बंदर के हाथ तलवार


जन्नतनशीं दादा जी कहा करते थे “बेटा, उप्पर वाले ने हर एक के कान में फ़ूंक के भेजा है, की बेटा तेरे डेढ अक्कल है” तो सब आईने के सामने खडे हो के समझते हैं की अपन सब से श्याणें हैं.

अपन तो ये ना सिर्फ़ मानते हैं बल्की जानते भी हैं की अपने में डेढ अक्कल है – अब इस डेढ अक्कल के चलते जो हो जावे सो कम!

हमारे मालवा में एक कहावत है – “जिसका काम उसी को साजे” – आई बेग टू डिफ़र! अपन को डिफ़रन्ट-डिफ़रन्ट चीज पे ट्राई मारने का कीडा है और निर्देशिकाएं पढना फ़टियल टाईप लोगों का काम है – समंदर मे कूदो दन्न से और तैरना सीखो – ये रही ना मरदानगी. इस पार नी तो उस पार!

इंदिरा के दो बेटे थे – एक ने राजनीति सीखी दूसरे ने जहाज उडाना सीखा – जिसके जहाज उडाते याद था वो राजनीति करते उड गया और जिसके राजनीति याद थी वो जहाज उडाते टपक गया – पर अपने को सब देख-भाल के अक्कल आई? नही! क्योंकी हम मे ढेड अक्कल है -अपने साथ ऐसा थोडी हो सकता है यार! अपन सब-कुछ कर सकते हैं, यहां तक की, अपन सब एक साथ बोले तो मल्टि-टास्किंग मोड मे कर सकते हैं!!

मुझे याद है विडियो केमरे की नई नई इजाद के बाद हर वो आदमी जिसके पास विडियो केमरा होता था अपने आप को स्टीवन स्पीलबर्ग समझते हर चीज पर ज़ूम-इन आउट करता रहता था. टीवी पर शो होते जिन पर लोग अपनी मजेदार फ़ुटेज भेज कर १५ मिनट की प्रसिद्धि पाते. यहां तक बात ठीक थी!

तो मानव के पूर्वज बंदर थे या नही इस के लिए शोध मे समय खपाने के बजाए आप मर्दों के हाथ में नई तकनीक का कोई आकर्षक खिलौना थमा दो और उस की प्रतिक्रिया देखो – निष्कर्ष पर पहुंचने मे देर नही लगेगी.

इन्टरनेट तकनिकी और कंप्युटर ने आम आदमी की जीवन शैली पर जो प्रभाव डाला है उस पर कई किताबें भी पेली जा चुकी हैं. जब तक कंप्युटर कठिन था जनता कन्नी काटती थी – जैसे जैसे आसान बनता गया लोग आटोमेटिकली में ‘एक्सपट’ होते गए और बंदर के हाथ तलवार लगती गई! अब स्याने प्रयोग भी करेंगे और गाली भी देंगे!

बानगी – “हम आजकल बिजी रहता हूं जी – लिखने का समय नही मिलता” टाईप सेल्फ़-प्रोमोसन कर चुकने के बाद, मगर, वहीं, ब्लाग लिखते लिखते कभी कभी मेरे दिल में (भी) खयाल आता है – यार मेरे मे शायर, कवि, कथाकार, व्यंग्यकार, ये कार – वो कार बहुत सारा कुछ होने का टेलेंट है – फ़िर एक आध किताब छप जाए तो गलत भी क्या है – बेहतर हो अंग्रेजी मे छपे – रीच बैटर रैगी! अभी ये बिमारी मुंगेरी लाल के हसीन सपने के स्तर को नही छू पाई है पर कहीं ना कहीं कसमसा रही हो तो भरोसा नी!

अब आदमी की इसी मानसिकता को बडे वाले श्याणें एक स्तर आगे ले गए हैं – बडे वाले स्याने बोले देसी या काले नहीं! अब यहां से लेख एक नई “उच्च-निम्नस्तरीय” गहराई की ओर को मुडता है – इस मोड से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज कदम राहें … वाली स्टाइल में, सो नखराली महिलाएं और बडे बच्चे सावधान ..(USA-PG13) (IND केन्द्रिय फ़िल्म प्रमाण बोर्ड-A-अ) ईत्यादी, सो पलट लो बाद मे मत बोलना चेताया नहीं!

इन्टरनेट के आने और छाने के बाद एक नया धमाल हुआ, हर आदमी अपने घर में बैठा बैठा अपने गाढे पसीने की कमाई आन-लाईन शेयर बाजर मे निवेश करने लगा – डे-ट्रेडिंग नामक घर-फ़ूंक तमाशा देख में आ bull मुझे मार से ले कर आ bear मेरी मार तक का चक्र पूरा चला!

जैसे कोई क्युरियस, पर नादान नव-यौवना, जोश-जोश में प्रथम अनुभव प्राप्त करते ही, हर्पिज़ की शिकार तो होवे ही साथ ही गर्भ भी ठहर जाए – इन नए ” शेयर मार्केट खिलाडियों” मे से कईयों कि इज्जत और बचत तो गई ही, कर्ज भी चढे!

पहले स्टाक मार्केट में कुछ ही लोग कुदियाते -फ़ुदियाते थे – अब हर एक हाथ अजमाने लगा और आगर कोई कयास सही बैठ जाए तो अपने आप पर इतराए पर अंत मे बोले तो सेड-स्टोरी , सब कुछ लुटा के होश मे आए तो क्या किया?

ऐसा क्यों होता है? हर एक, मतलब हर भोले निवेशक या सौदेबाज को लगता है की वो बाकियों से ज्यादा समझदार है और उस की इसी नादानी का शेयर मर्केट को नियंत्रिक करने वाली इकाईयां मिल कर फ़ायदा उठाती हैं और उस का उल्लू बनाती हैं. जब टीवी पर बुश आ कर बोलता है की आप अपने रिटायरमेंट वाले पैसे से शेयर मार्केट मे निवेश कर सको, ये संभव होना चाहिए – मैं ये नए कानून बनाना चाह रिया हूं और फ़िर १० मिनट बाद २-३ आन लाईन ब्रोकर अपने इश्तेहार में आप में डेढ अक्कल है याद दिलवाते हैं तो “ज़रा” शक तो होता ही है – क्या चल रहा है बाबा! तो अपनी डेढ अक्कल के चलते या तो अपने बाहर बैठ कर शेयर बजार मे पिटने वालों को रैट-पाईजन केश में बेचने का धंधा शुरु करो या कुछ और जुगत करो!

अभी हाल ही मे एक किताब पढी जिसके लेखक का दावा था की आप पूरे खेल की समझ के बिना इन्हे जीत ही नही सकते – लेकिन कहीं दूसरी जगह एक अनोखी कौडी हाथ लगी – अभी तक आजमाया नही गया है – पर आजमाया जाना है और आजमाया जायेगा!

तो, निवेश की तमाम विधियों को धता बताते एक बहुत ही सिंपल बंदे ने सिंपली फ़रमाया की उस ने आँख मींच के निवेश किया और कमाया, बस एक मुद्दे पर – अल गोर को इन्टरर्नेट प्यारा था तो उस ने समय से बहुत पहले ही तकनीकी मे पैसा लगा दिया पहले से फ़िर, डाट काम का बूम आया और इस ने कमाया!

जब बुश आया तो बुश तेल बनाने वाली कंपनियों से जुडा रहा है तो तेल में लगाया, अब वो वाली कंपनियां चांदी काट रही हैं – है ना सिंपल? तो इस में क्या बडी बात बोल दी? राजनौतिक शक्तियां भी अपने खास सेक्टर वालों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए बाध्य होती हैं – क्या सिंपल स्ट्रेटेजी है यार – watch the leader!!

One response to “बंदर के हाथ तलवार”

  1. अनूप शुक्ला

    स्वामीजी,बंदर के हाथ में उस्तरा सुना था.तुम तलवार पकड़ा दिये.मल्टीस्किलिंग का जमाना है आज .हर हुनर में उस्ताद -पीर,बाबर्ची
    ,भिस्ती ,खर होना चाहिये चमकने के लिये.ट्राई मारो.सब ठीक हो जायेगा।

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