इस बार घर सजाने को गुलदस्ते लेने निकला और बहुत सुंदर फूल लाया!
पहले जब गुलदस्ते लेने जाता था तो ऐसे गुच्छे ढूंढता था जिनमे कलियां अधिक हों – ताकी ज्यादा समय तक गुलदस्ते की कीमत वसूल कर सकूं. पता नहीं, समय के साथ अपनी डाल से कटे फ़ूलों से अजीब सी दोस्ती हो गई है – अब ऐसे गुलदस्ते उठा लेता हूं जिनमे कुछ पंखुडियां हल्की सी मुरझा सी रही होती हैं – “इसे कोई नही लेगा” सोच कर घर ले आता हूं और खुद को समझा देता हूं, चलो फ़ूल का उसकी डाल से कट जाना पूरी तरह व्यर्थ नही गया. वैसे हम कमीने “इंसान” इस लायक कहां की हमारे कमरों के लिए फूलों को डाल से जुदा किया जाए! हम कैसे इनकी सुंदरता को एक पक्का उपभोक्ता बन कर इस्तेमाल करते हैं! कितने लोग हैं जो प्रकृति का कुछ भला करते हैं? अपने नजरिये मे समय के साथ आए इस परिवर्तन की वजह का विश्लेषण नही किया अभी तक.
फूल खरीद कर जब भुगतान कर रहा था तो गल्ले पर खडी महिला ने कहा – “आप और ताजे फूल ढूंढ सकते थे!” मैंने कहा “मुझे तो यही चाहिए”. हम दोनो मुस्कुरा दिए! उस पल में, मुझे उसकी आंखों मे इंसानियत की चमक दिखी – जानी पहचानी और विरली. मैं खुश था!
इस बार गुलाबी गुलाब के फ़ूल इतने सुंदर थे की उनकी आभा से सब कुछ गुलाबी-गुलाबी हो रहा था! मुरझती हुईं वो कुछ पंखुडियां गुच्छे मे खो ही गईं थीं. अब कमरा भी खुश था! मेरे एक मित्र चायपान पर पधारे और गुलदस्ता देख कर बोले – “बहुत सुंदर लग रहा है!” मैने बताया की पास ही की फूलों की दूकान से लाये गए हैं फूल, तो वे अचंभित थे – “ये असली फूल हैं??” फ़ि उन्होंने नज़दीक से छू कर तसल्ली की! वो फूलों से ४ फ़ीट से ज्यादा दूर नही बैठे थे!!
अमरीका मे लोग नकली फ़ूल सजाते हैं – प्लास्टिक के! मै आज तक समझ नहीं पाता की कैसे कोई नकली फ़ूल सजा सकता है! मेरी एक परिचित का कहना था की वो मुरझाते हुए फ़ूल देख कर अच्छा महसूस नहीं करतीं इस लिए प्लास्टिक के फूल सजाती हैं! मैने पूछा बिल्कुल वैसे ही जैसे आप बढती उम्र के सच से बचती हैं, अपनी गलत उम्र बताती हैं आदी? हर चीज हमेशा अपने चरम पर नही बनी रहती – ढलती ही है! लोग “अभी तो मैं जवान हूं” गुनगुनाते रहने से सच बदलता नही है! हां जवान बने रहने की हर सच्ची कोशिश जरूरी है – जैसे की व्यायाम करना! पर रोज एक पेकेट सिगरेट का धुनकना और गालों पर लाली लगाना मेरी समझ के बाहर होती है यह नकली सजावट की तकनीक!
व्यायाम से याद आया – आप में से जो मेरी तरह कंप्यूटर के आगे बहुत बैठ कर उम्र खराब करतें हैं – मेरे कहने से बाहर निकलिए! शायद कोई मुस्कान आपका दिन रौशन कर दे! ![]()

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अब इतनी रात कहाँ जाऊँ फूल खोजने? ये जो तुमने अपनी पोस्ट मेँ लगा
रखे हैँ उनको ही सूँघकर खुशबू महसूस कर रहा हूँ.वैसे शाय अज्ञेय जी कविता है जिसके भाव हैँ:-जो फूल जहाँ है वहीँ पर देवताओ को समर्पित है.इससे फूल
तोडने की जरूरत नहीँ पडती.
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वैसे फुलो का ई स्वामी आपका हमेशा से शौक रहा है, याद है तलत अजीज का वो नगमा…फिर छिडि रात बात फूलों कि रात है या बारात फूलों कि..एक ही गाना पूरी कैसेट में…
कुछ एक नगमें ही अच्छे गाये है तलत ने ओर ये उनमें से एक है.
आनंद
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Kya baat kar rahe hain, hum to kaliyan ek dum komal hi lete hain kyonki:
bagbaan kaliyan de halke raang ki
bhejni hai ek kamsin ke liye
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