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  • कटी-छँटी सी लिखा-ई

5 responses to “कटी-छँटी सी लिखा-ई”

  1. नितिन

    बढ़िया!!

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  2. अनूप शुक्ल

    पहली कविता बहुत सुन्दर है!
    उसका ताना-बाना और फ़िर ये लाइने:

    “देखा? गर पैसे होते बादाम दूध पिया होता
    सोच यूं गुम ना होती तेरी
    बनिये को देख
    सबका हिसाब याद है उसे मूंह-ज़बानी”

    वैसे अब तो बनिये भी हिसाब-किताब कम्प्यूटर पर रखने लगे हैं। :)

    दूसरी कविता सघन अनुभूतियों की है! अच्छी! :)
    अनूप शुक्ल की हालिया प्रविष्टी..अपन तो बोर हो रहे हैं

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  3. प्रवीण पाण्डेय

    जीवन भर आधी ही रही राह हमारी..

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  4. वंदना अवस्थी दुबे

    कि पुराने किताबघर के किसी जिल्दबंद लुगत की सूरत
    धूल फ़ाँकती हैं तेरी यादें मेरे अंदर

    क्या बात है !!
    अलगाव का समय जैसे जैसे बढ़ता है, यादें धूल ही फांकने लगतीं हैं.
    समय हॉट बलवान :) :) वर्तमान शक्तिशाली होता है :)

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  5. वंदना अवस्थी दुबे

    ये ट्रांसलेटर भी न……..अब हमने ध्यान नहीं दिया, और ‘होत’ की जगह “हॉट” हो गया :) :) :)
    वंदना अवस्थी दुबे की हालिया प्रविष्टी..सूरजप्रकाश जी, किताबें और रश्मि…..

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