[चूहा यानी क्या? Rat (रैट- बडा चूहा) या Mouse(माऊस- छोटा चूहा या जिसे चुहिया भी कह देते हैं)? हमारे पास इन छोटे-बडे चूहों के लिये अलग अलग शब्द नही है, बस चूहा ही है!
अब कोई ज्ञानी कहेगा की जी ‘मूषक’ है – गणेशजी की आरती के अलावा उसका उल्लेख कब होता है! ये समस्या तो है, कि हिन्दी शब्दकोशों में चित्र खींचने वाले सटीक शब्दों का अभाव रहा है. आज मुझे जिस विषय पर लिखना है, उसके विषयानुरूप सटीक शब्द नही मिल रहे.]
गु़ज़ारिश है कि इस लेख के शीर्षक पर थोडा ठहरियेगा.. यह बेमतलब नही है.
हमारे यहां अक्सर शब्द स्वयं-स्थापित परिभाषाओं का रूप नही ले सके – मसलन ओल्ड-स्कूल/रेट्रो/रेट्रो-फ़्यूचरिस्टिक/अल्टरनेट-हिस्ट्री जैसे कई शब्द हैं, जो अंग्रेजी भाषा में स्वयंसिद्ध पारिभाषिक रूप ले चुके हैं, इस लेख में इन शब्दों का प्रयोग खुल कर होना है, अत: पहले इनके बारे में बात कर लेते हैं:
अल्टरनेट-हिस्ट्री – गल्प लेखन का एक प्रकार है. यह उपवर्ग विज्ञान-गल्प (साईंस-फ़िक्शन) और इतिहासी-गल्प (हिस्टॉरिक-फ़िक्शन) पर आधारित है.
इस प्रकार के गल्प में कल्पना की जाती है कि इतिहास ने जो करवट ली, यदि वैसा ना होकर कुछ भिन्न या अलग हुआ होता तो किस प्रकार के अविष्कार हुए होते, कैसे हुए होते और क्यों!
ओल्ड-स्कूल – गुज़रे जमाने की वो चीजें या तरीके जिसे बडे प्यार या सम्मान से याद किया जाता है.
रेट्रो- गुज़रे जमाने की वो चीज़ें जो इतने काम की हैं या उनसे जुडा नॉस्टेल्जिया इतना तगडा है कि वे किसी रूप में आज फ़िर फ़ैशन मे आ गई हैं.
आगे जैसे जैसे जरूरत पडेगी परिभाषाएं देखते चलेंगे.
कहते हैं कि हमारा सारा सृजन प्रकृति की नकल मात्र है. लेकिन कभी कभी मनुष्य अपने किये की से भी प्रेरित होता है, उसे नये रूप में दोहराता है या यूं कहें की नकल की नकल हो जाती है. रेट्रो इसी प्रकार की नकल है. कारों में नई बीटल या पी.टी क्रूज़र कारें ऐसी सी सफ़ल रेट्रो डिज़ाईन की कारे हैं. ये करें उन लोगो द्वारा नही खरीदी गईं जिन्होने हिप्पी युग मे ओरिजिनल डिज़ाईन वाली कारों में सवारी की थी, बल्कि ये कारें उन यूवा लोगो ने खरीदीं जो हिप्पी युग मे पैदा भी नही हुए थे. वे उस अतीत को महसूस करना चाहते थे जिसके बारे मे उन्होने पढा सुना मात्र था. हिप्पी युग का नास्टेल्जिया इतना तगडा है.
रेट्रो कई बार शास्त्रीय या कालजयी का प्रभाव देने के लिये भी प्रयोग मे लाया जाता है लेकिन ये है किसी दौर से जुडा हुआ ही. भारत में महिलाओं की पोषाकों मे रेट्रो डिज़ाईन्स देखने को मिलते हैं. पेंटिंग्स में तंत्र और यंत्रों पर आधारित एब्स्ट्रेक्ट आर्ट देखने को मिलता है. वो रेट्रो नाम से नही बिकता लेकिन पुरातन का ही नया वर्जन है.
समय के साथ कई चीजों प्रयोग मे नही रहतीं जैसे की पुराने टाईपराईटर्स लेकिन उनके प्रति एक प्रकार का मोह बचा रहता है.
रेट्रो और ओल्ड-स्कूल का संबंध है – ओल्ड-स्कूल शब्द भारत मे कहीं सबसे प्यार से प्रयोग मे आता है तो वो है “भांगडा” संगीत में! ये बात गैर पंजाबियों को कम पता है कि नये भांगडा बीट्स पुराने भांगडा बीट्स से अलग हैं – अत: किसी पार्टी मे यदी ताऊ-चाचों को नचाना हो तो गुहार लगाई जाती है – “ओल्डस्कूऽऽऽल” और पुरानी बीट्स वाला संगीत बजने लगता है. “टिंग टिंग टिंग ..तुन् ..टुंग टुंग टुंग.. ओ हुसन दिये सरकारे नींऽऽ… ” और पुराने अपनी “डान्स मूव्ज़” का जौहर दिखाने लगते हैं. ”
जो ओल्ड-स्कूल है उसे बदला नही जाता, उसे कभी कभी मूल रूप मे नये स्थानो मे प्रयोग कर लिया जाता है! ओल्ड-स्कूल यनी वो जिसका आनंद उसके मूल रूप मे ही सबसे ज्यादा आता है!
अल्टरनेट-हिस्ट्री – कल्पनाशील लेखन की, गल्प की देन है. जिसमे जानबूझ कर इतिहास को बदल कर देखा जाता है. “यूं होता तो क्या होता”. कला का एक उपवर्ग इस अल्टरनेट हिस्ट्री से प्रभावित हो कर जन्मा है. इस कला का आधार है कि यदि कई नए अविष्कार नही हुए होते या उनसे पहले पुरानी तकनीक और तकरीबों पे आधारित अविष्कार हुए होते तो वे कैसे दिखते.
अल्टरनेट हिस्ट्री पर आधारित कलाकृतियां नये और पुराने का ‘फ़्यूजन’ मात्र नही होती हैं ये अपनी कल्पनाओं में समय मे पीछे जा कर एक नई दिशा मे आगे जाने का प्रयास हैं.
यूं तो अल्टरनेट हिस्ट्री लेखन ने कई प्रकार की कलाओं को जन्म दिया है लेकिन इनमे कला का जो उपवर्ग मुझे सबसे लुभावना लगता है वो है “स्टीमपंक” [steampunk].
स्टीमपंक कला विक्टोरियन युग के भाप-आधारित (काल्पनिक) अविष्कारों या उस दौर में प्रयोग की जाने वाली तकनीकों से चीजों को बना कर देखने का प्रयास है.
कई बार कलाकार आधूनिक उपकरणों को उस पुराने दौर का “लूक-एण्ड-फ़ील” देता है. इस प्रकार के परिवर्तन मॉड्डिंग कहे जाते हैं. यहां उद्देश्य जितना हो सके नये को पुराने से पूरी तरह बदलना है मिलाना नही है. यानी कलाकार बीते हुए कल की निगाह से वर्तमान और भविष्य को देखने की कोशिश करते हैं. उपकरणों और उपक्रमों का उपयोगी होना एक अनिवार्य शर्त चाहे ना हो, यह कला के नमूने की कीमत बढा देता है.
स्टीमपंक का साहित्य, सचित्र-साहित्य, सिनेमा आदी में प्रयोग हुआ है. १९९९ मे बनी ‘वाईल्ड वाईल्ड वेस्ट’ और २००३ में बनी ‘अ लीग आफ़ एक्सट्राओर्डिनरी जेन्टलमैन’ दो उदाहरण हैं. ए लीग ऑफ़ एक्स्ट्राओर्डिनरी जेंटलमैन वैसे ज्यादा चली नही थी लेकिन उसमें प्रयोग किये गये स्टीमपंक डिज़ाईन्स पर भारतीय कला का प्रभाव भी बहुत था.
औद्योगिकरण के बाद कला का रूप बहुत बडे पैमाने पर बदला है, भारतीय कलाओं में इस प्रकार के समकालीन बदलावों और प्रभावों के बढने गुंजाईश आज अधिक है.
विचार आया की भारत में विक्टोरियन शैली (विक्टोरियाकालीन) कई वस्तुएं अपने मूल रूप मे सुरक्षित हैं जिनसे प्रेरणा ले कर कई मजेदार काम किये जा सकते हैं. और कभी कभी सोचता हूं कि यदी ऐसी मॉड्डिंग भारत में की जाए तो वो देखने वाली होगी. काश कोई ज़रिया होता की भारत के नर्डी कलाकारों के ऐसे जौहर देखने को मिलते.
मेरी पसंद के कुछ और चित्र प्रस्तुत हैं:
इस चित्र में कार के दोनो ओर बने हाथी पर गौर करें. यह चित्र अ लीग ओफ़ एक्स्ट्राआर्डिनरी जेन्टलमैन से है.



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आलेख अच्छा लगा। इन शब्दों के अर्थ याद रखने के लिए इन्हें कई बार पढ़ना पड़ेगा। आगे लिखिए।
लेख के साथ-साथ प्राचीन शैली का बेजोड़ चित्रण, बहुत खूब !
अच्छा लगा….आगे लिखिए.
मुझे भी टिप्पणी के लिए सटीक शब्द नहीं मिल रहे फिर भी समझ लो कि मेरे हिसाब से भीषण जानकारी दी है आपने।
जी बिलकुल ऐसी और सामग्री ज़रूर पढ़ना चाहेंगे।
तस्वीरें अद्भुत हैं। भांगड़ा का ओल्ड स्कूल तो देखने सुनने पर ही समझ में आएगा। पोषाखों की रेट्रो डिज़ाइन्स तो कई बार देखी हैं पर पता ही नहीं था इस बारे में। अल्टरनेट हिस्ट्री पर आधारित कोई भी चीज़ कभी देखी पढ़ी नहीं है इसलिए उल्लिखित दोनों फ़िल्में ज़रूर खोजकर देखूँगा।
अच्छा है । ज्ञान में इजाफा भया । इस पोस्ट के माध्यम से । इस तरह की पोस्टें देते रहिये ।