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खलील-ई

‘मौन‍म् सर्वार्थ साधन‍म्’ (तुम स्वयं को स्वामी क्यों कहते हो ई-स्वामी?)

By eswami on July 10, 2009

अहंकार का विष साधुओं को भी नहीं छोडता. तुलसीदास, कबीर, रैदास आदी सब अपनी रचनाओं में कहीं ना कहीं अपने नाम डाल कर छोड गए – ‘…देख कबीरा रोया’ ‘…तुलसीदास सदा हरि चेरा’ ‘बुल्ला की ज़ाणां मैं कौंन..’ नाम का अहंकार क्यों होना चाहिए? उन्हें ये चिन्ता क्यों होनी चाहिए थी की लोग रचनाओं के साथ उनका [...]

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प्रतिक्रियाएं जो टिप्पणियों में नहीं मिलतीं!

By eswami on August 17, 2008

एक चिट्ठाकार पाठिका चैट कर रही थीं. वे कभी-कभी मेल और फ़ोन पर भी बात करती हैं. इस बार मेरी छवि के लिये “चिंतित” दिखीं – “मुझे मालूम है आप कितना अच्छा सोचते हो और लिख सकते हो! मुझे मालूम है आपने शॉक वेल्यू के लिये नही लिखा होगा, लेकिन कभी-कभी आपका लिखा या शैली जंचती/पचती नहीं [...]

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