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	<title>ई-स्वामी&#187; eswmi ई-स्वामी</title>
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	<description>यहां पर "कुछ" लिखा है!</description>
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		<title>अजन्मे भूत की नज़र से भविष्य की कलाएं</title>
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		<pubDate>Tue, 24 Nov 2009 03:42:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[दिखा-ई]]></category>
		<category><![CDATA[features]]></category>
		<category><![CDATA[retro]]></category>
		<category><![CDATA[steampunk]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ कलाएं ऐसी हैं जो जन्मी तो पश्चिम मे हैं लेकिन यदि उन्हे भारतीय स्पर्श मिले तो मामला ही कुछ और होगा! ये लेख ऐसी ही कलाओं के बारे मे है. ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><em>[</em><em>चूहा यानी क्या? Rat (रैट- बडा चूहा) या Mouse(माऊस- छोटा चूहा या जिसे चुहिया भी कह देते हैं)? हमारे पास इन छोटे-बडे चूहों के लिये अलग अलग शब्द नही है, बस <strong>चूहा </strong>ही है! </em></p>
<p><em>अब कोई ज्ञानी कहेगा की जी ‘मूषक’ है – </em><em>गणेशजी की आरती के अलावा उसका उल्लेख कब होता है! ये समस्या तो है, कि हिन्दी शब्दकोशों में चित्र खींचने वाले सटीक शब्दों का अभाव रहा है. आज मुझे जिस विषय पर लिखना है, उसके विषयानुरूप सटीक शब्द नही मिल रहे.]</em></p>
<p>गु़ज़ारिश है कि इस लेख के शीर्षक पर थोडा ठहरियेगा.. यह बेमतलब नही है.</p>
<p>हमारे यहां अक्सर शब्द स्वयं-स्थापित परिभाषाओं का रूप नही ले सके – मसलन ओल्ड-स्कूल/रेट्रो/रेट्रो-फ़्यूचरिस्टिक/अल्टरनेट-हिस्ट्री जैसे कई शब्द हैं, जो अंग्रेजी भाषा में स्वयंसिद्ध पारिभाषिक रूप ले चुके हैं, इस लेख में इन शब्दों का प्रयोग खुल कर होना है, अत: पहले इनके बारे में बात कर लेते हैं:</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Alternate_history" target="_blank">अल्टरनेट-हिस्ट्री</a> – गल्प लेखन का एक प्रकार है. यह उपवर्ग विज्ञान-गल्प (साईंस-फ़िक्शन) और इतिहासी-गल्प (हिस्टॉरिक-फ़िक्शन) पर आधारित है.</p>
<p>इस प्रकार के गल्प में कल्पना की जाती है कि इतिहास ने जो करवट ली, यदि वैसा ना होकर कुछ भिन्न या अलग हुआ होता तो किस प्रकार के अविष्कार हुए होते, कैसे हुए होते और क्यों!</p>
<p><a href="http://www.urbandictionary.com/define.php?term=old%20school" target="_blank">ओल्ड-स्कूल</a> – गुज़रे जमाने की वो चीजें या तरीके जिसे बडे प्यार या सम्मान से याद किया जाता है.</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Retro" target="_blank">रेट्रो</a>- गुज़रे जमाने की वो चीज़ें जो इतने काम की हैं या उनसे जुडा नॉस्टेल्जिया इतना तगडा है कि वे किसी रूप में आज फ़िर फ़ैशन मे आ गई हैं.</p>
<p>आगे जैसे जैसे जरूरत पडेगी परिभाषाएं देखते चलेंगे.</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://www.littleredbook.cn/wp-content/uploads/2009/02/littleredbook_dot_cn_volkswagen_2.jpg" alt="" width="400" height="320" align="left" /> कहते हैं कि हमारा सारा सृजन प्रकृति की नकल मात्र है. लेकिन कभी कभी मनुष्य अपने किये की से भी प्रेरित होता है, उसे नये रूप में दोहराता है या यूं कहें की नकल की नकल हो जाती है. <strong>रेट्रो</strong> इसी प्रकार की नकल है. कारों में नई बीटल या पी.टी क्रूज़र कारें ऐसी सी सफ़ल रेट्रो डिज़ाईन की कारे हैं. ये करें उन लोगो द्वारा नही खरीदी गईं जिन्होने हिप्पी युग मे ओरिजिनल डिज़ाईन वाली कारों में सवारी की थी, बल्कि ये कारें उन यूवा लोगो ने खरीदीं जो हिप्पी युग मे पैदा भी नही हुए थे. वे उस अतीत को महसूस करना चाहते थे जिसके बारे मे उन्होने पढा सुना मात्र था. हिप्पी युग का नास्टेल्जिया इतना तगडा है.</p>
<p>रेट्रो कई बार शास्त्रीय या कालजयी का प्रभाव देने के लिये भी प्रयोग मे लाया जाता है लेकिन ये है किसी दौर से जुडा हुआ ही. भारत में महिलाओं की पोषाकों मे रेट्रो डिज़ाईन्स देखने को मिलते हैं. पेंटिंग्स में तंत्र और यंत्रों पर आधारित एब्स्ट्रेक्ट आर्ट देखने को मिलता है. वो रेट्रो नाम से नही बिकता लेकिन पुरातन का ही नया वर्जन है.</p>
<p>समय के साथ कई चीजों प्रयोग मे नही रहतीं जैसे की पुराने टाईपराईटर्स लेकिन उनके प्रति एक प्रकार का मोह बचा रहता है.</p>
<p>रेट्रो और <strong>ओल्ड-स्कूल</strong> का संबंध है – ओल्ड-स्कूल शब्द भारत मे कहीं सबसे प्यार से प्रयोग मे आता है तो वो है “भांगडा” संगीत में! ये बात गैर पंजाबियों को कम पता है कि नये भांगडा बीट्स पुराने भांगडा बीट्स से अलग हैं – अत: किसी पार्टी मे यदी ताऊ-चाचों को नचाना हो तो गुहार लगाई जाती है &#8211; <strong>“ओल्डस्कूऽऽऽल”</strong> और पुरानी बीट्स वाला संगीत बजने लगता है. “टिंग टिंग टिंग ..तुन्‍ ..टुंग टुंग टुंग.. ओ हुसन दिये सरकारे नींऽऽ… ” और पुराने अपनी “डान्स मूव्ज़” का जौहर दिखाने लगते हैं. ” <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>जो ओल्ड-स्कूल है उसे बदला नही जाता, उसे कभी कभी मूल रूप मे नये स्थानो मे प्रयोग कर लिया जाता है! ओल्ड-स्कूल यनी वो जिसका आनंद उसके मूल रूप मे ही सबसे ज्यादा आता है!</p>
<p><strong><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://www.impactlab.com/wp-content/uploads/2008/03/halleux2.jpg" alt="" width="400" height="438" align="left" /></strong><strong>अल्टरनेट-हिस्ट्री </strong>– कल्पनाशील लेखन की, गल्प की देन है. जिसमे जानबूझ कर इतिहास को बदल कर देखा जाता है. “यूं होता तो क्या होता”. कला का एक उपवर्ग इस अल्टरनेट हिस्ट्री से प्रभावित हो कर जन्मा है. इस कला का आधार है कि यदि कई नए अविष्कार नही हुए होते या उनसे पहले पुरानी तकनीक और तकरीबों पे आधारित अविष्कार हुए होते तो वे कैसे दिखते.</p>
<p>अल्टरनेट हिस्ट्री पर आधारित कलाकृतियां नये और पुराने का ‘फ़्यूजन’ मात्र नही होती हैं ये अपनी कल्पनाओं में समय मे पीछे जा कर एक नई दिशा मे आगे जाने का प्रयास हैं.</p>
<p>यूं तो अल्टरनेट हिस्ट्री लेखन ने कई प्रकार की कलाओं को जन्म दिया है लेकिन इनमे कला का जो उपवर्ग मुझे सबसे लुभावना लगता है वो है “<strong>स्टीमपंक</strong>” [steampunk].</p>
<p>स्टीमपंक कला विक्टोरियन युग के भाप-आधारित (काल्पनिक) अविष्कारों या उस दौर में प्रयोग की जाने वाली तकनीकों से चीजों को बना कर देखने का प्रयास है.</p>
<p>कई बार कलाकार आधूनिक उपकरणों को उस पुराने दौर का “लूक-एण्ड-फ़ील” देता है. इस प्रकार के परिवर्तन <em><strong>मॉड्डिंग</strong></em> कहे जाते हैं. यहां उद्देश्य जितना हो सके नये को पुराने से पूरी तरह बदलना है मिलाना नही है. यानी कलाकार बीते हुए कल की निगाह से वर्तमान और भविष्य को देखने की कोशिश करते हैं. उपकरणों और उपक्रमों का उपयोगी होना एक अनिवार्य शर्त चाहे ना हो, यह कला के नमूने की कीमत बढा देता है.</p>
<p>स्टीमपंक का साहित्य, सचित्र-साहित्य, सिनेमा आदी में  प्रयोग हुआ है. १९९९ मे बनी ‘<strong>वाईल्ड वाईल्ड वेस्ट’</strong> और २००३ में बनी <strong>‘अ लीग आफ़ एक्सट्राओर्डिनरी जेन्टलमैन’</strong> दो उदाहरण हैं. ए लीग ऑफ़ एक्स्ट्राओर्डिनरी जेंटलमैन वैसे ज्यादा चली नही थी लेकिन उसमें प्रयोग किये गये स्टीमपंक डिज़ाईन्स पर भारतीय कला का प्रभाव भी बहुत था.</p>
<p>औद्योगिकरण के बाद कला का रूप बहुत बडे पैमाने पर बदला है, भारतीय कलाओं में इस प्रकार के समकालीन बदलावों और प्रभावों के बढने गुंजाईश आज अधिक है.</p>
<p>विचार आया की भारत में <em>विक्टोरियन शैली (विक्टोरियाकालीन) </em>कई वस्तुएं अपने मूल रूप मे सुरक्षित हैं जिनसे प्रेरणा ले कर कई मजेदार काम किये जा सकते हैं. और कभी कभी सोचता हूं कि यदी ऐसी मॉड्डिंग भारत में की जाए तो वो देखने वाली होगी. काश कोई ज़रिया होता की भारत के नर्डी कलाकारों के ऐसे जौहर देखने को मिलते.</p>
<p>मेरी पसंद के कुछ और चित्र प्रस्तुत हैं:</p>
<p>इस चित्र में कार के दोनो ओर बने हाथी पर गौर करें. यह चित्र अ लीग ओफ़ एक्स्ट्राआर्डिनरी जेन्टलमैन से है.</p>
<p><img src="http://ucables.com/img/extra/THE-LEAGUE-OF-EXTRAOR-R48864-2.jpg" alt="" width="600" height="256" /></p>
<p><img src="http://bloggingbalkanistan.files.wordpress.com/2009/04/steampunkpc.jpg" alt="" width="291" height="218" /> <img src="http://www.ninjavspenguin.com/blog/wp-content/uploads/2008/01/steampunk-nerf-guns.jpeg" alt="" width="291" height="218" /></p>
<p><img class="alignleft" src="http://2.bp.blogspot.com/_iXmv21E_1gY/SDm9OmvEZVI/AAAAAAAABF4/mfj1fjLFCgs/s320/Steampunk+desktop.jpg" alt="" width="291" height="260" /></p>
<p>ये लेख आपको कैसा लगा?</p>
<p>क्या आप ऐसी और सामग्री पढना चाहेंगे? कृपया जरूर बताएं.</p>
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		<title>भाषा प्रवाह मतलब “मन का रेडियो बजने दे ज़रा!”</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/324</link>
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		<pubDate>Thu, 19 Nov 2009 18:28:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[लिखा-ई]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
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		<category><![CDATA[features]]></category>

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		<description><![CDATA[वैचारिक प्रवाह लहर है उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का  जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ कोशिशें.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कभी कभी अपने चिट्ठे पर लिखा कुछ, दोबारा पढ लेना आनन्द देता है. उससे अधिक आनन्द देती है कोई ऐसी टिप्पणी जिसमे अपने मनपसंद हिस्से की ही बानगी मिल जाए.</p>
<p>इटालियन कवि एन्टोनियो पोर्शिया कहते हैं &#8211; “मुझे पता है मैने तुम्हे क्या दिया, तुमने क्या लिया वो पता नहीं”. इसीलिये जब लिखी बात पहुंच जाती है, पावती मिल जाती है, तसल्ली हो जाती है!</p>
<p>अपवाद स्वरूप किसी लेख पर इतनी उदार प्रशंसा मिल जाती है कि सफ़ाई देने का मन हो आता है! <a href="http://anuragarya.blogspot.com/">डॉ. अनुराग</a> ने <a href="http://hindini.com/eswami/archives/308/comment-page-1#comment-5749">टिप्पणी की</a> “आपमें एक अजीब नेसर्गिक गुण है (या स्वंय अर्जित किया हुआ )…आपकी भाषा प्रवाह किसी भी लेखक को कोम्प्लेक्स दे सकता है …ओर उसपे ये गजब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर .”</p>
<p><strong>इन्टरनेट के इस कडीप्रद युग में अपने लेखन को लेकर कोई मुगालता या खुशफ़हमी भी तो नही पाली जा सकती.</strong> अत: मुझे लगता है कि इस पर सफ़ाई देना बहुत जरूरी है. चूंकि ये मात्र धन्यवाद देने वाली प्रशंसा नही है.</p>
<p>सुनील गावस्कर से किसी ने पूछा बॉल चाहे जैसी आए, स्ट्रेट ड्राईव्स कैसे लगा लेते हैं? तो उनका जवाब था “गल्ली क्रिकेट”!</p>
<p>बचपन में अपने घर की गली मे क्रिकेट खेल चुका हर व्यक्ति जानता है, कि जब तक सीधे पटिये नही चलाए, रन नही मिले. तो बचपन में जो सीमितताएं थी उन्होने एक फ़ायदा दे दिया. हां बाकी कलात्मकता परिपक्वता के साथ आ जाती है.</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm1.static.flickr.com/144/319012584_54eabdd6fa_m.jpg" alt="" align="left" />ये आम आदमी का भी सच है. मेरे लिये, सीधे इन्टरनेट पर लिखना गल्ली-क्रिकेट खेलने जैसा था. डिसकशन फ़ोरम्स, ई-मेल ग्रुप्स और फ़िर तकनीकी चिट्ठाकारी में साहित्यिक नही, शतरंजी लेखन चलता है – बात को आगे बढाता हुआ – लेन-देन करता हुआ. कुछ समेटा हुआ कुछ सटकाता हुआ. सीखता हुआ ढलता हुआ. <a href="http://hindi.amitgupta.in/" target="_blank">अमित गुप्ता</a> को देखिये वो भी ऐसा ही लिखता है – आपको कभी बडा प्यारा लगेगा और कभी बडा लडाका. <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/" target="_blank">संजय बैंगाणी</a> के अपेक्षाकृत सभ्य और सौम्य लेखन में भी इसकी हल्की सी झलक मिलेगी आपको.</p>
<p>फ़ोरम्स पर अगर लेख या संदेश में मौलिकता, ऊर्जा और गति नही है तो वो प्रत्युत्तर देने लायक नही पाया जाता. कई बार एक व्यक्ति को काफ़ी देर तक अपनी हांकने का पूरा मौका दे कर प्रत्युत्तर में सीधे गलाघोंट लेखन किया जाता है. पंगेबाजी को छोड दें तो चिट्ठाकारी मे उस प्रकार के लेखन से निजात है – ये स्वांत:सुखाय है लेकिन ये भी प्रवाहमय होने की मांग से बरी नही है.</p>
<p>तो कथ्य को प्रवाहमय बनाने की कोशिशों में मै क्या-क्या चोरी-चकारी, नकल-पट्टी और उठा-पटक ट्राई मार चुका हूं, साझा कर लेता हूं-</p>
<p><strong>पहली ट्रिक – चोरी:</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p>दुनिया के तमाम जबरदस्त लेखकों और नेताओं मे एक गुण समान होता है – वे संवाद-विवाद-कुशल, वाक-चातुर और विद्वान होते हैं.</p>
<p>वो जब लिखते हैं तो ऐसे जैसे अंधेरे में कोबरा डंस कर गायब हो जाए. स्ट्राईक-आऊट!</p>
<p>जो लोग आज चिट्ठाकारी को अक्सर त्वरित लेखन, क्षणिक उच्छवास की अभिव्यक्ति आदी के लेबल देते हैं उन्हें समझना चाहिए की सूक्तियां लिखने वाले तमाम महान विचारक तेजी से गहन सोच कर अपनी बात कह चुकते थे – आज संप्रेषण की गति ही तेज है. अगर अपनी बात सीधे कह चुकना है और वो भी ठीक से, तो मुझे ऐसी शैली चुराना होगी– ये चुनौती देनी होगी स्वयं को और लेकर चलना होगा की शुरु मे तो ९८.८६% बार असफ़ल ही होंगे हम!</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Aphorism" target="_blank">एफ़ोरिस्म</a> कलेक्शन[सूक्तियां] पढता तो हूं लेकिन सारी सूक्तियां ‘सुभाषित’ नही होतीं.</p>
<p>“Silence is golden” बॉर्डर-लाईन प्रवचनात्मक है. इससे बचना चाहता हूं. हिन्दी चिट्ठाकारी में इस प्रकार का लिखने वाले बहुत हैं.</p>
<p>“Life is but a moment, death also is but another.” उससे बेहतरीन है, ये फ़िलॉसोफ़िक है, हल्का भी है भारी भी और इसमे डार्क ह्यूमर का टच है – इस तरह से सोचने की कोशिश, इस शैली को चुराने की कोशिश करता हूं.</p>
<p><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Aphorism" target="_blank"><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm3.static.flickr.com/2055/2231025016_15fe2ce891_m.jpg" alt="" align="left" /></a>फ़िर बीते हुए महान लेखकों पे सवासेर कौन हैं? आने वाले कल के महान लेखक! हैना!!</p>
<p>मेरा देखना रहा है कि, सूक्तियां लिख चुके महान लेखक और आज के अल्हड किशोर बहुत अलग अलग तरीके से सोचते हैं. सोचना भी हुआ. लेकिन ज्यादा मजेदार तरीके से हमेशा अल्हड किशोर ही सोचते हैं. वो कुछ अलग प्रकार से कल्पनाशील होते हैं.</p>
<p>अत: सूक्तियां पढने से ज्यादा मजा आता है दो-तीन माह मे एक बार कुछ देर <a href="http://www.bash.org/?latest" target="_blank">IRC quote database</a> पढने में. इन्टरनेट पर रिले चैट करते समय जब कोई बहुत मजेदार बात लिख देता है तो उसे एक खास डाटाबेस मे सहेजने के लिये भेजा जाता है. यह डाटाबेस एक जबरदस्त स्रोत है. कल्पनाशीलता भरे वाक्य विन्यास और कुछ हट कर कहते-सोचते लोगों को पढ कर अपने लकीर के फ़कीर छाप सोचने के तरीके से कुछ देर ही सही निजात मिल जाती है.</p>
<p>बानगी देखिये -</p>
<p>“&lt;Jelena&gt; Silence is golden. Duct tape is silver.”</p>
<p><a href="http://www.bash.org/?le=02c18ce26d3597a26dc5e7db62074676&amp;sux=896407"></a></p>
<p>“&lt;xterm&gt; The problem with America is stupidity. I&#8217;m not saying there should be a capital punishment for stupidity, but why don&#8217;t we just take the safety labels off of everything and let the problem solve itself?”</p>
<p>ये आधुनिक सूक्तियां हैं. हमारी हिन्दी चिट्ठाकारी ने भी कुछ दिया है – मसलन “टंकी” &#8211; आने वाले समय में बस जिक्र ही काफ़ी होगा! <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>स्वीकारता हूं की इस प्रकार का की चीज़ पढना  मुझे आनंद देता है – चूंकी ये कल्पनाशील, ऊर्जावान और गतिमान कथ्य है! इससे भी सीखने की ट्राई मारता हूं!</p>
<p><strong>दूसरी ट्रिक- नकल: </strong></p>
<p>प्रकाशन की त्वरितता में कला का ह्वास देखने वाले कई हिन्दी साहित्य प्रेमी कुछ इस प्रकार से सोचते हैं &#8211; “जैसे कलात्मक हॉकी को एस्ट्रोटर्फ़ नें पॉवर प्ले में बदल दिया और उसका सत्यानाश कर दिया, वैसे इन्टरनेट भी लेखन की कलात्मकता को बदल देगा उसे कमतर कर देगा”.</p>
<p>अपने अनुभव के आधार पर मै कह सकता हूं कि ये ठीक वैसा मामला नही है. बल्कि जैसे शास्त्रीय गायक को जो काम करने के लिये १ घंटा चाहिए, बॉलीवुड की फ़िल्म में किसी राग पर आधारित गायन करने वाले को वैसा ही प्रभाव छोडने के लिये मात्र पांच मिनट मिलते हैं. (और अक्सर वो फ़िर भी अपना प्रभाव छोड जाते हैं.) – अब चुनौती है तो टेकनीक भी चाहिये होगी और टेकनीक है तो उसकी नकल भी होगी. आज विकीपीडिया पर लिखे गए लेख देखिये आप – बहुत आम लोगों ने बहुत जल्दी बहुत अच्छा लिखना सीखा है – और उन्होने नि:संकोच अच्छी शैलियों का अनुसरण [नकल कह लीजिये] किया है. ये तो उच्छावासी लेखन नही है न – विकी पर योगदान देने वालों का बडा प्रतिशत चिट्ठाकारी भी करता है.</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm2.static.flickr.com/1269/1041334966_6eda13f59a_m.jpg" alt="" align="left" /> नकल करने में भी इंजीनियरिंग लगती है &#8211; इन्टरनेट पर चिट्ठा लेखन की भी अपनी इंजीनयरिंग है, और गुणवत्ता के पैमाने भी वैसे ही हैं – वही <strong>प्रिसिजन</strong> और <strong>एक्युरेसी</strong> वाले पैमाने! चिट्ठाकारी में एक्युरेसी है किसी एक मुद्दे पर, एक बात को, सही तरह से एक बार कह देना. और प्रिसीजन है आदत – हर बार, जब भी कहो टारगेट को लगातार सही हिट कर सको!</p>
<p>फ़िर भी पठनीय वो <strong>नही</strong> होगा जो हर बार अपनी सही बात ज्यादा लोगो तक ज्यादा अच्छे से पहुंचा पाएगा.</p>
<p>पठनीय <strong>वो होगा</strong> जो जरूरी बात बिना गरिष्ठ हुए, बिना विरल हुए, पढने,देखने,सुनने की सहज गति में ठीक ध्येय तक पहुंचा दे. कई बार मेरे लेखन से अधिक चित्रों के चुनाव की प्रशंसा हुई – आज के पाठकों की मल्टीमीडिया सजगता देखने वाली है.</p>
<p>फ़िर भी कोई आए और पढे उसके लिये भाषा का प्रवाह बना रहना चाहिए विषय चाहे जो हो. मतलब फ़िर वही है &#8211; बॉल चाहे जैसी आए रनो का प्रवाह चाहिये तो दिशा साध के सही स्पीड से स्ट्रेट ड्राईव करो – बार बार लगातार! इसका ये भी मतलब है कि आप चाहे जिस विषय पर लिख रहे हैं, थाली के बैंगन किस्म का लेखन नही किया जा सकता – विषयवस्तु समेत <strong>सबकुछ</strong> जनता की निगाह मे हैं – आपकी शैली भी, चित्रों का चुनाव भी और आपके चिट्ठे का कलेवर भी.</p>
<p>लेखन की टेकनीक होती हैं और वो काम भी करती हैं ये सिद्ध करना चाहता हूं. यदी मै खुद से और पाठकों से बेईमानी करूं तो आराम से ४०-५० टिप्पणियां कबाडने वाले लेख लिख सकता हूं. ऐसे प्रयोग किये हैं मैने और सफ़ल हुआ हूं.</p>
<p>लेकिन वो अलग किस्म की टेकनीक्स हैं. उनसे पहले कुछ दूसरी <strong>शुरुआती</strong> तकनीकें हैं – वाक्य सरंचना की और लेख सरंचना की. नौ रसों, छ: अलंकारों के कॉम्बिनेशन और भाषाई उठापटक की, जो हमेशा काम करती हैं <strong>प्रवाह चाहे ना बने उसका आभास जरूर देती हैं</strong> -</p>
<p>“राम को माँ ने उठाया और वो अपना बस्ता ले कर स्कूल की ओर चला गया” [शान्त रस] के साथ <strong>फ़टाफ़ट</strong> गौण किस्म की खिलवाड की जा सकती है -</p>
<p>“माँ ने राम के नीचे से बिस्तर हटाया, ऊपर से बस्ता लगाया, स्कूल की ओर धकेला” [माँ की पॉवर दर्शाने के लिये, हास्य]</p>
<p>“माँ के जगाते ही, तरकश सा बस्ता धारण कर राम ने स्कूल की ओर कूच कर दिया” [उपमा – राम का उत्साह दर्शाने के लिये]</p>
<p>“..मॉं ने बस्ते का बोझ लादा, स्कूल पहुंचने तक राम का राम नाम सत्य होता रहा” [करुण, माईल्ड लेयरिंग]</p>
<p>आदी.</p>
<p>प्रवाह बनाने के लिए ऐसी तकनीक का प्रयोग किया है मैने – जैसे – यहां पर &#8211; “मेरे कमरे में वो पोस्टर लगे रह देने कि उनकी मौन अनुमति में ही अपने ‘जवान’ होने चुकने की पूंगी फ़ूंक फ़ूंक कर हांफ़ता मैं, अपने नि:श्वास की “टूँऽऽऽ”-स्वरूप पराध्वनी मन ही मन सुन गया – सफ़लता अंतत:!”</p>
<p>जब कहीं कोई वाक्य विन्यास अपील करता है, उसकी सरंचना और शैली की नकल करने में मै पीछे नही हटता, हिन्दी का हो या अंग्रेजी का! जिसने की सरम उसके फूटे करम!</p>
<p><strong>तीसरी ट्रिक: चेलागिरी</strong></p>
<p>मुझे हास्य या विनोद जितना पसंद है व्यंग्य उतना ही नापसंद है – हां मैं कभी कभी व्यंग्य करता हूं लेकिन मुझे लगता है कि <strong>व्यंग्य कटुता का ही एक परिष्कृत नाम है</strong>. इसलिये मैं कभी भी व्यंग्यकारों का बडा फ़ैन नही बन पाया. हां हास्य आप स्वयं को विषयवस्तु से ऊपर या नीचे रख कर लिख सकते हैं.. लेकिन व्यंग्य से फ़िर भी बचा जा सकता है.</p>
<p>Humor is the affectionate communication of insight.</p>
<p><strong>Leo Rosten</strong></p>
<p>Satire is focused bitterness.</p>
<p><strong>Leo Rosten</strong><br />
ठीक वैसे ही यदि मीर, मोमिन या गालिब से हल्काफ़ुल्का कोई नाम हो तो उसे शायर-कवि कहने में मुझे कुछ वैसा ही महसूस होता है जैसा किसी रेडिकल मुस्लिम को आजकल वंदेमातरम गाने मे होता होगा.</p>
<p><strong><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm1.static.flickr.com/39/96776343_4efe3075ff_m.jpg" alt="" width="240" height="180" align="left" /></strong>मुझे लगता है कि कोई बात अपने आप मे यदि काव्यात्मक है तो वो दिख जाएगी. वर्डप्रेस एक साफ़्टवेयर है जिसके बानाने वाले कहते हैं “कोड इज़ पोएट्री” ये कथन ही जितना सच है उतना काव्यात्मक भी है – बिना किसी कोशिश के. व्यंग्य भी ऐसा ही होता है – कोई सच स्वयं व्यंग्य हो सकता है. बिना लेखक की कोशिश के कि वो व्यंग्य लगे! उस पर कोई रोक नही है.</p>
<p><strong>इसीलिये मैं दूसरे बिंदास, बेलैस और अच्छे चिट्ठाकारों को मनोयोग से पढता हूं</strong> और उनकी शैली से मन ही मन बिल्कुल चेला बन कर सीखने की कोशिश जरूर करता हूं. (कितना सीख पाया हूं वो डिप्रेशन की कोई गोली पहले खाने के बाद लिखा जा सकता है.) लेकिन <strong>प्रवाह के लिये बिंदास,बेलौस,भदेस लगने के भय को हटाना होगा, बल्कि उसे कई बार अपनाना भी होगा!</strong></p>
<p><strong>चौथी और सबसे बडी ट्रिक: मन का रेडियो बजने दे ज़रा!</strong></p>
<p>मै खुद कई बार सोचता हूं की इस “भाषा के प्रवाह” का जनक क्या है? इसका स्रोत क्या है! मजेदार बात तो ये है कि इस प्रवाह का विश्लेषण शुरु होते ही मामला कुछ गरिष्ठ हो जाने वाला है- विसंगती है या विडंबना – शायद दोनो ही. फ़िर् भी कोशिश करता हूं कि मामला <em>पैलेटेबल</em> हो. धीरे धीरे आगे बढते हैं.</p>
<p>स्पॉन्टेनिटी  [स्वयं:स्फ़ूर्तता] का मूल है इन्स्टिंक्टिव [सहज-अभिव्यक्तिवाला] लेखन, लेकिन वो कैसे होता है?</p>
<p>बहुत सोच विचार के फ़िलहाल इस नतीजे पर हूं की अपनी स्पॉन्टेनिटी मेटा-कॉग्निशन जैसी कोई चीज़ है – जो पकड मे नही आती लेकिन बिना इन्टरनल/एक्सटरनल स्टिमुलेशन के हरकत मे भी नही आती, उतनी पूरी इंस्टिंक्टिव भी नही है – कुछ-कुछ ही है. [हो गई ना अंग्रेजी की टांग-खिंचाई, माफ़ी!]</p>
<p>प्रवाहों का नैसर्गिक तूफ़ान रात की रात में “शिकवा” और “जवाब-ए-शिकवा” लिखने वाले इकबाल के यहां मिलता है, परवीन शाकिर और अमृता प्रितम के यहां मिलता है – ये नैसर्गिक हैं – बॉर्न टेलेंट. वे होते ही किसी दूसरी दुनिया के स्टेट-ऑफ़-माईंड मे हैं!</p>
<p>भाषा प्रवाह के लिये या तो पूरी तरह किसी मूड में रुकना होता है या किसी भाव मे बहना होता है. मै जहां जाना चाहता हूं पहुंचने के दो रास्ते हैं – एक कीबोर्ड [डिस्कशन फ़ोरम्स वाले अंदाज में] हो कर जाता है दूसरा कलम से हो कर [साहित्यिक शैली मे].  मेरे लिये यह एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति नही है – सच है. वहां तैर कर लहरों से लड कर भी जा सकते हैं और सही समय पर सही दिशा मे पतवार खोल कर भी. प्रवाह दोनो स्थितियों मे हासिल हो जाएगा.</p>
<p>उदाहरण के लिये &#8211; विनोद कुमार शुक्ल और धूमिल को पढना अलग-अलग अनुभव हैं. एक सौम्य हैं दूसरे धारदर – प्रखर और प्रवाहमय दोनो हैं. सीखने के लिये सब अच्छों को पढना और उनकी थोडी बहुत मिमिक्री कर लेने मे कोई हर्ज नही मानता यदि उन अलग अलग मूड्स/शेड्स से सीख कर अपने नैसर्गिक/मौलिक लेखन को पठनीय बना सकूं.</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm3.static.flickr.com/2078/1497679352_fefc18da22_m.jpg" alt="" width="240" height="158" align="left" />तो, छोटी-छोटी कोशिशें करते रहना होती है! अपने लिये तो ये किसी स्तर पर अभिनय करने जैसा है, इसके लिये किसी मूड मे उतरना पडता है जो कहना चाहता हूं उसे पहले महसूस करना पडता है. जब महसूस होने लगता है तो उसकी तीव्रता मापनी पडती है, उस माप के विचार उभरने लगते हैं की बोर्ड पर उंगलियां चलने लगती हैं, शब्द मिलने लगते हैं – लिखते समय चेहरे के भाव, रक्तचाप, श्वास की लंबाई और गति, ये सब विषयवस्तु से बाकायदा प्रभावित होते हैं लेकिन ये स्विच-ऑन स्विच-ऑफ़ जैसा नही है. मूड काफ़ी देर तक लेख की विषयवस्तु के हिसाब से बना रहता है. तो ये उतना त्वरित – जितना दिखता है, उतना आवेश जैसा नही है – आवेग है – अपने मौसम से आता है और कुछ लिंगरिंग, या कह लें हैंग-ओवर सा बच भी जाता है. थोडा मेथड एक्टिंग का पुट है!</p>
<p>वैचारिक प्रवाह लहर है &#8211; उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है, जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का  जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ (सापेक्षिक हास्यास्पद) कोशिशें –</p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>“टाईम पत्रिका वालों नें भी जले पे सर्फ़ वाशिंग पाउडर छिडक दिया है कसम से – कोई इन्हें समझाए जख्म हमारे दाग भी नहीं बने अभी, अबे मिटेंगे कैसे?”</strong> – <a href="http://hindini.com/eswami/archives/108" target="_blank">हम काहे बनें टाईम पर्सन ऑफ़ द् ईयर</a> से</p>
<p>यहां मामला आईरॉनिक है!  वैसे ये राजकपूराना स्टाईल है [ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा – चरित्र हंस रहा है देखने वाला रो रहा है] , जो मूलत: चार्ली चेप्लिन के निर्देशन से चुराई गई हैं.</p>
<p><strong>“हंसता था तो लगता था हंस रहा है”</strong> – <a href="http://hindini.com/eswami/archives/161" target="_blank">किस्से हैं किरदारों के: वो दर्जी</a> से</p>
<p>ये वो केस है जब कभी कभी जब किस्मत साथ देती है और सही, बिल्कुल आसान शब्द मिल जाते हैं.</p>
<p>अत: जितना भी भाषा-प्रवाह अपने लिखने मे आ पाता है, वो बडे पैमाने पर ‘मन का रेडियो बजने दे ज़रा’ किस्म का प्रवाह है – वैचारिक तौर पे, शौली में कुछ अपना है कुछ पराया भी. सो सरजी, अब तो पूरी इमानदारी से बता दिया है कि अपना लेखन कितने गौण तरीकों पर आधारित कसरत है. ऑनेस्टी इज़ द बेस्ट पॉलिसी. <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>(ये पढ कर आपका भी गर बताने का मन हो आए कि आप कैसे लिखते हैं – जरूरे बताईयेगा!)</p>
<p><strong>मेरी पसंद -</strong></p>
<p>मन का रेडियो बजने दे ज़रा</p>
<p>गम को भूल कर जी ले तू ज़रा</p>
<p>स्टेशन कोई नया ट्यून कर ले ज़रा</p>
<p>फ़ुल्ल टू एट्टिट्यूड दे दे तु ज़रा</p>
<p>टूटा दिल? क्या हुआ!</p>
<p>हो गया जो हुआ!</p>
<p>भूले बिसरे गीत</p>
<p>गा के भूल जा</p>
<p>बदला जो रिदम</p>
<p>उस पे झूल जा</p>
<p>क्या होगा क्या नही होगा</p>
<p>उपर वाले पे छोड दे</p>
<p>आज इस पल में तू</p>
<p>जिंदगी को जी ज़रा</p>
<p>तुझको आकाश की</p>
<p>वाणी का है आसरा</p>
<p>क्या खोया क्या नही पाया</p>
<p>उसपे रोना छोड दे</p>
<p><strong>बैंड जो बजाऊं तेरा</strong></p>
<p><strong>खुल के तू साथ गा</strong></p>
<p>दर्द ही बने दवा</p>
<p>फ़ंडा है ये लाईफ़ का</p>
<p>मन का रेडियो बजने दे ज़रा! …</p>
<p><object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="425" height="344" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/8XYXMAEVqb8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="425" height="344" src="http://www.youtube.com/v/8XYXMAEVqb8&amp;hl=en_US&amp;fs=1&amp;" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></p>
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		<title>सचिन!</title>
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		<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 05:07:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[लिखा-ई]]></category>
		<category><![CDATA[सचिन ते]]></category>
		<category><![CDATA[Sachin Tendulkar]]></category>

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		<description><![CDATA[अगस्त २००८ में सचिन एक दिवसीय बल्लेबाजों की सूची में नीचे खिसकते-खिसकते २३वें क्रमांक तक जा पहुंचे थे. तब उनके लगातार गिरते प्रदर्शन के चलते मैने हताश और निराश ही हो कर एक लेख लिखा था “सचिन तेंडुलकर, अब बस कर!” जिसमें कहा था की लगातार खराब प्रदर्शन से बेहतर है वे एकदिवसीय में ना खेलें ताकी उस समय बेहतर प्रदर्शन कर रहे नयों को मौका मिले.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft" src="http://farm3.static.flickr.com/2173/2498206327_cb2766cff7_o.jpg" alt="" width="143" height="150" />अगस्त २००८ में सचिन एक दिवसीय बल्लेबाजों की सूची में नीचे खिसकते-खिसकते २३वें क्रमांक तक जा पहुंचे थे. तब उनके लगातार गिरते प्रदर्शन के चलते मैने काफ़ी हताश और निराश ही हो कर एक लेख लिखा था “<a href="http://hindini.com/eswami/archives/180" target="_blank">सचिन तेंडुलकर, अब बस कर!</a>” जिसमें कहा था की लगातार खराब प्रदर्शन से बेहतर है वे एकदिवसीय में ना खेलें ताकी उस समय बेहतर प्रदर्शन कर रहे नयों को मौका मिले. वो लेख भी  जिस घटनाक्रम के बाद, जैसे मूड में लिखा था अपने आप में अलग सा ही है!</p>
<p>उस लेख पर की गई टिप्पणियों में सचिन के प्रशंसकों ने विश्वास जताया था की वे पुन: शिखर की ओर अग्रसर होंगे और लंबे समय तक खेलेंगे. तब से लगभग सवा साल बाद, आज सचिन ना सिर्फ़ आईसीसी रैंकिंग में नवें क्रमांक पर पहुंचे हैं उन्होने कई नए कीर्तीमान भी स्थापित किये हैं. सचिन एक बार फ़िर अपने प्रशंसकों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं.</p>
<p>नेट प्रेक्टिस में नए-नए शॉट्स का अभ्यास करते सचिन ने घोषणा की &#8211; “मै अभी खेलना नही छोडूंगा” और उनके आंकडों की दिशा बदलना शुरु हो गई! कहते हैं कि आंकडे झूठ नही बोलते, लेकिन रैंकिन के ये आंकडे कलात्मकता का पैमाना भी तो नही! सचिन के खेल की दर्शनीयता – क्या कहने, पहले से और बढ गई – सोचता हूँ, अब अगर डॉन ब्रेडमन उन्हे दोबारा देखते तो क्या कहते!</p>
<p>सचिन के १७५ रन बनाने की खुशी मे अपने उस पुराने लेख की कडी प्रस्तुत करता मैं  इस “अग्निपक्ष्री” का गुणगान नही लिख पाया, अपनी हताशा के आनन्द मे बदल जाने की बातें नही कर पाया. उसी के साथ तो मिली प्रभाषजी के देहान्त की खबर! मालवा और मालवी भाषा का एक सिपाही चला गया. शब्द सुन्न हो गए. श्रद्धांजली कैसे की अर्पित? बस इन्टरनेट पर खोज-खोज कर उन पर लिखी हर खबर पढता रहा, इन्दौरवालों के फ़ोन आए-गए – अनिवासी जब दु:खी होता है तब फ़ोन या इन्टरनेट पर ग़म गलत करता है!<strong> हमप्याला और हमदर्द हैं बस एक फ़ोन की दूरी पर, उसकी बेतार जितनी!</strong></p>
<p>फ़िर सचिन को पढा प्रभाषजी को विनम्र श्रद्धांजली देते.</p>
<p>फ़िर सचिन को देखा, हार की उदासी में.</p>
<p>फ़िर सचिन को देखा मुस्कुराते, लाइलाज बिमारी से जूझते प्रशंसक बच्चे से मिलते.</p>
<p>फ़िर सचिन को पढा &#8211; मराठी होने का गर्व है लेकिन मुंबई सबकी है और पहले मै एक भारतीय हूं.</p>
<p>फ़िर सचिन…फ़िर सचिन.. मास्टर स्ट्रोक.. अफ़्टर मास्टर स्ट्रोक!</p>
<p>एक भाव है, एक रस – अद्भुत, अपने लिये बडा विरल सा है आजकल! सचिन आपको  धन्यवाद, सच – सिंपली अमेजिंग हैं  आप!</p>
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		<title>चिट्ठाचर्चा: ये दुरूह आत्मपीडक कर्म कर कैसे लेते हैं आप?</title>
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		<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 16:13:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[खलील-ई]]></category>
		<category><![CDATA[चिट्ठाचर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[feature]]></category>
		<category><![CDATA[features]]></category>

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		<description><![CDATA[आज जब चिट्ठाचर्चा की तुलना देसीपंडित से करता हूं तो पाता हूं कि आज अंग्रेजी वालों के पास भी इसकी टक्कर का कोई उपक्रम मौजूद नही है! ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://www.weblogcartoons.com/cartoons/weight.gif" alt="cartoon from www.weblogcartoons.com" align="left" /> <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/">चिट्ठाचर्चा</a> पर हजारवीं पोस्ट सजी है. इस सामूहिक चिट्ठे के आरंभ की कहानी भी अपने आप मे हिन्दी चिट्ठाकारों की उस <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/01/blog-post.html" target="_blank">ठसक का प्रमाण</a> है, जिसने समूह को इस मुकाम पर पहुंचाया है.</p>
<p>आज जब चिट्ठाचर्चा की तुलना <a href="http://www.desipundit.com/">देसीपंडित </a>से करता हूं तो पाता हूं कि आज अंग्रेजी वालों के पास भी इसकी टक्कर का कोई उपक्रम मौजूद नही है!</p>
<p><strong>सबक:</strong></p>
<p>चिट्ठाचर्चा के लंबे इतिहास का जिक्र होते ही अक्षरग्राम, अनुगूंज, ब्लागनाद, बुनो कहानी, संजय, सर्वज्ञ, चिट्ठाविश्व व नारद जैसे अनेको प्रपंचो और उनसे जुडे किस्सों की यादें भी ताजा हो जाती हैं. पॉडभारती, इन्डिब्लॉगीज़ और निरंतर के लिंक्स को एक बार फ़िर कुरेद लेने का मन हो आता है.  इनमे से कई प्रपंचों के तो अब जीवाश्म भी नही मिलते, ऐसे में  चिट्ठाचर्चा की ये लंबी पारी सचमुच प्रशंसनीय है.</p>
<p>चिट्ठाचर्चा इस बात का प्रमाण है कि लंबी अवधि में वे ही उपक्रम चलते हैं जिन्हें मात्र आधारभूत संरचना बनाने वाले सृजनशील विश्वकर्माओं के अलावा समर्पित संरक्षक भी मिलें. यदि ऐसा हुआ होता तो हमारे कई अन्य उपक्रम आज भी टिके होते.</p>
<p><strong> यादें:</strong></p>
<p>वो एक अगल दौर था. डिसकशन फ़ोरम्स पर हिन्दी के सेक्षन बनवाना, अपने हिन्दी टूल्स को अंग्रेजी फ़ोरम्स पर रिलीज़ कर देना, हिन्दी मे टिप्पणियां छोडना और लोगों को “थिंक फ़ोनेटिक” कह कर हिन्दी के ट्रांसलिटरेशन टूल्स पकडा देना और “क्ष” कैसे बनता है “ज्ञ” कैसे बनता है आदी समझाना – ये सब उस समय के हमारे हिन्दी प्रसार के शगल थे जिस दौर में चिट्ठाचर्चा का जन्म हुआ था.</p>
<p>तब जीतू ने अपने ब्लाग के मेटा टैग्स में वे तमाम ‘खास’ शब्द तक डाल रखे थे जो खास सामग्री ढूंढते लोगों तक को उनके चिट्ठे तक पहुंचा देते थे. चिट्ठाकार एक दूसरे की आई.पी. एड्रेस जानते थे और इस प्रकार के की वर्ड सर्च करते जब किसी आपस वाले के चिट्ठे पर पहुंचते तो बडे मजे ले कर खुलासे किये जाते थे. कितना कुछ याद आ रहा है.</p>
<p>उपर याद किये गए तमाम नाम इस बात का भी प्रमाण है कि मात्र ई-मेल द्वारा संपर्क के जरिये कई बडे काम अंजाम दे दिये गए.</p>
<p><strong>तारीफ़:</strong></p>
<p><strong>चिट्ठाचर्चा आसान नही है. हिन्दी चिट्ठाजगत के कई अतिरथी और महारथी चिट्ठाचर्चा करने के नाम पर भाग खडे होते हैं.</strong> इस काम को करने के लिये रुचि, धैर्य, समभाव और समय सबकुछ चाहिए. यह एक कठिन काम है और इसका जिम्मा लेने वाला हर व्यक्ति जानता है कि उसकी चर्चा को गुरुदेव [अनूप शुक्ला] की कसौटी पर कसा जाएगा.</p>
<p>यही वजह है कि हर चर्चाकार अपना अच्छा प्रभाव छोडना चाहता है, अपनी अनूठी छाप छोडना चाहता है यह सत्य उनकी मेहनत मे दिखता है. गुरुदेव चाहे प्रोत्साहित करें लेकिन मूंहफ़ट टिप्पणीकार कन्नी काटने वालों को बक्शते नहीं हैं, ये जानते हुए चर्चा करना बडी हिम्मत का काम है!</p>
<p>बात, जो मै समझ नही पाता हूं वो ये है कि विचारों के दोहराव और बासीपन से भरी ढेरों पोस्ट पढने के बाद आप उनपर खुन्नस निकाले बिना और उन्हे नजर-अंदाज कर के कुछ पोस्ट्स का ही जिक्र कैसे कर पाते हैं? <strong>असीम सहनशील कर्म है! स्वयं को आप इतनी पीडा कैसे दे पाते हैं? </strong></p>
<p>कई बार दिखता है कि चर्चाकार की व्यक्तिगत रुचियां और सरोकार चिट्ठों के चुनाव पर अपना असर दिखाते हैं &#8211; ये एक बहुत ही मानवीय बहुत ही ऑर्गेनिक पहलू है.ये तो होगा ही. फ़िर भी, मुझे ताज्जुब होता है कि क्या किसी का कभी कुछ ऐसा लिखने का मन नही किया-</p>
<p>&#8220;आज ४५ कवियों ने खुल्ले मे की, १५ मुहब्बत पे रोए, २० मुहब्बत में रोए, कुछ ने कोटेशन्स का कविताफ़िकेशन किया.  कविताएं पढ कर ये स्पष्ट हुआ की बहुधा डरपोक आदमी छायावादी हो जाता है, सीधे बोलने में उधड लेती है.</p>
<p>जिसने दूसरों कवियों के यहां सबसे ज्यादा वाह-वाह की, आज का स्टार कवि हो गया है. ब्लागवाणी पर आज अधिक टिप्पणी पाए लेखो मे खोज लो पहचान मे आ जाएगा,  इधर उल्लेख कर के मंच के अभिजात्य का टंडीराकरण नही करना मुझे!&#8221;</p>
<p>या</p>
<p>&#8220;अगर एग्रीगेटर्स में क्राईटेरिया बे्स्ड सॉर्टिंग उपलब्ध ना होती तो आज की चर्चा मात्र २ घंटे ५५  मिनट में खत्म करने मे मेरी वाट लग जाती. ये दिखाने के लिये की मै सबको पढता हूं, मैने रेंडमली चिट्ठाजगत की नई पोस्ट का स्वागत करें वाली मेल मेसे कुछ नयों का जिक्र भी करना है. अगर मेरी हिंग्लिश आपको त्रस्त कर रही है तो बता दूं कि १५ मिनट मे दफ़्तर के लिये निकलना है और शब्दकोश का सर्वर आज स्लो है.&#8221;</p>
<p>या</p>
<p>&#8220;जी चाहता है आज ऐसे चिट्ठों की चर्चा करूं जिन्हे दर-असल लिखना बंद कर देना चाहिए .. मुझे लगता है आज का दौर ही ऑसमली बैड परोसने का है लोगों का टेस्ट ही खराब हो गया है, स्टीवन स्पीलबर्ग की २०० मिलियन मे बनी ट्रांसफ़ार्मर्स २, fmylife.com, रियालिटी शोज़, दुनिया की इकॉनोमी सबकुछ तो हैं ऑसमली बैड.</p>
<p>ऐसे में एक ऑसमली बैड चिट्ठों की चर्चा हाजिर है.. मै जानता हूं की ऐसा कर के मैं उनका तुगलकी तंत्र मजबूत करूंगा लेकिन मैं अपने दर्द सहने की सीमा जानना चाहता हूं शायद उनका अतीरेक भी!&#8221;</p>
<p>सचमुच यार दिल पे हाथ रख के कह दो कि कभी ऐसा कुछ लिख कर मिटाया नहीं आपने?</p>
<p>वैसे  होता है कि कभी कभी &#8220;ऑसमली बैड&#8221; पोस्ट को अधिक तवज्जो मिल जाती है, मैने स्वयं अनुभव किया है कि कुछ चर्चाओं मे चर्चाकार बहुत कुछ समेटने के दबाव में पोस्ट की सबसे दमदार बात का जिक्र करना भूल कर कम महत्वपूर्ण हिस्से की चेप कर जाता है.  लेकिन वो भी क्या करें .. अब तादाद ही इत्ती बढ गई है.</p>
<p><strong>एक बात जो कहीं कही नही गई है: </strong></p>
<p><strong><img class="alignleft" src="http://farm3.static.flickr.com/2635/3795070870_c3fdaf2763_m.jpg" alt="" width="240" height="240" />चिट्ठाचर्चा का महत्व तब पता चलता है जब कोई लोकप्रिय एग्रीगेटर कुछ समय के लिये बिस्तर पकड ले. ऐसे मे चिट्ठाकारी करने वाले की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं आप – चर्चाकार को सचमुच गागर मे सागर भरना होता है सागर का सेंपल नहीं.</strong> और वक्त आने पर चर्चाकारों ने ये जिम्मा भी बखूबी निभाया है. ऐसे में गुरुदेव  और कई अन्य &#8220;मैं हूं ना&#8221; मोड मे आ जाते हैं.</p>
<p><strong>ये मानवीय जीवटता का वो पहलू है जिसको सचमुच नमन करता हूं मैं.</strong></p>
<p><strong>विकल्प:</strong></p>
<p>चिट्ठाचर्चा की तर्ज पर अन्य कई प्रयत्न किये जाते रहे हैं लेकिन वे उतने सतत नही रह पाए हैं – आशा है विकल्प हमेशा मौजूद रहेंगे मात्र विकल्प होने के लिये नहीं पठनीय व विश्वसनीय होने के लिये भी. बढते हुए समूह मे विकल्पों को हमेशा स्वागत किया जाता है.</p>
<p><strong>शुभकामनाएं:</strong></p>
<p>चिट्ठाचर्चा समूह को हार्दिक शुभकामनाएं!</p>
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		<title>अंग्रेजी चिट्ठा उपलब्ध</title>
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		<pubDate>Tue, 03 Nov 2009 06:37:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[खलील-ई]]></category>
		<category><![CDATA[English Blog]]></category>

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		<description><![CDATA[बहुतेरे हिन्दी चिट्ठाकारों के अंग्रेजी चिट्ठे हैं.
महाजनो येन गत: स: पन्था  का अनुसरण करते ऐसा करने का मन तो बन ही चुका था, समय रहते यह काम भी हो ही गया.
जैसा कि होता है, एक छोटी  व्यक्तिगत पोस्ट से आगाज़ कर दिया है. विविधता बढने व कलेवर और निखरने मे ज्यादा समय नही लेगा. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बहुतेरे हिन्दी चिट्ठाकारों के अंग्रेजी चिट्ठे हैं.</p>
<p><strong>महाजनो येन गत: स: पन्था<span id="main" style="visibility: visible;"><span id="search" style="visibility: visible;"><em> </em></span></span></strong><span id="main" style="visibility: visible;"><span id="search" style="visibility: visible;"><em></em></span></span><strong><span id="main" style="visibility: visible;"><span id="search" style="visibility: visible;"><em></em></span></span></strong> का अनुसरण करते ऐसा करने का मन तो बन ही चुका था, समय रहते यह काम भी हो ही गया.</p>
<p>जैसा कि होता है, एक छोटी  व्यक्तिगत पोस्ट से आगाज़ कर दिया है. विविधता बढने व कलेवर और निखरने मे ज्यादा समय नही लेगा. चिट्ठे का पता है <a href="http://hindini.com/e-swami">http://hindini.com/e-swami</a> इच्छु्क पाठक कृपया फ़ीड  जोड लें.</p>
<p><strong>मेरी पसंद:</strong></p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.snorgtees.com/images/PiBeRational_Fullpic_1.gif" alt="" width="377" height="302" /></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>इलाहबाद चिट्ठाकार संगोष्ठी: बधाईयां! शर्म तो बेच खाई, ये तो लफ़्फ़ाजियों का समय है!</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/286</link>
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		<pubDate>Mon, 26 Oct 2009 21:08:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[स्माइल-ई]]></category>
		<category><![CDATA[ब्लोगर्स मीट]]></category>
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		<category><![CDATA[feature]]></category>
		<category><![CDATA[features]]></category>

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		<description><![CDATA[इलाहबाद: २३/२४ नबंबर - एक अस्सी साल के कलमघुसेडू द्वारा हिन्दी चिट्ठाकारी की अस्मिता के साथ बलात्कार! कई हंसते-खिलखिलाते बरिष्ठ चिट्ठाकार इस कृत्य में सहयोग करते पाए गए!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft" src="http://farm1.static.flickr.com/24/58499153_e0c220ec61_m.jpg" alt="" width="240" height="180" />इलाहबाद: २३/२४  अक्तुबर &#8211; एक अस्सी साल के कलमघुसेडू द्वारा हिन्दी चिट्ठाकारी की अस्मिता के साथ बलात्कार! कई हंसते-खिलखिलाते बरिष्ठ चिट्ठाकार इस कृत्य में सहयोग करते पाए गए!</p>
<p>इलाहबाद में “हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया” नामक एक कार्यक्रम यानी ब्लाग संगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमे नामवर सिंह को मुख्य अतिथी बनाया गया. वहां हिन्दी चिट्ठाजगत के तमाम आम-खासियों/मुहल्लेवासियों/भडासियों/संडासियों/शाबासियों समेत रवि श्रीवास्तवजी और अनूप शुक्लाजी ने उछल-उछल कर शिरकत की. नामवर सिंह कोई चिट्ठाकार नहीं हैं बल्कि एक साहित्यकार हैं… ना न्ना ..अब तो वो भी नही, ये बस एक आलोचक मात्र हैं, आलोचना करते हैं –अब इस उम्र में कुछ और तो होना ही ना हुआ.. बैड आर्टिस्ट्स आर गुड क्रिटिक्स!</p>
<p>नामवर सिंह बिना पढे राय बनाने के लिये मशहूर हैं. वे चिट्ठे पढते ही नहीं हैं, उसके लिये कंप्यूटर होना चाहिए,  और सर्फ़िग भी तो आना चाहिए! वे बस बिना पढे अंतर्दृष्टी से जानते हैं कि चिट्ठे कचरा होते हैं.</p>
<p>इस चिट्ठों को कचरा कहने वाले घोंघे [ नो पन इंटेंडेड] को बतौर मुख्य अतिथी हिन्दी चिट्ठाकारी की इस तथाकथिक राष्ट्रीय संगोष्ठी मे बुलाया गया, और वे  नेट-गटर में तमाम कूडा-कचरा डालने वालों को सबक सिखाने पहुंचे! जनहित में की गई इसी प्रक्रिया में चिट्ठे को सबसे पहले ‘चिट्ठा’ कहने का श्रेय ले, उन्होंने हिन्दी चिट्ठाकारी का देवनागरी.नेट से बना <strong>आलोकि</strong>त दुपट्टा नोच लिया .. इस कूल-एक्ट पर सभा मे सरकारी खर्च से उपस्थित सभी हिन्दी ब्लागर्स ने तालियां बजा कर उनका उत्साहवर्धन किया!</p>
<p>हिंदी चिट्ठाकारों के इस जमघट में ब्लागलेखन की विश्वसनीयता, लोकप्रियता और विधा के आधूनिक सोपानों के उदाहरणों की चर्चा  बेमानी थी. इसलिये बुजुर्गवार अलोचक चिट्ठाकारों को को स्वतंत्रता और स्वछंदता का भेद ठीक वैसे ही देने लगे, जैसे किसी अश्लील फ़िल्म में मुश्टंडे नवयुतियों को उनकी स्वछंदता के लिये ‘दंड’ देते हैं!  तत्पश्चात वे स्वछंद चिट्ठाकारी पर राज्य के हस्तक्षेप की संभावनाएं बता बता कर चिट्ठाकारों की पिछाडी लाल करते रहे .. “हू इज़्ज़ योर डैड्डी.. हु इज्ज योर डैड्डी”! चिट्ठाकार नॉट्टी नवयुवतियों के समान कराहे “ यू आर . यू आर” .. इस पर प्रसन्न हो कर वे चले गए. चिट्ठाकार अपनी लज्जा त्याग कर इस पूरे क्रियाकलाप का विवरण अपनी सखियों सहेलियों तक पहुंचाने मे जुट गए! <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  &lt;—स्माईली!</p>
<p>*_*_*</p>
<p>मैं जो कुछ इलाहबाद में हुआ उसका उन उत्साहित रिपोर्टों द्वारा पाठकों को जो इम्प्रेशन मिला वह और भी सटीक तरीके से उपरोक्त शैली में ही लिखता जा सकता था. मगर सोचता हूं की बस इशारा काफ़ी है! <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>बहुत पढा और पढता ही जा रहा हूं ..</p>
<p>अब सीधे प्रश्न पर आता हूं! क्या हिन्दी चिट्ठाकारी के लिये इससे दयनीय कुछ और हो सकता है? एक ऐसा नॉन-ब्लागर सब हिन्दी चिट्ठाकारों से सामूहिक रूप से एक मुख्य अतिथी के रूप में मुखातिब है और आप सबकी विधा का, ब्लागरी का वर्चुअल शीलहरण पूरे इत्मिनान से कर जाता है! वाट ए शेम! मान सकता हूं की वे ओहदों पर बैठे किन्ही के साथ अपने कनेक्शन्स के चलते वहां  होंगे – लेकिन रिपोर्टें पढ कर यही दीखता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी की गरिमा सरेआम  कुछ मुफ़्तखोरों कीए गद्दारी के चलते लुट गई और वे इसे अपने उपलब्धी मान कर घूम फ़िर  आए!</p>
<p>ये तो मै जानता था कि रवि भाई और गुरुदेव अनूप शुक्ल दोनो सॉफ़्टी हैं – व्यंजल और मौज तक का लेखन! जब नामवर सिंह जैसे औचित्यहीन इंसान को बुलाए जाने पर प्रश्न करने की बारी आई, वहां से सटासट त्वरित रीपोर्टें भेजी जाने लगीं. जब उसकी बची जिंदगी के लिये चिट्ठाकारी पर बिलावजह आलोचनात्मक रवैये पालने पे दीदे खोलू हश्र दिखा कर उसे निपटाना था, बस दोनो हे-हे करने और फ़ोटो-ऑप में व्यस्त हो गए? चिट्ठाजगत के राजनीति का शिकार होने का भय कैसा जब विधा के प्रति वफ़ा दिखाने के समय पर ये किया आपने? किसी और से तो कभी उम्मीद भी नही रखी, पर ये क्या किया आपने? जो विधा आपको ये तमाम सैर सपाटे करवा रही है उसे कचरा कहने वाले आदमी के साथ मंच भी साझा कर आए? बॉस,तीन बार आपकी तरफ़ से चुल्लूभर आर.एस.एस. फ़ीड में डूबकी मार चुका हूं, जान है की पूरा लिखे बिना [और टिप्पणियां पढे बिना ऑफ़कोर्स] जाएगी नहीं! …तीस पर आप उसी आदमी को विधा सीखने के लिये लालयित बता रहे हैं?  <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' />  &lt;—नॉट सो स्माईली!</p>
<p>लेकिन उस समय बाकियों ने भी क्या किया? किसी एक की जुबां नही खुली कि चिट्ठाकारी को कचरा कहने वाला एक नान-ब्लागर यहां क्या कर रहा है? कैसे आप उस आदमी को बर्दाश्त कर सके? कभी हिन्दी चिट्ठाकारी पर राजेन्द्र यादव को कटाक्ष को झेला जाता है, कभी हिन्दी भाषा के विकास को लेकर मंगलेश डबरवाल के घृष्टकथनों को और रही सही ये नामवर  सिंह पूरी करते रहे हैं – फ़िर भी … हिन्दी ब्लागिंग के इतने सालों के बाद.. और तकनीकी पृष्ठभूमी से आने वाले हम जैसे लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद, आज भी एक आम भारतीय हिंदी का ब्लागर तथाकथित साहित्यकारो की पिछाडी धो कर अचमन करता फ़िरता है! फ़िर और फ़िर इन्हे बुलावे भेजे जाते हैं! नाक कटवा ली? अपनी भी और विधा की भी!</p>
<p>और फ़िर उसके बाद क्या करते हो आप सारे मिल के? बेनामी टिप्पणीकारों पे अपनी बेजारीयों का रोना रोते दोपहरिया सोप-ऑपेरा चलाते रहते हो? अपने चिट्ठों का खडे हो कर बखान करते हो और आपस में एक दूसरे की छिछलेदारी- फ़िर चाय मिली या नही.. एसी रूम मिला या मच्छरवाला कमरा इस पर बाकी सब को झिलवाते रहते हो! शाब्बाश मेरे जिगर के छल्लों.. शाब्बाश! बहुत बढिया!! <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  &lt;—एक और स्माईली</p>
<p>रही सही कसर खत्म नही हुई – कुछ टिप्पणियों के जरिये चमचागिरी मे व्यस्त हो गए हैं  ताकी अगली बार का जुगाड जम जाए! जीओ बेटा जीओ!</p>
<p>*_*_*</p>
<p>और जो नहीं पहुंचे वो क्या कर रहे हैं? सबसे पहले सुरेश चिपलूनकर – अपना गैर जिम्मेदाराना रवैया छोडो और सही मुद्दों पर आओ!</p>
<p>चाहे वो ब्लागवाणी का कुछ समय के लिये अनुपलब्ध होना रहा हो, या सरकारी खर्च पे इलाहबाद में हुआ ये नया हिन्दी चिट्ठाकारी गुडगोबरीकरण कार्यक्रम; दोनो पर सुरेश की प्रतिक्रियाएं उनके हिन्दुत्ववादी होने की तरफ़ इशारा नही करती बल्कि उनके हिन्दूत्वमेनिया के शिकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. हिन्दुत्ववादी होना और हिन्दूत्वमेनिया का शिकार होना दो अलग-अलग माईंड सेट हैं! मुझे तो ये लगने लगा है कि अपने आप पर हिन्दूत्ववादी होने का लेबल लगा कर कोई भी सुरेश से अपने पक्ष में लेखन करवा सकता है. खुद को टाईपकास्ट करवालेने का सीधा फ़ायदा ये है कि आपको एक खास पाठकवर्ग तैयार मिल जाता है. वहीं इसका नुकसान ये है कि आप अपने इसी खास पाठक वर्ग की अपेक्षाओं के बंधुआ हो गए. सही या गलत!</p>
<p>सुरेश को दूसरी बीमारी है “जंपिंग द गन” की! आपको भी याद होगा कि ब्लागवाणी के कुछ समय अनुपलब्ध होने पर भी आपकी[सुरेश से मुखातिब हूं] शिकायत थी तथाकथित वरिष्ठ चिट्ठाकार चुप्पी साधे बैठे थे. हम मे से कई लोग कोशिश करते हैं कि अधकचरी और अधूरी या एकतरफ़ा जानकारी के आधार पर कोई प्रतिक्रिया ना जताएं और मेरे विचार में समय से पहले प्रतिक्रिया दे देना ही है “जंपिंग द गन”.. इस बार फ़िर आपने वही किया है – यू जंप्ड द गन! अगेन!!</p>
<p>आपने एक चिट्ठाकार से चैट की, उनके विचार जाने और मात्र उस आधार पर एक लंबी चौडी पोस्ट लिख मारी -<strong>“<a href="http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html" target="_blank">हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों से परहेज, नामवर सिंह का आतंक और सैर-सपाटा यानी इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन…</a>”</strong> शीर्षक पढ कर लगा की आप इलाहबाद से लिख रहे थे . अन्यथा आप जैसे, एक जिम्मेदार और तथ्यपरक ब्लागर को, दुनिया कि हर किसी घटना में, हिन्दूविचारधारा-विरोधी साजिशें नजर आने लगें, और वो, बेधडक, इस पर मय बोल्ड-इटालिक्स-अण्डरलाईन्स लिखने लगें तो मेरे जैसे पाठकों का चौंकना स्वाभाविक है. [चाहे वो ब्लागवाणी का तब अनुपलब्ध होना हो या प्रमेन्द्र के आत्मालाप पर तुम्हारी प्रतिक्रिया]  ना तो वो कोई ब्लाग सम्मेलन ही था, उप्पर से बुजुर्गवार नामवर सिंह की दांत-आंतविहीन तस्वीरें देखीं? सिरिमान्जी तो अब जाऊं, की तब जाऊं हो रहे हैं. उनका आतंक कैसा? किस बात पर छोडा गया उन्हें? इसी पर की ये तो कभी भी टें बोल देगा .. उम्र का लिहाज ही था ना! .. फ़िर भी छोडा नही जाना चाहिए था – वो भी जब वो कॉम्मी सब को राज्य के अधिकारों पे झिलवा गया. उस पर ना लिख कर, इतना प्रो-हिन्दु-गैरजरूरी बवाल लेखन? हद्द है! <strong>हर वक्त हर मुद्दे को हिन्दूत्ववाद बनाम दूसरे का मुद्दा बनाना छोडो! बडी कोफ़्त होती है!</strong></p>
<p><img class="alignleft" src="http://farm1.static.flickr.com/99/267060150_e690307561_o.jpg" alt="" width="375" height="282" /></p>
<p>सुरेश, आपसे पहले और आपके अलावा, एक चिट्ठाकार के रूप में कईयों ने इलाहबाद मे हुए कार्यक्रम पर अपने अपने तरीके से प्रतिक्रियाएं जताईं – वहां पहुंचने वाले, घर से लिखने वाले .. सब लिखे.. हम बांचे, सबको बांचे! कहीं कोई टिप्पणी की? नही! ये सब कुछ पढ कर प्रतिक्रिया <strong>ना</strong> करने वालों का और संयत प्रतिक्रियाएं करने वालों का प्रतिशत कितना अधिक है! ये सत्य आपके लिये अनपेक्षित क्यों होता है?</p>
<p>आप चुप तो नही रहे, लेकिन जिस तरह से आपने लिखा, आपने नोटिस किया आपके इस लेख की प्रतिक्रिया में क्या हुआ? आपके अपने चिट्ठे पर दूसरों की छीछलेदारी करतीं छद्मनामों से टिप्पणियां आने लगीं – कई टिप्पणीकारों के प्रोफ़ाईल पेज नादारद हैं. और उनके अलावा आप स्वयं अनजाने में उन जाने-पहचाने ट्रॉल्स- जी हां ट्रॉल्स (उन्हे चिट्ठाकार कहना चिट्ठाकारी का अपमान है) को बढावा देने लगे जिनसे हिन्दी चिट्ठाजगत पहले ही त्रस्त है. आपने अपने लेख में कई प्रश्न किये हैं. मेरा आपसे ये प्रश्न है कि बताईये आपके इस लेख से क्या बदल गया?</p>
<p>आप चाहे उपेक्षाप्रूफ़ हों लेकिन आपकी उकसाव-तत्परता और त्वरित-प्रतिक्रियाएं दर्शनीय हो जाती है! देखिये मैने आपकी उपेक्षा नहीं की ये लिखने के लिये कि <strong>आप भी कभी कभी अपने हित में और अपने पाठकों के हित में ऐसी घटनाओं की उपेक्षा किया कीजीये! </strong></p>
<p>*_*_*</p>
<p>स्वनामधन्य ब्लागर्स द्वारा नामवर सिंह का विरोध ना किया जाना और सुरेश के लेख की वजह से लिखा जो लिखा. इससे पहले मैने कभी इस प्रकार के आयोजनों पर ना प्रतिक्रिया ही की और ना ही इन का कोई महत्व ही माना! हमेशा पूरी उपेक्षा ही की!</p>
<p>मेरी निगाह मे इन आयोजनों से विधा का एक पैसे का फ़ायदा नही होता, हां कुछ पोडियम प्रेमियों की खुजली जरूर शान्त हो लेती है.<strong> ये मुद्दा बस एक मात्र मुद्दा है- हिन्दी चिट्ठाकारों के और वो भी भारतीय हिन्दी चिट्ठाकारों के आत्मविश्वास का मुद्दा!</strong> कोई भी पोडियम प्रेमी जो हिन्दी चिट्ठाकारी का असम्मान करने वाले के साथ मंच बांटता है उसे संदेश है कि चुप्पी को मौन समर्थन ना समझा जाए. हमारी अनुपस्थिती में आपको इन नामवरों द्वारा अपने लेखन और विधा का शीलहरण करवाना है तो करवाते रहें हां जिन्होंने इस कुकृत्य के लिये आपके आने जाने और बिस्तर का खर्च दिया है उन्हें मेरे इस लेख की लिंक जरूर थमा दें, यदि गलती से भी हम जैसा कोई बिना बुलाए टपक गया तो उन्हे लेने के देने पड जाएंगे!</p>
<p>कभी आप चिट्ठाकारी के लिये संपादकों और साहित्यकारों का वरदहस्त ढूंढने चल पडते हैं. कभी आप इसमे त्वरित और स्वतंत्र पत्रकारिता के पुट खोजने लग पडते हैं. आज पांच  साल बाद आप डिफ़ाईन करने कि कोशिश करने लग पडते हैं कि ब्लाग के लिये चिट्ठा अच्छा शब्द है या नही!  कभी किसी समाचार पत्र में एक उल्लेख को तरसते ..अपनी शक्ति का कोई आभास है आपको?!</p>
<p>जिस बात का सबसे ज्यादा जिक्र होना चाहिए था उनमे से एक थी अभय कि फ़िल्म .. ए ट्रू मल्टीमीडिया एफ़्फ़र्ट ..उसे तो तकरीबन हाशिये पर ही डाल दिया गया  &#8211; जो एक  चिट्ठाकार का जमीनतोडू काम थी! अभय आपको सलाम.</p>
<p>अन्यथा आप सब ने नामवर के साथ मंच बांट कर सामूहिक रूप से स्वयं के सथ जो होने दिया है  शब्दातीत है?</p>
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		<title>ट्विट ट्विट..फ़िल्म समीक्षा..ट्विट ट्विट ट्विट!</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/282</link>
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		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 00:03:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[स्माइल-ई]]></category>
		<category><![CDATA[ट्विट्टर]]></category>
		<category><![CDATA[वॉट्स योर राशी]]></category>
		<category><![CDATA[फ़िल्म समीक्षा]]></category>

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		<description><![CDATA["वॉट्स योर राशी" फ़िल्म देखते हुए समीक्षा भी कर रहा हूं. ये लेटेस्ट स्टाईल है भैये! जम कर पल-पल की ट्विट्टिंग करो – अपने जीवन को रीपोर्ट करने के चक्कर में चाहे उसका मजा ही खो दो! ट्विट.. ट्विट.. ट्विट..!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>“वॉट्स योर राशी” देख रहा हूं.</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://i.indiafm.com/firstlook/whatsyourraashee3.jpg" alt=""  /></p>
<p>
वैसे फ़िल्म देखते हुए ब्लागिंग भी कर रहा हूं – ये एक प्रयोग है– इस प्रकार फ़िल्म समीक्षा लिखना, ढेर सारे ट्विट्टर करने जैसा है. वैसे मैने आज तीन लोगों को ट्विट्टर पे फ़ॉलो करना बंद किया है – साले हगते-मूतते ट्विट ट्विट ट्विट करते रहते हैं. लाहौल-विला-कुव्वत!</p>
<p>बैक टू मूवी .. चलो अपनी ट्विट्टींग… सॉरी .. ब्लागिंग शुरु!</p>
<p>सबसे पहले टाईटल सॉंग बज रहा है &#8211; “वॉट्स योर राशी”</p>
<p>बजने दो, एक तथाकथित जोक सुनो – ताजा ताजा बनाया है -</p>
<blockquote><p>लडका (लडकी से): वॉट्स योर राशी?</p>
<p>लडकी: $500.</p></blockquote>
<p>स्टोरी का सेट अप बोरिंग सा है. सभी ओवर एक्टिंग करते हुए लग रहे हैं. डायलाग बोरिंग हैं. ये इस हीरो के करियर की आखरी फ़िल्म है – इस जमूरे को हीरो किसने बनाया? क्या चपडकनाती है यार!!</p>
<p>मेष राशी कि कन्या – प्रियंका कि एक्टिंग अच्छी है. लेकिन मेष राशी की लडकियां ऐसी नही होतीं. ये पिक्चर फ़्लाप होगी लग रहा है.</p>
<p>कुंभ राशी की कन्या – सही डिपिक्शन है. दूसरा गाना ठीक है.  “जाओ ना”  . पन मेरे कोई ये समझाओ कि इत्ती तेज हवा में ओपन कार मे चलते, कोई गिटार बजा के गा कैसे सकता है?</p>
<p>मिथुन राशी की कन्या – कूछ तो भी बनाई है – मडोना का सस्ता और उससे  भी सस्ता संस्करण लग रही है. गाना बोर है “आजा लहराते” !</p>
<p>कर्क राशी की कन्या – “बिखरी बिखरी सी ज़ुल्फ़े हैं क्यों?” गाना अच्छा है .. संतुलित प्रस्तुतिकरण है चरित्र का! कर्क राशी वालियां अक्सर बहुत इमानदार होती हैं!</p>
<p>तुला राशी की कन्या – इस केरेक्टर को ज़रा ओवर-डू कर दिया लगता है! कंट्रोल-फ़्रीक बना दिया है तुला राशी कि कन्या को, अपवादस्वरूप होती भी होंगी ऐसी. “मानूंगा .. मानूंगा .. जो तेरा कहना है’ .. औसत गाना है.</p>
<p>आशुतोष गोवारिकर मे कॉमिक सेंस नही है! .. मै डेविड धवन को मिस्स कर रहा हूं.</p>
<p>मीन राशी की कन्या – .. अनुपमा मूवी कि शर्मिला याद आ गई! सही है, प्रियंका लुक्स गुड! ये केरेक्टर भी ओवर-डन है! .. .. यार आशुतोष पागल है क्या?  मीन राशी की कन्या को ऐसे दिखाया है जैसे कोई ओब्सेसिव कंपल्सिव सायको [जुनूनी] हो.  “सौ जनम हां लेंगे हम” एक और बोरिंग गाना.  ये पिच्चर पिटेगी!</p>
<p>अगली राशी सिंह  &#8211; “धडकन धडकन बोले मेरा ये मन” एकदम चंपक गाना है. .. चरित्र का चित्रण फ़िर भी ठीक है. डायरेक्टर ने इस फ़िल्म में अलग-अलग राशी की कन्याओं के गुण बताने कि कोशिश गंभीरता से नही की.</p>
<p>वृश्चिक राशी की कन्या – वृश्चिक नाम आते ही एक ही शब्द उछलता है “पैशन” नो डाऊट ये चित्रण सही लगता है. जैसे ऐश को देख कर बनाया है ये चरित्र – बहुमुखी प्रतिभा, बहुफ़लक, बहुरंगी! “आ ले चल मुझको सपनो के नगर” बेसुरा गना है.</p>
<p>कन्या राशी की कन्या – ये चित्रण भी कंविन्सिंग है. गाना “प्यारी प्यारी नई नई” स्वीटऽऽट! .. बहुत बढिया गाना है .. हट के है! फ़ाईनली .. वसूल्ल!! पता है ये मेरे अनुभव में आए <a href="http://hindini.com/eswami/archives/171">इस चरित्र जैसा है</a>. अमेजिंग!</p>
<p>वृषभ राशी की कन्या – ये कौनसी जगह है यार .. क्या अमेजिंग बिल्डिंग है… और लगा दी वाट .. एक और पगला चरित्र ..आशुतोष के जीवन मे बहुत पागल चरित्र आए हैं लगता है. “सूं छे .. सूं छे मन मा” मधुर गाना .. बहुत सही .. लेट्स गूगल मोर अबाऊट थिस सॉंग .. ब्यूटीफ़ुल . ओह वेट .. ये लडकी [स्पायलर अलर्ट सिचुएशन.. छोडो, जाने दो]  ..फ़ाईनली .. ये चित्रण जबरदस्त है. पता है ये फ़िल्म मैं चन्द गानो के लिये दोबारा झेल सकता हूं.</p>
<p>धनु राशी की कन्या – लगता है की प्रियंका स्वयं धनु राशी की हैं – वो इस चरित्र में सबसे सहज लग रही हैं. गूगलिंग अगेन .. प्रियंका कर्क राशी की हैं.  “सलोने क्या तूने प्रेम का शास्त्र पढा” .. अनादर मलोडियस सॉंग .. अकॉर्डियन का पीस सही है. [टाईप करने के चक्कर में सीन मिस्स हो रहे हैं] .. रिवाईंड.. इस वाले एपिसोड की कॉमेडी सही है.  शी लुक्स टु बी हैविंग फ़न इन थिस सीक्‍वेंस! मुझे वो इस गाने मे सबसे पसंद आई! इस केरेक्स्टर की पोशाक भी एकदम रेट्रो-कूल है! प्रियंका को और कॉमेडी करना चाहिए .. शी इज़ गूड! <strong>आशुतोष में छटांक भर कॉमिक सेंस है यार .. फ़ाईनल्ली!!</strong></p>
<p>मकर राशी की कन्या &#8211; “घूंघट में गोरी क्यों जले” .. शानदार .. प्रियंका अच्छी अभिनेत्री हैं. … वाह .. अमेजिंग.. शी कैन विन अन अवार्ड जस्ट फ़ॉर थिस केप्रिकॉर्न केरेक्टर!</p>
<p>ऋतिक रौशन के “मैं ऐसा क्यूं हूं” कि तर्ज पे “वॉट्स योर राशी” गाने में इस लप्पडझंगू [इसका नाम क्या है यार गूगल करने का मन भी नही होता] को नचवाने कि कोशिश .. दयनीय!!</p>
<p><strong>ये प्रियंका की फ़िल्म है. शी इज़ ब्रिलियंट!</strong> उनके और कुछ गानों के लिये फ़िल्म जरूर देखी जा सकती है. ऑल सेड एण्ड ड्न .. “सलोने आ” गाना फ़िर से देख रहा हूं! अकॉर्डियन के पीस के लिये <img src='http://hindini.com/eswami/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';-)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>तो ये लेटेस्ट स्टाईल है भैये! जम कर पल-पल की ट्विट्टिंग करो – अपने जीवन को रीपोर्ट करने के चक्कर में चाहे उसका मजा ही खो दो! ट्विट.. ट्विट.. ट्विट..!</p>
<p><strong>मेर पसंद: </strong></p>
<p><strong>‘सलोने क्या’ गाने का वीडियो</strong><br />
(in HD&#8230;.case to case basis slow load warning)<br />
<object classid="clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000" width="560" height="340" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"><param name="allowFullScreen" value="true" /><param name="allowscriptaccess" value="always" /><param name="src" value="http://www.youtube.com/v/IPVeUQrCrmY&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;" /><param name="allowfullscreen" value="true" /><embed type="application/x-shockwave-flash" width="560" height="340" src="http://www.youtube.com/v/IPVeUQrCrmY&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true"></embed></object></p>
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		<title>‘ओबामा को शान्ति नोबल’ अमरीकी नेतृत्व का छवि प्रबंधन?</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/278</link>
		<comments>http://hindini.com/eswami/archives/278#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 07:40:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[लिखा-ई]]></category>
		<category><![CDATA[अमरीका]]></category>
		<category><![CDATA[ओबामा]]></category>
		<category><![CDATA[नोबल पुरुस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[शान्ती]]></category>

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		<description><![CDATA[आज ओबामा की आस्तीन पर नोबल शान्ति पुरुस्कार का बिल्ला चमकाना एक कूटनीति जरूरत है अन्यथा इनके बढाए हाथों से कोई मरहम तो क्या जहर ना ले!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>अत्याधुनिक बमों से मासूमों का सर फ़ोड-फ़ाड के ईसाई मिशनरीयों के हाथ बासी बेअसर मरहम लगवाने कि अमरीकी अदा नई नही है.</p>
<p>आज ओबामा की आस्तीन पर नोबल शान्ति पुरुस्कार का बिल्ला चमकाना एक कूटनीति जरूरत है अन्यथा इनके बढाए हाथों से कोई मरहम तो क्या जहर ना ले!</p>
<p>बुश थे स्वयं-भू “वॉर प्रेसिडेंट” और ओबामा हैं स्वयं-भू शान्तीदूत!</p>
<p>एक सोची समझी रणनीति के चलते ये वॉर-प्रेसिडेंट्स और शान्तीदूत अपनी अपनी बारी अपनी अपनी पारी खेलते रहते हैं. एक आता है बम बरसा जाता है दूसरा आता है “च्‍च्‍च् अले अले अले .. अंकल ने माला.. बहुत बुले हैं अंकल .. अच्छा लो मैं दवा लगा देता हूं”</p>
<p>किसी अमरीकी राष्ट्रपति को शान्ती के लिये नोबल पुरुस्कार दिये जाने से अधिक विसंगतिपूर्ण कुछ नही हो सकता. कौन बताता है हमें कि ओबामा उम्मीद की किरण हैं? कौन सिखाता है? कब बन गए ये शान्ती के मसीहा?</p>
<p>अमरीकी राजनीतिक परिदृश्य में ओबामा के पदार्पण से ले कर आज तक जिस प्रकार उन्हे मीडिया का सहयोग मिला है वो अभूतपूर्व है. एक अजनबी प्रत्याशी से ले कर एक सफ़ल राजनेता बनने की यात्रा बिना छवि प्रबंधन के पूरी कैसे हो. <a href="http://sefora.org/wp-content/uploads/2008/09/nobelists-for-obama.pdf" target="_blank">चुनाव के समय ओबामा को ६१ नोबल पुरुस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों का सहयोग प्राप्त था!</a> – एक पूरी लॉबी सक्रीय थी. हॉलीवुड की सबसे पैसे वाली लॉबी भी थी इनके पीछे. ऐसे में शान्ती नोबल पुरुस्कार  मिल चुकना क्या बडी चीज है? वैसे ओबामा के आ जाने से कोई कोई जमीनी हकीकत नही बदली है.</p>
<p>(याद दिला दूं कि केलिफ़ोर्निया में ऐसे ही शोर शराबे के साथ एरनाल्ड श्वॉज्नेगर आए थे – आज और अधिक बदहाली मे है पूरा राज्य!)</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm4.static.flickr.com/3526/3997624820_2c207f4179.jpg" alt=""  />अब तक लगभग ७०% ट्विट्टर सदस्यों को ओबामा के चयन पर अचंभा हुआ है और <a href="http://mashable.com/2009/10/09/obama-nobel-peace-prize/" target="_blank">वे इससे सहमत नही दिखते</a>!</p>
<p>कोई कहता है कि पुरुस्कार समय से पहले मिला. यानी अगर वे अगले आठ साल बम ना बरसाते तो दिया जाना चाहिए था – चूंकि वे बरसा सकते होते और नही बरसाये होते तो अपने सर कि सलामती से खुश सब उन्हे पुरुस्कृत करते ही ना!</p>
<p>कोई कहता है कि वे इस पुरुस्कार के हकदार हैं. यानी वे बुश नही हैं – इस सिफ़त से ही उन्हे शान्ती के लिये नोबल पुरुस्कार दे दिया जाना बिल्कुल दुरुस्त है जी!</p>
<p>कोई कहता है कि ओबामा को पुरुस्कार दे कर नोबल पुरुस्कार कमेटी ने शान्ती पुरुस्कार पर जनता का ध्यान पा लेने का ध्येय अर्जित किया है. यानी इतना गये गुजरे थे जिन्हे पहले मिले ये पुरुस्कार!</p>
<p>कोई कुछ लिखता है कोई कुछ …जितने कीबोर्ड हैं उतने दृष्टीकोण हैं.</p>
<p>कीबोर्ड्स खडकते रहते हैं&#8230;उनकी नियति है!</p>
<p>चीख लें या धर लें मौन…चौधराहट जारी हैं.</p>
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		<title>पांच रुप्पैय्या बारा आना: चिट्ठे पर विज्ञापन, प्रायोजक या दानपेटी?</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 05:46:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[खलील-ई]]></category>

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		<description><![CDATA[एक पडताल - चिट्ठों पर विज्ञापन लगाने के क्या विकल्प हैं? इस माहौल में चिट्ठाकारी का औचित्य भी क्या है? ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मै चिट्ठे पर विज्ञापन लगाने का पक्षधर नहीं हूं – मेरी सोच मे -</p>
<ul>
<li>१. मै अपने विचार पाठको तक पहुंचाने के लिये चिट्ठा लिखता हूं. वो जो समय और स्नेह देते हैं वही पुरुस्कार है, वही सम्मान है. वे मुझे पढने के लिये साईडबार के एनिमेशन्स को क्यों झेलें? क्यों मेरे प्रचार के लिये यहां वहां “पसंद” “नापसंद” जैसे बटनों पर क्लिक करें?</li>
<li>२. ब्लागलेखन मे आने वाले खर्चों का रोना यदि रोना हो तो ब्लागिंग छोड कर एक अदद साईड-जॉब कर लिया जाना चाहिए! कोई भी ब्लागिंग कर के किसी पर एहसान नही करता.</li>
<li>३. हम जो शो-केस कर रहे हैं, विज्ञापन उसके प्रस्तुतिकरण पर बुरा प्रभाव डालते हैं.</li>
</ul>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px;" src="http://farm4.static.flickr.com/3471/3376199252_a5b9a13b4f_m.jpg" alt="" align="left" />मै सोचता था, ओपन सोर्स की बलिहारी है &#8211; लिनक्स फ़्री का, अपाचे फ़्री का, पीएचपी फ़्री की, माए-सीक्वल फ़्री का, वर्डप्रेस फ़्री का, थीम्स भी फ़्री की! मात्र होस्टिंग का ही तो खर्च है – हमे चाहिए की हम अच्छा पढें, कोशिश हो कि अच्छा लिखें और हिन्दी के संसाधनो को मजबूत करें. विज्ञापन लगा कर साईट कुरूप क्यों करें?</p>
<p>हमारी सदेच्छाओं पर कुठाराघात किये गए. हमारी साईट अब से एक-डेढ साल पहले से हेक की जा चुकी थी – और हमारी कई फ़ाईलों के मेटा टैग्स के साथ छेडखानी(ऑब्स्फ़्यूकेशन) की गई थी कि वो गूगल रेंकिंग मे नीचे गिरती जाएं. हमारी भली कोशिशों के बाद भी, एक शौकिया चलाई जा रही साईट किसी की आंख में खटकती है – कोई अपना समय बरबाद करता है ये सब करने के लिये, सोच कर ही विधा से वितृष्णा होती है. मोहभंग होता है. क्यों किया, किसने किया? कोई हम मे से ही एक है – नाम मे क्या रखा है, जो किया गया, भारत से ही किया गया!</p>
<p>कभी हमारे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Caller_ID_spoofing" target="_blank">फ़ोन नंबर्स को स्पूफ़ किया गया</a> और हमारे नंबरों से ब्लागमंडल के लोगों को फ़ोन किये गए, कभी हमारी साईट्स को हैक किया गया, कभी अक्षरग्राम को विज्ञापनो से बचाने के लिये चंदे कि गुहार लगाने पर हम पर तोहमतें लगीं – कभी कुछ कभी कुछ! ये सब करने वालों की दिलचस्पी थी तो इसी ब्लागजगत मे ही ना! जिसके जो मूंह मे आया जब चाहा कहा! कुछ प्रकरणों मे तो लिटरली कुत्तों के समान भौंके हैं लोग – अनर्गल, किसी ने एक बार अपने ब्लाग पर अनूपजी पर हाथ उठाने की बात लिखी!</p>
<p>अभी ज्यादा दिन नही हुए कि जगदीश भाटिया जी द्वारा ध्यान मे लाए जाने पर मैने एक ब्लाग कंटेट चुराने वाले भारतीय छात्रों द्वारा बनाए जा रहे एग्रीगेटर की स्वयं फ़ोन कर के अमरीका मे रहने वाले उसके डामेन-ओनर से शिकायत की – तब जा कर कार्यवाही की गई! क्यों करते हैं हमारे ही लोग ये सब? उन लौंडे लपाडों का भी यही राग था की हम चुरा सकते हैं – सो हमने चुरा लिया – आप मूर्ख हैं जो अपने माल की सुरक्षा नही कर सके – चोरी फ़िर सीना जोरी! मुझे चोरी से ज्यादा उनकी बदतमीजी ने खिन्न किया था! क्या हश्र हुआ? आज अपने प्रोजेक्ट को कहीं और होस्ट करते होंगें! .. मै जान गया था कि किस स्थान से किया था उन्होने ये सब – किस युनिवर्सिटी के थे, सो बात करने मे समस्या नही थी. हर चीज की कोई हद होती है – गिरी हुई हरकतें करने की भी!</p>
<p>प्रश्न उठता है कि हम क्यों कर रहे हैं यह सब? किसी भी अच्छे प्रयास कि छिछलेदारी किये बिना देसी मन को चैन क्यों नही है? इतने परपीडक क्यों हैं हम?</p>
<p>इस प्रकार अनुभव मुझे और दूसरों को हिन्दी ब्लागजगत में रह कर हुए हैं. लोग छोड गए समूह! इन हरकतों के चलते मेरी प्रतिबद्धता कम तो नही हुई लेकिन मेरी खिन्नता बढी है – शिकायत करने के लिये कोई चेहरा नही है! टंकी पर चढ जाऊं? यहां सबसे पहले टंकी पर मै ही चढा था! और मुझे अनूपजी ने उतारा था!  ये बात बहुत कम लोगों को पता है! <a href="http://hindini.com/index2.html" target="_blank">उस पल का साक्षी पेज अब तक संभाला हुआ है!</a> उससे विघ्नसंतोषियों और गिद्धचिंतकों को सुख ही मिलता है बस!</p>
<p><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm4.static.flickr.com/3362/3426193378_bc372bbee5.jpg" alt="" width="244" height="183" align="left" />ये एक नापसंद बात थी कि जो समय मै अपने परिवार और बच्चों को देना चाहता था उस समय में, मैं हैक्ड फ़ाईलों कि मरम्मत कर रहा था!  मेरी तकनीकी मदद के लिये आगे कौन आया – एक  अमरीकी अंग्रेजीभाषी ओपन-सोर्स का पैरोकार! वैसे हां, उन्ही दिनो की बात है – इस दौरान ही हमारे समूह के लोग पहले ब्लागवाणी पर दोषारोपण में व्यस्त थे, फ़िर उनका रुदालीकरण हुआ अंतत: गंधर्व-किन्नरीकरण … बॉलीवुड स्ठॉयल बेबी!!</p>
<p>इस सब बातों का विज्ञापनों से क्या संबंध है? – संबंध गहरा है … मुझसे जीतू भाई कहते थे की एड लगा लो जो कमाई हो जाए तो हिन्दी भाषा के सहायतार्थ चलाए जा रहे किसी उपक्रम में भेज देना, वे स्वयं यही करते हैं. मै सोचता था कि ऐसा भी हम बिना एड के ही कर सकें तो और बेहतर होगा.</p>
<p>हालिया थुक्काफ़जीतियों और हैकिंग प्रकरणों से मै जितना क्षुब्ध हुआ उतना अधिक सम्मान उन लोगों के लिये उमडा जो निस्वार्थ ओपनसोर्स प्रोजेक्ट्स में सहयोग कर रहे हैं लोगो की मदद कर रहे हैं, सो, अलबत्ता मैने तय किया कि जिस व्यक्ति की बनाई थीम्स हम १.५-२ साल से मुफ़्त प्रयोग कर रहे थे और जो मेरी साईट को सजाने में निस्वार्थ मदद कर रहा था क्यों ना मै उस नेक आदमी के काम आऊं – क्यो ना उसकी थीम्स को क्रय करें हम या उसकी दानपेटी मे सहयोग करें! धन्यवादस्वरूप हमने यही किया, आगे भी ऐसे ही करने के लिये इसी विचार से एड लगा दिये! मेरे निर्णय को हमेशा की तरह गुरुदेव [अनूपजी] का पूरा सहयोग मिला. आगे भी यही करने का विचार है. वैसे भी भारतीय एड एजेंसियों के पब्लिशर प्लान्स बडे चूसू हैं और पुराने अकाऊंट्स को छोड, गूगल ने हिन्दी से किनारा कर लिया है.</p>
<p><strong>हां ये एक ऎड्स  एक सांकेतिक विरोध जरूर हैं, यही “<em>पांच रुपैय्या बारा आना</em> ” किसी हिंदी से जुडे काम मे आ सकता था – यदि हमारे समूह मे भी उठने और उठाने की वही भावना होती जो दूसरे समूहो मे पाई जाती है. </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong><strong><img style="display: inline; margin-left: 0px; margin-right: 0px" src="http://farm3.static.flickr.com/2624/3907286916_cab0debd82_m.jpg" alt="" align="left" /></strong></strong>मेरे अपने सुधि पाठकों से भावनात्मक जुडाव के चलते ये एक दु:खद प्रकरण है! इसका किसी व्यवसायिकरण या प्रो-बुल्ल्शिट से कोई लेना देना नही है.  शायद अच्छा हो कि निकट भविष्य में हम कुछ आनलाईन प्रोजेक्ट्स चला कर उन पे दानपेटी लगा दें. लेकिन फ़िलहाल जो है सो सामने है! मेरे विचार में जब तक समूह के तौर तरीके नही बदलेंगे कुछ नही होगा. – ना टूल्स, ना अनुप्रयोग, ना व्यवसायिकरण ना ही गैर ब्लागर पाठक समुदाय का गठन. ये ही सब चलता रहेगा.</p>
<p><strong>मेरी पसंद:</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>गाली-गांव में </strong>हर छोटा-बडा स्त्री-पुरुष बहुत गंदी गंदी गालियां दे कर बात करता था.</p>
<p>पास गांव वालों को पता चला की इलाके में गांधीजी की सभा होने वाली है – वो गांधीजी के पास गए और बोले की आप अपनी सभा गाली-गांव मे कर लें. आपके कहने पे वे सुधर जाएंगे सो साथ ही उन्हे सभ्यता से पेश आने की नसीहत भी दे दें!</p>
<p>तो सभा गाली-गांव मे आयोजित हो गई. गांधी मंच पर बैठे. नीचे गाली-गांव वाले असभ्य गालीपूर्ण कोलाहल मे व्यस्त -</p>
<p>“ये बुड्ढा स्साला.. [बीप] का..  कहां से आगया”</p>
<p>“इस टकले की [बीप] [बीप] [बीप]”</p>
<p>हर तरफ़ [बीप] ही [बीप] चल रही थी..</p>
<p>मंच से गांधी जी बोलने का प्रयास करते ही रहे -</p>
<p>“देवियों और सज्जनों … मेरी प्रार्थना तो सुनिये….”</p>
<p>“भाईयो और बहनों… बडी खुशी हुई आप सब के बीच आ कर…”</p>
<p>मगर कोई कान ना धरे!  अंतत: थक हार के गांधी जी जोर से बोले “सालों तुम्हारी भैन की … मै बस ये बोलने आया हूं कि गालीयाँ देना छोड दो!”</p>
<p>तो क्या यही सच है कि चाहे कितना ही चाहो अंतत: समूह का स्तर व्यक्ति के स्तर पर हावी हो ही जाता है! मुझे नही पता कि मेरे स्थान पर कोई और होता तो क्या सोचता और कैसे विरोध प्रकट करता. फ़िलहाल इस साईट के कुछ कोनों पर अब हम सब सामूहिक रूप से एड झेलेंगें. ओब्वियसली, खुन्नस में हूं!</p>
<p>शेष कुशल!</p>
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		<title>गांधी के इफ़ेक्ट्स और साईड-इफ़ेक्ट्स</title>
		<link>http://hindini.com/eswami/archives/271</link>
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		<pubDate>Fri, 02 Oct 2009 08:11:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>eswami</dc:creator>
				<category><![CDATA[दिखा-ई]]></category>
		<category><![CDATA[लिखा-ई]]></category>

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		<description><![CDATA[ओबामा और गूगल को आज गांधी याद आए हैं – वही गूगल जो हिन्दी में टेक्स्ट एड व्यवसाय नही करता! वही ओबामा जो लगतार पाकिस्तान को सामरिक मदद देते आ रहे हैं. ये है गांधी की सही-सही प्रासंगिकता!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>“गाँधीजी से मेरी लडाई बडी करीबी रही है. बचपन से लेकर किशोरावस्था तक मुझ पर  गांधी जितने अधिक थोपे गए उतना तो किसी बाल-वेश्या पर लिंग भी नहीं थोपा जाता!  गांधी के माध्यम से मेरा वैचारिक और बौद्धिक कौमार्य तब भंग किया गया जब मैं एक  बच्ची थी! गांधीवाद के माध्यम से मेरी सोच को आकार नहीं दिया गया बल्कि उसकी  तार्किकता का एक तरह से शोषण किया गया – ये शारीरिक शोषण से छोटा अपराध नहीं है.”   मैं उसके शब्दों का पैनापन महसूस कर रहा था, वो मित्र शराब पी रही थी.. इस मदिरापान  का उसकी गांधीछाप संस्कारों के प्रति चिढ होने से संबंध हो सकता होगा शायद.</p>
<p>“हर बचपन में काफ़ी कुछ थोपा जाता है – कहीं धर्म, कहीं फ़लसफ़े, कहीं हिदायतें  कहीं नसीहतें और कही प्रताडनाएं – गांधी थोपा जाना उतना बुरा नही है – उसे काफ़ी हद  तक ‘अन-डू’ किया जा सकता है.. बडा हो चुकने पर वो खुद काफ़ी हद तक फ़ेड आऊट हो लेते  हैं.” मैने मरहम बनने की कोशिश की. लेकिन मैने महसूस किया की गांधी के बारे में ऐसे  विचार रखने वाली वो अकेली शख्स हो जरूरी नहीं.</p>
<p>*_*_*</p>
<p>“गांधी  की प्रासंगिकता” बडा जबरदस्त जुमला है – हर साल दो बार उछलता है, तीस  जनवरी और दो अक्टूबर को! “वैसे गांधी हैं बडे खतरनाक. अपने दुश्मनों या विरोधियों  के लिये ही नहीं अपने देश के लिये भी, और भारत ने जो दो सबसे खतरनाक चरित्र भुगते  नेहरू तथा जिन्ना – तात्कालिक राजनैतिक मंच को दोनो गांधी की ही देन थे. प्रश्न  उनकी प्रासंगिकता का नही है, साईड-इफ़्फ़ेक्ट्स का है” – एक मित्र कहता है!</p>
<p>*_*_*</p>
<p>उपरोक्त दोनो हिस्से अलग अलग बातचीतों में से हैं. यादों के हवाले रख दिये. दोनो  ने मुझे गहरे छुआ है.</p>
<p>घूम फ़िर कर फ़िर आएंगे गांधी पर, आज <em>उन्ही का दिन </em> जो है.. धीरज  रखें जरा चैनल बदल रहा हूं -</p>
<p>भगवान दत्तात्रेय का नाम सुना है? हिंदू होंगे तो सुना ही होगा! पता है कौन थे  वो?</p>
<p>हाल ही में मैने अघोरियों के बारे मे कुछ पढा और कुछ देखा/सुना. होता है अक्सर  ऐसा, किसी विषय पर ढेर सारा पढ जाता हूं फ़िर छोड देता हूं. भारतीय ज़ी टीवी पर एक  सीरियल आया था ‘काल कपाल’ उसके कई सारे एपिसोड भी देख मारे. और एक विदेशी  डाक्युमेंट्री ६ अंशों मे  पूरी देख ली.</p>
<p>पता है दत्तात्रेय थे अघोरियों के मूल गुरु –प्रथम अघोरी थे वे! हिन्दू मंदीरों  में मूर्तियां मिलती हैं उनकी, यहां अमरीका में भी!</p>
<p>किसी भी विषय का ट्रीटमेंट, उसकी कद्र, उसको हैंडल करने का तरीका,  प्रस्तुतिकरण, उसकी गंभीरता दिखाने वाले के लेंस और दिमाग पर निर्भर करती है. मैने  देखा है कि चाहे गांधी हो या अघोरी, विदेशी निर्देशकों ने अधिक करीब और समझदारी से  दिखाया है दोनो को.</p>
<p>दो शब्द हैं ‘गांधी’ और ‘अघोरी’! दो ध्रूव हैं असंबद्ध, एक साथ आ ही नही सकते –  एक महात्मा है दूसरा औगढिया! हां दोनो खालिस भारतीय हैं. लेकिन गांधी हमेशा बडे  सम्मान के साथ दिखाए जाते हैं और अघोरी बडे संशय के साथ. ९९.९९९% अघोरी यदी भगौडे  नशेडी हैं तो ९९.९९९% गांधीवादी सत्ता के भडुए [बॉस लेंग्वेज देखी?] हैं! लेकिन यही  हकीकत है – किसी और शब्द से बयां नही हो सकती.</p>
<p>गांधी पूजनीय हैं, गांधीवादी और उनके नाम की खाने वाले ९९.९९९९% उनके नकली  अनुयायी भी पूजनीय हो लिये! जबकी दत्तात्रेय पुज्य हुए, पर उनके अनुयायी त्यज्य हो  गए! <strong>ये गांधी की ब्यूटी है! उनके चमचे, और बाईप्राडक्ट जितने टॉक्सिक थे  उतने स्वीकृत भी हुए! हैं ना गांधी खतरनाक! </strong></p>
<p>एक अघोरी कहता है – “तुम कहते हो मैं अधजले शव का मांस खाता हूं, मांस तो मांस  है. मानव का क्या और मुर्गे का क्या.. मर कर सब एक ही हो जाते हैं. मैं मांस से  घृणा करूंगा तो बताओ ईश्वर के करीब कैसे जाऊंगा – ईश्वर से प्रेम करने का अर्थ है  उसकी हर चीज को प्रेम करना – कुछ भी त्यज्य नहीं है जो उसने बनाया!” ये एक रेडिकल  बात है! हिला देती है!!</p>
<p>एक टिप्पणीकार कहता है &#8211; “अघोरी गिरा हुआ साधू होता है, मानवमांस की लत लग जाने  पर आदमखोर हो जाता है!”</p>
<p>हम्म! ठीक है – बहुत हो गई गंदी बातें – गांधी की शरण में वापस चलें?</p>
<p>गांधी, शूद्रों को हरिजन नाम देने वाले वेजिटेरियन गांधी, अहिंसावादी  शान्तीप्रिय गांधी.. वाह! उनके जिन्ना ने, उनके नेहरू ने अपने करियर्स के लिये भारत  विभाजन के समय कितनी लाशें बिछा दीं.. कितनों को जिंदा खा गए यार ये लोग, अपने मूल  रॉ फ़ॉर्म में ये और दूसरे क्या आदमखोरो से कम थे?! ये गांधी के दाएं बाएं थे! ये मत  कहियेगा कि गांधी नहीं चाहते थे कि ये हो लेकिन ये सारे जिन्न उन्ही के खडे किये  हुए थे.. एक बार बोतल से निकले तो बस निकले! आर्यावर्त फिर बंट गया और ये महान  नेता(?) भी पूज्य हो लिये! <strong>ये हैं गांधी के साईड इफ़्फ़ेक्ट्स मे से  एक</strong>. महान लोग महान गलतियां करते हैं! हम तो सिर्फ़ उन गलतियों की बातें भर  ही कर सकते हैं ना!</p>
<p>आज अगर कोई इस तथ्य को रेखांकित करे तो उसकी लेखनी में से लोगों को उसके  “हिन्दुत्ववादी” होने की बू आने लगती है. तो कोई मूह भी कैसे खोले! <strong>ये है  हम पर गांधी के इफ़्फ़ेक्ट्स मे से एक! </strong></p>
<p><strong> </strong><br />
<a title="GandhiGoogle by scottdecosta, on Flickr" href="http://www.flickr.com/photos/92523949@N00/3973357731/"><img src="http://farm4.static.flickr.com/3465/3973357731_52180a2e03.jpg" alt="GandhiGoogle" width="402" height="145" /></a><br />
ओबामा और गूगल को आज गांधी याद आए हैं – वही गूगल जो हिन्दी में टेक्स्ट एड  व्यवसाय नही करता! वही ओबामा जो लगतार पाकिस्तान को सामरिक मदद देते आ रहे हैं. ये  है गांधी की सही-सही प्रासंगिकता!</p>
<p>ये सब देख सोच कर, आज के दिन एक पोस्ट लिख दी – किनारों से  हल्का-फ़ुला कुढ-सड-जल-भुन लेने की रवायत कर ली पूरी, आगे टिप्पणीयों में  “हांजी/नांजी” पढ लेंगे.. ल्यो जी मन गया २ अक्टूबर!</p>
<p>शेष कुशल!</p>
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