परेशां हो के मेरी खाक आखिर दिल ना बन जाए
जो मुश्किल अब है या रब फ़िर वही मुश्किल ना बन जाए
मेंहदी हसन साहब की आवाज़ मे, कुछ इस तरह के शेर सुनने के साथ अपने दिन की शुरुआत होती थी, अब इन्टरनेट रेडियो पे काँटा लगा का रिमिक्स झेलते हुए काम होता है – जीवन का स्तर सुधर गया है या बदतर हो गया है? अब क्या बोलें – पहले चाहे फ़िल्मी गाने भी मोनो मे रिकार्ड होते थे पर सुन कर पारलौकिक किक बैठ जाती थी अब DTS/DSP मे कचरा परोसा जा रहा है!
बात तकरीबन १५ साल पहले की है, जगजीत सींह एक दौर मे एक से, नीरस और पकाउ हो गए, मेहंदी हसन उम्र के असर से मधुर खरज़दार, गुलाम अली अकेले मोर्चा संभाले रहे. राज कुमार रिजवी कभी छा नही पाए पर तलत अज़ीज़, पंकज उधास, चंदन दास इत्यादी अपने को कभी जमे नहीं तभी हरिहरन ने धमाकेदार एलबम्स के साथ गज़ल संसार मे प्रवेश किया – उम्मीद की किरन दिखी, आशा जगी और लो ये जनाब पाप गाने लगे और गजलों के नए एलबम्स आना कम होते गए.
एक पुरानी फ़िक्र फ़िर नई हो गई, जब हाल ही में हम-तुम का टाईटल गीत लिखने वाले प्रसून जोशी के लिखे तीन गीत फ़िल्म फ़िर मिलेंगे से सुने! मैं आसानी से प्रसून जोशी को मन पसंद गीतकारों की श्रेणी में सदाबहार गुलज़ार और मेहनती जावेद अख्तर के बाद व्यक्तिगत सूची में तीसरी पायदान पर रख चुका हूँ. कवित्व है बिलाशक! मगर फ़िक्र ये की कहीं ये भी चालू ना लिखने लगें. “कुछ पल” सुन कर तो मैने शर्त लगा ली की ये गुलजार की कलाकारी है और शर्त हार कर दो बातों की खुशी हुई – अंतर्यामिणी ने कहा “गुलज़ार से ज़रा नीचे” और मैने कहा “गुलज़ार ही हैं, जरा जल्दी में” .. तो वो जीती दूसरे कोई तो ऐसा आया जिस को सुन कर गुलज़ार का जिक्र निकला! बहुत खूब प्रसून जी – बहुत खूब!!


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