अमरीका – शमरीका!

भारतीय समय के हिसाब से रात के कम से कम ढाई बजे होंगे जब चैट पर फ़ुर्सतियाजी अवतरित हुए और उन्होंने अपने लेख की कडी थमाई – अमरीकी और उनके मिथक. “पढ कर अपने विचार बताओ” आदेश दे कर अंतर्ध्यान हुए.

टाईटल से ही समझ गए हम, की अमरीका उन्हें फ़िर हैरान किये है, रह रह के परेसान करत है ससुर - आज फ़िर रात की नींद चुरा ली है अमरीका ने. (मेरी तरह के अपरिमित जिज्ञासू हैं – कोई आश्चर्य नही होता अब!)

फ़ुर्सतियाजी का कहना है की उनके अमरीका निवासी ब्लागर बंधू अमरीका के बारे में बेबाकी से नही लिखते. बेबाकी से लिखने से क्या तात्पर्य है? हम अगर अमरीका की तारीफ़ करें तो फ़ुर्सतियाजी कहेंगे “तुम अमेरिका से प्रभावित हो” अगर बुराई करें तो फ़ुर्सतियाजी कहेंगे “चलो वापस घर आ जाओ” वे ये दोनो ही बातें मुझे कह चुके हैं. “अपनी तो ये आदत है के हम कुछ नही कहते” के अंदाज़ मे अगर हम कुछ नही कहेंगे तो बेबाक नही हैं, और कहेंगे तो हम दन्न से उद्दंण्ड घोषित हो जाएंगे. (पार्श्व मे गीत सुनें ”अब यहां से कहां जाएं हम? अमरीका में ही मर जाएं हम!”) 

हमारे बारे में फ़ुर्सतियाजी राय कायम कर चुके हैं और वे हमारे बारे में अपनी राय के सटीक होने की राय भी रखते हैं. इसके चलते जो भी लिखूंगा राय का चश्मा लगा कर ही पढा जाएगा. ये कोई समस्या नही है, हम बस मोनालीसा के समान ’सीक्रेट में’ मुस्कुरा जरूर देते हैं. 

फ़ुर्सतियाजी के लेख पर की गई पहली छ: टिप्पणियां भी बांच चुका हूं. इस से पहले भी अमरीकियों को एकाधिक विशेषणों से नवाजे जाते पढ चुका हूं - इग्नोरंट(अनभिज्ञ), एर्रोगंट(बदतमीज़) और भी ना जाने क्या क्या कहा जाता है अमरीका की जनता को. पढ कर हंसी आती है ऐसी मूर्खताभरी बातों पर, जिस देश के लोगों ने पूरी दुनिया की हर सरकार को साध रखा है उस देश के लोग अनभिज्ञ हैं. जिस देश के लोगों ने दुनिया भर से अधिक रीसर्च कर रखी है, पेटेंट्स की लाईन लगा रखी है, दुनिया भर की प्रतिभाओं के लिए अपने दरवाजे खोल रखे हैं, दुनिया को पीसी और इन्टरनेट जैसी चीज़ दे रखी है उसी इन्टरर्नेट पर उन्हें सीमित दायरे में जीने वाला कहा जा रहा है. 

अब क्या लिखें? अमरीका जैसा देश बनाने मे जो पुरुषार्थ लगता है वो खटर-पटर कर के ब्लाग पोस्ट करने से ज्यादा हार्सपावर लेता है. जो समाज पुरुषार्थ दिखाएगा उसे अपने बारे में सही या गलत राय बनाए जाने का भय नही सताएगा. वो कहते हैं ना, किसी की जुबान बोलती है किसी का काम बोलता है. मजेदार है की हम भारतीय खुद में लाख खामियां होने पर भी दूसरों की मीन-मेख जरूर निकाल सकते हैं – अपने आप को रेशनलाईज करने की हमारी सामूहिक जरूरत के चलते.

हमारे शहर के अखबारों में सप्ताहांत वाले विशेष परिशिष्ट में कभी कभी विदेश भ्रमण कर आए किसी व्यक्ति के संस्मरण छपते थे. बचपन में उन विदेश हो कर आए निहाल हो चुके गधों के वही सब घिसे पिटे विचार पढता था “विदेशों में बडी सफ़ाई है” “लोग मेहनती हैं” “लोग देश प्रेमी हैं” “भ्रष्टाचार नही है” “मेहनत करने वाले की इज्जत है” – सब सही है यदी आप तुलना भारत से करें और कुछ समय घूम घाम कर वापस लौट जाएं लेकिन जब किसी स्थान पर तुलनात्मक रूप से लंबे समय तक रहो तब वस्तुस्थिती बेहतर समझ में आती है. और जो चंद दिन भारत के बाहर घूम आने पर ही अपने आप को खास समझने लगे उसके अपने आत्मविश्वास की तो बलिहारी है, उस से कभी पूछो की यार तुम खुद क्या हो? क्या सीख कर आए हो विदेश देख कर? क्या बदला तुम में? अपने देश और भाषा से कितना प्यार करना सीख लिए? क्या बदला अपने परिवेश में?

अमरीका के बारे में मेरी धारणा सदैव परिवर्तनशील रहती है क्योंकी पूरा परिवेश ही बहुत तेजी से परिवर्तनशील है. अमरीका ‘अनप्रेडिक्टेबल’ है क्योंकी समाज लकीर के फ़कीरों का नही हैं, समाज का तौर है कर के सीखने का और गलतियों से सबक लेने का – इसके फ़ायदे भी हैं और नुकसान भी. यह एक जीवंत समाज है जिसमें अपने सरोकारों को लेकर जो संवेदनशीलता और सजगता मैंने यहां देखी है और कहीं नहीं देखी. कुछ लोग परिवर्तन लाते हैं और अधिकतर उसको अपनी अपनी गति से अपनाते हैं - जिन्हें आप शायद अनभिज्ञ बोलने का लोभसंवरण ना कर सकें. 

अमरीका में किसी भी चीज की शेल्फ़-लाईफ़ बहुत छोटी है. इन्सान की भी और उसके विचारों और हुनर की भी. एक बात पक्की है की जो चीज अमरीका में लंबे समय तक टिक जाए वो सचमुच खास चीज होगी जैसे कोका-कोला या जीन्स. और फ़िर वो चीज बाकी दुनिया पर भी छा ही जाती है. मार्केटिंग का हल्ला है ये बोल कर इस सत्य का महत्व कम नही किया जा सकता.

चीजों की शेल्फ़ लाईफ़ छोटी इसलिए है की यह महाद्वीप ही “नव विश्व” कहलाया और इस महाद्वीप पर आ कर बसने वालों नें परिवर्तनशीलता में ही नवीनता बनाए रखने की तरकीब देखी है. यहां पहले पहल वो लोग आ कर बसे जो राज्य,राजनीति या धर्म के सताए हुए थे या उनसे त्रस्त थे. नए विचारों के लिए जैसा स्वागतभाव और खुलापन मैनें अमरीका में देखा है और कहीं नहीं देखा. इसी खुले नव विश्व में उन्हीं लोगों द्वारा ही अश्वेत गुलाम बना कर लाए गए और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पडा – ये कितना बडा विरोधाभास है. ये इंसान होने का विरोधाभास है -एक साथ अच्छा और बुरा होने की क्षमता का विरोधाभास है.

अमरीका में ही अपनी असफ़लताओं के लिए कुछ अश्वेत गोरों को दोष देते हैं – समान व्यव्हार ना किये जाने की शिकायतें करते हैं लेकिन गैर जिम्मेदाराना जीवन शैली के चलते वे अपनी आर्थिक स्थिती सुदृढ नही करते ये देख कर अचरज होता है. कब तक अपनी नाकारियों का ठीकरा आप दूसरों पर फ़ोडोगे? कभी हुआ था अन्याय अब तो मौके हैं अगर अप्रवासी सफ़ल हो सकते हैं तो आप क्यों नहीं?

अमरीका के वैचारिक खुलेपन की धारणा के विरोध में कहा जाता रहा है की अमरीका में कभी कोई महिला या अश्वेत राष्ट्रपति नही हुआ और इसाईयत का जोर है, इस हिसाब से तो देश परंपरावादी ही हुआ ना? ये फ़ंडा देने वाले भूल जाते हैं की अमरीका में पहले धर्म के बागी आए और फ़िर बागीयों की संतानों ने दोबारा अपने से पहले वाली पीढियों से ज्यादा धर्म को अपनाया. हां हुआ और ये भी एक ऐतिहासिक सत्य है. आज का अमरीकी अपनी पिछली पीढियों से कम शराब और सिगरेट पीता है. अमरीका मोटे लोगों का वह देश है जिसके नागरिक हर ओलंपिक मे सबसे ज्यादा पदक जीतते हैं. सनकी चरित्र वाले लोग हैं जो मोटे से दुबले होते हैं, पदक जीतते हैं और फ़िर मोटे हो जाते हैं – भारत में हम बस होते हैं और दूसरों को टीवी पर ओलंपिक जीतता देखते मर जाते हैं ये फ़र्क है.

मैंने पिछले आठ सालों में कई अमरीकियों से ज्यादा अमरीका घूमा है देखा है और भोगा है! भोगा है लेकिन सही मायनों मे अमरीका को जीया नहीं है. अमरीका वो जीता है जो यहां अपना बचपन और किशोरावस्था गुज़ारता है – बाकी तो अप्रवासी ही हैं – अधूरे अमरीकी – वे जैसा देस वैसा भेस के नीयम पर चलते हैं अमरीकी तौर तरीके गढते नही हैं उन्हें निभाते भर हैं. अमरीका को जीना हो तो यहां पर वे साल गुज़ारने होंगे जिनमें व्यक्तित्व की नींव पडती है और पुख्ता होती है – वे सही मायनों में असली अमरीका का स्वाद चखने के साल हैं. अधिकतर भारतीय परिवारों के बच्चे जिनके अभिभावक भारत से आए होते हैं – उनका व्यक्तित्व सांस्कृतिक सिट्ज़ोफ़्रेनिया का केस होता है. मां-बाप सोचते हैं की हमने पूर्व और पश्चिम का सही संतुलन दे दिया लेकिन तेल और पानी को एक बोतल में डाल कर लाख हिला लो तेल और पानी अलग अलग रहेंगे और अलग अलग सतह पर जमेंगे. तो भारतीय अभिभावकों के अत्याधिक प्रभाव में पली संतानें भी अधूरी अमरीकी ही होती हैं.

अमरीका को समझना है तो पैदाईशी अमरीकी की मनोवृत्ती को समझना होगा. अमरीका दुनिया के नक्शे पर एक किशोर राष्ट्र है जिसकी हर हरकत में कैशोर्य की झलक है. एक किशोर की समझदारी है, उत्साह है, भोलापन भी है, भय भी और उद्दंडता भी और बेवकूफ़ियां भी. मनोवृत्ती के हिसाब से यहां के बूढे भी किशोर हैं और वहीं भारत में बच्चे में भी बुढापे वाली कंडीशनिंग भरी हुई है. 

अमरीका के बारे में राय बनाना दूसरे समाजों की मजबूरी है – किशोरों के बारे में राय बनाना आसपास वाले बुजुर्गों की मजबूरी होती है. जिस किशोर के बारे में सर्वाधिक उद्दण्ड होने की राय रखी जाती है वो किसी से प्रभावित हो कर सही या गलत अनुचारण करते रहता है.  अमरीकी भी प्रभावित होते हैं और सीखते हैं. अमरीकी अपने अतिआत्मविश्वास (यहां चाहें तो ‘अपनी उद्दण्डता’ पढें) के शिकार होते रहे हैं लेकिन गलतियों से सबक लेकर उसे याद रखते हैं. इनके इसी सीखने की ललक का मैं फ़ैन हूं और इनकी प्रतिभा के आकलन की क्षमता, सम्मान और कद्र करने के भाव का कायल हूं. यह अमरीका की सीख है बाकी दुनिया को! अमरीकी स्वयं  पिछली पीढीयों के प्रभावों को जनरेशन्स में बांट कर समझने की कोशिश करते हैं और हर पीढी अपनी मौलिकता भी जोडती है. हर पीढी पिछली पीढी के गढे खाके के बाहर रहना चाहती है. ये एक कलेक्टिव माईंड सेट है. एक मूड है. फ़ुर्सतियाजी को इन जनरेशन्स के बारे में पढ कर अमरीका को समझने में आसानी रहेगी. अमरीकी किशोर को पालना एक महान सरदर्द है क्योंकी वो भारतीय किशोर के समान “राजबेटा” या “सोना पुत्तर” नही होते – बगावती होते हैं, ये पीढी दर पीढी होता है.बाकी विश्व चाहे जितना दंभ भरे पूरी दुनिया की जीवनशैली पर इस किशोर राष्ट्र का प्रभाव है. ये हमेशा किशोरों का ही काम रहा है. 

भारत तो फ़िर भी अमरीका से मित्रवत है लेकिन दूसरे देशों में रहने वालों के तौर देखे होंगे आपने. अमरीका से ये चिढ क्यों है? अगर कोई ईर्ष्या है एक उन्नत समाज से तो अपना समाज बेहतर क्यों ना बनाएं! आज बहुत से जाहिल इस पर आमादा हैं की किसी और की खूबसूरत चीज इस लिए तोड दें की वो खुद को हासिल नही है! भारत भी आतंकवाद से इसी के चलते जूझ रहा है. 

भारत पाकिस्तान की हरकतों को “हम बर्दाश्त नहीं करेंगे” कहता हुआ सहता रहता है और अमरीकी सीधे कार्पेट बम बिछा देते हैं – कर लो जो करते बने! हम दूसरों को ओलंपिक पदक जीतते देखते रहते हैं, राय कायम करते रहते हैं पेलते रहते हैं और हमारे अर्जुनसिंह और करुणानिधी देश को गर्क करते रहते हैं. बकौल राजीवजी “हमें देखना है, हम देखेंगे” (करेंगे धरेंगे कुछ नहीं)! देखते रहना हमारा स्थायीभाव है और बर्दाश्त ना करना अमरीका का स्थायीभाव है.

वैसे तो आज अमरीकीयों की एक राष्ट्र के रूप में औसत आयू बढ रही है अर्थात अमरीका बूढा हो रहा है. बेबी-बूमर्स वाली जिस पीढी की वर्तमान अमरीका को गढनें मे महती भूमिका रही वो बुढा रही है और उनके बाद वाली बेबी-बस्टर जनरेशन नें कम संतानें उत्पन्न कीं अत: देश में यूवा पहले से कम हैं – यह हर उन्नत समाज में होता है. जबकी भारत में किशोरों की और युवाओं की संख्या बूढों से अधिक है,  भारत युवाओं से भरा हुआ देश है. फ़िर भी मनोवृत्ती के हिसाब से अमरीका किशोर है और भारत जर्जर बूढा है. ये पूरा मानसिकता का फ़र्क है. हम सचमुच अमरीका से बहुत कुछ सीख सकते हैं – कॉपी करने को नहीं सीखने को बोल रहा हूं - फ़र्क है!

रही बात जीवनशैली की – भारतीयों की कामेच्छाएं दमित हैं. संस्कृति और मूल्यों के नाम पर भारतीय किशोर और यूवा पीढी दर पीढी दमित रहे हैं. पश्चिमी समाज में खुलेपन को भारतीय उनके यौनाचार से ही जोडकर देखते हैं वैचारिक आत्मनिर्भरता से जोड कर नहीं – ये हमारी कुण्ठाओं का परिचायक है, हमारी मुक्ति कहां हुई? वैचारिक खुलापन एक जन्मजात स्वतंत्रता है – वर्जनाओं और ग्लानीभाव से स्वतंत्रता जो यहां के बच्चों को  मयस्सर हुई है. इन्हीं मुक्तताओं के चलते उनमें वैचारिक आत्मविश्वास अधिक है. इस पर अलग से एक लेख बन सकता है – इसी तरह कभी उकसा दिए जाने पर! :)

12 responses to “अमरीका – शमरीका!”

  1. Hindi Blogger

    फ़ुरसतिया जी के आमंत्रण पर आपने अपने विचारों को जिस दृढ़ता से रखा वो सराहनीय है. हालाँकि, उन्होंने जिस बात की उलाहना दी थी, वो शिकायत अब भी क़ायम है. ग़ौर फ़रमाया जाए- “हमारे तमाम ब्लागर दोस्त अमेरिका में हैं लेकिन कुछ ऐसा है कि वे वहां के जीवन के बारे में उतनी बेबाकी से नहीं लिखते।”

    आपकी इस उक्ति से मैं अपनी विनम्र असहमति दर्ज कराना चाहूँगा- ‘जिस देश के लोगों ने पूरी दुनिया की हर सरकार को साध रखा है…’ क्योंकि मुझे लगता है चीन,रूस,फ़्रांस,ईरान,वेनेज़ुएला,क्यूबा,उत्तर कोरिया, और न जाने कितने ही अन्य देशों की सरकारें अमरीकियों के सहारे के बिना ही सधी हुई हैं. शायद, भारत की सरकार को भी कभी अमरीका के लोगों के सहारे की ज़रूरत नहीं रही है. हाँ, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारों को ज़रूर ही अमरीका ने साध रखा है.

  2. अनुराग मिश्र

    बेहतरीन लेख। आपका तुलनात्मक लेख अच्छा लगा। मेरे मन की बहुत सी बातों को आपने शब्दों में उतार दिया है।

    मैं स्वयं अमरीका में पिछले पाँच सालों से हूँ, और अब महसूस होता है कि हम भारतीयों में एक अलग सा काम्पलेक्स है कि अपनी बुराई या कमी मानना ही नही. चाहते है। जब भी किसी और की तारीफ होती है तो अच्छी बातों को आत्मसात करने के बजाए उसकी बुराइओं की तरफ ध्यान देने लगते हैं।

    मेरा लेख “विनय और आत्मसम्मान की कमी” देखें। ये मेरे अमरीका अनुभव के बाद पैदा हुए विचार हैं।

    अनुराग

  3. Jagdish Bhatia

    अमेरीकी समाज को समझने का एक अलग नजरिया। खुले समाज में रहते हुए आप भी खुलेपन के साथ अमेरीकी समाज की समीक्षा पोजिटिव तरीके से कर पाए जो कि एक भारतीय के लिये भारत में रहते हुए संभव न हो पाता। शायद हमारे समाज में रहने वाले पुरातन्पंथी इससे कुछ सीख पाएं।

  4. रवि

    मेरे सहकर्मी के एक संबंधी अमरीका में काफी समय से बसे हुए हैं. गाहे बगाहे उनके यहाँ भारत से लोग जाते रहते हैं – घूमने-घामने सैर करने और मिलने.

    एक दफा उनकी सासू जी अमरीका गईं. वहाँ पर जैसा कि हम भारतीयों के दिल में किसी प्यारे से छोटे से बच्चे को देख कर दिल में प्यार उमड़ आता है और उसे अले … ले… ले कह कर गोद में उठा लेते हैं, वैसा ही कुछ उन सासू माँ ने पड़ोस के पार्क में टहलते हुए किया. वह बच्चा अपने अमरीकी मां बाप से अलग घूम रहा था. मित्र की सासू माँ ने बच्चे को कुछ चॉकलेट जैसी चीज भी खाने को दी.

    बस क्या था. बावेला मच गया. बच्चे के पालकों ने पास के पुलिस वालों को बुला लिया और अपहरण का केस दर्ज कर दिया. वह सत्तर साल की भारतीय मां अमरीकी कानून के तहत जेल में बन्द हो गई. उसे छुड़ाने के लिए उस परिवार को पसीने आ गए.

    – सच है, सद्व्यवहार के अपने रूप अपने रंग हैं. मेरा बचपना ऐसे मुहल्ले में गुजरा है जहाँ बच्चा पैदा होता है तो सबसे पहले वह मां बोलना सीखने के बजाए मां की गाली देना सीखता है. शुक्र कि बात यह रही कि मैं उस मुहल्ले में बोलना और कैसे बोलना यह तहजीब सीख कर गया था. पंजाब में तो लोग आपकी तारीफ भी मां-बहन की गाली देकर करते हैं.

    जाहिर है, ऐसे सर्वेक्षण विवाद पैदा कर बाजार हासिल करने के उद्देश्य से किए जाते हैं.

  5. संजय बेंगाणी

    बहुत ही अच्छा लिखा हैं, अमुमन मैं लम्बे लेख ऊपरा-ऊपरी पढ़ कर निपटा देता हुं, लेकिन इसे अविराम पुरा पढ़ा. बहुत सधा हुआ लेख हैं.
    जब मिन-मेख निकालना ही भारतीयता हो गया हैं तब दुसरों से सिखना हमारे बस का काम नहीं.

  6. सुनील

    लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. मैं भी मानता हूँ कि अमरीका में बहुत बुराईयाँ हैं, जैसी कि हर देश में होतीं हैं, पर अमरीका में ऐसे लोग भी बहुत हैं तो अपनी बुराईयों की खुल कर चर्चा और आलोचना कर सकते हें जो अन्य देशों में इतनी आसानी से नहीं होता. वैसे तो तुम्हारे लेख में बहुत सी बातें हें जिनपर बहस हो सकती है पर इस समय एक बात पर अपनी असहमतीं प्रकट करना चाहता हूँ. जिस देश से बात न बने, उस पर कार्पेट बम्ब फैंक कर अपनी ताकत दिखाना किशोरावस्था की ही नासमझी लगती है, क्योकि बमों से कभी कोई समस्या नहीं सुलझी.

  7. SHUAIB

    बहुत खूब जी, लेख पढ कर मज़ा आगया।

  8. अनूप शुक्ला

    लो भइये हमारी टिप्पणी कुछ लंबी हो गयी तो उधर ही पोस्ट कर दी लेख के रूप में।
    शायद यह कुछ और लिखने के लिये उकसाये।

  9. मनीष

    इस चर्चा की वजह से बहुत अच्छे लेख पढ़ने को मिल रहे हैं।आपकी बिटिया का जवाब पढ़कर खुशी हुई।

  10. मनीष

    ऊपर की टिप्पणी की दूसरी पंक्ति गलती से paste हो गयी है।

  11. अतुल शर्मा

    आपने तो आईना दिखा दिया। शक्ल बड़ी बदसूरत नज़र आ रही है। निश्चित रूप से हम भारतीयों ने अमरीका से केवल कपड़े, भाषा कोक, पिज्जा-बर्जर भाषा आदि को अपनी सुविधानुसार अपना लिया है। उनकी कर्मठता को हमेशा ही अनदेखा किया। वहाँ के लोग सभी नियम कायदों का जिस पालन सम्मान करते हैं हम उन्हें तोड़कर उतना ही गर्व करते हैं। हमारे देश के युवा चौराहे पर लाल बत्ती में बाइक ले जाना अपनी शान और मर्दानगी समझते हैं (क्योंकि फिल्मों ऐसे ही कचरों से हीरोइन इंप्रेस होती है)और युवा ही क्यों ये कार्य तो कोई उम्रदराज व्यक्ति भी करता दिखाई दे जाएगा आखिर वे भी युवकों को यही आदर्श दे रहे हैं।

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