By eswami on November 2, 2010
लडकियाँ अगर मेलों में यानी सार्वजनिक स्थल पर मेंहदी वालों से मेंहदीं लगवा सकती हैं, गोदने गुदवा सकती हैं तो भई लिपस्टिक क्यों नही लगवा सकतीं.. लगाने वाले को अगर मूंह में लिपस्टिक पकडना आसान पड रहा है तो आप बीच में बोलने वाले कौन?
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By eswami on August 1, 2010
खलील जिब्रान के विचार मित्रता पर- सुन्दर और आदर्श!
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By eswami on November 11, 2009
आज जब चिट्ठाचर्चा की तुलना देसीपंडित से करता हूं तो पाता हूं कि आज अंग्रेजी वालों के पास भी इसकी टक्कर का कोई उपक्रम मौजूद नही है!
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By eswami on November 3, 2009
बहुतेरे हिन्दी चिट्ठाकारों के अंग्रेजी चिट्ठे हैं. महाजनो येन गत: स: पन्था का अनुसरण करते ऐसा करने का मन तो बन ही चुका था, समय रहते यह काम भी हो ही गया. जैसा कि होता है, एक छोटी व्यक्तिगत पोस्ट से आगाज़ कर दिया है. विविधता बढने व कलेवर और निखरने मे ज्यादा समय नही [...]
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By eswami on October 6, 2009
एक पडताल – चिट्ठों पर विज्ञापन लगाने के क्या विकल्प हैं? इस माहौल में चिट्ठाकारी का औचित्य भी क्या है?
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