, बिल्कुल आसान शब्द मिल जाते हैं.
अत: जितना भी भाषा-प्रवाह अपने लिखने मे आ पाता है, वो बडे पैमाने पर ‘मन का रेडियो बजने दे ज़रा’ किस्म का प्रवाह है – वैचारिक तौर पे, शौली में कुछ अपना है कुछ पराया भी. सो सरजी, अब तो पूरी इमानदारी से बता दिया है कि अपना लेखन कितने गौण तरीकों पर आधारित कसरत है. ऑनेस्टी इज़ द बेस्ट पॉलिसी.
(ये पढ कर आपका भी गर बताने का मन हो आए कि आप कैसे लिखते हैं – जरूरे बताईयेगा!)
मेरी पसंद -
मन का रेडियो बजने दे ज़रा
गम को भूल कर जी ले तू ज़रा
स्टेशन कोई नया ट्यून कर ले ज़रा
फ़ुल्ल टू एट्टिट्यूड दे दे तु ज़रा
टूटा दिल? क्या हुआ!
हो गया जो हुआ!
भूले बिसरे गीत
गा के भूल जा
बदला जो रिदम
उस पे झूल जा
क्या होगा क्या नही होगा
उपर वाले पे छोड दे
आज इस पल में तू
जिंदगी को जी ज़रा
तुझको आकाश की
वाणी का है आसरा
क्या खोया क्या नही पाया
उसपे रोना छोड दे
बैंड जो बजाऊं तेरा
खुल के तू साथ गा
दर्द ही बने दवा
फ़ंडा है ये लाईफ़ का
मन का रेडियो बजने दे ज़रा! …






वाह-२, आज तो मूड में लगे पूरे, लंबा ही रेडियो बजा दिया मन का!!
क्यों भूल रहे हैं, इस तरह के कथनों में हास्य रस भी तो होता है, कल्पनाशीलता के साथ ही तगड़ा मज़ा इन कथनों में मौजूद हास्य भी देता है, तभी तो बहुतया ऐसे कथनों को पढ़ एक मुस्कान अधरों पर आ जाती है!!
बड़ा मुश्किल होता है ऐसे रेडियो बजाना। तुमने बजा ही दिया। अपनी लेखन प्रक्रिया का कच्चा चिट्ठा खोल के धर दिया।
व्यंग्य के बारे में परसाई जी कहा करते थे कि व्यंग्य में करुणा की अंतर्धारा होती है। कटु और तिलमिलाने वाला तो यह उसके लिये होता है जिसके ऊपर व्यंग्य किया जाता है।
“लेखन ” पर अच्छा लेखन !
फूरसतियाजी से थोड़ी दूरी बनाए रखें, रेडियो ज्यादा देर तक बजा
मगर संगीत मधूर था, अतः माफ किया जा सकता.
मेरा लिखा अमूमन क्रिया न हो कर प्रतिक्रिया जैसा होता है. जब भी ठोक बजा कर लिखा ज्यादा पसन्द नहीं किया गया. बिना अभ्यास के दो मिनट में लिखी पोस्ट सबसे ज्यादा पसन्द की गई. माने ब्लॉग में अनघड़ता चलेगी.
मन एक कलाकार का है अतः आपकी तस्वीरों को चयन करने की क्षमता की सदा प्रसंशा करता हूँ. मुझे पोस्ट से ज्यादा वे पसन्द आती है.
स्वामी जी आपके इस प्रवचन से काफ़ी कुछ सीखने को मिला… ऐसा तो हम कभी भी नहीं लिख सकते…
आज की पोस्ट कुछ “खास” पसंद नही आई.
लगता है सब गल्ली क्रिकेट वाले आ गए यहाँ.. हम भी उन्ही में से है..
ट्रिक्स तो सारी की सारी मज़ेदार है..
निंदा /स्तुति के भद्र झोंके हिंदी चिट्ठाकारो के लिए बेलेंस के लिए जरूरी है ….चिट्ठकारी में जब आया तो ऑरकुट से उब कर…यहाँ वहां कुछ पढ़ा .प्रमोद जी की विलक्षण भाषा थी….फिर एक पोस्ट पढ़ी अब तो याद नहीं किसकी थी ..उसमे पूरा डिस्क्रिप्शन था ….ट्रको के पीछे लिखे जुमलो का ….मसलन बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला …..रामकली तुम्हारी है ……. हम मोहित हो गए .हमें लगा दिमाग की प्यास इधर कुछ तालाबो से बुझ सकती है ….खंगालने शुरू किये …फिर नज़र आयी मनीषा जी कोई पोस्ट सावलेपन ओर शहर में अकेली लड़की के रहन सहन पर .हमें लगा ….कमाल की चीज है ये ब्लॉग …..बरसो से जमा कर रखा सामान यहाँ डाल देते है …सूचनाओ की आंधी में एक पड़ाव ओर सही ……सो टेंट गाड दिया ….प्रतिक्रियाओं का भी अपना एक चरित्र होता है …..ओर कभी कभी तटस्थ रहना भी अपराध …..आपमें ,अमर कुमार जी ओर अनूप जी में एक सेन्स ऑफ़ ह्यूमर दिखा ….जैसा हम मनोहर श्याम जोशी में देखते थे …सो कह दिया …..जब असहमत होगे तो भी खुल कर कहेगे….
वाह ! ईस्वामी ऑन ईस्वामी — इन सेल्फ-सेलीब्रेटरी मोड . नार्सीसस कॉम्प्लेक्स ? या नारद मोह ? या वस्तुनिष्ठ आकलन ?
जो भी हो ईस्वामी की शैली जानदार और शानदार है — आत्यंतिक रूप से उनकी अपनी निजी शैली . मानक हिंदी के बरक्स तमाम अर्जित अर्थ-छवियों से खदबदाती बोलती-बतियाती आक्रामक और अभिव्यंजक मर्दानी हिंदी जिसकी जडें गली-मुहल्ले की बोली-बानी से लेकर औपचारिक शिक्षा से अर्जित ज्ञान-विज्ञान तक मेँ ढूंढी जा सकती हैँ . इसमें क्या शक है कि अपने लेखन के लिए — विषयवस्तु के वैविध्य तथा उसके उपयुक्त भाषिक स्थापत्य के लिए — वे हिंदी ब्लॉग जगत के लिये उपलब्धि हैं .
‘ह्यूमर’ और ‘सटायर’ का अंतर अंग्रेज़ी की दो प्रेपजीशन ‘विद’ और ‘ऐट’ का अंतर है . यह फर्क ‘वेन वी लाफ विद समबडी’ और ‘लाफ ऐट समबडी’ का फर्क है . सुधार का उद्देश्य दोनों मेँ होता है.पर व्यंग्य मेँ कटुता होती है . इंजर्ड मैरिट होती है. वह चुभता है . उसका कोई निशाना होता है . जबकि हास्य-विनोद में –’ह्यूमर’ में — वह भी साथ हंसता है जो लक्षित है क्योंकि वह शामिल है. इसलिए हास्य शामिल बाजा है .
(ब्लॉगीय) हिंदी के शैलीविज्ञान पर अच्छा लेख . आत्मकथ्य कहां तक पहुंचा ?
हमें इतना समझ में आया कि हम कुछ कह नहीं सकते।