सोच
खयाल छोड देते हैं साथ अध-बीच
कोई सिरा जुडता नहीं
कोई शैतान है भीतर
फ़ूंक कर बिखेर देता है ताना-बाना
और कहता है
देखा? गर पैसे होते बादाम दूध पिया होता
सोच यूं गुम ना होती तेरी
बनिये को देख
सबका हिसाब याद है उसे मूंह-ज़बानी
अनकही
पुराने किताबघर के किसी जिल्दबंद लुगत की सूरत
धूल फ़ाँकतीं हैं तेरी यादें मेरे अंदर
पता है पिछली दफ़ा मैंने
जब पलटीं थीं वो सफ़हें बेचैन करवटों की तरह
हर लफ़्ज़ था उर्दू हर खयाल नाज़ुक
जीना था मुहाल फ़िर कई दिन तक
कैसे लिख दूं ये तुम्हारे फ़ेसबुक पेज पर?
कि पुराने किताबघर के किसी जिल्दबंद लुगत की सूरत
धूल फ़ाँकती हैं तेरी यादें मेरे अंदर
[लुगत=कोश]
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बढ़िया!!
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पहली कविता बहुत सुन्दर है!
उसका ताना-बाना और फ़िर ये लाइने:
“देखा? गर पैसे होते बादाम दूध पिया होता
सोच यूं गुम ना होती तेरी
बनिये को देख
सबका हिसाब याद है उसे मूंह-ज़बानी”
वैसे अब तो बनिये भी हिसाब-किताब कम्प्यूटर पर रखने लगे हैं।
दूसरी कविता सघन अनुभूतियों की है! अच्छी!
अनूप शुक्ल की हालिया प्रविष्टी..अपन तो बोर हो रहे हैं
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जीवन भर आधी ही रही राह हमारी..
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कि पुराने किताबघर के किसी जिल्दबंद लुगत की सूरत
धूल फ़ाँकती हैं तेरी यादें मेरे अंदर
क्या बात है !!
वर्तमान शक्तिशाली होता है
अलगाव का समय जैसे जैसे बढ़ता है, यादें धूल ही फांकने लगतीं हैं.
समय हॉट बलवान
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ये ट्रांसलेटर भी न……..अब हमने ध्यान नहीं दिया, और ‘होत’ की जगह “हॉट” हो गया

वंदना अवस्थी दुबे की हालिया प्रविष्टी..सूरजप्रकाश जी, किताबें और रश्मि…..
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