पिछले हफ़्ते भारत में एक महान भीतराघात हुआ है. कोई खास शोर-शराबा नहीं हुआ, भारत के हित को देखा जाए तो ये खबर किसी भी कार्टून समस्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है. जबकी भारत का हर अखबार कार्टून बवाल से भरा हुआ है. मैं इसे भीतराघात कह रहा हूं लेकिन है तो एक बडा कूटनीतिक उलट-फ़ेर!
बात कर रहा हूं पेट्रोलियम मंत्रालय मे हुए फ़ेरबदल की. मणीशंकर अय्यर को खेल मंत्रालय में डाल दिया गया और मुरली देवडा को पेट्रोलियम मंत्रालय मिला है. ये सरदारजी के हालिए मंत्रीमंडल विस्तार का नतीजा था? नहीं ये हुआ ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विरोध मे डाले गए भारत वोट के ऐन पहले!
अय्यर जिस तरह से भारत-पाक-इरान पेट्रोल पाईपलाईन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे वो अमरीका की आंख मे खटक रहे थे. अब उन्हें हाशिये (खेल मंत्रालय) पर डाल कर अपनी पसंद का पेट्रोलियम मंत्रालय का प्रमुख बनवा दिया है. ये अमरीकी इशारे के बिना नही हुआ हो सकता. अय्यर को हटाने की वजह? मंत्री मंडल का विस्तार हो रहा है या कुछ और?
अय्यर के वामपंथी झुकाव को दरकिनार करते हुए यह तो कहना ही होगा की उनकी पहल देश के हित में एक बडी बात थी. अमरीका हमेशा से इस क्षेत्र में अपनी पाईपलाईन बिछाने का प्रपंच करता रहा है. और शायद अब भारत-पाक-इरान पाईपलाईन बिना अमरीकी भागीदारी या भूमिका के डलेगी नहीं. हमारे एशियाई देश फ़िर ऐक और राजनीतिक चाल का शिकार होते दिख रहे हैं.
५ जून २००५ को मैने इस विषय पर लिखा था अपने पुराने ब्लाग पर, और मेरा हर एक भय सही साबित हुआ है – प्रत्येक! ( वहां अब मै लिखता नही) – क्या ६-८ महीने में एक महान योजना का गर्भपात होते देख रहा हूं? या एक नई योजना का सूत्रपात??
हाल ही मे अमरीका के सुर में सुर मिलाते हुए भारत नें ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध कर दिया है. ये इरान के साथ हमारे संबंधों के लिए कोई सकारात्मक बात नही है. क्या हमारे नेता ये सोच रहे हैं की अमरीका की हां मे हां मिलाना ही एक मात्र विकल्प है? हमारी विदेशनीति बस अमरीका को खुश करने तक सीमित हो चुकी है?
ईरान में आए हालिया बदलावों का पाईपलाईन प्रोजेक्ट पर क्या प्रभाव होता वो एक बडा ही “अगर-मगर” वाला मुद्दा है. अब भारत में पेट्रोल तो आएगा, शायद इरान से ही आए पर आएगा किसी अमरीकी ब्राण्ड के नाम से या किसी अमरीकी प्रोजेक्ट के चलते और ये होगा सब देखते-समझते हमारी आंखो के सामने.
जो हो रहा है वो तो दुखद है ही उस से ज्यादा दुखद है की इस बारे में कोई सामाजिक प्रतिक्रिया या सरोकार बना नही दिखा – जैसे ये कोई मुद्दा ही ना हो! इस पाईपलाईन योजना के बारे मे कोई अगर कोई जानी-समझी राजनैतिक चाल भी है तो बिना किसी प्रतिक्रिया के पूरे देश को कैसे मंजूर है??
जैसे ही यह हुआ ईरान ने घोषणा कर दी , हालिया बयानो के चलते पाईपलाईन पाकिस्तान तक जाएगी भारत तक नहीं! भारत इस विषय में अमरीकी वायदों पर कैसे विश्वास कर सकता है? माना की अमरीका, एशिया में चीन के प्रभाव और दबाव को संतुलित करने के लिए भारत का पक्षधर हो सकता है लेकिन क्या भारत चीन संबंधो के लिए वो बुरा नही है – हम एक साथ ईरान और चीन से बेहतर संबंध रख सकते थे लेकिन हमने अब स्वार्थी अंकल सैम का हाथ थाम लिया है! दबाव में या समझदारी समझ कर ?





कुछ ऐसा ही यहां पर है
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