By eswami on November 1, 2010
चिट्ठाकारी अपनी आईडेंटिटी बनाने के बाद अब आईडेंटिटी क्राईसिस के दौर से गुज़र रही है. समस्या ये है कि अच्छे-बुरे हर एक की शेल्फ़ लाईफ़ एक जैसी हो गई है…
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By eswami on November 19, 2009
वैचारिक प्रवाह लहर है उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ कोशिशें.
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By eswami on July 20, 2008
(हे खास-आदमी, ज़रा इत्मिनान से पढ…नहीं तो आगे बढ!) (दृश्य १) कभी ज़मीन होती थी. ज़मीन पर, आम-आदमी होते थे; घांसाहारी जीव थे. मांसाहारी नेता, इन घांसाहारी जीवों का भेजा खाते थे. जब आदमी का भेजा खाने के लिये नेता जमीन पर आते थे, तब उन्हें ‘जमीन से जुडा हुआ नेता’ कहा जाता था. भेजा खाए जाने की प्रक्रिया में, आदमी, चट कर भी अनुग्रहित महसूस करता था. *_*_* [...]
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