९वी अनुगूँज – आशा ही जीवन है


भाषा पर पकड कमजोर हो तो विचार भी अस्पष्ट रहते हैं, और अगर विचार अस्पष्ट हो तो सही शब्दों का चुनाव नही होता; औरों के समक्ष ही नही, पर मन मे भी – ये दोनो ही बातें सही हैं.

आशा और अपेक्षा ऐसे दो भाव हैं, जब निर्धारण अस्पष्ट हो, और अपेक्षा, अराजकतापूर्ण तरीके से आशा के स्थान पर अतिक्रमण कर पडे – बवाल का मसाला तैयार समझो. तो सधे हुए जीवन के लिए पारस्परिक अपेक्षाओं का पूर्वघोषण प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से होता ही है. सावधानी हटी – दुर्घटना घटी. परिवेश से हम सीखते हैं क्या अपेक्षित है हमसे, और क्या अपेक्षाएं आशाओं की आड में दोहराई जा रही हैं – हम भी सीखते हैं कूटनीति और फ़िर हम भी शुरु हो जाते हैं – इसी चक्र का हिस्सा बन जाते हैं.

आशा और अपेक्षा में फ़र्क करने में ज्यादा विवेक नही लगता पर अपेक्षा को आशा का लेबल लगा के प्रेमपूर्वक अधिकारक्षेत्र के बाहर भी हितसाधन पूरा करवा लेना यह बहुत बडा गुर है – और अधिकारक्षेत्र बढा कर परिस्थितियों को ऐसे जुगाडित करना की अपनी अपेक्षा पूरी होने की आशा विश्वास में बदल जाए – ये उस से भी बडा कूटनीतिक हुनर है.

उदाहरण के लिए – भारतवासी कभी ये आशा करता था की पेट्रोल के दाम घटेंगे, अब वो भाव बढने पर निराश भी नही हो पाता. जब की अमेरिका अपनी दोस्ती के एवज में, अरब से पहले कम दाम में पेट्रोल की अपेक्षा करता था; फ़िर कुवैत से कुछ साल फ़ोकट में लेने का जुगाड किया और अब विश्वासपूर्वक अगले १०० साल का तेल इराकस्वरूप अपने जेब में डाल के बैठ गया है. बाजार को कब्जे में कर लिया है और अब भाव की चढत का नकली खेल जारी है! हमको अमेरिका से शराफ़त की आशा भी नही थी!

अमेरिकावासी आशा करता है की मौसम खुशनुमा होगा, फ़िर अमेरिकावासी टीवी पर मौसम का हाल देख कर आशा को अपेक्षा में बदलने के चांस तलाशता है अगर मौसम खराब होने वाला हो तो तैयारी करता है. देसी पिछली निराशाओं के चलते मौसम का हाल देखे बिना ही निकल पडता है सारे मौसम एक से! तो समझे भैये क्या बोलना चाह रिया हूं?

“आशा ही जीवन है” – मैं नही मानता! “प्रपंच ही जीवन है” ये मानता हूं – परिस्थितियों पर बेहतर नियंत्रण पाने का और बुरे समय के लिए तैयार रहने का प्रपंच – ताकी आशा ना हो विश्वास हो – जहां जहां आशा की फ़सल खडी हो प्रपंच की फ़ेक्ट्री डाल के पहले अपेक्षा और फ़िर विश्वास में परिवर्तित करो! उर्जा ही जीवन है! उद्यम ही जीवन है जीवटता है जीवन!

अब अगर आशा ही जीवन है तो कौन सा जीवन? जीवन जो थोप दिया तुम पर हम पर! कोई भी अपने मां-बाप को एप्लिकेशन नही भेजता की यार हमको पैदा करो! जो पागलखाना ये दुनिया है इसमे आना कौन बेवकूफ़ चाहेगा? क्या हमने ऐसा देश या ऐसी दुनिया बनाई है जिस पर गर्व कर के हम अगली पीढी को दें! कभी तुम को पैदा होने से पहले दिखाते हकीकत – तुम खुद नही पैदा होना चाहते! भाड में गया २१-२४ साल खप के १६-१८ क्लास पढो फ़िर रगडाई! इतना संघर्ष कर के भी देखो जीवन, मुम्बई की रेलों के धक्के दिल्ली की बसों में सरदर्द में बैठे और साथ वाला जाट बीडी का धूंआ आपके चेहरे पर उडाता बैठा है! मेहनत कम नही है हमारी पर कमी है कोई – अकल है हम में पर सही इस्तेमाल नही आता! एक ऐसा समाज जिसमे कल जो आशा थी वो आज अपेक्षा में तब्दील हो और कल जो अपेक्षा थी आज विश्वासपूर्ण तरीके से होवे और ये प्रपंच-चक्र फ़टाफ़ट चलता रहे – हर व्यक्ति अपने से की हुई आशा, अपेक्षा पूरी कर विश्वसनीय बने, ऐसा होना चाहिए था, पर ये हमारा इस्टाईल नही ना है!

यों देसी समझदार तो हैं, तो हम अपने साथ वाले देसियों से कोई आशा नही करते की साथ मिल कर बेहतर भारत बनेगा! सीधे सीधे एन आर आई होने का जुगत करते हैं और जो देस मे हैं वो एन आर आई को नान-रिलाएबल बोल देता है – वो भी कोई आशा नही करता!

अब दूसरा पहलू – आशा अपेक्षा का स्थान ले तो क्या क्या होता है – बहुत कुछ परिचित होता है भाई!

अपेक्षा होती है धर्मपालन की – यहां ये धर्म वो रिलिजन वाला हिन्दू-मुस्लिम वाला धर्म नही है. धर्म – जो तुम से अपेक्षा है वो तुम्हारा धर्म है. सैनिक से अपेक्षा है कि वो सुरक्षा करेगा- जान की कीमत पर भी – तो लडते हुए जान दे देना उसका धर्म है – करना ही चाहिए! कोई एहसान या धन्यवाद का मसाला नही है – मर गया कोई गल्ल नी – यही ए़क्स्पेक्टेड था – मरणोंपरान्त, अहोभाव रखो और ऐसे और नागरिक बनाओ! ये धर्म था उसका और अपेक्षा थी हमारी.

बुद्ध नें कहा था अपेक्षा ही सारे दुखों की जड है – अपेक्षा मत कर! हो गया सत्यानाश!!

वो तो नसीब, बुद्ध ने ये नही कहा था की आशा मत कर – वो क्या था, बुद्ध को दु:ख से एलर्जी थी – बचपन में एक शवयात्रा देखी और दुखी हो गए, सालों प्रपंच कर के बुद्धत्व को प्राप्त हुए और फ़िर सारे संसार का दु:ख दूर करने की ट्राई मारने लगे – वापस आ कर बोले अपेक्षा नहीं करने का! भारतवासी तभी से कोई अपेक्षा नही करते – बस आशा करते हैं. हम आशा करते हैं की हमारे नेता कुछ करेंगे, हमारा तंत्र साफ़सुथरा होगा, हम ये नही चाहते की हमसे भी कोई अपेक्षा हो जो किसी नागरिक से होती है, और हम रिश्वत दे कर भी कोई भी काम कर दिए जाने की आशा भर ही कर सकते हैं. हमारे पास ऐसी आशाओं की भरमार होती है इसलिए हम आशा लगाने से ले कर उसके पूरा होने के बीच गाने गाते हैं या निराश होने पर शायरी-कविताएं पेल देते हैं. हमारे गरीब, प्रर्थनापूर्ण, विनयशील रहने और “धार्मिक” श्रद्धालू रहने में इन “आशाओं” का बहुत बडा हाथ है. क्यों? अपेक्षा पूरी ना करने का दंड दिया जा सकता है – आशा पूरी करने का क्या दंड – कोई दंड नहीं!

बुद्ध ने कहा था अपेक्षा मत कर दु:ख होगा- अगर अपेक्षा पूरी नही हुई तो – क्योंकी अपेक्षा पूरी नही होने पर दु:ख के बजाय क्रोध होने पर किसी और को दु:ख पहुंचायेगा – तो कोई तो होगा जो दंडित भी होगा और दु:खी भी – तो देसी लोग दंड नही देते क्षमा कर देते हैं – अपनी स्टाईल है ये! और एक पिटा हुआ समाज तो क्षमा करने का भी ढोंग ही करेगा – एक कविता के टुटे फ़ूटे टुकडे याद आ रहे हैं –

क्षमा वो करेगा
जिसके पास गरल है
वो क्षमा क्या करेगा
जो विषहीन
दंतहीन सरल है!

(ऐसा ही कुछ था)

तो वो बडप्पन भी जाता ही रहा! पश्चिम में क्या दनादन हायर-फ़ायर होती है कोई लिहाज नही कोई दर्द नही – अपेक्षा और पारितोष – यही चर्या है यही काम भी करती है! अपेक्षा को आशा नही बनने दिया जाता – गुणवत्ता बनी रहती है और सुधरती रहती है. हर एक के लिए कुछ शब्दों की परिभाषा फ़रक होती है – मेरे लिए आशा की परिभाषा जरा अलग सी ही है. मेरे हिसाब से जब किसी चीज के होने के चांस को उस की प्राबेबिलिटी को कोई और शक्ति नियंत्रित कर रही होती है तो हम बस आशा भर कर सकते हैं और अगर स्थितियों पर हमारा बेहतर नियंत्रण हो तो हम सफ़लता के लिए विश्वस्त हो सकते हैं – अगर परिस्तिथियों को नियंत्रित करने वाले घटकों के प्रभाव की समझ हो तो बेहतर कयास या पूर्वघोषणाएं कर सकते हैं – सब प्रपंच का खेल है.

6 responses to “९वी अनुगूँज – आशा ही जीवन है”

  1. kali

    chappe raha kallatarganj ! aapse aise hi shandar lekh ke apeksha thi aur samay rehte post ho jayega aise aasha thi.

  2. अनुनाद

    आपका लेख दो बार पढ चुका हूँ । आशा है तीसरे पाठ में थोडा बहुत समझ मे आ जायेगा ।

  3. अनूप शुक्ला

    लेख का लब्बो-लुआब तो जानदार है पर लगता है कि ‘पेल’के लालच में
    लेख में ‘तेल-फुलेल’ छूट गया है.ड्राफ्डिया मोड में लिखी गयी यह ‘पेल’ धांसू गुलेल है.रामधारी सिंह ‘दिनकर’की कविता है यह:-

    क्षमा सोभती उस भुजंग को,जिसके पास गरल हो,
    उसे भला क्या सोहेगी ,जो दंतहीन,विषहीन,सरल हो.

  4. विनय

    अनूप:

    मुझे यह यूँ याद है:

    क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
    उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो

  5. आशीष

    स्वामी जी, हमारे देश की विडम्बना है कि हम इन पोंगा पड़ितों और धार्मिक नेताओं व गुरुओं के प्रवचनों के चक्कर में आशा और अपेक्षा के बीच का मतलब भूल गये, जनता करती है आशा और ये साले नेता और धर्मगुरू करते हैं अपेक्षा अपितु इनको तो वो भी करने की ज़रूरत नहीं है। हमारा समाज है रीढ़विहीन जो कि सिर्फ़ आशा ही करता है और हमारे नेता करते हैं अपेक्षा कि साला वोट तो हमको या हमारे जैसे को देगा ही, जायेगा कहां और फिर हम खायेंगे मलाई और ये चाटेगा कुल्हड़।

  6. तरूण

    आशा को अपेक्षा का जामा पहना के सही पेला है गुरू जी…..

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