अपनी आदत, चुप रहते हैं…

पिछले दिनों कई गीत-कवितायें पढ़ने का मौका मिला। एक पत्रिका में तमाम गीतकारों की चुनिंदा पंक्तियां पढ़ने को मिलीं। कभी समय मिलने पर आपको पढ़वाउंगा।

फिलहाल ये कविता देखिये। फ़र्रुखाबाद के कवि शिवओम अम्बरजी हमारी समझ में आज के सबसे अच्छे मंच संचालकों में हैं। उनकी कई कविताओं में सबसे अच्छी कविता मुझे ये लगती है। ये कविता हमारे मित्र विनोद त्रिपाठी अक्सर दोहराते हैं -लेकिन आधी-अधूरी। वे खरी बात कहते हैं लेकिन अक्सर चुप भी हो जाते हैं क्योंकि लोग कभी-कभी उनसे खफ़ा भी हो जाते हैं। :)

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 1984 के परास्नातक विनोद ने इतिहास और हिंदी विषय लेकर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा पास की और आजकल हमारे यहां प्रशासनिक अधिकारी हैं। अपने सहज देशज गद्य के साथ अगर वे लिखना शुरू करें तो तमाम लोग उनके मुरीद हो जायें लेकिन वे फिलहाल चुप हैं। देखना है कब तक? कभी कविता लिखने की आदत आजकल स्थगित सी है। शायद इसे बांचकर फिर से कुछ कहने-लिखने का उनका मन बने।

अपनी आदत , चुप रहते हैं,
या फिर बहुत खरा कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥

आंसू नहीं छलकने देंगे
ऐसी कसम उठा रखी है
होंठ नहीं दाबे दांतों से
हमने चीख दबा रखी है।

माथे पर पत्थर सहते हैं,
छाती पर खंजर सहते हैं
पर कहते पूनम को पूनम
मावस को मावस कहते हैं।

अपनी आदत , चुप रहते हैं,
या फिर बहुत खरा कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥

हमने तो खुद्दार जिंदगी के
माने इतने ही माने
जितनी गहरी चोट अधर पर
उतनी ही गहरी मुस्कानें।

फ़ाके वाले दिन को, पावन
एकादशी समझते हैं
पर मुखिया की देहरी पर
जाकर आदाब नहीं कहते हैं।

अपनी आदत , चुप रहते हैं,
या फिर बहुत खरा कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥

हम स्वर हैं झोपड़पट्टी के
रंगमहल के राग नहीं हैं
आत्मकथा बागी लहरों की
गंधर्वों के फ़ाग नहीं हैं।

हम चिराग हैं, रात-रात भर
दुनिया की खातिर जलते हैं
अपनी तो धारा उलटी है
धारा में मुर्दे बहते हैं।

अपनी आदत , चुप रहते हैं,
या फिर बहुत खरा कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥

-शिवओम ‘अम्बर’
फ़र्रुखाबाद

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post कानपुरनामा बोले तो झाड़े रहो कलट्टरगंज!

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काफ़ी दिन से मैं अपने शहर कानपुर के बारे में लिखने की सोच रहा हूं। बचपन से इस शहर में रहा, पला, बढ़ा और आज संयोग कि रोजी-रोटी के लिये इसी शहर में नौकरी कर रहा हूं। कानपुर के बारे में नेट पर जानकारी है लेकिन जितनी है या और जो होगी जिसका मुझे पता नहीं उसमें कुछ और जोड़ सकूं इसका प्रयास करने का मन है।

काफ़ी पहले अतुल अरोरा ने प्रस्ताव रखा था कि कानपुर और आसपास के बारे में जानकारी देने वाली एक साइट बनाई जाये। हां, हौ, अच्छा, बहुत अच्छा, चलो करते हैं, लगते हैं, लगेंगे के बाद हम लोग उस पर आगे कुछ नहीं कर पाये। इसके बाद हम लगातार व्यस्त और मस्त होते चले गये। पस्त क्यों लिखें जी?

अभी हमने एक नया ब्लाग शुरू किया है। नाम हम रखना चाहते थे कानपुर लेकिन वो मिला नहीं। कानपुरियम सोचा और ब्लाग भी बना लिया लेकिन राजीव टंडन जी ने सुझाया कि कानपुरनामा सही रहेगा। कानपुरियम नाम की एक संस्था भी है कानपुर में । इसलिये और भी कानपुरनामा पर मन पक्का हुआ।

इस ब्लाग पर अभी फिलहाल मैंने अपने कुछ पुराने लेख पोस्ट किये हैं। आगे और लेख लिखे, पोस्ट किये जाने का मन है। देखिये कब, कितना कैसे हो पाता है।

इस ब्लाग के पीछे हमारी मंशा कानपुर के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की है। मौलिकता की कोई दुहाई और आग्रह नहीं है। यह भी कोई दावा नहीं कि जो छपे वो सबसे पहले हमारे यहां छपे। हम तो जहां से भी कानपुर के बारे में सामग्री मिलेगी उठा के टीप लेंगे। अनुमति लेकर, आभार देकर और इसके बाद न मामला बना तो जबरिया। :)

अपने कानपुर से जुड़े तमाम सथियों से अनुरोध है कि वे अपने लेख, सुझाव और सहयोग के साथ इस ब्लाग से जुड़ें। ब्लाग की प्रकृति सामूहिक रहेगी। हमारे ब्लाग पूर्वज आलोक, देबा्शीष, रविरतलामी और आदि-आदि से अनुरोध है कि इस पर अपने सुझाव दें। तरकशियों को इस ब्लाग को चमकाने की ठेका दिया गया है। जीतेंन्द्र, अतुल अरोरा, लक्ष्मी शंकर गुप्त जैसे कनपुरियों तमाम लोगों से अनुरोध है कि वे आयें और अपना आलस्य त्याग कर कुछ गली -मोहल्ले के अपने हो-हल्ले के दिन याद करें। जिनके नाम नहीं लिखे वे जानबूझकर इस लिये ताकि वे उलाहना दे सकें। बिना शिकवा-शिकायत भी कोई ब्लाग चलता है भला! :)

ब्लाग की पंचलाइन कैसी है? झाड़े रहो कलट्टरगंज!

आपके सुझाव , सहयोग और आलोचना का स्वागत है। इधर भी औरउधर भी।

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post आवश्यकता है डिजाइनर सांडों की

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कल पाण्डेयजी ने सांड़ के बारे में लिखा। इस पर द्विवेदीजी की टिप्पणी भी आई। हम कल टिपिया न पाये सो सोचा अपने ब्लाग पर लिख मारें।

दो साल पहले मैंने सांड़ के बहाने कुछ हायकू लिखे थे। फिर से देखिये-
दौड़ता हुआ
सांड़, सांड़ ही तो है
नही -दूसरा.

सिद्ध है सिद्ध
देख रहा है गिद्ध
नहीं बेचारा.

कुत्ते हैं भौंके
सांड़ चले मस्त
या गया सिरा ?

सिक्के खोटे
चलेंगे क्या सोंटे?
मरा ससुरा.

पूंछ पकड़ी
उचकेगा वो सांड
अबे ये गिरा..

हमारे स्वामीजी सांड़ प्रेमी जीव हैं। उनका सांड़ प्रेम भावुकता वाला नहीं है। वे कहते हैं-

गुरुदेव,

निःश्छल के क्रोध में भी एक सौंदर्य होता है, प्रतिक्रियात्मक आवेश तो होता है पर क्रियात्मक आवेग नहीं होता. मेरे विचार में सांड १०० मेसे ९९ बार सींग दिखाता है पर मारता नहीं, क्रोध आता है और चला जाता है फ़िर क्रोध का आवेश खुद को दिख जाता होगा हंसी आ जाती होगी अपने प्रतिक्रियात्मक आवेश पर!

हरिराम पंसारीजी ने इस बात को विस्तार देते हुये कहा था-

साँड शुद्ध शाकाहारी होता है. शुद्ध शाकाहारी गायों का परमेश्वर होता है. साँड ही असली पौरुषवाला होता है. एकाध को ही साँड छोड़ कर शेष बछड़ों को तो बैल बना दिया जाता है. साँड से न तो बैलगाड़ी चलवाई जा सकती है, न हल में लगा खेत जोता जा सकता है. साँड तो मस्त और स्वतन्त्र होता है. उसे कौन बाँध सकता है? सिर्फ भगवान शिव ही उस पर सवारी कर सकते हैं. वह भी बिना कोई नकेल बाँधे, बिना कोई काठी लगाए. साँड अर्थात् नन्दीश्वर स्वयं चाहें तभी शिव को स्वयं पर सवार होने देते हैं. पार्वती का वाहन सिंह भी साँड के शौर्य-वीर्य से डरा रहता है. जय साँड बाबा की.

ऐसे महिमावान जीव की तुलना सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और निठल्लों से होना दुखद है। लेकिन क्या करें लोग! हरेक का समय होता है। जो कभी पूजे जाते थे वे आज उपहास के पात्र बन गये। हर सक्रिय सांड़ को यह मर्म समझ लेना चाहिये कि यदि वो अनुशासित न रहा तो बधिया कर दिया जायेगा। और निठल्ला रहा तो उस पर पोस्ट लिखी जायेंगी। उसके हाल रागदरबारी के दूरबीन सिंह सरीखे हो जायेगें।

जो लोग अपने आसपास की हर चीज से सीख लेने की आदत से लाचार हैं उनको इस बात से सीख लेनी चाहिये। जो बहुत उग्र होकर सांड़पना दिखायेगा वो आज नहीं तो कल बधिया कर दिया जायेगा। और जो केवल निठल्लेपन के सहारे अपनी जिंदगी पार करने की सोचेगा वह उपहास का पात्र बनेगा। दोनों में संतुलन की आवश्यकता है जीवन में। दुनिया को डिजाइनर सांड़ चाहिये। जिसकी उग्रता जब चाहे नियंत्रित की जा सके और बाकी समय वो गधा बना रहे है। निठल्ला नहीं। दुनिया ऐसे जीव पसंद करती है जिसमें शेर, सांड़ और न जाने कैसे-कैसे जीवों जैसी आक्रामकता हो, गधे-घोड़ों जैसी बिना बोले काम करने की दक्षता हो, मालिक के इशारे पर बिना सोचे मर-मिटने की बुद्धि हो और न जाने क्या-क्या हो। इसके अलावा उनमें यह हुनर जरूर होना चाहिये ताकि वे अपने आका के हर सही-गलत हरकत को तर्क पूर्ण तरीके से सही साबित कर सकें। इस सांड़ों से ये अपेक्षा की जाती है कि अपने कार्य-कलापों और व्यवहार ये मई दिवस जैसी किसी भी अवधारणा को हास्यास्पद बना के रख दें।

दुनिया के तमाम प्रतिभाशाली , आला दिमाग के मालिकान ऐसे ही डिजाइनर सांड़ की परिभाषा के बहुत निकट हैं। वे आदर्श डिजाइनर सांड़ बनने के लिये कमरकसे जुटे हैं। सरकारी सांड़ तो सामने दिखते हैं। आप गिनती कर सकते हैं। संसद के सांड़ को आप प्रयास करके बाहर कर सकते हैं लेकिन ऐसे डिजाइनर सांड़ों के लिये क्या किया जाये?

स्वाभाविक/प्राकृतिक सांड़ों में जरा भी अकल अगर बची हो तो समय रहते उनको सावधान हो जाना चाहिये और अपने को सुधार लेना चाहिये। केवल सांड़ बने रहने से कुछ न होगा। उनको डिजाइनर सांड़ बनना होगा। अगर न बने तो अपने हाल के लिये वे खुद जिम्मेदार होंगे।

यह सूचना दुनिया के तमाम सांड़ों के हित के लिये जारी की जा रही है। फिर कोई सांड़ ये शिकायत लेकर न आये कि हमें बताया नहीं।
संबंधित कड़ियां :
1.. मुंसीपाल्टी का सांड़
2. साँड, मई दिवस और स्त्रियाँ
3. मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता
4.पुरुष बली नहिं होत है…
5.कविता के बहाने सांड़ से गप्प
6. ठाकुर बाबा

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post जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है

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मेरी प्यारी,

बहुत दिन हुये तुमको खत न लिखा। आज मन किया। सोचा तुमको खत लिखा जाये। वैसे लोग कहते हैं कि खत लिखने का जमाना चला गया। क्या ऐसा है? मुझे यह लोगों की फ़ैलायी गयी अफ़वाह लगती है। जो कर नहीं पाते उसी के लिये उड़ा दिया कि उसका जमाना चला गया। ऐसा होता है कहीं! बताओ भला।

तुम मुझे बहुत याद आती हो। बहुत टाइम बरबाद करती हो। जब कोई जरूरी काम कर रहे होते हैं टप्प से याद आ जाती हो। काम हराम हो जाता है।

कुछ लिखने से पहले शुरुआत तो कर लें। तो शुरू इस सच के साथ करता हूं कि तुम मुझे बहुत याद आती हो। बहुत टाइम बरबाद करती हो। जब कोई जरूरी काम कर रहे होते हैं टप्प से याद आ जाती हो। काम हराम हो जाता है। गैरजरूरी काम के समय तो खैर याद आना लाजिमी है। सोचते हैं कि इस बेहया काम से अच्छा तो तुम्हारा नाम है। साथ है।

मुझे पता है कि तुम यह सच पढ़ते ही सबसे पहले यही कहोगी- क्या हसीन झूठ है। मुझे सब पता है लेकिन तुमको भी यह पता है ही कि यह सच है। इसी भरोसे के कारण इस बात पर फ़िजूल टाइम खोटी नई करने का! :)

तुमने मुझे पत्र नहीं लिखा लेकिन शिकायत अवश्य करती हो -अब तुम बदल गये। वो वाले नहीं रहे। मुझसे वैसी मोहब्बत नहीं करते जैसी पहले करते थे।

अब बताओ इस बात का कोई जबाब है? किसी के पास! हम इसका क्या जबाब दें। बताओ।

किसी बड़का शायर शायद फ़ैज साहब ने लिखा है- मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग! बस उसी का सहारा लेकर अपनी बात कहने की कोशिश करता हूं। आशा ही नहीं विश्वास है कि तुम मेरी बात समझोगी और तुम्हारी कम से कम मोहब्बत वाली शिकायत दूर जायेगी। इसके बाद बाकी भी हो ही जायेंगी।

चांद सितारे तोड़ना बहुत रिस्की काम है। जैसे ही एक ठो चांद तोड़ा सारी दुनिया का संतुलन बिगड़ जायेगा। सारे सितारे हमारी-तुम्हारी-इसकी-उसकी मतलब कि दुनिया भर की चांद पर टपक पड़ेंगे।

पहले हम तुम्हारे लिये चांद-सितारे तोड़ के लाने की बात कहते थे। तुम्हें शायद उनका ही इंतजार होगा। लेकिन इधर पता चला कि चांद सितारे तोड़ना बहुत रिस्की काम है। जैसे ही एक ठो चांद तोड़ा सारी दुनिया का संतुलन बिगड़ जायेगा। सारे सितारे हमारी-तुम्हारी-इसकी-उसकी मतलब कि दुनिया भर की चांद पर टपक पड़ेंगे। दुनिया की वाट लग जायेगी, खटिया खड़ी हो जायेगी। तुम ऐसा तो कतई नहीं चाहती होगी न! तुम्हारे मेंहदी लगे वालों पर बड़े-बड़े गढ्ढे वाले बेहवा, बेहया चांद की परछाई भी पड़े ये हमें मंजूर नहीं!

ओह, क्या लफ़ड़ा हो गया। हम मेंहदी तुम्हारे हाथ की जगह बालों में लगा गये। याद ही नहीं रहा कि बालों में मेहदी लगाना तुम अर्सा पहले छोड़ चुकी हो और अब डाई की शरण में चली गयी हो। पिछली बार जब बात हुयी थी तो लोरियल लगाती थी। बहुत मंहगी हो गयी अब तो लोरियल , आजकल कौन सी डाई इस्तेमाल हो रही हो?

तुमको जब भी याद करते हैं तमाम परेशानियां घेर लेती हैं। वैसे तुम अपने आपमें एक मुकम्मल परेशानी हो। तुम्हारे रहते किसी और परेशानी की जरूरत नहीं है। लेकिन मन मुआ बहुत चंचल होता है। सबर नहीं है। एक से मानता नहीं है। डिड्या है। हर तरह की परेशानी का स्वाद लेना चाहता है। ये भी परेशानी भी हो वो भी हो और वो तो हो ही। मतलब वही ये मे ले, वो में ले और वो हू में ले। किसी के पास कोई नयी परेशानी दिखती है, मन करता है ये हमारे कने भी हो। जब तक उसको हासिल नहीं कर लेते , मन मानता नहीं। इसी ‘संग्रहणी-वृत्ति’ ने तमाम आदतें जमा कर रखी हैं। जाम लग गया है।

तुम अपने आपमें एक मुकम्मल परेशानी हो। तुम्हारे रहते किसी और परेशानी की जरूरत नहीं है। लेकिन मन मुआ बहुत चंचल होता है। सबर नहीं है। एक से मानता नहीं है।

आजकल सबसे ज्यादा परेशान मंहगाई ने कर रखा है। तुमसे भी ज्यादा। बल्कि सच तो यह है कि ये मुई मंहगाई ही है जिसके चलते तुम फिर से अच्छी , बहुत अच्छी लगने लगी हो। भाव बेभाव हो गये हैं। आसमान छू रहे हैं। कभी -कभी तो हमें ये शेखचिल्ली ख्याल आता है कि जो दुनिया भर में आकाश पर्यटन पर लाखों-करोड़ों फ़ूंके जा रहे हैं उस फ़िजूल खर्ची से अच्छा कि जिसको आसमान पर भेजना हो उसको किसी जिंस के भाव पर बैठा दो। वो फ़्री में आसमान छू लेगा।

जैसे अब किसी को बहुत तेजी से आकाश छूना है उसको तेल के भाव पर बैठा दो वो झट्ट से आसमान पहुंच जायेगा। इसी तरह किसी को आलू के भाव पर , किसी को दाल के भाव पर, किसी को गेहूं के भाव पर बैठा दो। बैठने वाला फ़्री में आसमान छू लेगा। जब उतारना हो तो उसको मेहनत, ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा जैसी कम कीमतों वाली चीजों पर बैठा दो। वो औकात में आकर जमीन पर धप्प से आ गिरेगा।

हमें पता है कि तुम कहोगी मेहनत, ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा जैसी चीजें आकाश तक जायेंगी कैसे? यह हमारी भी चिंता है लेकिन यह भी सोचते हैं कि जब लाइका जैसी कुतिया आकाश के चक्कर लगाने जा सकती है तो ‘इन चीजों’ के भी दिन बहुरेंगे। कभी उदात्त माने जाने वाले इन गुणों को ‘इन चीजों’ इस लिये लिखा कि अब लोग इनको बहुत चिरकुट चीजें मानने लगे हैं। जब दुनिया ऐसा मानती है तो हम भी सार्वजनिक रूप से इनको दोहराने में हिचकते हैं। क्या जमाना आ गया है। जिसका जिक्र करने में फ़क्र करते थे उसका नाम लेने में शरमाते हैं।

पहले चिट्ठी में फ़ूल भेजने का चलन था अब इस खत में बताओ क्या भेजें? दो-चार ठो लवली वायरस भेजें? जो तुम्हारे कम्प्यूटर में पहुंचकर खलबली मचा दें। तुम्हारे दिल में हलचल मचा दें-हाय अब मेरे कम्प्यूटर का क्या होगा?

तुमको लिखना तो और बहुत कुछ चाहता था लेकिन समय मुआ लाठी लिये पीछे खड़ा है। कह रहा अब बस्स! बहुत हो गया। सो फिलहाल इतना ही। पहले चिट्ठी में फ़ूल भेजने का चलन था अब इस खत में बताओ क्या भेजें? दो-चार ठो लवली वायरस भेजें? जो तुम्हारे कम्प्यूटर में पहुंचकर खलबली मचा दें। तुम्हारे दिल में हलचल मचा दें-हाय अब मेरे कम्प्यूटर का क्या होगा? तुम बेशाख्ता कह उठो- मैं बेकार ही इस चिठेरे के बहकावे में आकर इसका पत्र बांचने लगी! ये चिठेरा तो कभी न सुधरेगा । न जाने कितने पैसे ठुक जायें इस कम्प्यूटर को सुधरवाने में। उसी समय वाइरस ठ्ठा के कहे- हहहहहहाआआहाहा…. मैं जानता था अब तुमको मुझसे ज्यादा अपने कम्यूटर से प्यार है। इसके बावजूद भी हम तुमसे उतना ही प्यार करते हैं जितना पहले करते थे। बल्कि कुछ ज्यादा ही। लेकिन दिखावे में पिछड़ रहे हैं। दिखावा बहुत मेहनत मांगता है । हम उत्ता मेहनती नहीं हैं। हम तुम्हारे आलसी आशिक थे, हैं और रहेंगे। लेजी लवर! :)

मुझे पता है तुम इस बचकाने आरोप से घबराओगी नहीं। तुरत चहकते-महकते-किलकते, थोड़ा इतराते और बहुत सा बल खाते हुये तुरत कहोगी- तुमने तो मुझे डरा ही दिया था। जरा भी बदले नहीं। हाऊ स्वीट!

मैं तुमसे दूर हूं, बहुत दूर! लेकिन ई दूरी बस एक ई मेल भर की दूरी है। झट से तय हो जाती है। इसीलिये आशा है और विश्वास भी कि जल्द ही मिलेंगे।

बकिया फिर, फिलहाल इतना ही,

तुम्हारा

प्यारा!

मेरी पसंद

जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।

सहसा भूली याद तुम्हारी उर में आग लगा जाती है
विरहातप भी मधुर-मिलन के सोये मेघ जगा जाती है।

मुझको आग और पानी में रहने का अभ्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।

धन्य-धन्य मेरी लघुता को, जिसने तुम्हें महान बनाया
धन्य तुम्हारी स्नेह कृपणता, जिसने मुझे उदार बनाया।

मेरी अन्ध भक्ति को केवल इतना मन्द प्रकाश बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम विश्वास बहुत है।

अगणित शलभों के दल के दल एक ज्योति पर जलकर मरते
एक बूंद की अभिलाषा में कोटि-कोटि चातक तप करते।

शशि के पास सुधा थोड़ी है पर चकोर की प्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।

मैंने आंखे खोल देख ली हैं नादानी उन्मादों की
मैंने सुनी और समझी हैं कठिन कहानी अवसादों की।

फिर भी जीवन के पृष्ठों में पढ़ने को इतिहास बहुत हैं
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।

ओ! जीवन के थके पखेरू, बढ़े चलो हिम्मत मत हारो
पंखों में भविष्य बन्दी है मत अतीत की ओर निहारो।

क्या चिंता धरती यदि छूटी उड़ने को आकाश बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है।

बलबीर सिंह ‘रंग’

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