
अति सर्वत्र वर्जयेत. सो आदर्शों को व्यव्हारिकता की तराजू पर तौलना जरूरी है.
जैसे अहिंसा एक सुंदर आदर्श है लेकिन आत्मरक्षा के गुर सिखाए बिना मैं यह आदर्श नही सिखाउंगा. आत्मरक्षा के बिना अहिंसा एक सुंदर आदर्श की अति है – तार्किक असंतुलन है जो मुझे गलत लगता है.
व्यव्हारिकता और प्रासंगिकता से मूह नही मोडा जा सकता.
आदर्श देना, संस्कारित करना और शिक्षाएं देना ये काम तो हर समाज के अभिभावक करते हैं. शैली हर एक की अलग अलग होती है. क्या सिखा रहे हो ये तो महत्व का है ही कैसे सिखा रहे हो वह भी कम महत्व का नही है.
कई अभिभावक अति-संरक्षणात्मक होते हैं. कई बच्चों को नियंत्रित रखना चाहते हैं – अनुशासित नही नियंत्रित मानसिक रूप से नियंत्रित! ऐसे दोनो प्रकार के अभिभावकों के बच्चे या बागी हो जाते हैं या भीरू. दिए गए सारे आदर्श, संस्कार एक तरफ़ रह जाते हैं.
बहुत से अभिभावक मित्रों का सा बर्ताव रखते हैं – जैसे वो और उनके बच्चे एक ही टीम हैं जिसके वो कप्तान हैं. मौका आने पर छोटी-मोटी जिम्मेदारियों के बहाने कप्तानी का भार छोटों पर डालना और उन से करवा कर सिखाना – आदर्श और संस्कार एक क्रियात्मक तरीके से एक प्रक्रिया के माध्यम से देना. फ़ंडे पिलाना या पास बैठा कर भाषण या उपदेश झिलवाना नहीं. ऐसे मे दिए गए संस्कार ज्यादा टिकाऊ साबित होते हैं. क्योंकि आप खुद एक उदाहरण प्रस्तुत करते हो और व्यव्हारिक पक्ष मजबूत रहता है.
मुझे लगता है की आदर्शों की उम्र लंबी की जा सकती है और उनका पालन करने वालों की संख्या बढाई जा सकती है बशर्ते आप नियंत्रित करने के उद्देश्य से आदर्श ना दे रहे हो – अगर आप बच्चे को सिखाते हो “सदा सच बोलो” तो क्या आप उस से सदैव सच बुलवा कर उस पर बेहतर नियंत्रण रखने की सुलभता तो नही गढ रहे? वो अगर झूठ बोलेगा और पारंगत होगा झूठ बोलने में तो सबसे पहली परेशानी तो आपकी ही हुई ना.
क्या हम बस एक नीयम देने के बजाए किसी प्रक्रिया के माध्यम से यह सिखा पाने में सफ़ल होते हैं की विकट परिस्थितियों में सच बोलना साहसी का काम है और स्वार्थ सिद्ध करने के लिए या गलतियों पर पर्दा डालने के लिए बोला गया झूठ व्यक्तित्व और छवि को धूमिल करता है.
मैं सामाजिक रीतियों को आदर्शों से और संस्कारों से अलग रख कर कहूंगा, हर समाज में खुलापन अलग अलग स्तर पर होता है लेकिन कुछ समाज बच्चों को बच्चे जैसा रखते हैं कुछ बच्चों को एक व्यक्ति जैसा. उसकी समझ को कमतर ना आंकते हुए उसे पूरी विकसित करना चाहते हैं – उस पर गलत सूचना दे कर नियंत्रण नहीं. मेरे विचार में समाजों का रूप बहुत निर्भर करता है इस पर.


कँजूस लेखक ,लेख मेँ हायकू का अभ्यास कर रहे हो!अति सर्वत्र वर्जयेत!
[...] स्वामी जी बढ़िया रहे। इस विषय पर उन की प्रविष्टि पहले आई, और अनुगूँज बाद में घोषित हुई। यह तो वही हुआ कि जो आप ने पहले ही पढ़ा है उसी पर आप को डिग्री दी जाएगी। फिर खानापूर्ति के लिए एक और प्रविष्टि लिख दी, जिस पर अनूप भाई ने कंजूसी का आरोप सही लगाया है। स्वामी जी, आप से थोड़े लम्बे व्याख्यान की अपेक्षा थी। [...]