July 2007

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इंकब्लॉगिंग!

‘प्रतिभावान’ भारत!

दुनिया भर में बसे प्रतिभावान भारतीयों को हार्दिक शुभकामनाएं!

लिपियाँ तो अभी और निखरेंगी!

आज-कल कुछ अच्छे चिट्ठे पढने का सौभाग्य मिला है. पहले रमण कौल भाई और सुनील दीपकजी के चिट्ठे ऐसे होते थे (‘हैं’ इसलिये नही कहा की दोनों को व्यस्तताओं के चलते हाल में लिखे काफ़ी समय हो गया) जो सोचवाते थे इतना की उन पर की जाने वाली प्रतिक्रिया बढते बढते लेख ही बन जाए, ठीक वैसे ही विष्णु बैरागीजी [...]

आलोक पुराणिक जी की शानदार टिप्पणी

आदरणीय आलोकजी, आज मसिजीवी के ब्लाग पर आपकी काबिले-गौर टिप्पणी पढी. उसी पर अपने विचार रख रहा हूं. भईया मसिजीवीजी मेरी बात को रखने के लिए धन्यवाद। एंटी बाजार का अपना बाजार है, और बहुत बड़ा। चकाचक। एंटी बाजार वाले भी मलाई काट रहे हैं, पर इसी बाजार से। एक पूरी लिस्ट है मेरे पास [...]

वर्चुअल टीम्स और जटिलताएं

पिछली बार हमने वर्चुअल टीम्स के प्रकार देखे थे, इस बार ज़िक्र करेंगे उनसे जुडी जटिलताओं का. वर्चुअल टीम्स को उनकी सरंचना के हिसाब से वर्गिकृत करना तो आसान है लेकिन उनकी जटिलता को  उनके दो गुण सबसे अधिक प्रभावित करते हैं – वे सीमाओं में बंधी नही होती[स्थानीय समयों, दूरियों और भौगोलिक हदों के बाहर [...]