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उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए

आज कुछ पसंदीदा रचनायें पेश हैं। संयोग यह... 

उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए

अब तो जो पानी पिलवाय दे ,है वही नया अवतार

1.बदरा, बदरी के संग में, हुआ जाने... 

अब तो जो पानी पिलवाय दे ,है वही नया  अवतार

जींस-टाप, फ़ादर्स-डे और टिप्पणी-चिंतन

जींस-टाप में उभार दिखते हैं हर साल... 

जींस-टाप, फ़ादर्स-डे और टिप्पणी-चिंतन

हादसे राह भूल जायेंगे

पिछली पोस्ट पिछले साल लिखी थी। १९ दिसम्बर को।
इस बीच साल निकल गया। न जाने कित्ते शुभकामना सन्देशों का आदान-प्रदान हो गया। कई उधारी में पड़े हैं। सबके जबाब देने हैं। रोज सोचते हैं आज लिखेंगे, कल लिखेंगे। लिख नहीं पाते। कोई नाराज होगा तो मना ही लेंगे। यही विश्वास आलस्य को बढ़ावा [...]

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बाल दिवस पर ज्ञान दिवस

पिछले शनिवार को एक दिन के लिये इलाहाबाद जाना हुआ। हमारे कालेज में जो लोग १९८३ में पास आउट हुये उनका रजत जयन्ती मिलन समारोह था। हम १९८५ में कालेज-बाहर हुये लेकिन जान-पहचान के लोगों से मिलने के मोह ने हमको बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बना दिया।
कालेज गये वहां तमाम पुराने जाने-पहचाने लोगों की [...]

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अब तो जो पानी पिलवाय दे ,है वही नया अवतार

1.बदरा, बदरी के संग में, हुआ जाने कहां फ़रार,
बारिश के लाले पड़े, मचा है सबहन* हाहाकार!
सबहन*= सब जगह
2.फ़्रिज से कुल्फ़ी निकलकर, ऐंठी गरदन अकड़ाय,
गर्मी ने झप्पी दई, दिया फ़ौरन उसको पिघलाय!
3.बादल धरती के ऊपर दिखा, गये सूरज जी भन्नाय,
’आपरेशन मजनू’ को याद कर, बादल फ़ूटा जान बचाय!
4.लू-लपटों के संग रह, सड़कों के भी [...]

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जींस-टाप, फ़ादर्स-डे और टिप्पणी-चिंतन

जींस-टाप में उभार दिखते हैं
हर साल की तरह इस वर्ष भी कानपुर के कुछ बालिका विद्यालयों में ड्रेस कोड का हल्ला मचा। ऐसा हर साल जुलाई में होता है। लड़कियां ये पहनेंगी वो नहीं पहनेंगी। मोबाइल नहीं लायेंगी और इसी तरह की हेन-तेन। शहर के अखबारों में बयानबाजी होती है और फ़िर मामला खलास। इस [...]

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उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए

आज कुछ पसंदीदा रचनायें पेश हैं। संयोग यह है कि आज इन कविताओं के रचयिताओं का जन्मदिन है। नन्दनजी अपनी स्वास्थ्य संबंधी तमाम जटिलताओं के बावजूद सृजनरत हैं । प्रियंकर जी को हमें पिछले कई महीनों मिस करने का ही सौभाग्य मिला है। आज हालांकि उन्होंने रचनात्मक होने का वायदा किया है। [...]

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जिसे देखो वह नखरे दिखा रहा है

आजकल जिसे देखो नखरा दिखा रहा है।
वोटर, राजनीतिक पार्टियों का तो खैर काम ही नहीं चलता बिना नखरे के लेकिन पिछले हफ़्ते से हमारी ई ब्लाग साइट नखरे दिखा रही है। कोई पोस्ट करो बताती हैं- गलती है। अब बताओ काम साइट न करे और ऊपर से गलती है। चोरी-चोरी ,सीना जोरी।
नये कुछ लिखने [...]

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पहिला सफेद बाल

[परसाईजी के लेखों की श्रंखला में आज पेश है उनका प्रसिद्ध व्यंग्य लेख- पहिला सफेद बाल। इस लेख में जो यौवन की परिभाषा परसाईजी ने बतायी है वह मुझे खासतौर पर आकर्षित करती है-यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का [...]

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ठिठुरता हुआ गणतंत्र

[आज गणतंत्र-दिवस है। इस मौके पर मैंहरिशंकर परसाईजीका लिखा अपनी पसंद का एक लेख पोस्ट कर रहा हूं- ठिठुरता हुआ गणतंत्र। यह लेख मुझे कई कारणों से पसंद है। आज के मौके पर जब समाजवाद की बातें भी होनी बन्द हो गयीं हैं और भूमंडलीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था के हल्ले में समाजवाद की आवाजें मध्यम [...]

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उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए

आज कुछ पसंदीदा रचनायें पेश हैं। संयोग यह है कि आज इन कविताओं के रचयिताओं का जन्मदिन है। नन्दनजी अपनी स्वास्थ्य संबंधी तमाम जटिलताओं के बावजूद सृजनरत हैं । प्रियंकर जी को हमें पिछले कई महीनों मिस करने का ही सौभाग्य मिला है। आज हालांकि उन्होंने रचनात्मक होने का वायदा किया है। [...]

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अब तो जो पानी पिलवाय दे ,है वही नया अवतार

1.बदरा, बदरी के संग में, हुआ जाने कहां फ़रार,
बारिश के लाले पड़े, मचा है सबहन* हाहाकार!
सबहन*= सब जगह
2.फ़्रिज से कुल्फ़ी निकलकर, ऐंठी गरदन अकड़ाय,
गर्मी ने झप्पी दई, दिया फ़ौरन उसको पिघलाय!
3.बादल धरती के ऊपर दिखा, गये सूरज जी भन्नाय,
’आपरेशन मजनू’ को याद कर, बादल फ़ूटा जान बचाय!
4.लू-लपटों के संग रह, सड़कों के भी [...]

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जींस-टाप, फ़ादर्स-डे और टिप्पणी-चिंतन

जींस-टाप में उभार दिखते हैं
हर साल की तरह इस वर्ष भी कानपुर के कुछ बालिका विद्यालयों में ड्रेस कोड का हल्ला मचा। ऐसा हर साल जुलाई में होता है। लड़कियां ये पहनेंगी वो नहीं पहनेंगी। मोबाइल नहीं लायेंगी और इसी तरह की हेन-तेन। शहर के अखबारों में बयानबाजी होती है और फ़िर मामला खलास। इस [...]

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सोचते हैं चले ही जायें अगले हफ़्ते कलकत्ते

एक
सोचते हैं चले ही जायें अगले हफ़्ते कलकत्ते
वहां रहता है अपना बचपन का यार फ़त्ते,
बता रहा था वहां वो थोक में बेचता है गत्ते
लौटते में हमेशा सिलवा देता है कपड़े लत्ते!
बच्चा बोला पापा हमें भी अपने साथ लेते चलते,
हम बोले बोर होगे लौटने को कहोगे अधरस्ते,
बच्चा बोले हम भी देखेंगे नई जगहें,नये-नये रस्ते,
ट्रेन में [...]

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तरही कविता, तरह-तरह की कविता

तरही गजल शिवकुमारजी को इत्ता भा गयी कि उसकी तर्ज पर तरही कविता लिखने के अपना निर्माणाधीन स्कूल छोड़कर शुरू हो गये और कहते भये:
बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ मिट गईं, कोई नहीं रोने वाला
बैंक-वैंक तो कितने डूबे, कोई नहीं गिनने वाला
दशकों लगे जिन्हें बनने में, घंटों में वे उखड़ गए
जो हैं बचे डरे जीते हैं, मंदी [...]

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