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	<title>Comments on: चिट्ठाचर्चा के बहाने कुछ और बातें</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44153</link>
		<dc:creator>प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Dec 2009 02:39:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी इस पोस्‍ट से चिट्ठाचर्चा की बारीकिया सीखने को मिली, आज कल हम भी हाथ अजमा ले रहे है पर जैसा कि आपने बताया कि एक लाईना चर्चा नही है तो अब इससे गुरेज रखने का प्रयास करेगे। 

विवाद से कोई नही बच सकता है, विवाद से तो ब्‍लाग संसार में प्रेम बढ़ता है मानो या न मानो एक बार जिससे विवाद हो उससे जब मिलेगे तो उतनी ही गर्म जोशी से गले मिलेगे। :) 

तो पंसद आये, उसी की चर्चा करना कोई गलत नही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी इस पोस्‍ट से चिट्ठाचर्चा की बारीकिया सीखने को मिली, आज कल हम भी हाथ अजमा ले रहे है पर जैसा कि आपने बताया कि एक लाईना चर्चा नही है तो अब इससे गुरेज रखने का प्रयास करेगे। </p>
<p>विवाद से कोई नही बच सकता है, विवाद से तो ब्‍लाग संसार में प्रेम बढ़ता है मानो या न मानो एक बार जिससे विवाद हो उससे जब मिलेगे तो उतनी ही गर्म जोशी से गले मिलेगे। <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  </p>
<p>तो पंसद आये, उसी की चर्चा करना कोई गलत नही है।</p>
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	<item>
		<title>By: गौतम राजरिशी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44069</link>
		<dc:creator>गौतम राजरिशी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 03 Dec 2009 13:58:22 +0000</pubDate>
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		<description>ये अद्‍भुत पोस्ट पता नहीं कैसे मुझसे रह गयी थी।...

और इसी बहाने &quot;जितना खिड़की से दिखता है बस उतना ही सावन मेरा है&quot; पर भी नजर गयी। पहले इसके लिये शुक्रिया कह लेता हूँ, फिर पोस्ट पर आता हूँ।

चिट्ठा-चर्चा वाले तमाम चर्चाकारों का तो मैं जबर्दस्त फैन हूं। जो लोग बोलते हैं, उनका काम बस बोलना है....वो ये नहीं देखते कि कितनी मेहनत जुड़ी है। और इतनी ही शिकायत है तो खुद शामिल हो जाओ चर्चाकारी में।

शैलेन्द्र झा जैसे पाठक ही तो लेखक की असली पहचान हैं। देखिये वो मेरे ननिहाल के निकले,,,वैसे सच कहूं, ये झा लोग बड़े श्रद्धालु होते हैं। क्योंकि मैं भी झा हूँ... :-)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये अद्‍भुत पोस्ट पता नहीं कैसे मुझसे रह गयी थी।&#8230;</p>
<p>और इसी बहाने &#8220;जितना खिड़की से दिखता है बस उतना ही सावन मेरा है&#8221; पर भी नजर गयी। पहले इसके लिये शुक्रिया कह लेता हूँ, फिर पोस्ट पर आता हूँ।</p>
<p>चिट्ठा-चर्चा वाले तमाम चर्चाकारों का तो मैं जबर्दस्त फैन हूं। जो लोग बोलते हैं, उनका काम बस बोलना है&#8230;.वो ये नहीं देखते कि कितनी मेहनत जुड़ी है। और इतनी ही शिकायत है तो खुद शामिल हो जाओ चर्चाकारी में।</p>
<p>शैलेन्द्र झा जैसे पाठक ही तो लेखक की असली पहचान हैं। देखिये वो मेरे ननिहाल के निकले,,,वैसे सच कहूं, ये झा लोग बड़े श्रद्धालु होते हैं। क्योंकि मैं भी झा हूँ&#8230; <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Prashant (PD)</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44030</link>
		<dc:creator>Prashant (PD)</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 Nov 2009 07:56:45 +0000</pubDate>
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		<description>Apki ye post abhi abhi Twitiya kar aa rahe hain.. :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Apki ye post abhi abhi Twitiya kar aa rahe hain.. <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44029</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 19:58:55 +0000</pubDate>
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		<description>हम तो जब भी यहाँ या चिठ्ठाचर्चा के मछ पर आते हैं तो बहुत लाभान्वित होकर जाते हैं। लिखने और पढ़ने के अनेक गुर दिख जाते हैं यहाँ। 

इसके लिए हम इस मंच के संचालकों के आभारी हैं। आदरणीय अनूप जी विशेष बधाई के पात्र हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हम तो जब भी यहाँ या चिठ्ठाचर्चा के मछ पर आते हैं तो बहुत लाभान्वित होकर जाते हैं। लिखने और पढ़ने के अनेक गुर दिख जाते हैं यहाँ। </p>
<p>इसके लिए हम इस मंच के संचालकों के आभारी हैं। आदरणीय अनूप जी विशेष बधाई के पात्र हैं।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अमर-हिन्दी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44028</link>
		<dc:creator>अमर-हिन्दी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 18:01:34 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;em&gt;
@ डा. अनुराग

नहीं डा. अनुराग ऎसा नहीं है, ठीक है पसंद एक निजी मसला है …
यह मैं भी मानता हूँ कि पसंद एक निजी मसला है … पर मुख्य लोचा भी यही है
यदि किसी घर के मुखिया को बैंगन पसँद हो, तो ऎसा नहीं कि घर के सभी सदस्य यहाँ तक कि आगँतुक, मेहमान सभी उसका लुत्फ़ ( ? ) उठाने और उसकी वाह वाह करने को बाध्य हों । अलबत्ता यदि वह सम्पूर्ण भोज के उपराँत इतना भर इँगित कर दे कि ’ भई मेरे को काला कलूटा बैंगन ही प्रिय है, और वह भी आज के मीनू में है.. ’ फिर कोई भी पूर्वाग्रह का अँदेशा लेकर नहीं आयेगा, क्योंकि उसके अन्य विकल्प की अपेक्षायें पूर्ण होती हैं !
एक सार्वजनिक मँच पर जब आप कोई विषय उठाते हैं, तो यह तय हो जाना चाहिये कि आज की चर्चा की थीम क्या है...  यदि किसी चर्चा में केवल निजी पसँद के चिट्ठों की ही बात करनी है, तो यह पहले स्पष्ट हो जाये कोई बखेड़ा ही नहीं
इसके बाद की अगली चर्चा किसी सामाजिक विषय को लेकर हो सकती है, मसलन ’ मधु कौड़ा ’,
अब यह बदज़ायका डिश जिन भी ब्लॉगर्स ने परोसी है.. उस सब को समेट लिया जाय, वह एक अलग मज़ा देगी !
यदि किसी दिन पिछले 24 घँटों या पिछले सप्ताह आये चिट्ठों की चर्चा की जाये, तो भी ठीक !
ऎसे में पाठकों का भी सहभागिता करने का मन बनेगा ।
मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि चर्चा और रनिंग कमेन्ट्री में अँतर है..
चर्चा के मायने हैं विमर्श, जो सहमति और असहमति के बीच आपकी सोच को नये आयाम दे
मैं पहले भी कह चुका हूँ, देर सवेर श्रेणीबद्ध या विषयबद्ध चर्चाओं की आवश्यकता पड़ेगी, वरना चूल्हे अलग होते रहेंगे ! नतीज़ा, बहु-खिचड़ी त्रस्त हिन्दी ब्लॉगर समाज !

नहीं जानता कि यह टिप्पणी तुम तक पहुँचेगी भी या नहीं, क्योंकि टिप्पणी फ़ॉलो=अप का विकल्प रखना या न रखना भी ब्लॉग मालिक के परिधि में आता है, अब ?
&lt;/em&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><em><br />
@ डा. अनुराग</p>
<p>नहीं डा. अनुराग ऎसा नहीं है, ठीक है पसंद एक निजी मसला है …<br />
यह मैं भी मानता हूँ कि पसंद एक निजी मसला है … पर मुख्य लोचा भी यही है<br />
यदि किसी घर के मुखिया को बैंगन पसँद हो, तो ऎसा नहीं कि घर के सभी सदस्य यहाँ तक कि आगँतुक, मेहमान सभी उसका लुत्फ़ ( ? ) उठाने और उसकी वाह वाह करने को बाध्य हों । अलबत्ता यदि वह सम्पूर्ण भोज के उपराँत इतना भर इँगित कर दे कि ’ भई मेरे को काला कलूटा बैंगन ही प्रिय है, और वह भी आज के मीनू में है.. ’ फिर कोई भी पूर्वाग्रह का अँदेशा लेकर नहीं आयेगा, क्योंकि उसके अन्य विकल्प की अपेक्षायें पूर्ण होती हैं !<br />
एक सार्वजनिक मँच पर जब आप कोई विषय उठाते हैं, तो यह तय हो जाना चाहिये कि आज की चर्चा की थीम क्या है&#8230;  यदि किसी चर्चा में केवल निजी पसँद के चिट्ठों की ही बात करनी है, तो यह पहले स्पष्ट हो जाये कोई बखेड़ा ही नहीं<br />
इसके बाद की अगली चर्चा किसी सामाजिक विषय को लेकर हो सकती है, मसलन ’ मधु कौड़ा ’,<br />
अब यह बदज़ायका डिश जिन भी ब्लॉगर्स ने परोसी है.. उस सब को समेट लिया जाय, वह एक अलग मज़ा देगी !<br />
यदि किसी दिन पिछले 24 घँटों या पिछले सप्ताह आये चिट्ठों की चर्चा की जाये, तो भी ठीक !<br />
ऎसे में पाठकों का भी सहभागिता करने का मन बनेगा ।<br />
मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि चर्चा और रनिंग कमेन्ट्री में अँतर है..<br />
चर्चा के मायने हैं विमर्श, जो सहमति और असहमति के बीच आपकी सोच को नये आयाम दे<br />
मैं पहले भी कह चुका हूँ, देर सवेर श्रेणीबद्ध या विषयबद्ध चर्चाओं की आवश्यकता पड़ेगी, वरना चूल्हे अलग होते रहेंगे ! नतीज़ा, बहु-खिचड़ी त्रस्त हिन्दी ब्लॉगर समाज !</p>
<p>नहीं जानता कि यह टिप्पणी तुम तक पहुँचेगी भी या नहीं, क्योंकि टिप्पणी फ़ॉलो=अप का विकल्प रखना या न रखना भी ब्लॉग मालिक के परिधि में आता है, अब ?<br />
</em></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अमर-हिन्दी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44027</link>
		<dc:creator>अमर-हिन्दी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 17:56:58 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;em&gt;
@ डा. अनुराग

नहीं डा. अनुराग ऎसा नहीं है, ठीक है पसंद एक निजी मसला है …
यह मैं भी मानता हूँ कि पसंद एक निजी मसला है … पर मुख्य लोचा भी यही है
यदि किसी घर के मुखिया को बैंगन पसँद हो, तो ऎसा नहीं कि घर के सभी सदस्य यहाँ तक कि  आगँतुक, मेहमान सभी उसका लुत्फ़ ( ? ) उठाने और उसकी वाह वाह करने को बाध्य हों । अलबत्ता यदि वह सम्पूर्ण भोज के उपराँत इतना  भर इँगित कर दे कि ’ भई मेरे को काला कलूटा बैंगन ही प्रिय है, और वह भी आज के मीनू में है.. ’ फिर कोई भी पूर्वाग्रह का अँदेशा लेकर नहीं आयेगा, क्योंकि उसके  अन्य विकल्प की अपेक्षायें पूर्ण होती हैं ! 
 एक सार्वजनिक मँच पर जब आप कोई विषय उठाते हैं, तो यह तय हो जाना चाहिये कि आज की चर्चा की थीम क्या है
यदि किसी चर्चा में केवल निजी पसँद के चिट्ठों की ही बात करनी है, तो यह पहले स्पष्ट हो जाये कोई बखेड़ा ही नहीं
अगली चर्चा किसी सामाजिक विषय को लेकर हो सकती है, मसलन ’ मधु कौड़ा ’, 
अब यह बदज़ायका डिश जिन भी ब्लॉगर्स ने परोसी है.. उस सब को समेट लिया जाय, वह एक अलग मज़ा देगी !
यदि किसी दिन पिछले 24 घँटों या पिछले सप्ताह आये चिट्ठों की चर्चा की जाये, तो पाठकों का भी सहभागिता करने का मन बनेगा ।
मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि चर्चा और रनिंग कमेन्ट्री में अँतर है..
चर्चा के मायने हैं विमर्श, जो  सहमति और असहमति के बीच आपकी सोच को नये आयाम दे
मैं पहले भी कह चुका हूँ, देर सवेर श्रेणीबद्ध या विषयबद्ध चर्चाओं की आवश्यकता पड़ेगी, वरना चूल्हे अलग होते रहेंगे !
नतीज़ा, बहु-खिचड़ी त्रस्त हिन्दी ब्लॉगर समाज !

नहीं जानता कि यह टिप्पणी तुम तक पहुँचेगी भी या नहीं, क्योंकि टिप्पणी फ़ॉलो=अप का विकल्प रखना या न रखना भी ब्लॉग मालिक के परिधि में आता है, अब ?
&lt;/em&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><em><br />
@ डा. अनुराग</p>
<p>नहीं डा. अनुराग ऎसा नहीं है, ठीक है पसंद एक निजी मसला है …<br />
यह मैं भी मानता हूँ कि पसंद एक निजी मसला है … पर मुख्य लोचा भी यही है<br />
यदि किसी घर के मुखिया को बैंगन पसँद हो, तो ऎसा नहीं कि घर के सभी सदस्य यहाँ तक कि  आगँतुक, मेहमान सभी उसका लुत्फ़ ( ? ) उठाने और उसकी वाह वाह करने को बाध्य हों । अलबत्ता यदि वह सम्पूर्ण भोज के उपराँत इतना  भर इँगित कर दे कि ’ भई मेरे को काला कलूटा बैंगन ही प्रिय है, और वह भी आज के मीनू में है.. ’ फिर कोई भी पूर्वाग्रह का अँदेशा लेकर नहीं आयेगा, क्योंकि उसके  अन्य विकल्प की अपेक्षायें पूर्ण होती हैं !<br />
 एक सार्वजनिक मँच पर जब आप कोई विषय उठाते हैं, तो यह तय हो जाना चाहिये कि आज की चर्चा की थीम क्या है<br />
यदि किसी चर्चा में केवल निजी पसँद के चिट्ठों की ही बात करनी है, तो यह पहले स्पष्ट हो जाये कोई बखेड़ा ही नहीं<br />
अगली चर्चा किसी सामाजिक विषय को लेकर हो सकती है, मसलन ’ मधु कौड़ा ’,<br />
अब यह बदज़ायका डिश जिन भी ब्लॉगर्स ने परोसी है.. उस सब को समेट लिया जाय, वह एक अलग मज़ा देगी !<br />
यदि किसी दिन पिछले 24 घँटों या पिछले सप्ताह आये चिट्ठों की चर्चा की जाये, तो पाठकों का भी सहभागिता करने का मन बनेगा ।<br />
मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि चर्चा और रनिंग कमेन्ट्री में अँतर है..<br />
चर्चा के मायने हैं विमर्श, जो  सहमति और असहमति के बीच आपकी सोच को नये आयाम दे<br />
मैं पहले भी कह चुका हूँ, देर सवेर श्रेणीबद्ध या विषयबद्ध चर्चाओं की आवश्यकता पड़ेगी, वरना चूल्हे अलग होते रहेंगे !<br />
नतीज़ा, बहु-खिचड़ी त्रस्त हिन्दी ब्लॉगर समाज !</p>
<p>नहीं जानता कि यह टिप्पणी तुम तक पहुँचेगी भी या नहीं, क्योंकि टिप्पणी फ़ॉलो=अप का विकल्प रखना या न रखना भी ब्लॉग मालिक के परिधि में आता है, अब ?<br />
</em></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Ranjana</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44026</link>
		<dc:creator>Ranjana</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 10:50:04 +0000</pubDate>
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		<description>पोस्ट पढ़ते हुए बहुत सी बात ध्यान में आ रही थी,जिन्हें सोचा टिपण्णी में सजा दूंगी...पर मुकेश जी की इस कविता ने कुछ ऐसे भावुक किया कि दिमाग से सब फुर्र हो गया...

चिठ्ठा चर्चा मुझे तो बड़ा ही जिम्मेदारी का काम लगता है..क्योंकि मुझे लगता है,चर्चाकाल में एक निष्पक्ष पञ्च सा कर्तब्य निबाहना चाहिए...जब चिठ्ठों की चर्चा की बात /उदेश्य हो तो अधिकाधिक चिठ्ठों को पढ़कर फिर उनमे से बेहतर चिठ्ठों का जिक्र होना चाहिए और निश्चित टूर पर सामाजिक सरोकार तथा ऐसे विषय जिसमे समाज हित की बात हो,को प्रमुखता मिलनी चाहिए...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पोस्ट पढ़ते हुए बहुत सी बात ध्यान में आ रही थी,जिन्हें सोचा टिपण्णी में सजा दूंगी&#8230;पर मुकेश जी की इस कविता ने कुछ ऐसे भावुक किया कि दिमाग से सब फुर्र हो गया&#8230;</p>
<p>चिठ्ठा चर्चा मुझे तो बड़ा ही जिम्मेदारी का काम लगता है..क्योंकि मुझे लगता है,चर्चाकाल में एक निष्पक्ष पञ्च सा कर्तब्य निबाहना चाहिए&#8230;जब चिठ्ठों की चर्चा की बात /उदेश्य हो तो अधिकाधिक चिठ्ठों को पढ़कर फिर उनमे से बेहतर चिठ्ठों का जिक्र होना चाहिए और निश्चित टूर पर सामाजिक सरोकार तथा ऐसे विषय जिसमे समाज हित की बात हो,को प्रमुखता मिलनी चाहिए&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Panchayati</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44025</link>
		<dc:creator>Panchayati</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 08:33:14 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/archives/1093#comment-44025</guid>
		<description>ये साईड पट्टी वाले विज्ञापनों से कितना पैसा मिल रहा है इसको भी चर्चा मे हिसाब सहित बताया जाये.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये साईड पट्टी वाले विज्ञापनों से कितना पैसा मिल रहा है इसको भी चर्चा मे हिसाब सहित बताया जाये.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shiv Kumar Mishra</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44024</link>
		<dc:creator>Shiv Kumar Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 08:28:09 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/archives/1093#comment-44024</guid>
		<description>बढ़िया लेख.
मेरा अनुभव यह रहा है कि चिट्ठाचर्चा एक लोकतान्त्रिक मंच है. कम से कम चर्चाकार होकर मैं यह कह सकता हूँ कि चिट्ठाचर्चा का कोई गुप्त अजेंडा नहीं है. सफाई नहीं दे रहा हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि सफाई देने की ज़रुरत नहीं है. रही बात आरोपों की तो ऐसी बातें शक की वजह से होती रही हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया लेख.<br />
मेरा अनुभव यह रहा है कि चिट्ठाचर्चा एक लोकतान्त्रिक मंच है. कम से कम चर्चाकार होकर मैं यह कह सकता हूँ कि चिट्ठाचर्चा का कोई गुप्त अजेंडा नहीं है. सफाई नहीं दे रहा हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि सफाई देने की ज़रुरत नहीं है. रही बात आरोपों की तो ऐसी बातें शक की वजह से होती रही हैं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: dr anurag</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/1093/comment-page-1#comment-44023</link>
		<dc:creator>dr anurag</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Nov 2009 08:12:01 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/archives/1093#comment-44023</guid>
		<description>लेख महत्वपूर्ण होता है लेखक नहीं.......चिटठा चर्चा तो  बस कुछ चुनी हुई पोस्टो  का संकलन है .जिसे उस चिट्ठकार ने अपनी समझ ओर अपनी पसंद से चुना है .......अजीब बात है के हम कागजो में वो क्यों दिखने की कोशिश करते है जो हम असल में नहीं है ...आप टी वी देखते है .उसमे आने वाले सरे कार्यकर्म  आपको पसंद नहीं आते तो आप क्या करते है .रिमोट से चैनल बदल देते है ....यही  ब्लोगिंग में कीजिये जो आपको अच्छा लगे उसे पढ़िए जो नहीं...उसे नहीं ....जिस पर मन टिपियाने का हो उस पर टिपिया दीजिये ...प्रशंसा सभी को अच्छी लगती है ....परन्तु  किसी ब्लोगर को सर्टिफाइड होने के लिए न तो किसी अखबार की प्रशंसा या चिटठा चर्चा के सरटिफिकेट  की   जरुरत है.?.नया ज्ञानोदय में  ने प्रेम पर चार विशेषांक निकले है ....पर बिहार के किसी नौजवान अनजाने लेखक की   एक प्रेमकहानी मुझे सबसे  अच्छी लगी थी  ......कितने ओर लोगो को भी अच्छी लगी होगी .किसी को नहीं भी...पसंद एक निजी मसला है ...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लेख महत्वपूर्ण होता है लेखक नहीं&#8230;&#8230;.चिटठा चर्चा तो  बस कुछ चुनी हुई पोस्टो  का संकलन है .जिसे उस चिट्ठकार ने अपनी समझ ओर अपनी पसंद से चुना है &#8230;&#8230;.अजीब बात है के हम कागजो में वो क्यों दिखने की कोशिश करते है जो हम असल में नहीं है &#8230;आप टी वी देखते है .उसमे आने वाले सरे कार्यकर्म  आपको पसंद नहीं आते तो आप क्या करते है .रिमोट से चैनल बदल देते है &#8230;.यही  ब्लोगिंग में कीजिये जो आपको अच्छा लगे उसे पढ़िए जो नहीं&#8230;उसे नहीं &#8230;.जिस पर मन टिपियाने का हो उस पर टिपिया दीजिये &#8230;प्रशंसा सभी को अच्छी लगती है &#8230;.परन्तु  किसी ब्लोगर को सर्टिफाइड होने के लिए न तो किसी अखबार की प्रशंसा या चिटठा चर्चा के सरटिफिकेट  की   जरुरत है.?.नया ज्ञानोदय में  ने प्रेम पर चार विशेषांक निकले है &#8230;.पर बिहार के किसी नौजवान अनजाने लेखक की   एक प्रेमकहानी मुझे सबसे  अच्छी लगी थी  &#8230;&#8230;कितने ओर लोगो को भी अच्छी लगी होगी .किसी को नहीं भी&#8230;पसंद एक निजी मसला है &#8230;</p>
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