By eswami on September 3, 2010
“कौन देस के बासी?…कौन देस के बासी? यूं पूछते होंगे वो!” दादाजी ने पिताजी से कहा. “तुम बताना कि कहां से आए हो, फ़लां पण्डे के पास जाना है, ये पुराना पता है पण्डे का. हमारा खानदानी पण्डा है, मिल जाएगा. और वहां उनकी बहियों में हमारे पुरखों के नाम दर्ज हैं.” बहुत बचपन की एक स्मृति [...]
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By eswami on October 10, 2009
आज ओबामा की आस्तीन पर नोबल शान्ति पुरुस्कार का बिल्ला चमकाना एक कूटनीति जरूरत है अन्यथा इनके बढाए हाथों से कोई मरहम तो क्या जहर ना ले!
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By eswami on September 29, 2008
अमरीका की सरकार ने लोगों को शेर-आया शेर-आया का डर दिखा दिखा कर बहुत बेवकूफ़ बनाया. झूठ के बाद झूठ और उसके बाद झूठ! कभी आतंकवाद का डर. कभी इराक का. कभी आर्थिक परिस्थितियों का. डर में जीती हुई जनता से हर मन माफ़िक काम करवा लेना आसान था. लेकिन आज जो हुआ वो जनता [...]
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By eswami on September 28, 2008
मेरी पिछली प्रविष्ठी थी फ़ेडरल रिजर्व के बारे में. उसी को आगे बढाता हूं. जो संस्था किसी देश की मुद्रा की तरलता को नियंत्रित करती है, वह संस्था उस देश के सारे व्यापार-विनिमय को अनाधिकारिक रूप से नियंत्रित कर सकती है. अमरीका में यह अधिकार फ़ेडरल रिजर्व के पास है. यानी की प्राईवेट बैंकर्स के एक [...]
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By eswami on July 20, 2008
(हे खास-आदमी, ज़रा इत्मिनान से पढ…नहीं तो आगे बढ!) (दृश्य १) कभी ज़मीन होती थी. ज़मीन पर, आम-आदमी होते थे; घांसाहारी जीव थे. मांसाहारी नेता, इन घांसाहारी जीवों का भेजा खाते थे. जब आदमी का भेजा खाने के लिये नेता जमीन पर आते थे, तब उन्हें ‘जमीन से जुडा हुआ नेता’ कहा जाता था. भेजा खाए जाने की प्रक्रिया में, आदमी, चट कर भी अनुग्रहित महसूस करता था. *_*_* [...]
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