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	<title>Comments on: वीर रस में प्रेम पचीसी</title>
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	<description>हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै?</description>
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		<title>By: कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-32250</link>
		<dc:creator>कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 27 Oct 2008 07:54:28 +0000</pubDate>
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		<description>[...]  वीर रस में प्रेम पचीसी  हमारे पिछली पोस्ट पर समीरजी ने टिप्पणी की :- [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...]  वीर रस में प्रेम पचीसी  हमारे पिछली पोस्ट पर समीरजी ने टिप्पणी की :- [...]</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-27756</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Aug 2008 15:45:10 +0000</pubDate>
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		<description>आप धन्य हैँ महाराज!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप धन्य हैँ महाराज!</p>
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		<title>By: anitakumar</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-27652</link>
		<dc:creator>anitakumar</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 24 Aug 2008 06:07:51 +0000</pubDate>
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		<description>वाह पढ़ कर ही इतना अच्छा लगा तो सुनने में कितना अच्छा लगेगा हम इसकी कल्पना कर सकते हैं। जैसा आप ने सही कहा हम जैसे लोग जिनका उत्तर प्रदेश के गावों से कोई संबध नहीं रहा तो आल्हा के बारे में हमारी जानकारी काफ़ी कम है। इसे पोडकास्ट कर सुनाए तो कुछ ज्यादा आनंद आये। आल्हा से संबधित और जानकारी भी दें (पोडकास्ट के साथ) तो हम जैसे जो उत्तर प्रदेश को कुछ कम जानते है उनकी भी जानकारी बड़े। आशा करती हूँ कि समीर जी का कहा कि आप फ़ौरन मांग पूरी करते है वो सच ही साबित होगा…:)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह पढ़ कर ही इतना अच्छा लगा तो सुनने में कितना अच्छा लगेगा हम इसकी कल्पना कर सकते हैं। जैसा आप ने सही कहा हम जैसे लोग जिनका उत्तर प्रदेश के गावों से कोई संबध नहीं रहा तो आल्हा के बारे में हमारी जानकारी काफ़ी कम है। इसे पोडकास्ट कर सुनाए तो कुछ ज्यादा आनंद आये। आल्हा से संबधित और जानकारी भी दें (पोडकास्ट के साथ) तो हम जैसे जो उत्तर प्रदेश को कुछ कम जानते है उनकी भी जानकारी बड़े। आशा करती हूँ कि समीर जी का कहा कि आप फ़ौरन मांग पूरी करते है वो सच ही साबित होगा…:)</p>
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		<title>By: फ़ुरसतिया &#187; भैंस बियानी गढ़ महुबे में</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-834</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया &#187; भैंस बियानी गढ़ महुबे में</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Apr 2006 18:55:40 +0000</pubDate>
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		<description>[...] लक्ष्मी नारायण जी की नकल करते हुये हमने जब कुछ तुकबंदियां कीं तो पता चला कि कुछ साथी आल्हा से परिचित नहीं हैं। वास्तव में आल्हा उत्तरभारत के गांवों में बहुतायत में प्रचलित है। जिनका संपर्क गांवों से कम रह पाया वे शायद इसके बारे में कम जानते हों। साथियों की जानकारी के लिये आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखित &#8216;हिंदी साहित्य का इतिहास &#8216;से आल्हा से संबंधित जानकारी यहां दी जा रही है:- ऐसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक नाम के एक भाट थे,जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों -आल्हा और ऊदल(उदयसिंह)- के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया। जगनिक के काव्य का कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषाभाषी प्रांतों के गांव-गांव में सुनाई देते हैं। ये गीत &#8216;आल्हा&#8217; के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाये जाते हैं। गावों में जाकर देखिये तो मेघगर्जन के बीच किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह हुंकार सुनाई देगी- [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] लक्ष्मी नारायण जी की नकल करते हुये हमने जब कुछ तुकबंदियां कीं तो पता चला कि कुछ साथी आल्हा से परिचित नहीं हैं। वास्तव में आल्हा उत्तरभारत के गांवों में बहुतायत में प्रचलित है। जिनका संपर्क गांवों से कम रह पाया वे शायद इसके बारे में कम जानते हों। साथियों की जानकारी के लिये आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखित &#8216;हिंदी साहित्य का इतिहास &#8216;से आल्हा से संबंधित जानकारी यहां दी जा रही है:- ऐसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक नाम के एक भाट थे,जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों -आल्हा और ऊदल(उदयसिंह)- के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया। जगनिक के काव्य का कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषाभाषी प्रांतों के गांव-गांव में सुनाई देते हैं। ये गीत &#8216;आल्हा&#8217; के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाये जाते हैं। गावों में जाकर देखिये तो मेघगर्जन के बीच किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह हुंकार सुनाई देगी- [...]</p>
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	<item>
		<title>By: फ़ुरसतिया &#187; कुछ इधर भी यार देखो</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-821</link>
		<dc:creator>फ़ुरसतिया &#187; कुछ इधर भी यार देखो</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 22 Apr 2006 07:23:34 +0000</pubDate>
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		<description>[...] बहरहाल ये तो ऐसे ही कुछ ऊँची हांकने के लालच में लिख दिया। अगर ठीक समझे हों तो मिस़रा उठाइये नहीं तो हियां की बातें हियनै छ्‌वाडौ़ अबआगे का सुनौ हवाल। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] बहरहाल ये तो ऐसे ही कुछ ऊँची हांकने के लालच में लिख दिया। अगर ठीक समझे हों तो मिस़रा उठाइये नहीं तो हियां की बातें हियनै छ्‌वाडौ़ अबआगे का सुनौ हवाल। [...]</p>
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	<item>
		<title>By: आशीष</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-791</link>
		<dc:creator>आशीष</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Apr 2006 11:04:07 +0000</pubDate>
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		<description>चलो मै बच गया इस बार :-)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चलो मै बच गया इस बार <img src='http://hindini.com/fursatiya/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-789</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Apr 2006 16:19:47 +0000</pubDate>
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		<description>अमा शुकुल आल्हा का मजा पढने से ज्यादा सुनने मे आता है, इसलिए आधी तारीफ़ ही करुंगा, बकिया आडियो वर्जन सुनाओ तब करेंगे।

वैसे अब तुम्हारे हाथ कविताओं मे भी काफ़ी खुल गये है, तुम तो फ़्री स्टाइल पहलवान की तरह हो गये हो, चाहे WWF मे लड़वा दो या चाहो तो गाँव के दंगल में। लगे रहो...टकाटक।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमा शुकुल आल्हा का मजा पढने से ज्यादा सुनने मे आता है, इसलिए आधी तारीफ़ ही करुंगा, बकिया आडियो वर्जन सुनाओ तब करेंगे।</p>
<p>वैसे अब तुम्हारे हाथ कविताओं मे भी काफ़ी खुल गये है, तुम तो फ़्री स्टाइल पहलवान की तरह हो गये हो, चाहे WWF मे लड़वा दो या चाहो तो गाँव के दंगल में। लगे रहो&#8230;टकाटक।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: लक्ष्मीनारायण </title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-787</link>
		<dc:creator>लक्ष्मीनारायण </dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Apr 2006 11:53:57 +0000</pubDate>
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		<description>अनूप शुक्ला जी, 

अब हम क्या कहें। गुरु गुड़ ही रहा और चेला शक्कर हो गया। बहरहाल आपकी भौजी की तरफ से एक सन्देश है: 

&lt;b&gt;भौजी का सन्देश देवर सुकुल जी के लिये&lt;/b&gt; 

जिनके देवर ऐसे होवैं, उनका काह परी परवाह 

नैन लड़ावैं हम सैंयाँ से देउरा दीन्हीं बात बनाय 

अमरीका जब देवर ऐहौ, कढ़ी भात हम देब खिलाय 

जग जाहिर है कढ़ी हमारी, वाकी सैंयाँ करी न बात 

उनकी मठरिन का गावत हैं, देवर सही कही तुम बात 



लक्ष्मीनारायण</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप शुक्ला जी, </p>
<p>अब हम क्या कहें। गुरु गुड़ ही रहा और चेला शक्कर हो गया। बहरहाल आपकी भौजी की तरफ से एक सन्देश है: </p>
<p><b>भौजी का सन्देश देवर सुकुल जी के लिये</b> </p>
<p>जिनके देवर ऐसे होवैं, उनका काह परी परवाह </p>
<p>नैन लड़ावैं हम सैंयाँ से देउरा दीन्हीं बात बनाय </p>
<p>अमरीका जब देवर ऐहौ, कढ़ी भात हम देब खिलाय </p>
<p>जग जाहिर है कढ़ी हमारी, वाकी सैंयाँ करी न बात </p>
<p>उनकी मठरिन का गावत हैं, देवर सही कही तुम बात </p>
<p>लक्ष्मीनारायण</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-786</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Apr 2006 06:07:38 +0000</pubDate>
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		<description>अनूप भाई,
शर्मा शर्मी मे देखत है कैसन लाली लिये हैं गाल
फ़िर भी कौनो कसर ना छोडी सबको करे आप बेहाल
हमरी मांग पढिके उस पर धरे तुरत ही अपने कान
आगन कि कथा जोडिके &lt;b&gt;लगभग&lt;/b&gt; पूरा किया बखान
तुमको कैसे धन्नबाद दे इसहि सोच मे बीती शाम
शायद इससे नेता सिखें कुछ तो दें जनता पर ध्यान
तुरत ना माने मांगें फ़िर भी कभी तो धर दें उनपे कान.

समीर लाल</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप भाई,<br />
शर्मा शर्मी मे देखत है कैसन लाली लिये हैं गाल<br />
फ़िर भी कौनो कसर ना छोडी सबको करे आप बेहाल<br />
हमरी मांग पढिके उस पर धरे तुरत ही अपने कान<br />
आगन कि कथा जोडिके <b>लगभग</b> पूरा किया बखान<br />
तुमको कैसे धन्नबाद दे इसहि सोच मे बीती शाम<br />
शायद इससे नेता सिखें कुछ तो दें जनता पर ध्यान<br />
तुरत ना माने मांगें फ़िर भी कभी तो धर दें उनपे कान.</p>
<p>समीर लाल</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: sanjay &#124; joglikhi</title>
		<link>http://hindini.com/fursatiya/archives/122/comment-page-1#comment-785</link>
		<dc:creator>sanjay &#124; joglikhi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Apr 2006 04:03:23 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://hindini.com/fursatiya/?p=122#comment-785</guid>
		<description>चिट्ठा जगत के ‘कुङे-करकट’ में आपके इन मोतीयों का आल्हा लोक-शैली कि लय से अपरिचित होने के कारण समुचित रसास्वादन नहीं कर पाया, इस बात का खेद रहेगा. वैसे आपके उम्मदा प्रयास के लिए बधाई.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चिट्ठा जगत के ‘कुङे-करकट’ में आपके इन मोतीयों का आल्हा लोक-शैली कि लय से अपरिचित होने के कारण समुचित रसास्वादन नहीं कर पाया, इस बात का खेद रहेगा. वैसे आपके उम्मदा प्रयास के लिए बधाई.</p>
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